Sunday, January 10, 2010

तुमने कुछ कहा होता - दूसरा और अंतिम भाग

एक दिन बड़े आत्मविश्वास के साथ मुस्कराते हुए सुमति मेरे पास आई और अपनी शादी का कार्ड दे कर चली गई। मैं आसमान से ऐसा गिरा कि किसी खजूर पर भी नहीं अटका। चारों खाने चित। और तब मुझे पता चला कि सुमति को खो कर मैं क्या खो रहा हूँ। चार दिन तक तो मेरे दिमाग में एक ही सवाल था कि यह क्या हो गया। पर अब पछताए होत क्या...।

मैं एक व्यवहारिक जीव हूँ। मैंने स्वयं को समझा बुझा लिया कि सुमति की शादी हो रही है तो अच्छा ही है। मैं उसका बालसखा हूँ, मुझे तो प्रसन्न होना चाहिए। जब मैंने ही मंशा नहीं दिखाई तो उसे क्या पड़ी थी।

आज जब मैं इस बारे मैं सोचता हूँ तो पाता हूँ कि अन्य सब लड़कियों में भी मैं सुमति को ही तलाशता था। कितना नासमझ था मैं, कितना अंधा था मैं। जो पास थी उसे ही मैं दूर दूसरे परिवेश में खोज रहा था। पता नहीं क्यों उन दिनों मुझे सुमति मेंं एक आकर्षणहीन सादापन ही दिखाई पड़ता था। हो सकता है यह मेरी नजर का धोखा हो। शायद मैं घूम फिर कर और दुनिया देख कर ही घर लौटना चाहता था। यदि मैं देखना चाहता तो वह सब ग्लैमर जो मैं बाहर खोजता फिर रहा था, सुमति में मौजूद था। लड़कपन वाली सुमति और युवती सुमति में मैंने कभी अंतर किया ही नहीं। अपनी कच्ची समझ के कारण एक समझदार, सुलझी हुई और शायद समर्पित लड़की को मैं देख ही नहीं पाया।

आजकल अवकाश के क्षणों में मैं यह भी सोचता हूँ कि क्या कमी थी उन लड़कियों में जिनसे मैंने किनारा कर लिया था। सभी तो अच्छी लड़कियाँ थीं। सबका अपना अपना व्यक्तित्व था। आज समझ में आता है कि वे मुझे क्यों नहीं जँचीं, क्यों कि उनमें कोई भी सुमति नहीं थी। मेरे बिना जाने मेरे गहन भीतर तो सुमति बैठी हुई थी।




खैर, सुमति की शादी हो गई। मैंने स्वयं को समझा लिया कि चलो जो हुआ अच्छा हुआ। इसी में संतोष कर लूँ कि सुमति सुखी है। पर मेरे अंदर शादी करने का उत्साह जाता रहा। अपने मन की क्या कहूँ, सुमति के प्रति अहसास हुआ भी तो कब? सुमति के जाने के बाद। और अपना यह प्यार अपना विकराल रूप लेकर मेरे सामने तब खड़ा हुआ जब मैं सुमति से मिलने गया था उसके घर। तब उसकी शादी हुए सालभर हो गया था।

बहुत बड़ा परिवार था। औरतों और बच्चों की भीड़ थी। उसी भीड़ में सुमति भी थी। बड़ी, मँझली आदि बहुओं के बीच वह खो कर रह गई थी। वह एक अमीर परिवार था। सब कुछ था पर वह नहीं था जो होना चाहिए था। मर्दों की दुनिया अलग थी और औरतों की अलग। पत्नी होनी चाहिए थी, इसलिए थी। केवल वंशवृद्धि के लिए। पति आजाद था, पर पत्नी सास श्वशुर जेठ जेठानियों के अधीन थी।

मुझे वहाँ घुटन महसूस हुई। आया था सुमति से मिलने पर वहाँ औरतों और बच्चों की रेलपेल में उससे बात भी नहीं हो पाई। वहाँ से वापस लौटते समय सुमति के साथ कुछ मिनटों का एकांत मिला तो मैंने उससे पूछा, 'खुश तो हो न सुमति?'

सुमति ने कोई उत्तर नहीं दिया। फिर पता नहीं क्या सोच कर मैंने उसे कुरेदा। मुझे आभास तो मिल ही गया था कि ऐसे माहौल में सुमति खुश नहीं हो सकती। मैंने उससे कहा, 'उस दिन जब तुमने पूरे आत्मविश्वास के साथ मुस्करा कर मुझे अपनी शादी का कार्ड दिया था तो जानती हो मुझे कितनी ठेस पहुँची...'

सुमति बिफर गई। उसने मेरी बात पूरी नहीं होने दी। 'उस तरह मुस्कराने के लिए मैं चार दिनों से अभ्यास कर रही थी शशि। मेरा भी आत्मसम्मान हो सकता है यह तुम्हें ध्यान नहीं आया।'

उसकी ऑखें डबडबा आईं। एक ढुलकते हुए आँसू को उसने अपनी तर्जनी में ले लिया।

'तुमने तो साले मेरा जीवन ही बरबाद कर दिया।' उसने कहा था।

उसकी वह छवि आज तक मेरी आँखों के सामने तैरती है। वह छवि धूमिल पड़े और उम्रेदराज में कुछ साल बचे हों तो शायद मेरी भी शादी हो जाय। जब तक वह छवि धूमिल नहीं पड़ती शादी करके दूसरी गलती करने का मन नहीं है।
समाप्त






9 comments:

अनूप शुक्ल said...

अब जब उसने कहा तो आप कुछ कर नहीं सकते।

Arvind Mishra said...

मार्मिक

हरकीरत ' हीर' said...

कमाल है मथुरा जी आपने शादी नहीं की .....????

मेरे एक और मित्र हैं सतीश जयसवाल उनके साथ भी कुछ ऐसी ही घटना हुई .....उन्होंने भी शादी नहीं की .....देखिये कई बार कुछ ऐसी घटनाये ज़िन्दगी को किस कदर रुखा बना देती हैं ......पर कहानी बहुत मार्मिक बन पड़ी है ......बधाई ......सच्ची है न ....??

मथुरा कलौनी said...

@अनूप शुक्‍ल
मैं तो केवल कथावाचक हूँ।

@अरविंद मिश्र
धन्‍यवाद


@हरकीरत 'हीर'
जी मैं पूर्णतया विवाहित हूँ। इस कहानी में मेरा रोल केवल कथावाचक का है। कहनी सत्‍यघटना पर आधारित है। कहानी रचते समय मैंने लेखकीय स्‍वतंत्रता का लाभ उठाया है। कहानी के नायक ने आगे चल कर शादी की। वह बालबच्‍चेदार है। नायिका को तो वह अपना न सका और अपने परिवार का हो कर भी न हो सका। नायिका को देख कर जो शब्‍द मस्तिष्‍क में उभरता है वह है मशीन। वह न खुश है न दुखी। बस मशीन की तरह जी रही है।
फिल्‍म सगीना महतो का डायलॉग याद आ रहा है ' येई तो जीबोन, काली दा' (यही तो जीवन है, काली दा)

seema gupta said...

सुमति बिफर गई। उसने मेरी बात पूरी नहीं होने दी। 'उस तरह मुस्कराने के लिए मैं चार दिनों से अभ्यास कर रही थी शशि। मेरा भी आत्मसम्मान हो सकता है यह तुम्हें ध्यान नहीं आया।'"
" मन को छु गयी ये पंक्तियाँ......काश सुमति ने ......?? मगर शायद किस्मत को यही मंजूर हुआ होगा......असल जिन्दगी के बेहद करीब लगी आपकी ये कहानी "
regards

निर्मला कपिला said...

बहुत सुन्दर कहानी है आत्मकथानक मे लिखी गयी एाचना सही मे लेखक की ही समझी जाती है कई बार । कई बार मुझ से भी लोगों ने ऐसे ही प्रश्न पूछे हैं जैसे हरकीरत जी ने कहा। शुभकामनायें

श्याम कोरी 'उदय' said...

... बहुत सुन्दर कहानी, बेहद प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है,हर किसी की सराहना मिलने की पूरी संभावना है !!!!

सागर नाहर said...

कहानी जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा की पुस्तक "साँझ हुई घर आये" से थोड़ी मिलती जुलती लगी। फर्क इतना जरूर है कि उसमें संयोग के अजीबोगरीब खेल और नायक की सचिव के प्रयास से आखिर में नायक को नायिका मिल ही जाती है।
मार्मिक कहानी। हरकीरत जी की बात में दम है। इतनी सुन्दर प्रस्तुति सिर्फ कथावाचक शायद नहीं कर पाता।
:)

मथुरा कलौनी said...

सागर जी
टिप्‍पणी के लिये धन्‍यवाद। हकीरत जी की टिप्‍पणी का उत्‍तर मैं दे चुका हूँ।
मेरा दुर्भाग्‍य कि मैंने ओमप्रकाश जी को नहीं पढा है। आपकी पारखी दृष्टि की दाद देनी पड़ेगी कि आपने कहीं कुछ समानता देखी है। तथा फर्क को तो रेखांकित ही कर दिया है। हर प्रेम कहानी में नायक होता है, नायिका होती है और मिलने बिछड़ने की घटनायें होती हैं। इतनी समानता तो अवश्‍य मिलेगी।
वैसे मेरी यह कहानी ' वामा' के दिसंबर 89 अंक में छपी थी।
कहानी आपको मार्मिक लगी यह मेरे लिये बहुत बड़ी बात है।
एक बार फिर धन्‍यवाद