Thursday, September 30, 2010

मगनखोला

मैं आया था यहाँ चुपके चुपके
अपनी ही भूमि पर
एक नितांत अजनबी की तरह
कई गाँठों वाली यादों की डोर से
अपना बचपन बाँध कर ले जाने के लिये।

मैं दस साल का था जब मैंने अपना गाँव छोड़ा था। उस समय गाँव की आबादी लगभग 40 थी, जिसमें से लगभग 10 जने फौज में या रोजी रोटी के चक्कर में बाहर रहते थे। साल-दो-साल में छुट्टी आते थे।

मगनखोला की बाईं ओर छोटा गाँव नवगाँव है जो मगनखोला से तो बड़ा ही है और दाहिनी ओर बड़ा गाँव बुडलगाँव है।

हमारा परिवार कलकत्ते जा कर बस गया था। गाँव से संबंध रहता ही था। चिट्ठी-पत्री चलती ही थी। पिता जी रिटायर होने के बाद गाँव में रहने आये थे। एक साल से अधिक नहीं रह पाये। खेती-बाड़ी नहीं कर सकते थे। सुविधाहीन पहाड़ी कठिन जीवन था। करने को कुछ था नहीं। पेन्शन के पैसों से सामान लाकर उस पहाड़ पर खाते थे। फिर साहस कर पिथैरागढ़ में रेस्तराँ खोला। तब का जमाना था। रेस्तराँ चला नहीं। अंत में तराई में घर बना कर वहीं रहने आये तो फिर गाँव का मुँह नहीं देखा। हम बाकी लोग तो बाहर ही बस गये थे। पहाड़ जाने के नाम पर पिथौरागढ़ में ही रुक जाते थे। कभी एक दिन के लिये कभी गाँव भी हो आते।

लगभग यही हाल मगनखोला के अन्य परिवारों का था। देखते देखते गाँव खाली हो गया। और अब तो उजाड़ है।




कुछ साल पहले जब मैं मगनखोला गया था तो यह दृश्‍य देखा और कैमरे में कैद कर लिया।
ये तीन औरतें, करीब तीन सालों से अकेली मगनखोला में रह रहीं थी। बाएँ वाली रिश्ते में मेरी भाभी लगती हैं।
बीच की लड़की बोल नहीं पाती है, गूँगी है। प्यार से सब उसे लाटी बुलाते हैं। साथ कहने को जग्गू नाम का कुत्ता था। एक रात को बाघ आया। किसी तरह उन तीनों ने अपनी जान बचाई पर जग्गू को नहीं बचा पाये। उसे बाघ ले गया था। और अगले दिन ही उन तीनों ने गाँव छोड़ दिया था।







लाटी पेड़ पर चढ़ी हुई है मेरे लिये नारंगी तोड़ रही है।






















यह पिछले साल का चित्र है। वही जगह है, अब यहाँ कोई नहीं रहता है।





घर के सामने की खुली जगह को खाला बोलते हैं। इसी खाला में मेरा बचपन बीता था। यहाँ पर त्यौहारों में और खुशी के अवसरों पर खेल (कुमाऊँनी झोड़ा, सामूहिक नाच) होते थे।
इसी खाला में मैंने पहली बार तिब्बती लामा को देखा था। हमें बचपन में डराया जाता था कि ढंग से रहो नहीं तो लामा अपनी झोली में डाल कर ले जाएगा। इसी खाला में हुड़क्या हुड़क्यानि का नाच भी देखा था।

अखरोट का पेड़। इसके अखरोट हाथ से हलका दबाते ही टूट जाते हैं। अब भी नवगाँव के लोग आते हैं और पुराने दिनों को याद करते हुए अखरोट ले जाते हैं।


गाँव के पास से काली नदी का दृश्य।











मगनखोला का मंदिर। भरे-पूरे दिनों में यहॉं शादी व्‍याह में लंगर लगते थे।









गाँव की एक ओर जानवरों के रहने के लिये खर्क थे। सब के सभी खर्क अब गिर चुके हैं। खर्क की सीढ़ियों से हिमालय का दृश्य अभी तक याद है।









बीते दिनों को पकड़ने की चेष्टा की
पर गहन सन्नाटे को भेद नहीं पाया
साँसों की आवाज ने चौंकाया
अंदर ही अंदर क्या कुछ फूटा पता नहीं
क्यों हुईं आँखें नम पता नहीं

अब यहाँ कोई नहीं रहता।
अब यहाँ कोई नहीं आता।

यहाँ मेरा बचपन बीता था।

Monday, August 9, 2010

स्वयंवर 2010 – एक इमोशनल अत्याचार

मथुरा जी, नाटक कर रहे है। बहुत अच्छा कर रहे हैं।

धन्यवाद।

कौन सा नाटक कर रहे हैं?

स्वयंवर 2010

अरे आप टीवी में कब से बनाने लगे। बताया ही नहीं। हम को भी चांस दीजिए न। हा हा हा

स्वयंवर 2010 नाटक है। रंगशाला में खेला जा रहा है।

आछा। हम समझे रियेल्टी शो टाइप का कुछ है। कामेडी है?

जी नहीं। ड्रामा है।

वो तो हम समझ गये हैं कि यह ड्रामा है यानी नाटक है। हम पूछ रहे थे कि कामेडी है क्या?

कामेडी नहीं है। भावना प्रधान नाटक है।

आछा। हँसी का एक्को सीन नहीं है क्या?

है न। गंभीर नाटक है पर हँसी के सीन भी हैं।

नाटक में हँसी के सीन हैं तो नाटक कामेडी हुआ न। आपने हमको उलझा दिया। नाटक का नाम 2010 है तो कामेडी ही होना चाहिये।

2010 नहीं, स्वयंवर 2010

वही। खाली स्वयंवर से ही पता चलता है कि नाटक कामेडी है। अब आप नाम रखे है स्वयंवर 2010, शक की कोई गुंजाइश ही नहीं। नाटक कामेडी ही होगा। आप नाटक में भले ही कुछ विचार उचार रख दिए होंगे।

आप नाटक देखेंगे तो पता चल जाएगा।

अरे काहे नहीं देखेंगे। आपका नाटक है हम जरूर देखेंगे। कितना टिकट रखे हैं?

100 रुपया।

बहुत अच्छा है। हमको तो आप पास देते ही हैं। इस बार एक पास एक्स्ट्रा दीजिएगा। महेश बाबू को भी हम साथ में ले आयेंगे। आपके लिये नाटक के दर्शक जो बढ़ाने हैं।

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Saturday, June 5, 2010

एक झूठ - शेष कहानी

उसे जितनी दूर तक जाना चाहिये था वह उतनी दूर ही गया। क्या यह सच था ? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह अपने आप से ही झूठ बोल रहा हो!




'कब से जानती हो उसे?'

'वैसे तो उसे मैं बहुत दिनों से जानती हूँ। मेरे साथ ही पढ़ता था।'

'और ऐसे कब से जानती हो!'

'एक साल से।'

'शादी करोगी उससे?'

'हाँ।

'तुम्हारे घरवाले जानते हैं?'

'नहीं।'

'मान जायेंगे!'

'नहीं।'

'फिर!'

'पता नहीं। मैंने बहुत सोचा पर कुछ समझ में नहीं आता।'

'लड़का क्या कहता है?'

'कुछ नहीं।'

'कुछ तो कहता होगा।'

'नहीं, इस बारे में कुछ नहीं कहता। बस कहता है कि समय आने पर देखा जायेगा।'

'और समय कब आयेगा?'

'आ गया है। कुछ रिश्ते आये हैं। एक पर मम्मी और डैडी गंभीरता से सोच रहे हैं।'

'और तुम्हें अभी तक पता नहीं है कि तुम दोनों क्या करने वाले हो?'

उत्तर में जानकी ने नकारात्मक में सिर हिलाया था।

'उसके माँ-बाप क्या कहते हैं?'

'वे तो मुझे बहुत मानते हैं। ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे मनमोहन मुझसे एक या दो दिन में ही शादी करने वाला हो।'

'और मनमोहन तुमसे कुछ नहीं कहता है!'

वह चुप ही रही थी।

'उसे मालूम है तुम्हारे लिये रिश्ते आ रहे हैं?'

'हाँ।'

'फिर वह चुप कैसे रह सकता है!'

'वह कहता है कि मैं अपने मॉ-बाप से बात करूँ।'

'अपने माँ-बाप से बात करने का साहस है तुममें?'

फिर एक बार वह चुप रही थी।

'वह करता क्या है?'

'नौकरी की तलाश में है।'

'जानकी, तुमने कभी सोचा है कि वह तुम्हारे साथ केवल समय बिताना चाहता है?'

'यह कैसे कह सकते हैं आप!'

'मैं तुमसे केवल पूछ रहा हूँ। कभी गौर किया है इस बारे में तुमने?'

'वह मुझसे शादी करना चाहता है। उसने मुझे अंगूठी भी दे रखी है।'कुछ उत्तेजित होते हुये उसने कहा था।

'तुम मुझे यह सब क्यों बता रही हो!'

'आप पूछ रहे हैं, इसलिये।'

खैर, जो भी करना सोच समझ कर करना। मैंने बुजुर्गी ओढ़ते हुये कहा था। बात मेरे लिये विशेष महत्व नहीं रखती थी। मेरे विचार से लड़की गलती कर रही थी। उसे सावधान करना मेरा कर्तव्य था, वह मैंने कर दिया। आगे वह जाने।

मेरी बात जानकी को अच्छी नहीं लगी थी। उसके हाव-भाव यही बता रहे थे। मैं सोच रहा था कि वह अब उठ कर चली जायेगी। वह गई नहीं, बैठी रही। बातों का सिलसिला कायम रखने के लिये मैंने उससे पूछा था,

'गर्मी की छुट्टियों में जब तुम आई थीं, तो तुमने उस लड़के के संबंध में कुछ नहीं कहा था।'

'आपने पूछा ही नहीं था।' उसने कहा था।

'मुझे क्या मालूम था जो पूछता! जिस तरह तुम मुझसे घुलमिल गई थीं, उससे मैं तो कुछ और ही सोच रहा था।' मैंने कहा था और कहने के साथ ही मैं सोचने लगा था कि यह मैं क्या कह गया। जानकी यदि यह पूछे कि मैं क्या सोच रहा था तो असमंजस में पड़ जाऊँगा। जानकी ने पूछा भी था। 'कुछ नहीं, ऐसे ही..' कह कर मैंने बात वहीं समाप्त करने की चेष्टा की थी।

'नहीं, बताइये न।' जिद करते हुये जानकी ने कहा था।


किसी लड़की के साथ आपने बुरूँज के फूल तोड़े हों और वह जानकी की तरह आपके पास बैठ कर जिद कर रही हो तो वह लड़की आपको उस समय प्यारी लगेगी ही। जानकी उस समय मुझे भी प्यारी लग रही थी। उसका हाथ मैंने अपने हाथ में ले लिया था। उसने भी छुड़ाने का कोई प्रयत्न नहीं किया था। उसी समय अंजना उसे खोजती हुई आई थी। वह उठ कर उसके साथ चली गई थी और मैं सोचता रह गया था।

मेरे पास ढेरों काम थे। मैं उनमें जुट गया था। लेकिन दिमाग में जानकी थी। मैं यही सोच रहा था कि कहीं वह बेवकूफी न कर बैठे। दोपहर खाने के बाद जब पंडित परिवार आराम कर रहा था वह फिर नीचे मेरे पास आई थी।

'जानकी मैं तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था। मुझे नही लगता कि तुम्हारी जोड़ी मनमोहन के साथ बैठेगी।' मैंने कहा था।
'यह कैसे कह सकते हैं आप?' उसने पूछा था। इस समय उसके स्वर में उत्तेजना नहीं थी।
'तुम जानती ही कितना हो उसको? चोरी छिपे मिलती होगी, वह भी थोड़े समय के लिये। मुझे तो यह भी विश्वास नहीं है कि तुम उससे प्यार करती हो।'
'करती हूँ।' जानकी ने कहा था। मुझे उसकी आवाज खोखली लगी थी।
'मुझे पूर्णतया विश्वास नहीं होता।' मैंने कहा था। 'अच्छा एक बात बताओ, मेरे साथ बात करना तुम्हें कैसा लगता हे?'

'अच्छा लगता है।' उसने कहा था।

'केवल अच्छा लगता है, बस! यह जो अपने भेद बता रही हो मुझे, पिछली गर्मी में इतना घूमीं मेरे साथ, यह सब क्या यह नहीं दिखाता कि यह अच्छा लगने की सीमा से कुछ अधिक ही है।'

'हाँ, बहुत अच्छा लगता हे।' उसने कहा था।

'क्या यह अच्छा लगना प्यार में नहीं बदल सकता!' मैंने कहा था। आशा के विपरीत वह मेरी बात से विचलित नहीं हुई थी। शांत और सयाने भाव में उसने उत्तर दिया था,

'प्यार और अच्छा लगना एक बात थोड़े ही है।'

'प्यार जब होता है तो कोई धमाका थेड़े ही होता है? बस ऐसे ही तो आरंभ होता है।'

'शायद।' उसने बहुत धीमे स्वर में उत्तर दिया था।
'शायद क्या? ऐसे ही होता है।'मैने कहा था । 'मान लो, तुमको किसी कारणवश छह या सात महीनों के लिये यहीं मेरे होटल में रुकना पड़ जाय तो क्या हमारे संबंध गाढ़े नहीं हो जायेंगे? तुम मेरे संबंध मेंे बबहुत कुछ जान जाओगी और मैं तुम्हारे संबंध में। मेरा तो विश्वास हे कि तुम मुझसे ही प्यार करने लग जाओगी। मनमोहन अतीत का विषय हो जायेगा।'

'मैं क्या जानूँ?' उसने कहा था।
'यह जो तुम मैं क्या जानूँ बोल रही हो न, मैंने अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुये कहा था,'उसी से पा चलता है कि बात संभव है। नहीं तो तुम कहतीं कि ऐसा हो ही नहीं सकता है। तुम बोलतीं कि मनमोहन को प्यार करने के बाद कोई दूसरा व्यक्ति तुम्हारे जीवन में आ ही नहीं सकता।'

'मैं क्या जानूँ?' उसका एक ही उत्तर था।

इसके बाद हम दोनों के बीच थेड़ी चुप्पी छा गई थी। वह क्या सोचने लगी थी यह तो वही जाने, लेकिन थोड़ी देर केलिये मेरे जहन में यह सवाल उभरा था कि क्या यह संभव है? थेड़ी देर से अधिक मैं इस सवाल पर हीं ठहर सका था। मेरे मामा-चाचा क्या कहते! भाई भूखे हैं, बहन अनब्याही है, बाप क्षय रोग का मरीज है और द्वारका अपनी जिम्मेदारी को ताक पर रख कर इश्क फरमा रहा है। लेकिन मनमोहन के प्रति जानकी का मोह मुझे अच्छा नहीं लग रहा था या यूँ कहना चाहिये गलत लग रहा था। इसलिये उसी बात को आगे बढ़ाते हुये मैंने जानकी से कहा था,

'अच्छा जानकी, एक बात बताओ। अभी जो परिस्थिति मैंने बाताई है, उसमे तुम मुझसे प्यार करने लगोगी या नहीं?'

'पहले आप बताइये।' जानकी ने कहा था।

'मैं क्या बताऊँ?' मैंने पूछा था। जान कर अनजान बनते हुये।

'उस परिस्थिति में आप मुझसे प्यार करने लगते या नहीं?' शब्दों में लटकते हुये जानकी ने पूछा था।

अब मैं उसे अपने मामा-चाचा, भाई-बहन की बात क्या बताता। मैंने उत्तर दिया था,

'मैंने यह प्रश्न ही इसलिये पूछा है कि यह संभव है। कम से कम मेरी ओर से। तुम्हारी बात तुम बताओ।'

'मैं क्या बताऊँ?' उसने कहा था। जैसे मुझसे कह रही हो कि मेरे इस 'मैं क्या बताऊँ' में तुम अपने मन की बात खोज सकते हो खोज लो।

'जो तुम्हारी समझ में आता है, बताओ।' मैंने उसे प्रोत्साहित करते हुये कहा।

'हो सकता है जो आप कह रहे हैं वह संभव हो।' जानकी ने कहा था और कहने के साथ उसने अपनी आँखें झुका ली थीं।

उसका चेहरा रक्तिम हो रहा था। शायद वह नहीं चाहती थी कि उसके मन के भाव मैं उसके चेहरे पर पढ़ूँ, इसीलिये वह 'अभी मैं चलती हूँ' कह कर झट से उठ खड़ी हुई थी। मैं भी उसके साथ उठ गया था। पल के शतांश भर के लिये वह ठिठकी खड़ी रही, जिस समय मैंने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया था और उसके साथ ही वह मुझसे आलिंगनबद्ध हो गई थी।

उन लोगों के नैनीताल से जाने के बाद, एक-दो दिन में ही मुझे जानकी का पत्र मिला था। उसने पूछा था कि वह मेरे प्रति क्यों आकर्षित हो रही है जब कि वह मनमोहन से प्रेम करती है! मनमोहन के साथ तो उसका व्यवहार बातों तक ही सीमित था, लेकिन मेरे साथ तो वह बहुत आगे बढ़ गई थी। पत्र के अंत में जानकी ने हमारे संबंध के औचित्य पर भी शंका प्रकट की थी।

इसके बाद उसका दूसरा पत्र नहीं आया। ऐसा नहीं कि मुझे उसके दूसरे पत्र की प्रतीक्षा नहीं थी। प्रतीक्षा थी। स्वभावत: मैं जानकी को लेकर सपने देखने की बेवकूफी तो नहीं कर सकता था। हाँ, मुझे यह चिंता अवश्य थी कि कहीं जानकी मनमोहन को ले कर बचपना न कर बैठे। इसलिये जानकी का पत्र न आने पर मुझे बेचैनी हुई थी। दूसरी और महत्वपूर्ण बात यह थी कि वे लोग मेरे अच्छे ग्राहक थे। नैनीताल में बड़ी तगड़ी प्रतिद्वंद्विता रहती है। अपने बँधे-बँधाये ग्राहक खोना कोई नहीं चाहता है।

दो-तीन महीने तो ऐसे ही बीत गये। फिर मैंने मिस्टर पंडित को लिखा कि इस गर्मी के सीजनकी बुकिंग के लिये पत्र आ रहे हैं। यदि वे लोग आ रहे हैं तो मैं अपना होटल उनके लिये ही बुक करना चाहूँगा, क्यों कि वे लोग मेरे पुराने, नियमित और अच्छे ग्राहक हैं। फिर परिवार की कुशलक्षेम के साथ मैंने जानकी की कुशलक्षेम भी पूछी थी। उत्तर मिस्टर पंडित ने ही दिया था। मेरे पत्र के लिये उन्होंने मुझे धन्यवाद दिया था। लिखा था 'हम लोग कुशपूर्वक हैं', इस 'हमलोग' में जानकी के साथ उनके परिवार के सभी सदस्य आ गये थे। उन्होंने मई की 7 तारीख से 10 तारीख तक होट की बुकिंग के लिये भी लिखा था। मैंने बुकिंग पक्की करके, इस आशय का पत्र लिख भेजा था। जिसका उत्तर नहीं आया था।

खैर, मई की 7 तारीख की सुबह वे लोग पहुँच गये थे। मैं उनको लेने बस अड्डे गया था। बस अड्डे से वापस होटल आते समय जानकी अपनी माँ-बहन के साथ ही रही थी। पिछली बार की तरह दो कदम ठिठक कर मेरे साथ नहीं हुई।

होटल पहुँच कर वे लोग अपना सामान खोलने लगे और मैंने चाय भिजा दी। मैं नीचे रेस्तारॉ में ही बैठा रहा। आशा थी कि शायद पहले की तरह जानकी मेरे साथ चाय पीने नीचे आये। सीढ़ियों से पहले अंजना उतरी थी। आते ही उसने कहना आरंभ किया था,

'द्वारका जी आपको एक ताजा खबर सुनाती हूँ, जानकी दीदी...' वह अपनी बात पूरी नहीं कर पाई थी। जानकी ने, जो उसके पीछे ही सीढ़ियाँ उतर रही थी , उसे डाँट कर चुप करा दिया था।

'चलो भई, हम चुप हो जाते हैं। तुम्हीं बताओ अपनी सगाई की बात।' अंजना ने कहा था। तब मेरी समझ में आया था कि क्यो जानकी मुझसे कतरा रहीं थी।

'सगाई हो गई जानकी?' मैंने पूछा था।

'जी।' जानकी ने कहा था।

'बधाई हो।' मैंने कहा था।

अंजना एक बार मेरी ओर और एक बार अपनी दीदी की ओर देखते हुये बोली थी,

'द्वारका जी, आपने पूछा ही नहीं कि सगाई किसके साथ हुई है!'

'मनमोहन के साथ?' मैंने अंजना की ओर देखते हुये पूछा था।

'मनमोहन के साथ! अरे आप गलती कर ही गये न। मनमोहन का केस तो शुरू से ही बहुत कमजोर था। वह तो किसी गिनती में था ही नहीं। आपका केस जो...'

जानकी ने उसकी बात पूरी नहीं करने दी थी। जोर से डाँट कर कहा था,

'अंजू, क्या बकवास लगा रखी है। जो मुँह में आता है बक देती है।'

'ठीक है बाबा, मैं चलती हूँ। लगता है मेरी यहाँ आवश्यकता नहीं है।' कह कर और मुँह बना कर अंजना वहाँ से चली गई थी।
'आप अंजना की बातो का बुरा मत मानियेगा। मुँह में जो आता हे बक देती है।' जानकी ने कहा था।
'बुरा मानने लायक उसने कुछ कहा ही नहीं।' मैंने कहा था। फिर मैंने जानकी पूछा था कि क्या वह चाय पीयेगी?
'नहीं मैं ऊपर पी चुकी। ' जानकी ने कहा था।
'पहले तो ऊपर नहीं पीती थीं। मेरे साथ ही पीती थीं। अब क्या हो गया? मंगनी हो गई है, इसलिये?'

'नहीं नहीं, ऐसी बात नहीं है। आपने ऊपर भिजवाई थी, वहीं पी ली।'

'एक और कप पीओ।' मैंने जोर दे कर कहा था।

चाय पीते हुये बातों का टूटा हुआ सिलसिला जोड़ने की चेष्टा करते हुये मैंने कहा था,

'क्या तुम अपनी सगाई से खुश हो जानकी?'

'मैं इस संबंध में सोचती ही नहीं। जैसे पहले थी वैसी ही अब भी हूँ।' उसने कहा था।

'तुमने मनमोहन से क्या कहा?'

'कुछ नहीं।'

'तुमने उसे बताया तक नहीं कि तुम्हारी सगाई हो गई है!'

'उसे मालूम है।' उसके उत्तर में कुछ रुखाई थी। एक निश्चयात्मकता थी, जैसे कह रही हो कि मनमोहन जब था तब था। अब मनमोहन से कहीं अच्छा पात्र मिल गया है, इसलिये अब उसमें मेरी दिलचश्पी नहीं रही। एक कठोरता थी, जैसे कह रही हो कि सभी भूल करते हैं, मैंने भी की है, जिसे याद दिलाये जाने की आवयश्यकता नहीं है।

'तुम्हारा नया मंगेतर कैसा है?' मैंने पूछा था।

'अच्छे हैं।'

'उससे तुम्हारी चिट्ठी चलती है?'

'हाँ'

'क्या लिखता है वह?'

'इससे आपको क्या?'

जानकी से मुझे ऐसे उत्तर की अपेक्षा नहीं थी। कहा भी उसने बड़ी रुखाई के साथ था।

'हाँ मेरा पूछना गलत हो सकता है, ' मैंने कहा था, 'लेकिन पिछली बार जब तुमने मुझे मनमोहन के साथ घटी सभी छोटी-बड़ी बातें बाताई थीं, उसी से...'

'पिछली बार भी मैं आपको ऐसा ही उत्तर देने वाली थी, लेकिन आप बुरा मान जायेंगे कर के...' आखिरी शब्द को लंबा खींचत हुये उसने वाक्य पूरा किया था।

उसका उत्तर सुन कर मेरे अंदर एक तीव्र इच्छा यह जागी कि किसी तरह जानकी को चोट पहुँचाओ। कुछ ऐसा कहो कि वह तिलमिला जाय। मैं केवल इतना भर कह कर रह गया,

'नहीं जानकी, पिछली बार तुम मुझको ऐसा उत्तर नहीं देने वाली थीं, क्यों कि पिछली बार तुम्हें मेरी आवश्यकता थी जो अब नहीं रही।'

इसके बाद फिर कभी जानकी से मेरी एकांत में बात नहीं हुई। अब तो थोड़े ही दिनों में उसकी शादी होने वाली है। बात आई गई हो गई है।

जानकी के बारे में कभी कभार सोच लेता हूँ, बस। जानकी इतने दिनों मेरे होटल में रही। उसकी याद तो आयेगी ही। जितने भी टूरिस्ट नियमित रूप से मेरे होटल में आते हैं, उनकी याद आती ही है। उन्हीं को ले कर तो मेरा व्यवसाय है। अब मिस्टर पंडित अगली बार जब आयेंगे तो उनसे जानकी के बारे में पूछना स्वाभविक ही होगा। मैं अपने अनुशासन की जकड़ से कभी बाहर निकल ही नहीं सकता। अपने ही अनुशासन को ताक पर रखना दुर्बलता है, और मैं द्वारकानंद कभी दुर्बल हो ही नहीं सकता। दुर्बल होना मेरे लिये विलासिता है। बस इतना ही कह सकता हूँ कि जानकी के साथ बीते कुछ अंतरंग क्षणों में मैंने अपने आप को सीमित रूप से निरंकुश कर दिया था।

.......

Wednesday, June 2, 2010

एक झूठ

कहानियों के लिये सामग्री हमें आसपास की जीवन से मिल जाती है। पात्रों के जीवन में झॉंक कर और कुछ कल्पलना के रंग भर कर कहानी बन ही जाती है। सावधानी यह बरतनी पड़ती है कि पात्र या घटनायें बहुत करीब की न हों। बच्चे क्या सोचेंगे, भाई साहब कहीं बुरा न मान जायँ आदि के चक्कर में रोचक उपन्यासों का मसाला धरा का धरा रह जाता है।

कभी कभी ऐसा भी होता है कि पाठक कपोल कल्पित घटना को सच मान बैठते हैं। ' ऐसी कल्पमना तो कोई कर ही नहीं सकता है, जरूर आपके साथ ऐसा घटा है!'

बहरहाल, आप बताइये कि यह कहानी सच्ची है या नही। मुझे तो लगता है कि इस कहानी का नायक झूठ बोल रहा है। ....




कहते हैं युवावस्था में मन मचल जाता है, दृष्टि फिसल जाती है इत्यादि। रूमानी साहित्य में कालेज-जीवन में ऐसी घटनाओं के होने का वर्णन मिलता है। मेरा छात्र-जीवन अतीत के गर्त में कहीं है तो सही पर उसका वर्णन यहाँ पर विषयांतर होगा। संप्रति नैनीताल में मेरे पास इन सब बातों के लिये समय ही नहीं है। अपने बारे में कभी कभी-कभार सोच लेता हूँ बस। मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है मानो मैंने लड़कपन से सीधे प्रौढ़ावस्था में प्रवेश कर लिया हो, बीच के युवावस्था वाले भाग को लाँघ कर।

अभी मैं अपने विशाल परिवार के भरण-पोषण में लगा हुआ हूँ। साधन कहने को मेरे पास एक छोटा-सा होटल है, होटल क्या है, नीचे 8-10 जनों के लिये बैठने की व्यवस्था और ऊपर रहने की थेड़ी जगह बस। ऊपर रहने की थोड़ी जगह टूरिस्टों को ध्यान में रख कर नहीं बनाई गई थी। ऐसा भी एक समय था, जब ऊपर के सभी कमरे मेरे एकछत्र अधिकार में थे। जब से पिता जी क्षय रोग से ग्रस्त हो कर स्थाई रूप से सेनिटोरियम में रहने लगे थे तब से मेरी आवश्यकताओं के साथ-साथ मेरा आवास भी सिकुड़ गया था। सबसे छोटा कमरा अपने लिये रख कर बाकी मैंने टूरिस्टों के लिये सजा दिये थे।

मेरे होटल की विशेषता यह है कि मेरी अंग्रेजी भाषा के ज्ञान में पब्लिक स्कूल का टच है। सभ्यता और प्रगतिशीलता का एक मापदण्ड यह भी है कि आप अंग्रजी किस तरह बोलते हैं। मैं अपने रोजमरर्ा पहनने के कपड़ों में भी अपनी इस पब्लिक-स्कूली इमेज को बरकरार रखता हूँ। इससे कुछ टूरिस्ट प्रभावित होते हैं। कुछ तो इतने प्रभावित हुये हैं कि वे जब भी नैनीताल आते हैं मेरे ही होटल में ठहरते हैं। मिस्टर पंडित भी ऐसे ही एक टूरिस्ट हैं।

मैंने स्वयं को एक अनुशासन में जकड़ा हुआ है। फिर भी ऐसा नहीं है कि मैं किसी सुंदर तरुणी को देख कर आँखें फेर लेता हूँ। सीजन में नैनीताल में सुन्दर, विवाहित, अविवाहित और सद्य:विवाहित रमणियों का बाहुल्य होता है। कभी क्षण दो क्षण के लिये किसी पर दृष्टि ठहर जाती है। इससे आगे कुछ नहीं। जब मिस्टर पंडित पहली बार मेरे होटल में ठहरने आये थे तो उनकी पुत्री जानकी पर मेरी दृष्टि ठहरी थी। मैंने उसको अपनी ओर देखते पाया था।

बात इतनी ही होती तो कुछ नहीं था। वैसे अब भी कुछ नहीं है। हाँ इतना है कि बात दृष्टि के आदान-प्रदान तक ही सीमित नहीं रही थी। कुछ आागे भी बढ़ी थी।

पहली बार वे लोग बीस दिन ठहरे थे। चार जनों का परिवार था। मिस्टर पंडित, उनकी चुपचाप सी रहनेवाली पत्नी, जानकी और उसकी किशोरी बहन अंजना। उनको घुमाने में कुछ अधिक ही उत्साह दिखया था मैंने। यह अतिरिक्त उत्साह जानकी के लिये ही हो ऐसी बात नहीं है। मिस्टर पंडित बहुत ही मिलनसार व्यक्ति हैं। उनके लिये कुछ अतिरिक्त करने को मन करता है। एक दिन मैं उनको घुमाने स्नो व्यू के पीछे वाले जंगल में ले गया था। उन दिनों वहाँ बुरूँज के फूलों की छटा छाई हुई थी। जंगल के बीच रास्ता तो क्या कोई पगडंडी भी नहीं थी। मुझे याद है झाड़ियों के काँटों से सभी को खरोंच लग गई थी। मिस्टर पंडित बहुत उत्साहित थे। सबसे आगे वही चल रहे थे। अंजना ने अपनी माँ को सँभाला हुआ था। और जानकी भी साथ थी। हर छोटी बड़ी झाड़ी को पार करने के लिये वह मेरा हाथ पकड़ रही थी। यह बिना मतलब के हाथ पकड़ा-पकड़ी और छुआ-छुव्वल का खेल आगे भी चलता रहा। यह जानकी का खेल था। इसे मैंने आरंभ नहीं किया था।

मैं पंडित परिवार के साथ बहुत घुलमिल गया था। उनको हँसाने के लिये मैं उटपटाँग हरकतें किया करता था। मुझे याद है कि एक बार मैंने जानकी के उकसाने पर चाय नमक के साथ पी थी। इस पर वह इतना हँसी थी कि दूसरे दिन मैंने अपनी चाय में टमाटर की सॉस मिला ली थी। चुटकुलों की किताब से खोज-खोज कर चुटीले चुटकुले उनको सुनाता था। उन दिनों मैं बहुत प्रफुल्लित रहता था। क्यों न रहता, मुझे मिस्टर पंडित से बीस दिनों के रहने-खाने के लिये मोटी रकम जो मिलने वाली थी। उन दिनों जानकी मुझे सर के बल खड़ा हाने को कहती तो शायद हो जाता।

छह महीने बाद ही वे 15 दिनों के लिये फिर नैनीताल आये थे। होटल की बुकिंग के लिये जानकी ने मुझे पत्र लिखा था। पत्र लंबा था। कुछ विशेष नहीं, उसके पहली बार के नैनीताल प्रवास की घटनाओं का जिक्र था। पत्र मैंने सँभाल कर रखा हुआ था। टूरिस्टों से मिलनेवाले सभी पत्र मैं सँभाल कर रखता हूँ।

मैं बहुत सुबह ही इंतजाम आदि करने रेस्तराँ में आ जाता था। मेरे नीचे उतरने के कुछ क्षणों बाद ही जानकी भी नीचे उतर आती थी। हम दोनों अक्सर सुबह की चाय एक साथ पीते थे। जाने किस बात को लेकर एकदिन मैंने उससे मजाक में पूछा था,

'कोई खोज रखा है अपने लिये क्या!'

'हाँ।' उसने कहा था। एक हाथ की अँगुलियाँ उसने दूसरे हाथ में फँसा रखी थीं। जुड़े हुये हाथों से अपना निचला होंठ दबाते हुये उसने उत्तर दिया था। उत्तर देते समय वह स्थिर-चित नहीं थी। या हो सकता है यह मेरा वहम रहा हो। मैं उससे नकारात्मक उत्तर की आशा कर रहा था। उसके हाँ कहने से मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था। उस समय मैंने लक्ष्य किया कि वह मेरी ओर ही देख रही थी। मुझे लगा था जैसे वह जानना चाहती हो कि उसकी हाँ का मेरो ऊपर क्या प्रभाव पड़ा।

'वह क्रिश्चियन है' मेरे साथ आँखें चार होते ही उसने कहा था। ( आगे की कहानी इसी शनिवार को)

Friday, May 28, 2010

ऐसा भी होता है

दिखने में दुबले-पतले लेकिन स्वस्थ। उम्र होगी 75 के आस पास। स्मार्टली मंच में आये। कुछ औपचारिक संबोधन के बाद आप बीती सुनाने लगे। उन्हीं के शब्दों में।

मुझे अपनी पत्नी की बहुत चिता लगी रहती है। अभी वह 72 साल की है। वैसे तो वह बहुत एक्टिव है। चलती फिरती है। ऐसी कोई विशेष व्याधि भी नहीं है। ब्लड प्रेशर 120 – 80 ही रहता है। पर पिछले एक साल से कान कम सुनने लगी है। डाक्टरों को दिखाने को कहो तो भड़क उठती है। कहती है कि मैं एकदम ठीक हूँ। इधर मुझे चिंता यह लगी रहती है कि कभी सड़क में गाड़ी का हार्न नहीं सुनाई पड़ा या बस की आवाज नहीं सुनाई पड़ी तो दुर्घटना हो सकती है।

मैंने डाक्टर के पास जाने की बहुत जिद की तो उसने मुझे धमकी दी कि ज्यादा डाक्टर-डाक्टर करोगे तो तुम्हारे कान के नीचे एक जड़ दूँगी।

मैं परेशान और किंकर्तव्यविमूढ़। तभी मुझे अपनी पहचान में एक इएनटी की याद आई। उसको खोज निकाला, फोन किया, अपनी परेशानी बताई। उसने सांत्वना दी कि चिंता करने की कोई बात नहीं है। आज कल ऐसे ऐसे इलाज निकले हैं जिनकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। उसने राय दी कि पत्नी को क्लिनिक में न ले आऊँ। सीधे उसके घर पर मिलूँ। वहाँ देखा जाएगा। पर मेरी पत्नी को पहले ही भनक लग गई। वह इतना भड़की, इतना भड़की कि मुझे डर लग गया कहीं सचमुच ही वह मेरे कान के नीचे जड़ न दे। और मुझे बहरा ही न कर दे।

मैं अपने उस इएनटी मित्र के पास गया। मैंने हथियार डाल दिये। मैंने कहा कि मैं अपनी पत्नी को इलाज के लिये उसके पास नहीं ला सकता। तब उसने मुझसे कहा कि मैं पता लगाऊँ कि कितनी दूर तक मेरी पत्नी साधारण वार्तालाप सुन सकती है। उसके बाद सोचेंगे कि क्या करना है। डाक्टर ने मुझे पूरी तरह हिदायत दी कि कैसे क्या करना है। लिहाजा जब पत्नी रसोई में थी मैं बाहर के दरवाजे के पास गया और पूछा
'लक्ष्मी आज खाने में क्या बना रही हो?'
उत्तर नदारद।

फिर मैं दस कदम आगे बढ़ा और वही सवाल दोहराया। उसने सुना ही नहीं। फिर उत्तर नदारद।

मैं आगे बढ़ा और रसाई के दरवाजे से कहा
'लक्ष्मी आज खाने में क्या बना रही हो?'
उत्तर नदारद।

मैं बहुत डर गया। हालत बहुत खराब लग रही थी। मैं उसके एकदम पास गया और पूछा 'लक्ष्मी आज खाने में क्या बना रही हो?'

लक्ष्मी चिल्ला कर बोली, 'क्या हो गया है तुमको, बहरे हो गये हो क्या। वही सवाल बार बार क्यों पूछ रहे हो। तीन बार तो बता चुकी हूँ कि आज खाने में बिसिबेले भात है।

फिर उन सज्जन ने अपने कान से सुनने वाला यंत्र निकाला और कहा प्राब्लम लक्ष्मी के साथ नहीं मेरे साथ थी।

वहाँ दो सौ आदमियों की भीड़ थी। एक क्षण तो सन्नाटा रहा, अगले क्षण हॅसी का जो दौरा पड़ा लगता था छत गिर जाएगी।

Sunday, May 23, 2010

हम आपको तकलीफ देना नहीं चाहते

जावेद साहब अपने किसी काम से बेंगलोर आये हुए थे। उम्मीद कर रहा था कि आजकल में मुझसे मिलने आयेंगे। फोन करके उन्होंने बताया कि वे कल का लंच मेरे साथ करेंगे क्यों कि लंच के बाद ही उन्हें ट्रेन पकड़नी है। नहीं तो मिलना नहीं हो पायेगा। मैंने कहा कि आप आइए। लंच हमारे साथ कीजिए। और फिर मैं उनको स्टेशन तक छोड़ दूँगा।

'मैं कंपनी की कार में आऊँगा। इसलिए आपको तकलीफ नहीं दूँगा। और देखिए खाने में मेरे लिये कुछ स्पेशल करने की जरूरत नहीं है। नहीं तो मैं नाराज हो जाऊँगा।'

'अरे आप आइए तो सही।'

'मैंने इसलिए कहा कि असल में हमारा मकसद तो आपस में मिलना है। समय नहीं निकाल पाया इसलिए लंच में मिल रहे हैं। ऐसे में मैं आपको बेकार तकलीफ नहीं देना चाहता।'

'जावेद साहब कोई तकलीफ नहीं होगी। इतने दिनों बाद तो हम मिल रहे हैं। गप्पें मारेंगे और खाना साथ में खायेंगे।'

'जरूर जरूर। पर आप तो रोजमरर्ा खाते हैं वही बनाइएगा।'

'ठीक है वही बनायेंगे आप आइए तो सही।'

मैं आपको बता दूँ जावेद साहब एक खब्ती इनसान हैं। कब कौन सी खब्त उन पर सवार होगी आप कह नहीं सकते।

अगले दिन सुबह सुबह उनका फोन आ गया। 'मैं ग्यारह बजे पहुँच जाऊँगा। देखिए जो घर में है वही बनाइएगा। कुछ स्पेशल बनाने की जरूरत नहीं। नहीं तो में नाराज हो जाऊँगा।'

मैंने उनको यकीन दिलाया कि कुछ भी स्पेशल नहीं बनेगा उनके लिये। वे ग्यारह बजे आये। आते ही बोले, 'देखिए आपने यह बहुत गलत काम किया। रसोई से पकवानों की खुशबू आ रही है। आपने भाभी जी से कुछ स्पेशल बनाने को कहा होगा। इसकी क्या जरूरत थी। हमारा मकसद तो मिलना था न।'

आ गया मुझे भी गुस्सा। 'दोपहर खाने का समय हो रहा है। इस समय हम लोग पानी पीकर घुटने पेट में डाल कर नहीं बैठे रहते हैं। रसोई में कुछ बना कर खा लेते हैं। ऐसे में कोई मेहमान आ गया तो हम रसोई बनाना नहीं छोड़ते। आज रविवार है, कुछ न कुछ तो खास बनता ही है। ऐसा एकदम न समझिएगा कि यह सब हम आपके लिये कर रहे हैं। यह सब तो हमने अपने लिये बनाया है। अब जब आप आ गये हैं तो आपको भी वही परोसेंगे न। आपने कहा था कि आपके लिये स्पेशल न बनाया जाय सो हम नहीं बना रहे हैं। यह खाना आपको स्पेशल लगे तो कोई बात नहीं आप नमक के साथ भात खा लीजियेगा।'

इस बात को कई साल बीत गये हैं। अभी उनकी लड़की बेंगलोर तबादले में आई है। उसने फोन किया 'अंकल मैं संडे को आऊँ?'

'हाँ हाँ आ आजाओ। दिन का खाना हमारे साथ ही खाना।'

'ठीक है अंकल। आंटी से कहिएगा कि वे मेरे लिये कुछ भी स्पेशल न बनायें। नहीं तो मैं गुस्सा हो जाऊँगी।'


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Tuesday, May 11, 2010

विषकन्या




कुछ दिन पहले मैंने एक लघु उपन्यास 'विषकन्या' की रचना की थी। उपन्यास में रहस्य और रोमांच तो है ही, साथ ही मैंने हास्य का पुट देने का प्रयत्न किया था। मुलाहिजा फरमाइये

कार में जिन्दा लाश

बेला को इन्तजार करते चालीस मिनट हो गए थे। एक तो खड़े खड़े उसके पाँव दुख रहे थे। ऊपर से साढ़े दस बज गए थे। सामने रेस्तराँ खुल गया था और आते जाते लोग उसे घूर रहे थे। पर विक्टर का कहीं नामोनिशान नहीं। यह बेला के स्वभाव में नहीं था कि वह किसी का एहसान ले। जिन्दगी में इतना अनुभव तो उसे हो ही गया था कि एहसान एक बोझ होता है जो कभी सरल रिश्ते को भी जटिल बना सकता है। पर विक्टर की बात कुछ और थी। विक्टर उसका पार्टनर था। फिर उसका घर ऐसी जगह था कि आफिस जाने के लिए दो बसें बदलनी पड़़ती थीं। अगर कभी सीधी बस मिल भी गई तो वह कभी भी समय से नहीं पहुँचाती थी। विक्टर के पास कार थी। जब उसने कहा कि आज वह सीधे आफिस जा रहा है इसलिए वह उसके साथ कार में आफिस आ सकती है, तो उसने हामी भर दी। बस में धक्के खाने से तो अच्छा था कि वह विक्टर का साथ झेल ले। विक्टर कभी समय से पहुँचे तो, उसके लेने के लिए। आज से अब और नहीं करेगी वह विक्टर का इंतजार। गुस्से में आग बबूला हो कर वह टैक्सी स्टैंड की ओर मुड़ी ही थी कि विक्टर अपने छकड़े पर आ पहुँचा।

'पैंतालीस मिनटों से मैं यहाँ पर खड़ी हूँ। तुमने इतना भी नहीं सोचा .......!'

'शांत बेला, शांत। लोग देख रहे हैं।'

'देखते हैं तो देखने दो। हद होती है! तुमने मुझे पैंतालीस मिनट सड़क पर खड़ा रखा। खड़े-खड़े पाँव दुख गए। आने जाने वाले लोग घूर रहे हैं।'

'तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि लोग तुम्हें घूर रहे हैं। तुम्हें मेरा शुक्रगुजार होना चाहिए कि मैंने तुम्हें यह मौका दिया कि लोग तुम्हें देखें। तुम्हें घूरें।'

'विक्टर तुम अपनी बकवास बंद करो।' बेला ने लगभग चीखते हुए कहा।

'अरे अरे क्या गजब कर रही हो। सड़क पर इस तरह चिल्लाओगी तो लोग समझेंगे कि मैं तुम्हें छेड़ रहा हूँ।'

'मेरी बला से। बल्कि मैं तो खुश हूँगी अगर लोग ऐसा समझें और तुम्हें जूते चप्पलों से पूजें।'

'ठीक है भई। तुम्हारा गुस्सा भी ठीक है। सॉरी, आने में देर हो गई।'

'देर हो गई! पैंतालीस मिनट!! क्या बहाना बनाकर आए हो?'

'बहाना नहीं, ठोस कारण है। नब्बे किलो तो होगा ही।'

'क्या बक रहे हो?'

'जिसके कारण देर हुई उसका वजन बता रहा था। इधर देखो।' कह कर उसने कार की पिछली सीट की ओर इशारा किया।

बेला ने देखा और उसकी आँखें फट पड़ी। मुँह स्प्रिंग लगे बक्से के ढक्कन की तरह खुल गया।

'मुँह बंद करो।' विक्टर ने कहा।

'लाश!'

'लाश नहीं बेहोश है।'

'कौन है यह?' बेला ने पूछा।

'मुझे क्या मालूम?' लापरवाही-सी दिखाते हुए विक्टर ने कहा।

'तुम्हारे ऐसा कहने का क्या मतलब है विक्टर! तुम्हारी कार की पिछली सीट में एक आदमी बेहोश पड़ा है। इस बेहोश आदमी के साथ तुम मुझे पिकअप करने आ रहे हो। मैं पूछती हूँ तो कहते हो कि मुझे क्या मालूम। आखिर क्या जताना चाहते हो तुम! तुम्हारी प्राब्लम क्या है विक्टर?' बेला ने कहा।

कुछ आने जाने वाले लोग रुक कर कार की पिछली सीट पर पडे़ व्यक्ति को देखने लगे थे।

'चलो पहले कार में बैठो, नहीं तो यहाँ मजमा लग जाएगा।' विक्टर ने कहा।

'कौन है यह?' कार चल पड़ी तो बेला ने पूछा।

'मुझे नहीं मालूम।' विक्टर ने उसी लापरवाही से कहा।

'विक्टर, कार रोको।' बेला ने आदेश दिया।

'क्यों?' विक्टर ने पूछा।

'मैं तुम्हारे साथ नहीं जाना चाहती।'

'पर क्यों?'

'एक तो तुमने इतना इंतजार करवाया और अब पहेलियाँ बुझा रहे हो? ढंग से बात नहीं कर सकते हो? मेरी ऐसी कोई मजबूरी भी नहीं है कि मैं तुम्हें झेलती रहूँ।

पूरा उपन्यास यहाँ उपलब्ध है

http://www.abook2read.com/vishkanya.html

Sunday, May 9, 2010

जरा ऊँचे स्वर में बोलिये

मुझमें एक व्याधि है, वह यह कि जब आप मुझसे बहुत धीमे स्वर में बात करते हैं तो मेरी समझ में नहीं आता है। सुनाई पड़ता है कि आप कुछ कह रहे हैं पर समझ में नहीं आता है कि आप क्या कह रहे हैं। यह हो सकता है आपको मामूली बात लगे पर यह एक भयंकर समस्या है।

जब छोटा था तो समझ में ही नहीं आता था कि सब मेरा मजाक क्यों उड़ाते हैं। बातें मेरी लोगों की समझ में क्यों नहीं आती हैं? ऐसा क्या है जो औरों में है और मुझमें नहीं है। इस ऊँचा सुनने की व्याधि ने मुझे अंतर्मुखी बना दिया था।

पता नहीं कब, पर एक दिन मेरी समझ में आ ही गया कि मेरी समस्या क्या है। मैंने समाधान यह निकाला कि समझ में नहीं आये तो पूछो। उसी बात को दूसरी बार दोहराने में लोग बहुधा अपना स्वर ऊँचा कर लेते हैं।

एक स्थिति का जायजा लीजिये। आपको ऊँचा सुनने की आदत है। आपका बॉस आपको बुलाता है। बहुत धीमे स्वर में आपको कुछ निर्देश देता है। आपको सुनाई तो पड़ा कि आपसे कुछ करने के लिये कहा गया है, पर यह एकदम पल्ले नहीं पड़ा कि क्या कहा गया। यह स्थिति घर में पत्नी के साथ आ सकती है, आफिस में आ सकती है। मित्रों की बैठक में आ सकती है अंतरर्ाष्ट्रीय सम्मेलन में आ सकती है। कवि सम्मेलन में आ सकती है। हर उस जगह आ सकती है जहाँ लोगों ने ठान रखी हो कि वे आपसे धीमे स्वर में बात करेंगे। मधुमक्खी की तरह भनभनाहट वाले स्वर में।

तो ऐसे में क्या करेंगे आप। मैं तो जैसा कि मैंने कहा है मैं आव देखता हूँ न ताव, सीधे-सीधे पूछ बैठता हूँ कि कृपया आपने मुझसे जो कहा उसे ऊँचे स्वर में दोहराइये क्यों कि मैं समझा नहीं आपने क्या कहा।

मैंने तो एक रणनीति ही बना ली है। बस ऐलान कर देता हूँ कि मैं ऊँचा सुनता हूँ। कुछ लोग विश्वास कर लेते हैं कि मैं सचमुच ऊँचा सुनता हूँ। कुछ नहीं नहीं भी करते। ऐसे एलान में बचने का निकास रहता है। जैसे, आपने ऐसा कहा था क्या, मैंने तो नहीं सुना। आपको तो मालूम ही है कि मैं ऊँचा सुनता हूँ।

कुछ लोग तो आदतन नीचे स्वर में बोलते हैं। उनको ऊँचा बोलने के लिये कहा जाय तो ऊँचे स्वर में बोलने लगेंगे पर कुछ समय बाद ही फिर अपने उसी पुराने धीमे स्वर में आ जाते हैं। उनको बार बार ऊँचा बोलने के लिये टोकना भी अच्छा नहीं लगता, विशेष कर जब आपको छोड़ कर सभी लोग बड़ी तन्मयता से उन्हें सुन रहे होते हैं। आप कितनी बार उन्हें टोकेंगे!

कुछ लोग यह जानते हुये भी कि आप ऊँचा सुनते है, ऊँचा नहीं बोलेंगे। उनका अहम् इतना बड़ा होता है कि उन्हें लगता है कि उनके ऊँचा बोलने से उनके अहम् में क्रैक पड़ जायेगा। ऐसे लोगों से सावधान रहना पड़ता है। भग्न अहम् वाले लागे आपके स्वस्थ्य के लिये हानिकारक सिद्ध हो सकते हैं।

ऊँचा सुनने वालों की एक और समस्या है। औरों की हो न हो, पर मेरी है। वक्ता धीमे स्वर में बोल रहा है और आपको बात समझ में नहीं आ रही है। तो सुनने वाले का ध्यान भटकेगा या नहीं। जैसे किसी मीटिंग में, वक्ता आपको समझा रहा है कि किसी विशेष समस्या का कैसे सामना करना चाहिये और आप वक्ता के बगल में बैठी सुंदरी को कल्पना के घोड़े उड़ाये ले जा रहे हैं।

खैर अपनी इस समस्या के साथ काफी वक्त गुजार लिया है। अब तो हम बड़े गर्व के साथ कहते हैं कि हम सठिया गये हैं इसलिये आप हमसे साफ साफ और ऊँचे स्वर में बोलिये।

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Friday, April 30, 2010

कौन है जो कहकहे सब बटोर कर ले गया

बनने का बड़ा शोर था कैसे खामोशी से ढह गया।
कौन है जो कहकहे सब बटोर कर ले गया

नादॉं तो न थे हम, इन्तहॉं थी मस्ती की।
खतरों से बेखबर रवानी में बहते गये।

बेमुरव्वत तो आशियॉं जला के चले गये
हम जल भी न सके, सुलग कर रह गये।

कॉफी की महफिलें, देर से आना बनाकर बहाना
चले थे साथ जो दो कदम, वही याद करके रह गये

Thursday, February 25, 2010

एक सकारात्मक सोच

लोग कहते है कि मैं नेगेटिव हूँ। यानी हमेशा नेगेटिव सोचता हूँ। मैं कहता हूँ कि मैं जैसा भी हूँ ठीक हूँ। किसी और के लिये नहीं तो कम से कम अपने लिये तो ठीक ही हूँ। और मैं किसी से राय माँगने तो नहीं निकला हूँ न कि भैया मुझे बता दो कि मैं नेगेटिव हूँ या पाजिटिव। और सच कहूँ तो मुझे आज की भाषा के ये शब्द समझ में नहीं आते हैं। नेगेटिव, पाजिटिव। मानो आदमी आदमी न हो कर बैटरी का टर्मिनल हो गया हो।

हम तो भैया ऐसे ही हैं और ऐसे ही रहेंगे। नेगेटिव पाजिटिव जो कहना है कह लो, हमें कोई तकलीफ नहीं हो रही। हमारे पास आने से जब किसी का कुछ घट जाता है तो न आये वह हमारे पास। हम निराशावादी है तो वही सही। हम यह आशा तो नहीं कर रहे हैं न कि आप हमें आशावादी समझें।

फिर एक बार पूछता हूँ कि क्या होता यह नेगेटिव या पाजिटिव। हमारी सोच नेगेटिव है यानी नकारात्मक है तो ठीक है न।

सामने से तीखे सींग वाला बिगड़ैल साँड़ आ रहा है। अब आप सोचते रहें कि आपको कैसा सोचना है या कैसा व्यवहार करना है। नेगेटिव या पाजिटिव। नकारात्मक या सकारात्मक। आप आशावाद का सहारा लेंगे या निराशावाद का। किसका दृष्टिकोण अपनायेंगे अपना या साँड़ का। साँड़ आपको सींग मारेगा और आप घायल हो कर अस्पताल पहुँच जायेंगे। या साँड़ आपको देख कर मुस्करा कर आगे बढ़ जायेगा और आपको अस्पताल जाने की नौबत नहीं आयेगी।

हम तो भैया एक किनारे हट जायेंगे। अनजान जगह हो, व्यक्ति हो, स्थिति हो, मशीनरी हो तो हम तो पहले अपने बचाव का तरीका सोच लेते हैं।

निराशावादी होना भी बहुत लाभदायक होता है। आशा ही निराशा की जननी है। जब आप आशा ही नहीं करेंगे तो निराशा आपके पास फटकेगी कैसे।

Wednesday, January 27, 2010

हाई वोल्ट वाली जानलेवा मुस्कान

चेहरा सुदर्शन हो और भोलापन लिये हुये हो तो यह अच्छे नाक-नक्श और भोलेपन का यह मेल बड़ा जानलेवा सिद्ध हो सकता है। चेहरा देख कर ही इनके सौ खून माफ कर देने को दिल करता है। यहाँ पर उनकी बात नहीं हो रही है जो बड़े जतन से भोलापन ओढ़े रहते है जिनके बारे में कहा गया है कि 'भोली सूरतिया दिल के बड़े खोटे इत्यादि। हम बात कर रहे है उनकी जिनका भोलापन जन्मजात होता है। यह और बात है कि वे अपने इस भोलेपन की शक्ति को जानते हैं और इसका प्रयोग भी करते हैं।

ऐसे ही एक युवक हमारी कलायन नाट्य संस्था में भी हैं। आजकल हमारी नाट्य संस्था दो नाटकों के बीच में है। यानी पिछले नाटक का मंचन हो चुका है और अगला अभी आरंभ नहीं हुआ है। बड़ा ही कष्टप्रद और उलझाने वाला होता है यह समय। अन्य नाट्य संस्थाओं में भी शायद ऐसा होता हो हमारी संस्था में तो ऐसा होता ही है कि सभी कलाकार मंच पर अभिनय करने के इच्छुक रहते हैं। नाटक को मंच तक लाने में जो पापड़ बेलने पड़ते हैं उससे उनको कोई मतलब नहीं होता है।

कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी कुछ करने की इच्छा बड़ी बलवती होती है, और बहुत कुछ कर गुजरने की क्षमता भी रखते हैं पर अपनी इसी इच्छा को ही वे अपनी उपलब्धि मान बैठते है। ये सज्जन भी ऐसे ही हैं। यह तथ्य स्वीकारने में मुझे बहुत कष्ट होता है पर करने के लिये मुझे वाध्य किया जा रहा है। कैसे?

लिहाजा फरमाइये।

बहुत पहले ही तय हो गया था कि अगला नाटक चंद्रकान्ता होगा। नाटक तो मैंने बहुत पहले ही लिख लिया था पर मंचन के लिये यथेष्ट साहस नहीं जुटा पा रहा था। कलायन सभी ने सदस्यों ने भरपूर सहयोग देने का तो वादा किया है पर मैंने अपने अनुभव से सीखा है कि ऐसे वादों का अर्थ यह निकलता है कि 'आप आगे बढ़िये अभिनय करने के लिये हम तैयार हैं'।

इंद्रिय शिथिलता कहिये या कुछ और कि मैं नाटक आरंभ नहीं कर पा रहा था।

फिर मैं ने सोचा यह जो सभी भरपूर सहयोग का वादा कर रहे हैं इसका लाभ उठाना चाहिये। मैंने इन सुदर्शन व्यक्तित्व वाले सज्जन के जिम्मे एक काम सौंपा। वह था, नाटक चंद्रकान्ता के लिये टेकनिकल टीम का गठन करना। पिछले अक्टूबर से वे इस काम में लगे हैं। पर दिसंबर तक टीम नहीं जुटी। कभी पूछा कि क्यों भई काम कितना आगे बढ़ा तो उत्तर मिलता था कभी 'मैं फलाँ से बात करनेवाला हूँ' तो कभी 'मैं सोच रहा हूँ फलाँ को आजमाया जाय।'
मैं कहता ' भई दिसंबर जाने वाला है, ऐसे तो नाटक आरंभ होने में बहुत देर हो जायेगी।'
इसके उत्तर में एक हाई वोल्ट की जानलेवा मुस्कान। और मैं चारों खाने चित।

मुझे विश्वास है इन सज्जन ने टेकनिकल टीम के गठन का प्रयास अवश्य किया होगा। पर मस्तिष्क की उपज को क्रियान्वित करना और बात है। इस कारण से, या उस कारण से या कई करणों से टीम नहीं जुटी।

मुझे अपने ऊपर बहुत ग्लानि हुई कि एक नवजवान के कमजोर कंधों में मैंने इतना बड़ा बोझ डाल दिया। इस उमर में जब उन्नति करने भावना होती है, उत्साह होता है। देश को भी आगे बढ़ाना होता है। और कहाँ मैंने यह एक इतना बड़ा काम जिससे न तो देश की उन्नति होती है और न ही अपना करिअर आगे बढ़ता है, इनको सौंप दिया।

लिहाजा मैंने उनका बोझ हलका कर दिया और उनके जिम्मे इतना ही काम सौंपा कि बस कलायन के वरिष्ठ कलाकारों की एक मीटिंग बुलाओ। उसी मीटिंग में सब मिल करक तय करेंगे।

उत्तर मिलते हैं

अरे भूल गया सर।
आज तो ऑफिस में सॉस लेने की फरसत भी नहीं मिली।
आज नहीं हो पायेगा, किसी शादी में जाना है।
कल मैं नहीं आ पाया सर, क्या बताऊँ बॉस ने रात के दस बजे तक छोड़ा ही नहीं। बाकी लोग आये थे क्या?
कल मैं कोलकाता जा रहा हूँ।
कभी सामना हो गया तो, जी हाँ आप समझ गये होंगे, वही हाई वोल्ट वाली जानलेवा मुस्कान और मैं चारों खाने चित।

Sunday, January 10, 2010

तुमने कुछ कहा होता - दूसरा और अंतिम भाग

एक दिन बड़े आत्मविश्वास के साथ मुस्कराते हुए सुमति मेरे पास आई और अपनी शादी का कार्ड दे कर चली गई। मैं आसमान से ऐसा गिरा कि किसी खजूर पर भी नहीं अटका। चारों खाने चित। और तब मुझे पता चला कि सुमति को खो कर मैं क्या खो रहा हूँ। चार दिन तक तो मेरे दिमाग में एक ही सवाल था कि यह क्या हो गया। पर अब पछताए होत क्या...।

मैं एक व्यवहारिक जीव हूँ। मैंने स्वयं को समझा बुझा लिया कि सुमति की शादी हो रही है तो अच्छा ही है। मैं उसका बालसखा हूँ, मुझे तो प्रसन्न होना चाहिए। जब मैंने ही मंशा नहीं दिखाई तो उसे क्या पड़ी थी।

आज जब मैं इस बारे मैं सोचता हूँ तो पाता हूँ कि अन्य सब लड़कियों में भी मैं सुमति को ही तलाशता था। कितना नासमझ था मैं, कितना अंधा था मैं। जो पास थी उसे ही मैं दूर दूसरे परिवेश में खोज रहा था। पता नहीं क्यों उन दिनों मुझे सुमति मेंं एक आकर्षणहीन सादापन ही दिखाई पड़ता था। हो सकता है यह मेरी नजर का धोखा हो। शायद मैं घूम फिर कर और दुनिया देख कर ही घर लौटना चाहता था। यदि मैं देखना चाहता तो वह सब ग्लैमर जो मैं बाहर खोजता फिर रहा था, सुमति में मौजूद था। लड़कपन वाली सुमति और युवती सुमति में मैंने कभी अंतर किया ही नहीं। अपनी कच्ची समझ के कारण एक समझदार, सुलझी हुई और शायद समर्पित लड़की को मैं देख ही नहीं पाया।

आजकल अवकाश के क्षणों में मैं यह भी सोचता हूँ कि क्या कमी थी उन लड़कियों में जिनसे मैंने किनारा कर लिया था। सभी तो अच्छी लड़कियाँ थीं। सबका अपना अपना व्यक्तित्व था। आज समझ में आता है कि वे मुझे क्यों नहीं जँचीं, क्यों कि उनमें कोई भी सुमति नहीं थी। मेरे बिना जाने मेरे गहन भीतर तो सुमति बैठी हुई थी।




खैर, सुमति की शादी हो गई। मैंने स्वयं को समझा लिया कि चलो जो हुआ अच्छा हुआ। इसी में संतोष कर लूँ कि सुमति सुखी है। पर मेरे अंदर शादी करने का उत्साह जाता रहा। अपने मन की क्या कहूँ, सुमति के प्रति अहसास हुआ भी तो कब? सुमति के जाने के बाद। और अपना यह प्यार अपना विकराल रूप लेकर मेरे सामने तब खड़ा हुआ जब मैं सुमति से मिलने गया था उसके घर। तब उसकी शादी हुए सालभर हो गया था।

बहुत बड़ा परिवार था। औरतों और बच्चों की भीड़ थी। उसी भीड़ में सुमति भी थी। बड़ी, मँझली आदि बहुओं के बीच वह खो कर रह गई थी। वह एक अमीर परिवार था। सब कुछ था पर वह नहीं था जो होना चाहिए था। मर्दों की दुनिया अलग थी और औरतों की अलग। पत्नी होनी चाहिए थी, इसलिए थी। केवल वंशवृद्धि के लिए। पति आजाद था, पर पत्नी सास श्वशुर जेठ जेठानियों के अधीन थी।

मुझे वहाँ घुटन महसूस हुई। आया था सुमति से मिलने पर वहाँ औरतों और बच्चों की रेलपेल में उससे बात भी नहीं हो पाई। वहाँ से वापस लौटते समय सुमति के साथ कुछ मिनटों का एकांत मिला तो मैंने उससे पूछा, 'खुश तो हो न सुमति?'

सुमति ने कोई उत्तर नहीं दिया। फिर पता नहीं क्या सोच कर मैंने उसे कुरेदा। मुझे आभास तो मिल ही गया था कि ऐसे माहौल में सुमति खुश नहीं हो सकती। मैंने उससे कहा, 'उस दिन जब तुमने पूरे आत्मविश्वास के साथ मुस्करा कर मुझे अपनी शादी का कार्ड दिया था तो जानती हो मुझे कितनी ठेस पहुँची...'

सुमति बिफर गई। उसने मेरी बात पूरी नहीं होने दी। 'उस तरह मुस्कराने के लिए मैं चार दिनों से अभ्यास कर रही थी शशि। मेरा भी आत्मसम्मान हो सकता है यह तुम्हें ध्यान नहीं आया।'

उसकी ऑखें डबडबा आईं। एक ढुलकते हुए आँसू को उसने अपनी तर्जनी में ले लिया।

'तुमने तो साले मेरा जीवन ही बरबाद कर दिया।' उसने कहा था।

उसकी वह छवि आज तक मेरी आँखों के सामने तैरती है। वह छवि धूमिल पड़े और उम्रेदराज में कुछ साल बचे हों तो शायद मेरी भी शादी हो जाय। जब तक वह छवि धूमिल नहीं पड़ती शादी करके दूसरी गलती करने का मन नहीं है।
समाप्त






Thursday, January 7, 2010

तुमने कुछ कहा होता - एक लघु कथा





मैंने शादी न करने की कसम नहीं खा रखी है। पर हुई नहीं है मेरी शादी अभी तक। अपना सुव्यवस्थित व्यवसाय है। रंग-रूप, कद-काठी औसत से बहुत अच्छे हैं। चालचलन साधारण मापदण्डों के हिसाब से दोष रहित ही है। मतलब यह कि अब तक शादी हो जानी चाहिए थी। सभी पूछते भी हैं कि शादी क्यों नहीं की अब तक, कब कर रहे हो, इत्यादि। पर पता नहीं है। मुझे कोई जल्दी नहीं है।

नहीं नहीं, ऐसा कहना गलत होगा। मुझे पता है कि मेरी शादी क्यों नहीं हो रही है। मैं अपने अंदर शादी के लिये कोई उत्साह नहीं पाता हूँ। पर किसी जमाने में शादी के लिये उत्साह अपनी चरम सीमा में था। उस जमाने में इतना उत्साह, इतनी उतावली रहती थी कि एक प्रेम प्रसंग सामाप्त होते न होते मैं दूसरे में फँस जाता था।

जब मैं छोटा था, यही दस बारह साल का रहा हूँगा जब एक परिवार हमारे पड़ोस में रहने के लिए आया। उस परिवार की बड़ी लड़की का नाम था सुमति। वह मुझसे तीन चार साल छोटी थी। वह मेरी सहपाठिन बनी। साथ पढ़ते खेलते हमलोग बड़े हुए। बड़े हुए तो पता चला कि हम दोनों के परिवार इच्छुक हैं कि हम दोनों की आपस में शादी हो जाय। मैंने इस बात पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था। हाँ, मुझे सुमति को चिढ़ाने का एक हथियार मिल गया था। तब चिढ़कर सुमति मुझे साला कह कर गाली देती थी। क्या होता था उसकी इस गाली में? मुझे घायल करने की नीयत? उलाहना? खिसियाहट? काश, मैंने जानने का प्रयत्न किया होता।

हमारी शादी नहीं हुई। मेरे कहने का अर्थ है हमारी एक दूसरे के साथ शादी नहीं हुई। आजकल मैं कभी कभी कारण ढूँढ़ने का प्रयत्न करता हूँ। जब दोनों परिवार इच्छुक थे तो शादी क्यों नहीं हुई? मेरे परिवार की ओर से शायद कारण था मेरी माँ की बीमारी। या मेरी बहन की शादी। या हो सकता है कारण हमारा आर्थिक अभाव रहा हो। या मेरी ओर से उत्साह का अभाव। बहुत संभव है सभी स्थितियाँ मिल का एक बहुत बड़ा कारण बन गई हों। पिता जी शायद सोचते थे कि लड़की तो बगल में है, सुविधा से शादी कर देंगे। पिता जी कहते तो शायद मैं बिना ना-नू किए सुमति से शादी कर लेता। पर पिता जी को सुविधा नहीं मिली। बहन की शादी के पश्चात् माँ ने बीमारी में दम तोड़ दिया। और माँ की बरसी से पहले ही पिता जी भी हमें छोड़ कर चल दिये। उस समय सुमति एम ए फायनल में थी और परीक्षा के लिए तैयारी कर रही थी। मैंने तो बी एस सी करने के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी थी। मैं एक व्यवसाय करने लगा था।

पिता जी के जाते जाते मेरा व्यवसाय जमने लगा था। तब मुझे उचित जीवन साथी की फिक्र हुई। सुमति तो थी ही पर मैं चाहता था कि मुझे कोई दूसरी लड़की भी मिले। यानी लड़की ने बचपन में आपकी बहती हुई नाक देखी हो तो यह आवश्यक नहीं कि उसी से शादी की जाय। फिर मेरा दुनिया का अनुभव ही क्या था। दुनिया से मेरा मतलब है लड़कियों का। मैं बचपन से एक ही लड़की को जानता था। उससे शादी करने के बाद पता चले कि दुनिया सुमति में ही नहीं सिमटी हुई है तो कैसा लगेगा! और भी लड़कियाँ हैं जो शायद सुमति से बहुत अच्छी निकलें। इधर उधर ताक झाँक करने में हर्ज ही क्या है। कोई नहीं मिली तो सुमति तो है ही।

तो इस ताक झाँक में मैं ललिता, अरुणा, बार्बी आदि के दौर से गुजरा। कहीं आभिजात्य आड़े आया तो कहीं धर्म। एक दो लड़कियों से तो मैंने स्वयं किनारा कर लिया था।

इस बीच मेरी सुमति से भी यदा कदा मुलाकात हो ही जाती थी। कभी मुझे लगता था कि वह मुझसे उतनी सहज नहीं है। या क्या यह मेरा भ्रम था? कभी लगता था कि हमारे बीच वही पुरानी सहजता है। या क्या यह भी मेरा भ्रम था?

मेरी लड़कियों से मित्रता के बारे में न कभी सुमति ने कुछ पूछा ओर न ही मैंने उसे इस संबंध में कुछ बताने की आवश्यकता समझी। मेरे मस्तिष्क के किसी कोने में यह विचार कर रहा था कि मुझे सुमति से शादी करनी चाहिये उधर सुमति और उसके परिवार का कुछ दूसरा ही प्रोग्राम बन रहा था जिसकी मुझे कोई खबर नहीं थी। खबर होती कैसे, उस समय तो मैं बार्बी की अधकटी जुल्फों में उलझने की चेष्टा कर रहा था।



कहानी बस थोड़ी और है। दूसरा और अंतिम भाग आगामी इतवार तक...