Tuesday, December 29, 2009

चारों ओर चिल्लपों मची है

चारों ओर चिल्लपों मची है कि यह साल गुजर रहा है और नया साल आ रहा है। जब सभी इस तरह हमें बताने में जुटे हैं तो हम भी ऐलानिया तौर पर मान लेते हैं कि यह साल गुजर रहा है और नया साल आ रहा है। वैसे सच कहूँ मुझे पहले से ही मालूम था कि यह साल गुजर रहा है और नया साल आ रहा है।

सब लोग पीछे देख रहे हैं। लेखा जोखा कर रहे हैं कि इस गुजरते साल में क्या क्या हुआ। कौन सी फिल्म हिट रही। कौन सी हीरोइन सेक्सी रही। यह सब हमें ऐसे बताया जा रहा है जैसे कि दिसंबर के जाते न जाते उस हीरोइन की सेक्स अपील समाप्त हो जायेगी।
तो हमने भी साहब पीछे देखना शुरू किया

मोमबत्ती जलाई तो परवाना याद आया
दिसंबर में ही गुजरा जमाना याद आया
हम करते रहे काक चेष्टा बकुल ध्यानम
उनको कोई ले उड़ा हमें फसाना याद आया।

अब और पीछे नहीं देखा जाता। चलिये आगे देखते हैं।
सही समय है ज्ञान की बाँटने के लिये। जॉर्ज कारलिन के बारे में पढ़ रहा था। उनकी कही कुछ बातें यहाँ दे रहा हूँ।मुलाहिजा फरमाइये-

यह विडंबना ही है कि
हमारी इमारतें ऊँची हैं पर हमारी सहनशक्ति छोटी है
चौैड़ी सड़कें हैं पर सँकरा दृष्टिकोण है
हमारे खर्चे बड़े है पर हमारे पास जो भी है बहुत कम है
हम खरीदते ज्यादा हैंे पर आनंदित कम ही होते हैं
घर बड़े हैं परिवार छोटे। सुविधायें अधिक पर समय कम
डिग्रियाँ अधिक हैं पर अक्ल कम है। अधिक ज्ञान पर समझ कम है।

नया साल आप सब लोगों के लिये सुख, शांति और समृद्धि लाये।

Thursday, December 24, 2009

मैं भी कहाँ शिकायत कर रहा हूँ!

दफ्तरी जीवन से अवकाश प्राप्त करने के बाद अपनी दिनचर्या एकदम बदल गई है। सुबह देर से नींद खुलती है। आलस के मारे बिस्तर छोड़ते छोड़ते आठ तो बज ही जाते हैं। सुबह घूमने की इच्छा इच्छा ही रह गई है। आज दृढ़ निश्चय के साथ सुबह प्रात: भ्रमण के निकला तो वह दिखाई पड़ा। चुस्त दुरुस्त कंधे में झोला लटकाये हुये। वह मुझे देख कर मुस्कराया। प्रत्युत्तर में मैंने भी अपनी लुभावनी मुस्कान बिखेर दी। पहल उसीने की।

'मॉर्निंग वाक' को जा रहे हैं।'

'जी हाँ'

'अभी इतनी देर में!'

'क्यों अभी नौ ही तो बजा है।'

'मेरे लिये तो नौ बजे बहुत देर हो जाती है। मैं साढ़े सात बजे ही निकल जाता हूँ। बहुत ही अच्छा समय रहता है 'मॉर्निंग वाक' के लिये।'

'सही फरमाया आपने। पर नौ बजे भी कोई देर नहीं हुई है। वैसे समय अपना है, मैं ऑफिस जाने के झंझट से मुक्त हो चुका हूँ।'

'रिटायर तो मैं भी हो चुका हूँ। दस साल पहले। फिर भी देखिये हर रोज सुबह साढ़े सात बजे बिना नागा निकल जाता हूँ।'

जिस हिसाब से वह कमर में हाथ रख कर इत्मिनान से बातें कर रहा था, मुझे लगा कि ढील दे दो तो वह घंटों ऐसे ही खड़े खड़े बातें करता रहेगा। मैंने इतने कष्ट के साथ यह मॉर्निंग वाक की रुटीन बनाई है, वह टूट जायेगी। एक बार रुटीन टूटी तो फिर शुरू करने में कई दिन निकल जायेंगे।

वह कहे जा रहा था, 'एक घंटा वाक करता हूँ। तेज चाल वाला ब्रिस्क वाक, समझ रहे हैं ने आप। उसके बाद में पार्क में बैठ कर आधा घंटा प्राणायाम करता हूँ। अभी बाजार से हरी सब्जी ले कर लौट रहा हूँ। मैं नाश्ते में रोज हरी सब्जी खाता हूँ। दस साल पहले रिटायर हुआ। मुझे देखिये अभी तक फिटफाट हूँ।'

'फिर भी काम तो रहते ही हैं।' कह कर खिसियानी सी हँसी के साथ आगे बढ़ गया। जान बची लाखों पाये।

जान कहाँ बची साहब चार दिनों के बाद वे फिर दिख गये। मैं कन्नी काट कर निकले ही वाला था कि उन्होंने धर दबोचा।

'आज फिर आप देर से निकले हैं। अब तो धूप भी निकल आई है। यह देखिये आज मुझे ताजे टमाटर मिल गये। मैं रोज सुबह टमाटर का रस पीता हूँ। आप भी पिया कीजिये। स्वास्थ्य के लिये बड़े लाभदायक हैं टमाटर।'

'अभी मैं चलता हूँ, मुझे देर हो जायेगी।' मैंने जान छुड़ाने का प्रयत्न किया।

'अरे आप तो कहते थे कि समय अपना है।' और वह ह ह ह ह कर हँसने लगा।

कहने का मन तो हुआ कि समय अपना है तो क्या तुम पर लुटा दूँ। पर बिना कुछ कहे कुढ़ता हुआ आगे निकल गया।

और मैंने मार्निंग वाक का अपना रास्ता बदल दिया। अपनी किस्मत इस नये रूट पर भी एक दिन उससे फिर मुलाकात हो गई।

'अरे तो आप इस तरफ से जाते हैं। तभी आपसे इतने दिन मुलाकात नहीं हुई।'

'जी।' मैंने कहा।

'हाँ यह रास्ता आपके लिये आसान पड़ता होगा। इसमें कम चलना पड़ता है। अपना तो वही मेन रोड वाला रास्ता है। पूरे छह किलोमीटर का है।'

जलभुन कर मैंने पूछा, 'तो आप आज इस तरफ कैसे?

'आगे नुक्कड़ पर हरी सब्जी वाला बैठता है। यह देखिये ताजा मेथी। मधुमेह में बहुत लाभदायक है।'

'तो आपको मधुमेह है।'

'हाँ वही एक बीमारी है। नहीं तो देख लीजिये मैं एकदम फिटफाट हूँ। दस साल हो गये हैं मेरी रिटायरमेंट को। आप कब रिटायर हुये?'

'मुझे भी दस साल हो गये हैं।' मैंने कह दिया हालाँकि मुझे अभी दो ही साल हुये हैं।

'तो आप भी अड़सठ साल के हैं।'

'नहीं तो मैंने अभी अठहत्तरवाँ पूरा किया है।' मैंने जड़ दिया। उसके मुँह पर जो भाव आये उन्हें देख कर मुझे अपूर्व सुखानुभूति हुई। अपने इस झूठ पर मुझे गर्व होने लगा। मैंने अपना बासठवाँ साल ही पूरा किया है।

'अभी तो आप कह रहे थे कि आपको रिटायर हुये दस साल ही हुये हैं।' वह बहुत ही कन्फ्यूज्ड लग रहा था।

'जी हाँ। मैं एक वैज्ञानिक हूँ। हमारे यहाँ रिटायरमेंट नहीं होता है। जब तक काम करने की इच्छा हो करो। दस साल पहले मैंने सोचा कि अब बहुत हो गया। अब रिटायर हो कर अपने बाकी शौक पूरे करूँ। अड़सठ साल में ही रिटायरमेंट ले लिया।'

'आप लगते तो नहीं हैं अठहत्तर साल के।'

'जी मैं अठहत्तर साल का ही हूँ।' अब मुझे उससे बात करने मैं बहुत मजा आने लगा था। 'देखिये अभी तक एकदम फिटफाट हूँ।रोज छह बजे से आठ बजे तक कराटे की प्रैक्टिस करता हूँ। नौ बजे से दस बजे तक प्रात: भ्रमण के लिये जाता हूँ। आप भी आइये मेरे साथ। छह बजे से कराटे की प्रैक्टिस कीजिये। नौ बजे मानिर्ंग वाक कीजिये। आपकी यह मधुमेह की बीमारी भी दूर हो जायेगी। आप हैं तो अभी अड़सठ के पर दिखने में मुझसे बड़े लगते हैं।

'अच्छा अभी मैं चलता हूँं। घर में इंतजार हो रहा होगा।' वह खिसकने लगा।

'कल से आप आ रहे हैं तो कराटे के लिये।' मैंने पीछे से आवाज दी। कहीं हाँ बोल देता तो लेने के देने पड़ जाते पर वह हाँ बालने टाइप का नहीं लगा था।

वह दिन है और आज का दिन है वह मुझे जब भी दिखाई पड़ता है हमेशा दूसरी तरफ के फुटपाथ पर दिखाई पड़ता है। मुझे देखते ही फुटपाथ बदल लेता है।

मैं भी कहाँ शिकायत कर रहा हूँ!

Thursday, December 17, 2009

बस हाइजैक

यह घटना वास्तव में घटी है।

रात का समय था। बस हल्द्वानी से दिल्ली जा रही थी। रात के करीब दो बजे बस रामपुर पहुँची, वहाँ चार व्यक्ति बस में चढ़े। उस समय बस के यात्री निद्रा की विभिन्न अवस्थाओं में थे। कोई खरर्ाटे ले रहा था तो कोई करवट बदल रहा था। उन चारों पर किसी का ध्यान नहीं दिया। उन्होंने सीटें से ही रिजर्व करा रखीं थीं। कंडक्टर ने उन्हें खाली सीटों में बिठाया। मुरादाबाद बाईपास पार होते ही उन चारों में से एक जिसके चेहरे में चेचक के दाग थे ड्राइवर के पास गया और उसकी कनपटी में रिवाल्वर सटा दी। बस को वे लोग एक सुनसान खेत में ले गये और रिवाल्वरों के जोर पर यात्रियों को एक एक करके बाहर निकाला और उनके गहने पैसे लूट कर अपने साथ लाए बोरों में भर लिया। उसके बाद उन लोगों ने बस और पैसेंजरों को छोड़ दिया। लुटी हुई बस आगे बढ़ गई।
बस गजरौला करीब आधे घंटे के लिये एक ढाबे में रुक कर आगे बढ़ ही रही थी कि वे चार फिर आ गए। चेचक के दाग वाला उनका मुखिया लग रहा था। उसने बस के यात्रियों से कहा, आप लोगों का सब सामान हम लौटा रहे है। सामान नीचे दरी में पड़ा हुआ है। अपना सामान उठा लीजिए। इसके बाद वे कार में बैठ कर रफूचक्कर हो गये। यात्रियों ने देखा कि लूटा हुआ कैश तो वहाँ नहीं था पर गहने और सब सामान दरी में था।
लुटेरों की इस अजीब हरकत का खुलासा बस के ड्राइवर ने किया। इस हाईवे पर जब कोई भी बस लुटती है तो उसका एक बँधा हुआ रेट पुलिस को जाता है। बस से लुटेरे कितना ही क्यों न लूट लें पुलिस को उससे कोई मतलब नहीं। उनको उनकी पूर्व निर्धारित राशि मिलनी चाहिए। इस बस को लूटने पर उन चारों ने पाया कि कुल मिला के सामान की कीमत से पुलिस का ही चुकता नहीं होगा। उन्होंने सामान लौटा दिया। पुलिस को बता देंगे कि सामान कम निकला इसलिए लौटा दिया। इस तरह वे पुलिस को देने से, यानी घाटे के सौदे से बच जायेंगे।

Tuesday, December 15, 2009

चिराग का भूत - हँसी से भरपूर प्रहसन

आदमी की इच्छाओं का अंत नहीं। यदि आपको चिराग का जिन्न मिल जाए तो आप उससे क्या माँगेंगे! पढ़िए एक हँसी से भरपूर प्रहसन। - मथुरा कलौनी

चिराग का भूत

स्थान - रास्ता

पथिक - (स्वगत) यह पेड़ की छाँव में कौन बैठा हुआ है। कोई बेचारा लगता है। किस्मत का मारा लगता है। सूरत रोनी है। इसके साथ हुई बात कोई अनहोनी है। जरा पूछ कर तो देखूँ क्या दुख है इसको। ( प्रकट) क्यों भैया क्या दुख है तुमको?

बेचारा - कौन हो भई तुम?

पथिक - मैं एक पथिक हूँ। विश्राम करने के लिए इस पेड़ की छाँव में आया। यहाँ आ कर तुमको बैठे पाया। सोचा पूछ कर देखूँ क्या दुख है तुमको। क्यों भैया क्या दुख है तुमको?

बेचारा - कोई एक दुख हो तो बताऊँ। कोई एक गम हो तो सुनाऊँ। यहाँ तो किस्सा इस तरह है कि जब से मैंने होश सम्हाला है, दुखों को ही पाला है। मुझे पहले एक दुख मिला। उस पहले दुख से उबरा ही था कि मुझे दूसरा दुख मिला। फिर तीसरा, फिर चौथा। तुमको गिनती आती है।

पथिक - आती है।

बेचारा - पूरी गिनती गिन जाओगे तो भी मेरे दुखों का पार न पाओगे।

पथिक - वह तो बता रही है तुम्हारी सूरत। दुखों की बने हो तुम एक बड़ी मूरत। चलो अपना कोई नया ताजा दुख सुनाओ। तुम्हारा जी भी हल्का हो जाएगा, मेरा मन भी बहल जाएगा। मैं कर लूँगा थोड़ा विश्राम और तुम को भी आएगा आराम।

बेचारा - कहते हो तो बताता हूँ। अपने गम की दास्तान सुनाता हूँ। अभी परसों की बात है। मैं थका माँदा अपने घर पहुँचा। जैसे सिर मुड़ाते ही ओले बरसते हैं, मेरे घर में घुसते ही शोले बरसते हैं।

पथिक - क्या तुम्हारी बीवी तुमको मारती है?

बेचारा - नहीं नहीं मेरी बीवी तो बहुत अच्छी है। बस गाय समझ लो।

पथिक - गाय! गाय भी तो सींग मारती है।

बेचारा - मेरी बीवी क्या मारेगी मुझको। बस मेरी किस्मत ही ऐसी है कि मैं ही खा लेता हूँ उसके हाथ से मार। कभी एक दो कभी दो चार। परसों की बात बता रहा था। बीवी ने सेव मँगाए थे और मैं खाली हाथ गया था।

पथिक - यह तो तुमने गलती की। बीवी ने मँगाए थे सेव तो ले जाते सेव। यह कौन सी बड़ी बात थी। सेव ही तो माँगे थे।

बेचारा - हाँ माँगे तो थे उसने केवल सेव। पर मैं कहाँ से ले जाता सेव। सेव क्या पेड़ में उगते हैं कि जब चाहो तोड़ लो। बाजार में मिलते हैं सेव। वह भी सौ रुपये किलो। और मेरे पास बस का किराया भी नहीं था तो कहाँ से ले जाता सेव!

पथिक - क्या बीवी ने बहुत मारा। मेरे कहने का मतलब है क्या तुमने अपनी बीवी के हाथों बहुत मार खाई?

बेचारा - हाँ आँ...फिर उसने मुझे धक्का दे कर बाहर निकाल दिया और मेरे मुँह पर दरवाजा बंद कर दिया। खटाक।

पथिक - फिर क्या हुआ?

बेचारा - उद्देश्यहीन, भटकता हुआ मैं यहीं आ पहुँचा। यहाँ आकर क्या देखता हूँ कि उधर पत्थरों के बीच में एक चिराग दबा हुआ है। मैंने पत्थरों को हटा कर चिराग को निकाला। बहुत ही सुंदर चिराग था। उस पर धूल और मिट्टी चिपकी हुई थी। मैंने उस पर से मिट्टी हटाई और रुमाल से उसे साफ करने लगा। अभी मैं उसे रुमाल से रगड़ ही रहा था कि.....

दृश्‍य बेचारा और जिन्‍न।
जिन्न प्रकट होता है।

जिन्न - (अँगड़ाई लेता है) इस बार तो बहुत ही लंबे अरसे के बाद किसी ने चिराग को रगड़ा। अरे बापरे यह तो ट्वेंटीफर्स्ट सेंचुरी है। चिराग किसने रगड़ा, कौन बना मेरा मालिक!

बेचारा - भूत... भूत... भूत... भूत...

जिन्न - (स्वगत) तो ये है मेरा नया मालिक। (प्रकट ) गुड इविनिंग सरकार।

बेचारा - भूत... भूत... भूत... भूत...

जिन्न - ओ मेरे आका॥ ओ मेरे सरकार आपने मुझको बुलाया, और मैं आया।

बेचारा - मैंने तुमको नहीं बुलाया... मैंने तुमको नहीं बुलाया।

जिन्न - अरे कैसे नहीं बुलाया! यह कौन सा जमाना है भाई ? कोई मुझे बुलाता और खुद भागता!

बेचारा - भूत... भूत... भूत...

जिन्न - डरो मत सरकार, डरो मत सर, डरो मत बडी, डरो मत बाबा, डूड।

बेचारा - कौन हो तुम।

जिन्न - मैं जिन्न हूँ।

बेचारा - जिन्न?

जिन्न - हाँ जिन्न। हिंदी में भूत, उर्दू में जिन्न और अँग्रेजी में जिनी हूँ।

बेचारा - भूत...भूत... बचाओ...

जिन्न - (स्वगत ) ऐसा डरपोक आदमी मैंने पहले कभी नहीं देखा। ( प्रकट ) हाई डूड! मैं आपका सेवक हूँ सरकार ।

बेचारा - मुझे बहुत खुशी हुई आपसे मिल कर।

जिन्न - मैं आपका सेवक हूँ सरकार।

बेचारा - भूत महाराज क्या सेवा करूँ मैं आपकी?

जिन्न - सेवा मैं करूँगा सरकार आपकी।

बेचारा - नहीं भूत महाराज॥

जिन्न - (स्वगत) ये क्या हो रहा है? मैं बहुत कनफ्यूज हो गया हूँ। ( प्रकट) सरकार आप मुझे यह बतायें कि आपने मुझे क्यों बुलाया?

बेचारा - यह क्या गजब कर रहे हो भूत महाराज। मेरी हिम्मत कि मैं आपको बुलाऊँ। आप विश्वास कीजिए महाराज कि मैंने आपको नहीं बुलाया। माँ कसम।

जिन्न - अरे कैसे नहीं बुलाया! आपने उस चिराग को रगड़ा कि नहीं?

बेचारा - मैं उसे साफ कर रहा था।

जिन्न - हुकुम मेरे आका।

बेचारा - माने?

जिन्न - क्या माने?

बेचारा - अभी तुमने क्या कहा। हुकुम मुन्नका।

जिन्न - हुकुम मुन्नका नहीं, हुकुम मेरे आका।

बेचारा - इसका मतलब क्या हुआ?

जिन्न - हुकुम मेरे आका माने आप हुकुम करो मेरे मालिक।

बेचारा - कौन है तुम्हारा मालिक?

जिन्न - आप हैं मेरे आका।

बेचारा - ए भैया, क्यों मेरा मजाक उड़ा रहे हो। मैं पहले ही बहुत परेशान हूँ। मुझे और परेशान न करो। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो और आपना रास्ता नापो।

जिन्न - ये मैं नहीं कर सकता।

बेचारा - क्यों नहीं कर सकते। मुझे काका भी बुलाते हो....

जिन्न - काका नहीं आका।

बेचारा - जो भी हो मुझे आका काका बुलाते हो और परेशान भी करते हो।

जिन्न - (स्वगत ) वाह क्या आदमी मिला है! एक हजार साल में ही जमाना इतना बदल गया है। आदमी इतना भी बेवकूफ हो सकता है? (प्रकट) देखो मेरे आका जब कोई उस चिराग को रगड़ता है तो मैं हाजिर हो जाता हूँ। चिराग रगड़ने वाले का दास बन जाता हूँ। और वह जो भी माँगता है मैं हाजिर कर देता हूँ।

बेचारा - क्या कहा... आप चिराग रगड़ने वाले के दास बन जाते हैं!

जिन्न - जी सरकार यही प्रोटोकॉल है।

बेचारा - अलादीन के चिराग की तरह।

जिन्न - यह चिराग अभी आपके पास है सरकार और मैं आपका दास। हुकुम मेरे आका। आप जो भी माँगेंगे मैं हाजिर कर दूँगा।

बेचारा - मैं जो भी माँगूँ तुम दे सकते हो!

जिन्न - हाँ सरकार आपने चिराग रगड़ कर मुझे बुलाया और मैं चला आया। अब आप जो भी माँगोगे मैं हाजिर कर दूँगा। हुकुम मेरे आका।

बेचारा - तुम यह बार हुकुम मेरे आका। मत बोलो। मुझे डर लगता है और भागने का दिल करता है।

जिन्न - बोलना पड़ता है सरकार। यह हमारे कोड ऑफ कंडक्ट में लिखा हुआ है। डरिए मत सरकार! माँगिए। हुकुम मेरे आका।

बेचारा - क्या माँगूँ। प्यास लगी है, घर से बाहर निकालने से पहले बीवी ने पानी भी नहीं पिलाया। भूत महाराज आप एक पानी का गिलास हाजिर कर दीजिए।

जिन्न - अभी लीजिए सरकार। नहीं सरकार माफ कीजिए। यह मैं नहीं कर सकता।

बेचारा - क्यों?

जिन्न - मुझे नहीं मालूम यह पानी का गिलास क्या होता है। सोने का गिलास होता है, चाँदी का गिलास होता है पर पानी का गिलास क्या होता है, मुझे नहीं मालूम।

बेचारा - पानी का गिलास माने एक गिलास में पानी।

जिन्न - ओ आपको पानी चाहिए। ऐसा बोलिए न। यह लीजिए सरकार।

बेचारा - अरे, यह आपने कैसे किया? वाह आप तो बहुत कमाल के भूत हैं ।

जिन्न - हुकुम मेरे आका।

बेचारा - आप मुझे सेव ला कर दे सकते हैं।

जिन्न - सेव?

बेचारा - हाँ सेव।.... एपल।

जिन्न - ओ एपल! यह लीजिए सरकार।

बेचारा - भूत महाराज?

जिन्न - हुकुम मेरे आका।

बेचारा - मुझे अमीर बना दीजिए।

जिन्न - अरब का अमीर सरकार?

बेचारा - कहीं का भी बनाइए पर बनाइए अमीर।

जिन्न - अभी लीजिए सरकार।

बेचारा - यह क्या!

जिन्न - लड़की सरकार।

बेचारा - लड़की क्यों?

जिन्न - सरकार अमीर आदमी का बहुत बेगम। रिच मैन, मैनी वाइभ्ज। जितना बड़ा अमीर उतना बड़ा हरम।

बेचारा - ओ भूत मालिक, ओ जिन्न महाराज अमीर बनने के लिए रुपये चाहिए। लड़की नहीं। क्या तुम मुझे रुपये दे सकते हो?

जिन्न - हुकुम मेरे आका।

बेचारा - मुझे 100 रुपये दो।

जिन्न - यह लीजिए।

बेचारा - मुझे 10,000 रुपये दो।

जिन्न - यह लीजिए।

बेचारा - अरे वाह। आप तो बहुत ही काम के भूत निकले। अब मुझे बीवी से मार खाने की जरूरत नहीं। जो जो चाहिए माँग लेता हूँ। भूत महाराज एक पेन चाहिए।

जिन्न - यह लीजिए।

बेचारा - कागज चाहिए।

जिन्न - यह लीजिए।

बेचारा - आप यह कागज और कलम लीजिए। मुझे जो जो चाहिए मैं बोलता हूँ।þ और आप लिखते जाइए ।

जिन्न - हुकुम मेरे आका।
बेचारा - लिखिए बाटा शू कंपनी का एक जोड़ी जूता। नहीं नहीं दो जोड़ी जूते। दोनों के साइज सात। रेमंड कंपनी के दो उलन पैंट। एरो कंपनी की दो शर्ट। जौकी कंपनी के आधे दर्जन अंडरवीयर। इसको एक दर्जन कर दीजिए। लिखा।

जिन्न - हॉं सरकार लिखा।

बेचारा - आगे लिखिए, ओल्ड स्पाइस का आफ्टरशेव लोशन, जिलेट का शेविंग किट, बनारस की जरी वाली दो साड़ियाँ, एक हरी और एक धानी...

बेहोशी का संगीत। जिन्न लिखते लिखते बेहोश हो जाता है। बेचारा - पानी छिड़क कर उसे होश में लाता है।

जिन्न - सरकार आप इतने लालची आदमी हैं। लिखते लिखते मैं बेहोश हो गया। हाथ दुख रहा है। अब और मैं नहीं लिख सकता।

बेचारा - ठीक है अभी आप इतना ला दीजिए। बाकी मैं बाद में बोलता हूँ।

जिन्न - अभी और है... और यह लिस्ट तो बहुत बड़ी है। मैं कैसे करूँगा इतना काम!
(स्वगत)
मेरी हिस्ट्री में मुझे बहुत किस्म के लोग मिले। बहुत लोगों ने इस चिराग को रगड़ा। किसी ने कहा दीनार दो, तो किसी ने कहा मीनार दो।
कोई बोला शबाब दो, तो कोई बोला साथ में शराब और कबाब दो।
कोई ताजमहल माँगा तो कोई मुमताज महल,
पर यह आदमी तो एकदम आम आदमी है।
मैं पूछता हूँ कि क्या चाहिए धन, दौलत, लड़की
और यह माँगता है नून, तूल और लकड़ी।

बेचारा - ओ भूत महाराज। सामान जल्दी ले आइए। मुझे अपनी बीवी को सरप्राइज देना है।

जिन्न - सरकार इतना सामान लाते लाते तो मुझे महीना लग जाएगा। मुझे जल्दी है। चिराग में जा कर सोना है।

बेचारा - अभी तो मैंने पूरा सामान बताया ही नहीं । पहले मेरा पूरा काम कर दीजिए।

जिन्न - (स्वगत) मर गए। अब मैं इससे कैसे छुटकारा पाऊँ! आइडिया! -प्रकट- सरकार अगर आप अमर हो जाँय तो कितना अच्छा होगा।

बेचारा - अमर माने?

जिन्न - अमर माने अमर। आपका नाम लोग सदियों तक याद करते रहेंगे।

बेचारा - इससे मुझे क्या फायदा होगा।

जिन्न - आप इम्मार्टल हो जाएँगे। आपकी संतान, आपकी संतान की संतान,
आपकी संतान की संतान की संतान, यानी पुश्त दर पुश्त आपकी आल फ्यूचर जनरेशन आपको याद करेगी।

बेचारा - यह कैसे होगा! क्या आप ऐसा कर सकते हैं?

जिन्न - हुकुम मेरे आका।

बेचारा - भूत तुम मुझे अमर कर दो।

जिन्न - यह लीजिए सरकार। वह देखिए क्या है?

बेचारा - कहाँ?

जिन्न - उस तरफ।

बेचारा - वहाँ तो एक बहुत बड़ा जूता दिखाई पड़ रहा है।

जिन्न - वह जूता नहीं है सरकार, वह एक बहुत बड़ी विल्डिंग है। शू पैलेस। जूता महल।

बेचारा - जूता महल !

जिन्न - हाँ जूता महल आप ताज महल के बारे में जानते हैं न?

बेचारा - हाँ।

जिन्न - जैसे ताजमहल को देख कर लोग शहंशाह शाहजहान को याद करते हैं वैसे ही जूता महल देख कर लोग आपको याद करेंगे।

बेचारा - कैसे?

जिन्न - मैं आपको मार कर आपकी कब्र के ऊपर जूता महल बनाऊँगा। जैसे ताजमहल के नीचे शहंशाह शाहजहान वैसे ही जूता महल के नीचे आप। जैसे शहंशाह शाहजहान अमर हैं वैसे ही आप अमर हो जाएँगे।

बेचारा - तू साला भूत। मुझे मारना चाहता है। मुझे! तुमने मुझे मार दिया तो मैं अपनी बीवी को क्या मुँह दिखाऊँगा। अमर बनाएगा मुझे। अरे तू क्या अमर बनाएगा मुझे। दूर हो जा मेरी नजरों से नहीं तो अपने इस जूते से मार-मार कर तेरा भुरकस निकाल दूँगा।

जिन्न - जो हुकुम मेरे आका।

जिन्‍न गायब हो जाता है।
दृश्‍य बेचारा और पथिक

बेचारा - मेरे दूर हो जा कहते ही वह जिन्‍न गायब हो गया। वह चिराग भी गायब हो गया।

पथिक - यानी वो जिन्न चला गया। तुम्हारा सामान भी नहीं आया। चिराग भी चला गया!

बेचारा - पता नहीं कहाँ गया। मैंने बहुत खोजा नहीं मिला। या तो जमीन खा गई या आसमान निगल गया।

पथिक - ( लंबी सॉंस खींच कर) वह चिराग अब नहीं मिलेगा।

बेचारा गौर से पथिक को देखता है।

बेचारा - कौन हो तुम?

पथिक - तुम्हारी तरह ही एक किस्मत का मारा।

बेचारा - वो कैसे?

पथिक - वह चिराग का भूत...जिन्न तुमसे छुटकारा पाना चाहता था। पर तुम्हारी मर्जी के बिना यह संभव नहीं था। वह तुमको गुस्सा दिलाना चाहता था ताकि तुम गुस्से में उसे चले जाने को कहोगे और वह चिराग में घुस जाएगा। पर चिराग ही गायब हो गया। वह बेचारा लटक गया बीच में ही। चिराग में तो घुस नहीं पाया। चिराग के बिना उसका जादू भी बेकार हो गया। अब वह जिन्न से साधारण आदमी बन गया है।

बेचारा - तुम को यह सब कैसे मालूम?

पथिक - क्यों कि मैं ही वह जिन्न हूँÆ ... था।

बेचारा - डरता है
डरो मत। अब मैं भी एक बेचारा हूँ।

बेचारा - अपने लिए नहीं तो तुम्हारे लिए चलो चिराग को खोजते हैं।

पथिक - मैंने कहा न अब वह चिराग नहीं रहा। जब तुम अमीर बनना चाहते थे मैंने तुमको एक बेगम ला कर दी थी। वह कोई और नहीं तुम्हारी ही बीवी थी। तुम उस भेष में उसे नहीं पहचान पाए थे। वह जाते समय चिराग को अपने साथ लेती गई। उस समय मैंने भी ध्यान नहीं दिया। मुझे बहुत बात में पता चला।

बेचारा - यह तो अच्छा हुआ चिराग घर में ही है। तुमको तुम्हारा घर मिल जाएगा और मुझे मेरा सामान। लिस्ट तो तुम्हारे पास होगी ही।

पथिक - तुम्हारी बीवी चिराग लेकर सीधे लोहार के पास गई। चिराग को गला कर उसने एक कटोरी बनवा ली है।

बेचारा - माने?

पथिक - माने चिराग गया। न मैं जिन्न बन सकूँगा और न तुम्हारा सामान आएगा।

बेचारा - अब तुम क्या करोगे?

पथिक - कुछ नहीं। तुम्हारे साथ तुम्हारे घर चलता हूँ। तुम्हीं को मुझे पालना पड़ेगा। मुझे तो कुछ आता ही नहीं है।
समाप्‍त