Friday, April 30, 2010

कौन है जो कहकहे सब बटोर कर ले गया

बनने का बड़ा शोर था कैसे खामोशी से ढह गया।
कौन है जो कहकहे सब बटोर कर ले गया

नादॉं तो न थे हम, इन्तहॉं थी मस्ती की।
खतरों से बेखबर रवानी में बहते गये।

बेमुरव्वत तो आशियॉं जला के चले गये
हम जल भी न सके, सुलग कर रह गये।

कॉफी की महफिलें, देर से आना बनाकर बहाना
चले थे साथ जो दो कदम, वही याद करके रह गये

3 comments:

राजेन्द्र मीणा said...

एक सुन्दर पोस्ट ....बधाई स्वीकारे
http://athaah.blogspot.com/

वन्दना said...

sundar rachna.

SANJEEV RANA said...

इस रचना के लिये धन्यवाद
ऐसे लेखन कि ब्लोग जगत को आवयश्कता है