Tuesday, March 18, 2008

बंगलौर में हिन्‍दी नाटक - कुछ अनुभव - 1


कहते हैं हिन्‍दी किसी की भाषा नहीं है इसलिए यह सब की भाषा है। सब की भाषा होने के कारण हिन्‍दी उपेक्षित हो गई है। यह जान कर दुख होता है कि जिनकी मातृभाषा हिन्‍दी है उनके बच्‍चे अंग्रेजी के चरण पखारते रहते हैं। वे हिन्‍दी भी अंग्रेजी में बोलते हैं जैसे भीष्‍म पितामह को बिसम पितमह और संजय को संजेय। यह देख कर अच्‍छा लगता हे कि आजकल हिन्‍दी के प्रति जागरूकता बढ़ी है। फिर भी ऐसे लोगों की कमी नहीं जो आपसे कहते हैं ' आप बड़ी शुद्ध हिन्‍दी बोलते है।'


एक वाकया याद आता है। आषाड़ का एक दिन का मंचन हो रहा था। नाटक के बाद मेरे एक जानपहचान के स्‍टेज में आए और कहने लगे 'नाटक की हिन्‍दी इतनी कठिन है। बंगलौर में यह नहीं चलेगा।'
इन सज्‍जन ने हिन्‍दी को अनाथ समझ कर अपना लिया था, लिहाजा वे ही तय करेंगे कि बंगलौरवासियों को कैसी हिन्‍दी परोसनी चाहिए। उन सज्‍जन की भविष्‍यवाणी कि अगली बार तुम्‍हारा नाटक देखने कोई नही आएगा गलत सिद्ध हुई। लोग नाटक देखने आते ही हैं। दर्शकों में अहिन्‍दीभाषी बहुत बड़ी संख्‍या में आते है।
- मथुरा कलौनी

4 comments:

गुस्ताखी माफ said...

सही कह रहे हैं आप.
आपके लिखने की प्रतीक्षा रहेगी

Vibha Rani said...

Hindi ki apani yatra ko koi rok nahi sakata. Main ek lekhak, samaj sevak ke allave theatre actor v playwright hoon. mere naatak NSD ke bhaarangam v Shri Ram Centre mein khele ja chuke hai, Mohan Rakesh Samman se sammanit hain. Abhi ek monologue kar rahii huun, "Life is not a Dream" Hindi v Eng dono mein. khushii hogi kalayan ke maadhyam se ise bangalore me prastut kar ke. mujhe mail kar sakti hai- gonujha.jha@gmail.com par. holi ki badhaii!

Madhumita said...

My reply in English as I'm not sure about the Hindi fonts. I agree that Hindi is a unifying language ... but what about mixed cultured families where giving precedence to either the mother or father's language becomes a sensitive issue? Hindi is still perceived as a 'native' tongue more localized to North India.

Just a thought ...

Anonymous said...

हिंदी के जितन्रे रूप हैं उससे भी ज्यादा हैं इसके बारे में लोगों के मत. क्या कर सकते हैं जनाब. सही तो यही लगता है कि भाषा को नैसर्गिक रुप पनपने दिया जाए. हां इसकी जड़ों में निज भाषा प्रेम का जल सिंचते रहना है, सेवा करती रहनी है..........
डॉ. राकॆश