Wednesday, June 2, 2010

एक झूठ

कहानियों के लिये सामग्री हमें आसपास की जीवन से मिल जाती है। पात्रों के जीवन में झॉंक कर और कुछ कल्पलना के रंग भर कर कहानी बन ही जाती है। सावधानी यह बरतनी पड़ती है कि पात्र या घटनायें बहुत करीब की न हों। बच्चे क्या सोचेंगे, भाई साहब कहीं बुरा न मान जायँ आदि के चक्कर में रोचक उपन्यासों का मसाला धरा का धरा रह जाता है।

कभी कभी ऐसा भी होता है कि पाठक कपोल कल्पित घटना को सच मान बैठते हैं। ' ऐसी कल्पमना तो कोई कर ही नहीं सकता है, जरूर आपके साथ ऐसा घटा है!'

बहरहाल, आप बताइये कि यह कहानी सच्ची है या नही। मुझे तो लगता है कि इस कहानी का नायक झूठ बोल रहा है। ....




कहते हैं युवावस्था में मन मचल जाता है, दृष्टि फिसल जाती है इत्यादि। रूमानी साहित्य में कालेज-जीवन में ऐसी घटनाओं के होने का वर्णन मिलता है। मेरा छात्र-जीवन अतीत के गर्त में कहीं है तो सही पर उसका वर्णन यहाँ पर विषयांतर होगा। संप्रति नैनीताल में मेरे पास इन सब बातों के लिये समय ही नहीं है। अपने बारे में कभी कभी-कभार सोच लेता हूँ बस। मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है मानो मैंने लड़कपन से सीधे प्रौढ़ावस्था में प्रवेश कर लिया हो, बीच के युवावस्था वाले भाग को लाँघ कर।

अभी मैं अपने विशाल परिवार के भरण-पोषण में लगा हुआ हूँ। साधन कहने को मेरे पास एक छोटा-सा होटल है, होटल क्या है, नीचे 8-10 जनों के लिये बैठने की व्यवस्था और ऊपर रहने की थेड़ी जगह बस। ऊपर रहने की थोड़ी जगह टूरिस्टों को ध्यान में रख कर नहीं बनाई गई थी। ऐसा भी एक समय था, जब ऊपर के सभी कमरे मेरे एकछत्र अधिकार में थे। जब से पिता जी क्षय रोग से ग्रस्त हो कर स्थाई रूप से सेनिटोरियम में रहने लगे थे तब से मेरी आवश्यकताओं के साथ-साथ मेरा आवास भी सिकुड़ गया था। सबसे छोटा कमरा अपने लिये रख कर बाकी मैंने टूरिस्टों के लिये सजा दिये थे।

मेरे होटल की विशेषता यह है कि मेरी अंग्रेजी भाषा के ज्ञान में पब्लिक स्कूल का टच है। सभ्यता और प्रगतिशीलता का एक मापदण्ड यह भी है कि आप अंग्रजी किस तरह बोलते हैं। मैं अपने रोजमरर्ा पहनने के कपड़ों में भी अपनी इस पब्लिक-स्कूली इमेज को बरकरार रखता हूँ। इससे कुछ टूरिस्ट प्रभावित होते हैं। कुछ तो इतने प्रभावित हुये हैं कि वे जब भी नैनीताल आते हैं मेरे ही होटल में ठहरते हैं। मिस्टर पंडित भी ऐसे ही एक टूरिस्ट हैं।

मैंने स्वयं को एक अनुशासन में जकड़ा हुआ है। फिर भी ऐसा नहीं है कि मैं किसी सुंदर तरुणी को देख कर आँखें फेर लेता हूँ। सीजन में नैनीताल में सुन्दर, विवाहित, अविवाहित और सद्य:विवाहित रमणियों का बाहुल्य होता है। कभी क्षण दो क्षण के लिये किसी पर दृष्टि ठहर जाती है। इससे आगे कुछ नहीं। जब मिस्टर पंडित पहली बार मेरे होटल में ठहरने आये थे तो उनकी पुत्री जानकी पर मेरी दृष्टि ठहरी थी। मैंने उसको अपनी ओर देखते पाया था।

बात इतनी ही होती तो कुछ नहीं था। वैसे अब भी कुछ नहीं है। हाँ इतना है कि बात दृष्टि के आदान-प्रदान तक ही सीमित नहीं रही थी। कुछ आागे भी बढ़ी थी।

पहली बार वे लोग बीस दिन ठहरे थे। चार जनों का परिवार था। मिस्टर पंडित, उनकी चुपचाप सी रहनेवाली पत्नी, जानकी और उसकी किशोरी बहन अंजना। उनको घुमाने में कुछ अधिक ही उत्साह दिखया था मैंने। यह अतिरिक्त उत्साह जानकी के लिये ही हो ऐसी बात नहीं है। मिस्टर पंडित बहुत ही मिलनसार व्यक्ति हैं। उनके लिये कुछ अतिरिक्त करने को मन करता है। एक दिन मैं उनको घुमाने स्नो व्यू के पीछे वाले जंगल में ले गया था। उन दिनों वहाँ बुरूँज के फूलों की छटा छाई हुई थी। जंगल के बीच रास्ता तो क्या कोई पगडंडी भी नहीं थी। मुझे याद है झाड़ियों के काँटों से सभी को खरोंच लग गई थी। मिस्टर पंडित बहुत उत्साहित थे। सबसे आगे वही चल रहे थे। अंजना ने अपनी माँ को सँभाला हुआ था। और जानकी भी साथ थी। हर छोटी बड़ी झाड़ी को पार करने के लिये वह मेरा हाथ पकड़ रही थी। यह बिना मतलब के हाथ पकड़ा-पकड़ी और छुआ-छुव्वल का खेल आगे भी चलता रहा। यह जानकी का खेल था। इसे मैंने आरंभ नहीं किया था।

मैं पंडित परिवार के साथ बहुत घुलमिल गया था। उनको हँसाने के लिये मैं उटपटाँग हरकतें किया करता था। मुझे याद है कि एक बार मैंने जानकी के उकसाने पर चाय नमक के साथ पी थी। इस पर वह इतना हँसी थी कि दूसरे दिन मैंने अपनी चाय में टमाटर की सॉस मिला ली थी। चुटकुलों की किताब से खोज-खोज कर चुटीले चुटकुले उनको सुनाता था। उन दिनों मैं बहुत प्रफुल्लित रहता था। क्यों न रहता, मुझे मिस्टर पंडित से बीस दिनों के रहने-खाने के लिये मोटी रकम जो मिलने वाली थी। उन दिनों जानकी मुझे सर के बल खड़ा हाने को कहती तो शायद हो जाता।

छह महीने बाद ही वे 15 दिनों के लिये फिर नैनीताल आये थे। होटल की बुकिंग के लिये जानकी ने मुझे पत्र लिखा था। पत्र लंबा था। कुछ विशेष नहीं, उसके पहली बार के नैनीताल प्रवास की घटनाओं का जिक्र था। पत्र मैंने सँभाल कर रखा हुआ था। टूरिस्टों से मिलनेवाले सभी पत्र मैं सँभाल कर रखता हूँ।

मैं बहुत सुबह ही इंतजाम आदि करने रेस्तराँ में आ जाता था। मेरे नीचे उतरने के कुछ क्षणों बाद ही जानकी भी नीचे उतर आती थी। हम दोनों अक्सर सुबह की चाय एक साथ पीते थे। जाने किस बात को लेकर एकदिन मैंने उससे मजाक में पूछा था,

'कोई खोज रखा है अपने लिये क्या!'

'हाँ।' उसने कहा था। एक हाथ की अँगुलियाँ उसने दूसरे हाथ में फँसा रखी थीं। जुड़े हुये हाथों से अपना निचला होंठ दबाते हुये उसने उत्तर दिया था। उत्तर देते समय वह स्थिर-चित नहीं थी। या हो सकता है यह मेरा वहम रहा हो। मैं उससे नकारात्मक उत्तर की आशा कर रहा था। उसके हाँ कहने से मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था। उस समय मैंने लक्ष्य किया कि वह मेरी ओर ही देख रही थी। मुझे लगा था जैसे वह जानना चाहती हो कि उसकी हाँ का मेरो ऊपर क्या प्रभाव पड़ा।

'वह क्रिश्चियन है' मेरे साथ आँखें चार होते ही उसने कहा था। ( आगे की कहानी इसी शनिवार को)

5 comments:

mrityunjay kumar rai said...

fabulous

वन्दना said...

are kis mod par lakar chod diya kahani ko.....intzaar rahega.

शोभना चौरे said...

abhi kya kahen?besbri se intjar hai shnivar ka ?

शोभना चौरे said...

abhi kya kahen?besbri se intjar hai shnivar ka ?

आचार्य जी said...

क्रोध पर नियंत्रण स्वभाविक व्यवहार से ही संभव है जो साधना से कम नहीं है।

आइये क्रोध को शांत करने का उपाय अपनायें !