Wednesday, February 4, 2026
Friday, August 4, 2023
एक अनुभव ऐसा भी
भैया के कई तरह के उच्चारण मिलते हैं... भइया...भाया... बैया.. ब्बैया आदि। पर फोन में उसने कहा था (प फ ब भ) का मिलाजुला सॉफ्ट बड़े जतन से विकसित किया हुआ स्वर और ‘या’ तो मुँह से ऐसे फिसला जैसे पूरे मुँह में मक्खन की कोटिंग इसी उद्देश्य से की गयी हो।
- बईया 20 जून को कॉटेज मिल जायेगा क्या।
- हाँ मिल जायेगा।
- कितना लगेगा?
- कितने लोग हैं आप लोग ?
- हम चार लड़कियाँ हैं और एक बच्चा है।
- बच्चे की उम्र ?
- यही 13,14 15 साल
- पाँच व्यक्तियों के लिए एकदिन का पड़ेगा 5889 रुपये
- ऐंह यह तो बहुत ज्यादा है। कम नहीं हो सकता है क्या ? हम लोग लोकल हैं। .....गढ़ के ही हैं।
- ठीक है आपके लिए 5300 रुपये।
- यह तो बहुत ज्यादा है।
- …..गढ़ बहुत बड़ा शहर है। आप अन्यत्र देख लें।
- हम लोग स्टूडेंट हैं।
- ओह, ठीक है आप 4500 दे दीजिये।
- आप 4000 लगा दीजिये।
- जी नहीं 4500, वह भी आपलोग स्टूडेंट हैं इसलिए।
- ठीक है आप बुक कर दीजिये।
- बुक करने के लिए पेमेंट करना पड़ेगा।
- कितना?
- पूरा।
- हमारे पास तो तीन या चार सौ रुपये ही होंगे अभी।
- जीपे या पेटीएम से कर दें।
- वह तो नहीं हैं।
- ठीक हैआप पेमेंट की व्यवस्था कर लीजिये। फिर संपर्क कर सकती हैं।
अतिथियों-आगंतुकों के साथ मेरा अनुभव सुखद ही रहा है। इस प्रकार की हुज्जत का सामना शायद पहलीबार करना पड़ रहा था। पर .....गढ़ मेरी कमजोरी रहा है। महिला ने अपना नाम बताया था। सोशल मीडिया से पता चला कि महिला बेंगलुरू में नौकरी करती हैं या करती थीं। इस कहानी को आगे बढ़ाने के लिए महिला का नाम गीतिका रख लेते हैं। जब गीतिका ने दूसरी बार संपर्क किया तो कॉटेज बुक हो चुका था।
दूसरे दिन गीतिका का फोन आता है कि हम लोग कॉटेज देखने जा रहे हैं।
मैंने कहा कि अभी वहाँ जाना ठीक नहीं। वहाँ लोग हैं उनको डिस्टर्ब करना ठीक नहीं।
कुछ समय बाद मेरे रिसॉर्ट मैनेजर का फोन आता है कि कोई गीतिका अपने दोस्तों के साथ रिसॉर्ट देखने आई है और कॉटेज में जाने की जिद कर रही है। कहती है हम तो लड़कियाँ हैं हम कहीं भी जा सकती हैं।
उन्होंने कॉटेज शांति-तंद्रा भंग की और मेहमान के साथ सेल्फी ली। मैंने रिसॉर्ट मैनेजर से कहा कि पूरे प्रकरण को ‘ऐसा-भी-होता-है’ के खाते में डाल दो और भूल जाओ। बात यहाँ समाप्त नहीं होती। गीतिका का फोन आता है
- बैइया कॉटेज आज खाली है क्या?
- हाँ आज अभीतक तो बुक नहीं हुआ है।
- बैइया हमारे लिए बुक कर दो। 4000 रुपये जीपे कर देती हूँ।
- 4000 नहीं 5300 जीपे कर दीजिए
उसने फिर हुज्जत शुरू की। मैंने कहा 5300 और फोन काट दिया। पांच मिनट बाद उसने जीपे से 5300 भेज दिये। मैने रिसॉ़र्ट मैनेजर को बता दिया कि गीतिका ने कॉटेज बुक कर लिया है। व्यर्थ तूतूमैंमैं में न पड़ना। धैर्य से काम लेना और संभाल लेना। दूसरे दिन मैंने रिसॉ़र्ट मैनेजर को फोन किया
- गीतिका लोग गये?
- हाँ गये।
- सब ठीक है?
- कुछ ठीक नहीं हैं। कॉटेज आज के लिए ब्लॉक कर दीजिये। बुकिंग नहीं लीजिये।
- क्यों?
- उन लड़कियों ने सिगरेट पी थी। पूरे कॉटेज में सिगरेट के ठुट्टे और दारू की बोतलें पड़ीं हुई हैं। कॉटेज के पर्दे बदलने पड़ेंगे, उनमें सिगरेट की बास समा गयी है।
- ठीक है। आज के लिए ब्लॉक कर देता हूँ।
- और
- और क्या
- खाने के बिल में भी गीतिका मोलभाव कर रही थी। मैंने मना किया और हमारी कंपनी पॉलिसी बताई तो गीतिका ने कहा कि वह रिसॉर्ट का गंदा रिव्हू देगी में।
गीतिका की प्रशंसा करनी पड़ेगी। वह आयी अपने दोस्तों के साथ। खाया पीया उधम मचाया पर उसने बहुत ही गंदा रिव्हू दिया। और अपने साथ आये चारों साथियों को टैग किया।
हमारा रिसॉर्ट एक होमस्टे है। टूरिस्टों को हम अपनी संस्कृति से अवगत कराते हैं। हमारा होमस्टे तो एक माध्यम है, यहाँ के लोग ही तो हमारी संस्कृति के प्रतीक हैं। पर कुछ ऐसे लोग भी मिल ही जाते है।
- बईया 20 जून को कॉटेज मिल जायेगा क्या।
- हाँ मिल जायेगा।
- कितना लगेगा?
- कितने लोग हैं आप लोग ?
- हम चार लड़कियाँ हैं और एक बच्चा है।
- बच्चे की उम्र ?
- यही 13,14 15 साल
- पाँच व्यक्तियों के लिए एकदिन का पड़ेगा 5889 रुपये
- ऐंह यह तो बहुत ज्यादा है। कम नहीं हो सकता है क्या ? हम लोग लोकल हैं। .....गढ़ के ही हैं।
- ठीक है आपके लिए 5300 रुपये।
- यह तो बहुत ज्यादा है।
- …..गढ़ बहुत बड़ा शहर है। आप अन्यत्र देख लें।
- हम लोग स्टूडेंट हैं।
- ओह, ठीक है आप 4500 दे दीजिये।
- आप 4000 लगा दीजिये।
- जी नहीं 4500, वह भी आपलोग स्टूडेंट हैं इसलिए।
- ठीक है आप बुक कर दीजिये।
- बुक करने के लिए पेमेंट करना पड़ेगा।
- कितना?
- पूरा।
- हमारे पास तो तीन या चार सौ रुपये ही होंगे अभी।
- जीपे या पेटीएम से कर दें।
- वह तो नहीं हैं।
- ठीक हैआप पेमेंट की व्यवस्था कर लीजिये। फिर संपर्क कर सकती हैं।
अतिथियों-आगंतुकों के साथ मेरा अनुभव सुखद ही रहा है। इस प्रकार की हुज्जत का सामना शायद पहलीबार करना पड़ रहा था। पर .....गढ़ मेरी कमजोरी रहा है। महिला ने अपना नाम बताया था। सोशल मीडिया से पता चला कि महिला बेंगलुरू में नौकरी करती हैं या करती थीं। इस कहानी को आगे बढ़ाने के लिए महिला का नाम गीतिका रख लेते हैं। जब गीतिका ने दूसरी बार संपर्क किया तो कॉटेज बुक हो चुका था।
दूसरे दिन गीतिका का फोन आता है कि हम लोग कॉटेज देखने जा रहे हैं।
मैंने कहा कि अभी वहाँ जाना ठीक नहीं। वहाँ लोग हैं उनको डिस्टर्ब करना ठीक नहीं।
कुछ समय बाद मेरे रिसॉर्ट मैनेजर का फोन आता है कि कोई गीतिका अपने दोस्तों के साथ रिसॉर्ट देखने आई है और कॉटेज में जाने की जिद कर रही है। कहती है हम तो लड़कियाँ हैं हम कहीं भी जा सकती हैं।
उन्होंने कॉटेज शांति-तंद्रा भंग की और मेहमान के साथ सेल्फी ली। मैंने रिसॉर्ट मैनेजर से कहा कि पूरे प्रकरण को ‘ऐसा-भी-होता-है’ के खाते में डाल दो और भूल जाओ। बात यहाँ समाप्त नहीं होती। गीतिका का फोन आता है
- बैइया कॉटेज आज खाली है क्या?
- हाँ आज अभीतक तो बुक नहीं हुआ है।
- बैइया हमारे लिए बुक कर दो। 4000 रुपये जीपे कर देती हूँ।
- 4000 नहीं 5300 जीपे कर दीजिए
उसने फिर हुज्जत शुरू की। मैंने कहा 5300 और फोन काट दिया। पांच मिनट बाद उसने जीपे से 5300 भेज दिये। मैने रिसॉ़र्ट मैनेजर को बता दिया कि गीतिका ने कॉटेज बुक कर लिया है। व्यर्थ तूतूमैंमैं में न पड़ना। धैर्य से काम लेना और संभाल लेना। दूसरे दिन मैंने रिसॉ़र्ट मैनेजर को फोन किया
- गीतिका लोग गये?
- हाँ गये।
- सब ठीक है?
- कुछ ठीक नहीं हैं। कॉटेज आज के लिए ब्लॉक कर दीजिये। बुकिंग नहीं लीजिये।
- क्यों?
- उन लड़कियों ने सिगरेट पी थी। पूरे कॉटेज में सिगरेट के ठुट्टे और दारू की बोतलें पड़ीं हुई हैं। कॉटेज के पर्दे बदलने पड़ेंगे, उनमें सिगरेट की बास समा गयी है।
- ठीक है। आज के लिए ब्लॉक कर देता हूँ।
- और
- और क्या
- खाने के बिल में भी गीतिका मोलभाव कर रही थी। मैंने मना किया और हमारी कंपनी पॉलिसी बताई तो गीतिका ने कहा कि वह रिसॉर्ट का गंदा रिव्हू देगी में।
गीतिका की प्रशंसा करनी पड़ेगी। वह आयी अपने दोस्तों के साथ। खाया पीया उधम मचाया पर उसने बहुत ही गंदा रिव्हू दिया। और अपने साथ आये चारों साथियों को टैग किया।
हमारा रिसॉर्ट एक होमस्टे है। टूरिस्टों को हम अपनी संस्कृति से अवगत कराते हैं। हमारा होमस्टे तो एक माध्यम है, यहाँ के लोग ही तो हमारी संस्कृति के प्रतीक हैं। पर कुछ ऐसे लोग भी मिल ही जाते है।
Saturday, November 27, 2021
Friday, September 4, 2020
Friday, September 7, 2018
Monday, August 6, 2018
निष्कासित – जातिप्रथा पर एक प्रहार
जातिप्रथा एक दुधारू गाय!
कलायन का नया नाटक,
निष्कासित, इस कुप्रथा के कुछ पहलुओं पर प्रकाश डालती हुई एक ऐसे गाँव की
कहानी है जिसमें रूढ़िवादी और प्रगतिशील विचारधाराओं का संघर्ष है। कलायन बेंगलुरु
में अपना 30 वाँ साल मना रही है, इस रोचक और विचारोत्तेजक नाटक निष्कासित के मंचन के साथ।
जागृति थिएटर
बेंगलुरु में अगस्त 31 से सितंबर 2, 2018
तक
और ए डी ए रंगमंदिरा
बेंगलुरु में सितंबर 2, 2018 को
https://in.bookmyshow.com/plays/nishkasit/ET00080358
जातिप्रथा एक दुधारू गाय!
सरल शब्दों में कहें तो सभी जन सभी कार्यों में
समान रूप से दक्ष नहीं हो सकते। ऐसा मानें तो जातियाँ किसी ने बनाई नहीं बल्कि व्यक्तियों
की रुचि के अनुसार समाज की आवश्यकता और श्रम विभाजन के आधार पर जातियाँ बनी होंगीं।
यहाँ जाति का अर्थ जातिवाद में प्रयुक्त जाति से भिन्न है। यहाँ जाति का अर्थ पेशे
से है जैसे सुनार, लोहार, वैद्य इत्यादि। आरंभ का सरल वर्गीकरण पारिवारिक पेशे में बदला।
बेटा अपने पिता की देखा-देखी उसका पेशा अपनाने लगा। फलस्वरूप व्यवसायिक परंपरा का प्रादुर्भाव
हुआ। परिवार अपने चुने हुए कार्यक्षेत्र में निपुण होते गये। पेशा परिवार की जाति बन
गई।
जाति बनी तो जातिवाद
आया। ऊँच-नीच की भावना आई। शारीरिक श्रम करने वालों को निम्न स्तर का समझने की भावना
आ गई। ताकत और सत्ता का खेल आरंभ हुआ। ऊँचे
तबके के लोग प्रगति करते गये। उनकी मानसिक संकीर्णता के शिकार बने शारीरिक श्रम करने
वाले लोग। वे दलित कहलाये। दलितों का प्रगति – पथ अमीरों की ड्योढ़ी तक ही पहुँचने लगा।
वोट बैंक की राजनीति
आई। दलित नेता आए जो दलितों का राजनीति में शतरंज के मोहरों की तरह इस्तेमाल करने लगे।
देखते-न-देखते वे सवर्णों से अधिक शक्तिशाली हो गये। अब स्थिति यह है कि दलित नेता
नये ब्राह्मण बन गये हैं और ब्राह्मण नये दलित। समाज हैव्स और हैव-नॉट
में बदल रहा है। जिनके पास है वे अपने पास जो है उसे बढ़ाने में लगे हैं। जिनके पास
नहीं है, वे खुरच-खुरच कर जीने के साधन जुटा रहे हैं।
एक वर्गहीन समाज की रचना तो केवल कल्पना
है। पर आज की पढ़ी-लिखी पीढ़ी में
जाति-व्यवस्था का
प्रभाव कम होता नजर आता है। पर यह अभी बड़े शहरों में ही कहीं दिखाई पड़ता है जो नगण्य
है। जो दिखाई पड़ता है वह भी चर्चाओं में ही
अधिक है, व्यवहार में बहुत कम। अधिकांश भारत जाति प्रथा की जकड़ में है।
और यह जकड़ ढीली पड़ती नहीं दिखाई पड़ती।
अब हाल यह है कि जाति-प्रथा
एक ऐसी दुधारू गाय हो गई है जिसको सभी दुहने में लगे हुए हैं। इस सिस्टम को बरकरार
रखने में सभी के भाग कुछ-न-कुछ छीछड़े आ ही जाते हैं।
मथुरा कलौनी
Wednesday, September 27, 2017
Monday, June 26, 2017
कुछ छूट गया
करने को बहुत है और समय है बहुत कम
कुछ न कुछ छूट ही जाता है
अब छूट ही गया तो ऐसा भी कुछ नहीं
न शोर हुआ, न धमाका हुआ और
न दुनिया ही रुकी
फिर भी अपराध-बोध होता है कि
कुछ छूट गया
बहुत दिनों से यह चिट्ठा छूटा हुआ है।
कुछ न कुछ छूट ही जाता है
अब छूट ही गया तो ऐसा भी कुछ नहीं
न शोर हुआ, न धमाका हुआ और
न दुनिया ही रुकी
फिर भी अपराध-बोध होता है कि
कुछ छूट गया
बहुत दिनों से यह चिट्ठा छूटा हुआ है।
Sunday, October 23, 2016
प्रजातंत्र का धर्म और धर्म का प्रजातंत्र
आगे बढ़ने से पहले प्रजातंत्र और धर्म इन दोनों शब्दों को समझना आवश्यक है। प्रजातंत्र का
शाब्दिक अर्थ है प्रजा का तंत्र। तंत्र का यहाँ व्यापक अर्थ है। याने एक ऐसी व्यवस्था जो प्रजा ने
स्वयं के लिये निर्धारित की हो। एक ऐसी शासन व्यवस्था जिसमें प्रजा अपना ‘राजा’ खुद चुनती है। राजा यहाँ राजा न हो कर प्रजा यानी जनता का प्रतिनिधि होता है। जनता के आदेश से जनता का शासक बनता है। अब्राहम लिंकन ने प्रजातंत्र को इस तरह परिभाषित किया था, जनता का, जनता के लिए तथा जनता द्वारा शासन। प्रजातंत्र में कानून की नजर में सब बराबर हैं। सबको समान रूप से अभिव्यक्ति की आजादी है। विभिन्न धर्मों, संप्रदायों, अल्पसंख्यकों को समानाधिकार प्राप्त हैं। शासनतंत्र घोषितरूप से धर्मनिरपेक्ष रहता है। पर शासनतंत्र धर्मनिरपेक्ष रह पाता है या नहीं या किस सीमा तक धर्मनिरपेक्ष है, यह इस पर निर्भर करता है कि प्रजातंत्र कितना विकसित हुआ है या कितना परिपक्व है।
प्रजातंत्र के कई स्वरूप हैं, पर मूल सिद्धांत वही है, जनता का, जनता के लिए तथा जनता द्वारा शासन। प्रजातंत्र में साधारणतया प्रतिनिधि एक निश्चित अवधि के लिये जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं और उन्हें जनहित हेतु नीतियाँ बनाने की स्वतंत्रता होती है। नियमित अंतराल पर चुनाव प्रतिनिधियों पर अंकुश का काम करता है। जो देश-समाज के लिये कुछ करना चाहते हैं वे चुनाव द्वारा शासन तंत्र में आते हैं। उनका अगली बार चुना जाना या न चुना जाना इस पर निर्भर करता है कि जनता उनके कार्य की गुणवत्ता को कैसे परखती है। ध्येय से भटकने वाले प्रतिनिधियों को जनता अपने मतदान से सत्ता से बाहर कर सकती है।
अब आते हैं धर्म की व्याख्या पर। एक धर्म होता है मानवोचित व्यवहार से जुड़ा हुआ और एक होता है ईश्वरीय आस्था से जुड़ा हुआ। व्यापक अर्थ में ईश्वरीय आस्था से जुड़ा हुआ धर्म मानवोचित व्यवहार से जुड़े हुए धर्म से भिन्न नहीं हो सकता। पर चूँकि ईश्वर की मान्यताएँ अलग-अलग हैं और उनसे जुड़े धर्म अलग-अलग है. तो धर्म की परिभाषा स्पर्धा की भावना में लिप्त हो कर संकीर्ण हो जाती है।
पद्मपुराण में धर्म की व्याख्या इस प्रकार है,
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।।
अर्थात धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो ! और सुनकर इसका अनुगमन करो। जो आचरण स्वयं के प्रतिकूल हो, वैसा आचरण दूसरों के साथ नहीं करना चाहिये। इस परिभाषा के अंतर्निहित अर्थ का अनुगमन किया जाये तो प्रजातंत्र का धर्म बनता है –
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।
अर्थात सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े। विस्तार में न जा कर यहाँ यह कहना श्रेयस्कर होगा कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में सभी अपने-अपने धर्मों का अनुसरण करते हुए, सुख शान्ति से जीवनयापन करते हुए उन्नति की ओर अग्रसर हों। यही प्रजातंत्र का धर्म है। जब हम प्रजातंत्र के धर्म की बात करते हैं तो हम मानवोचित व्यवहार से जुड़े हुए धर्म की ही बात कर रहे होते हैं।
अब आते हैं धर्म के प्रजातंत्र की ओर। यहाँ पर मानवोचित व्यवहार से जुड़ा हुआ धर्म यानी प्रजातंत्र का धर्म गौण हो जाता है और ईश्वरीय आस्था से जुड़ा हुआ धर्म मुख्य धारा में आ जाता है। कहा जा चुका है कि प्रजातंत्र की व्यवस्था के अनुसार प्रजातंत्र में विभिन्न धर्मावलंबियों को समानाधिकार मिलता है। एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में सभी धर्म के अनुयायी अपने-अपने धार्मिक नियम-सिद्धांतों का अनुकरण करने के लिये स्वतंत्र हैं। प्रजातंत्र में एक कमजोरी यह है कि जनता का प्रतिनिधि अक्सर गुणवत्ता नहीं वरन् जाति और धर्म के आधार पर चुना जाता है जिससे अवांछनीय तत्व सत्ता में आ जाते हैं। ऐसे तत्व अपनी साख बनाये रखने के लिये अपनी प्रजा को अँधेरे में रखते हैं। धर्मनिरपेक्षता का हवाला दे कर धर्म की कुप्रथाओं को हवा देते हैं और उनकी उन्नति नहीं होने देते। यहाँ तक कि ऐसे सत्ता के लोलुप, धर्म को राष्ट्र से बड़ा बना देते हैं। जहाँ किसी जाति या धर्मानुयायियों का उत्थान नहीं होता वहाँ घेटो (ghetto) मानसिकता पनपती है जो उन्नति के द्वार बंद कर देती है। जहाँ प्रजातंत्र का धर्म सुख समृद्धि लाता है वहीं धर्म का प्रजातंत्र अराजकता फैलाता है।
धर्म का उद्देश्य वस्तुतः आचरण की शुचिता का उन्नयन करना है जिसके लिये ईश्वरीय गुणों की परिकल्पना को अनुसरण योग्य आदर्शों के रूप में स्वीकार किया जाता है। अतः यह सर्वजन हिताय है। प्रजातंत्र का धर्म भी सर्वजन हिताय है। स्पष्ट है कि धर्म और प्रजातंत्र के मूल उद्देश्यों में कहीं टकराव नहीं है। प्रजातंत्र तो तब कुत्सित हो जाता है जब तथाकथित धर्म की स्वार्थपरक एवं संकुचित परंपराएँ जनतंत्र के निहितार्थ को नियमित करने लगती हैं।
धर्म और प्रजातंत्र दोनों स्वयं में दोषमुक्त हैं परंतु विडंबना है कि मनुष्य मात्र जिनके लिये इनका आविर्भाव हुआ है इनके अनुगमन में पर्याप्त सावधानी नहीं बरतते। सत्य निष्ठा से किसी भी धर्म का पालन निर्वाण की ओर ले जाता है। इसी प्रकार प्रजातंत्र के आदर्शों का पालन एक सुखी और सम्पन्न समाज की रचना करता है। परंतु जिन्हें उनके निर्वहन का उतरदायित्व सौंपा गया है, उनको चारित्रिक दृढता से सिद्धांतों का अनुपालन करना चाहिए तभी धर्म एवं प्रजातंत्र वास्तव में एक दूसरे के पूरक होंगे न कि शत्रु।
समाप्त
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Saturday, July 11, 2015
Thursday, January 22, 2015
आज नुक्कड़ पर बम फटा था
आज नुक्कड़ पर बम फटा था
कुछ जानें गई थीं
सड़क पर खून बिखरा था
कुछ जानें गई थीं
सड़क पर खून बिखरा था
टीवी चैनलों में, जींस पहने हाथ में माइक लिए रिपोर्टर
बारबार दिखा रहे थे
सड़क पर कुछ लावारिश जूते, चप्पल
और रोते दहाड़ते हुए परिजन
दहशत का माहौल था
अब और भी गाढ़ा हो चला था
डर लग रहा था
उनका इलाका था पर जाना था जरूरी
जेब में चाकू रख लिया कि क्या पता
सुनसान गली सहमा सहमा सा मैं
घड़कते दिल से
अपने को समेटे चला जा रहा था मैं
तभी मेरे पीछे किसी के चलने की सी आवाज आई
चप... चप... चप... चप
मेरी तो जान साँसत में फँस गई
मैंने कदम तेज कर दिये तो आवाज भी तेज हो गई
चप – चप – चप - चप
मैं रुका तो आवाज भी रुकी
डर के मारे मेरी घिघ्घी बँध गई
मैंने लैंप पोस्ट की आड़ ली
पीछे देखा, एक लंबा-चौड़ा हट्टा-कट्ठा आदमी
मैं पसीने-पसीने
सोचा आज तो मैं तो गया
मेरा छोटा-सा चाकू क्या कर लेगा इसके सामने
मुझे तो ठीक से चाकू पकड़ना भी नहीं आता
कैसे मारेगा वह मुझे
क्या पता वह पीछे से चाकू फैंकेगा
या पकड़ कर गला रेतेगा
नहीं नहीं वह ऐसे कैसे कर सकता है
कैसे मार सकता है
वह जरूर पहले पता करने की कोशिश करेगा कि
मैं उसके धर्म का हूँ या नहीं
यदि न निकला तो
अभी तो पूरी जिंदगी पड़ी थी मेरे सामने
अपने को बचाने के लिए मैं दौड़ पड़ा
मेरे पीछे वह भी दौड़ेने लगा
ठोकर लगी मैं गिर पड़ा
वह मेरे ऊपर झुका
उसकी आँखें लाल-लाल
चेहरा खूँखार
उसने मेरा हाथ पकड़ा
मुझे झटके से उठाया और बोला
नुक्कड़ पर बम फटा है
मैंने देखा आप सड़क पर सहमे-सहमे जा रहे हैं
मुझे इस सुनसान सड़क पर मुझे डर लग रहा है
मैं शहर में नया हूँ
मैं आपके साथ बस स्टॉप तक चलूँ क्या
एक से दो भले
मेरी जान में जान आई
मैंने राहत की साँस ली
लगा अभी मानवता बाकी है
इन्सानियत से भरोसा नहीं उठा है
पर किस का भरोसा
मेरा या उसका !
आज नुक्कड़ पर बम फटा था
कुछ जानें गई थीं
सड़क पर खून बिखरा था
Sunday, March 27, 2011
प्रेमिका संवाद -5 (अंतिम किस्त )
प्रेमिका संवाद -5
अब तक आपने पढ़ा
प्रेमिका संवाद -1 प्रेमिका संवाद -2 प्रेमिका संवाद - 3 प्रेमिका संवाद - 4
अब आगे-
प्रेमाशिष का मुँह खुल गया। चेहरे पर बेवकूफों सा भाव लिये वह सरला की ओर देखने लगा।
'प्रेम,' सरला उसी रौ में कहती गई, 'किसी भी व्यक्ति में कम से कम थोड़ा तो आत्मसंयम होना चाहिए। जिस लड़की को अभी तुम अपने जाल में फाँस रहे थे , मैंने सुना है कि उसकी सगाई हो चुकी है। मानवता के नाते थोेड़ी तो मानवता दिखाओ। दूसरों की मँगेतरों को तो छोड़ दो।'
प्रेमाशिष के चेहरे के भावों में थोड़ा परिवर्तन हुआ। वह और भी अधिक बेवकूफ लगने लगा।
सरला ने अपना कर्तव्य समझ कर इतना कह तो दिया,पर यह उसके लिये बहुत कष्टदायक सिद्ध हुआ। प्रेम को देख कर, उसके सम्मुख खड़े हो कर बातें करते समय उसका सारा संयम रेत की दीवार की तरह ढहने लगा। बड़ी कठिनाई से उसने अपने को सँभाला। स्वयं को संयत करने के लिये वह बाथरूम की ओर चली गई।
उसे हर हाल में अपने को सँभालना होगा। अभी तो लंबा जीवन उसके सामने है। जीवन के सूखे और कंटकाकीर्ण पथ में ऐसे झटके, अब लगता है मील के पत्थर की तरह आते रहेंगे। उसे सदा सचेत रहना पड़ेगा कि कभी जब प्रेम पास हो तो वह किसी भी क्षणिक कमजोरीवश कही ऐसा न कर दे जैसा उसने नहीं करने का प्रण लिया है। जानबूझ कर तो मक्खी नहीं निगली जाती। फिर उसका आत्मसम्मान भी तो है।
उधर प्रेमाशिष ने मुँह में रखे आलू दम के टुकड़े को जैसे-तैसे उदर में पहुँचाया। उस आलू में अब कोई दम न था। विनोद ने मदन को देखा तो वह एक गिलास पानी ले कर उसके पास पहुँच गया। उसने कहा,
'लो, यह पानी पी लो। ठीक हो जायेगा।'
'काश, हमारी सभी समस्याएँ पानी पीने से ठीक हो जातीं!' प्रेमाशिष ने सोचा। पर उसके मुँह से निकला, 'आँ...।'
'मैं तुमको वहाँ से देख रहा था। तुम्हारा चेहरा देख कर समझ गया कि तुम्हारे गले में कुछ अटक गया है।' विनोद ने कहा।
'आँ...गाँ...।' प्रेमाशिष ने कहा।
कहा जा चुका है कि टीले वाला मकान पार्क का सबसे बड़ा मकान है। उसमें कमरे ही कमरे हैं। नया आदमी तो इन कमरों की भूलभुलैया में भटक कर रह जाय। घर की मालकिन की कृपा से सरला बाथरूम तक पहुँच गई थी। जब वह निकली तो वह अपने हिसाब से उसी ओर बढ़ी जहाँ पार्टी चल रही थी। पर पहुँची एक बड़े लंबे चौड़े गलियारे में, जिसके दोनों ओर पर्दे लगे दरवाजे थे। कुछ देर तो वह पशोपेश में रही कि किस पर्दे को हटा कर अंदर जाए। स्थिति ऐसी थी कि देवकीनंदन खत्री जी होते उसकी जगह, तो वे भी सिर खुजलाने लगते। फिर जो दरवाजा पास था उसी का पर्दा हटा कर वह अंदर घुस गई। यह कोई और ही कमरा था। इस कमरे में मदन एक सोफे में धँसा सिगरेट पी रहा था। संयोग से मदन का मुँह दूसरी ओर था। वह उल्टे पाँव वापस लौट ही रही थी कि दूसरे दरवाजे से शीला कमरे में आई और मदन को संबोधित कर कहने लगी, 'लो तुम यहाँ छिपे हो। चलो, चलते हैं।'
'तुम जाओ। मैं अभी बैठूँगा। आज छुट्टी है, फिर प्रेम भी साथ में है।' मदन ने कहा।
'तुम्हारा दोस्त प्रेम बहुत दुखी व्यक्ति है।' शीला ने कहा। 'वह अभी तक सरला से प्यार करता है।'
'मुझे मालूम है।' मदन ने कहा। 'ऐसे में कोई कुछ नहीं कर सकता है। कुछ मामले आदमी को स्वयं सुलझाने पड़ते हैं।'
'मदन, अभी मेरी बहुत देर तक प्रेम से बातचीत हुई। उसने टीक से तो कुछ नहीं बताया, पर मुझे लगता है कि सरला गलती कर रही है। उसे यदि अंदाज हो जाय कि प्रेम उसे प्रेम करता है तो शायद दो बिछड़े मिल जाएँ।' सरला ने कहा।
पर्दे के पीछे खड़ी सरला ने सोचा, 'तो वह शीला के संबंध में गलती कर रही थी शायद, क्योंकि शीला का मँगेतर प्रेमाशिष का ही मित्र मदन लग रहा था। पर इससे क्या अंतर पड़ता है! चंद्रिका, कमला, निशा, विभा, तारा, सुजाता, सब के बारे में तो वह गलती नहीं कर सकती।
'यह मुश्किल है।' मदन ने कहा। 'क्यों कि सरला को विश्वास है कि प्रेम उससे प्रेम करता है।'
'फिर...फिर...'
'उसे यह भी विश्वास है कि प्रेम सरला के साथ-साथ शहर की उन सभी लड़कियों को प्यार करता है जो अविवाहित हैं।'
'ऐसा कैसे हो सकता है?' शीला ने पूछा।
'सरला ऐसा ही सोचती है। सरला क्या, प्रेम को जानने वाले सभी यही सोचेंगे। क्यों कि उसका पिछला रिकार्ड ही ऐसा है।' मदन ने कहा।
'मदन, तुम अपने मित्र को अधिक जानते हो। पर मुझे तो लगता है कि प्रेम सरला से ही प्रेम करता है। यदि ऐसा है तो पहले की लड़कियों से छेड़छाड़ कोई महत्व नहीं रखती।' शीला न कहा।
क्या सचमुच ऐसा संभव है? सरला सोचने लगी। पर वह अपने विचारों में कायम नहीं रह पायी। कोई खटका हुआ। उसका ध्यान अपनी वर्तमान परिस्थिति पर आ गया। वह वहाँ से हट गयी।
गलियारे के दूसरे छोर पर उसे प्रसाद खड़ा दिखाई पड़ा। उसके खड़े होने का अंदाज बता रहा था कि हम यहाँ यूँ ही खड़े नहीं हैं। उसकी लंबी पतली गर्दन में उसका आवश्यकता से अधिक उभरा हुआ टेंटुआ जिस हिसाब से ऊपर नीचे हो रहा था उससे उसकी मानसिक हलचल का पता चलता था। यदि टेंटुआधारी व्यक्ति के चेहरे से गंभीरता टपक सकती है तो प्रसाद के चेहरे से गंभीरता टपक रही थी।
प्रसाद एक गणितज्ञ था। वह कोई भी समस्या गणित के मॉडल के माध्यम से हल कर सकता था। पर सरला के व्यवहार का वह कोई भी मॉडल नहीं बना पा रहा था। यदि कोई संख्या दो से विभाज्य है, तो है। इसके दो अर्थ नहीं हो सकते। दो और दो का गुणनफल चार ही हो सकता है, कभी चौबीस नहीं। समीकरण के दाहिनी ओर जितनी संख्या है बाईं ओर भी उतनी ही होनी चाहिए। वह बेचारा सरला के साथ अपना कोई समीकरण नहीं बना पा रहा था। विभाजन में शेष बच जा रहा था। गुणनफल शून्य हो जा रहा था। यहाँ तक कि एक और एक मिला कर भी वह अकेला एक ही बच जा रहा था। एक गणितज्ञ के लिए इससे बड़ी व्यथा क्या हो सकती है?
'सरो' उसने पुकारा।
सरला ने अनसुना कर दिया और वह उसके पास से होकर निकलने लगी। अपनी पुकार का कोई असर न पा कर प्रसाद बहुत क्षुब्ध हुआ। इतना कि जितनी देर में आप हलचल कहेंगे उतनी देर में उसका टेंटुआ दो बार ऊपर नीचे हो गया। उसने सरला का रास्ता रोक कर तथा अपनी खनकती आवाज का ट्रेबल बढ़ा कर कहा, 'सरला!'
'क्या है? मुझे अभी परेशान मत करो।' सरला ने कहा।
'तुम्हें मेरी बात सुननी पड़ेगी।' प्रसाद ने कहा।
'देखो प्रसाद, मुझे तुम्हारी कोई बात नहीं सुननी है। जो कहना है बाद में कहना।' सरला ने कहा।
'मैं अभी कहूँगा। मैं और अधिक सहन नहीं कर सकता।'
'क्या सहन नहीं कर सकते?'
'तुम्हारा व्यवहार।'
'तो अच्छा है न। मत सहन करो। मुझसे उलझो ही नहीं।'
बेचारा गणितज्ञ यहीं परास्त हो गया। सरला ने तो बात ही समाप्त कर दी। दूसरी ओर उस प्रेमाशिष के बच्चे को उसने साफ सीधे शब्दों में चेतावनी दी थी, पर उसका भी कोई असर नहीं हुआ। जो हो इस बार वह हार नहीं मानेगा। फैसला करके ही रहेगा, भले ही दशमलव के आवर्तक अंक की भाँति उसे लगे ही क्यों न रहना पड़े।
'देखो सरो,' उसने समझाते हुए कहा, 'जब तुम शेखर के साथ सिनेमा गई थीं, मैंने कुछ नहीं कहा। जब महेश तुम्हारा मित्र बना मैंने कुछ नहीं कहा। पर अब यह प्रेमाशिष मुझसे सहन नहीं होगा। मेरे मना करने के बाद भी अभी तुम उससे बातें कर रही थीं!'
'तुम होते कौन हो, मुझे मना करने वाले?' गुस्से से तिलमिला कर सरला ने कहा।
'मैं कौन होता हूँ? यानी मैं... मैं बताता हूँ मैं कौन होता हूँ। मैं तुम्हारा होने वाला पति हूँ।' लगभग चिल्लाते हुए प्रसाद ने कहा।
'तुम्हारा इतना साहस?' सरला ने कहा।
'तुम्हारे पिता जी ने मुझे चिट्ठी में ...' प्रसाद कहने लगा पर सरला ने उसकी बात बीच में काट कर कहा,
'तो जा कर पिता जी से कहो। अब फिर कभी मेरा रास्ता रोका तो मैं तुम्हारा टेंटुआ दबा दूँगी।' सरला ने कहा। वह पैर पटक कर वहाँ से जाने के लिए उद्यत हुई तो उसने देखा कि पार्टी के लगभग सभी जन उस गलियारे में उपस्थित थे। ग्लानि से उसकी आँखों में ऑसू छलक आये। वह दौड़ती हुई वहाँ से निकल गई।
उस दिन शाम को पार्क में कोई अपने घर से बाहर नहीं निकला। सभी पत्र लेखन में व्यस्त हो गये थे। यह उस समय की बात है जब मोबाइल फोन, वीडियो चैट आदि भविष्य की बातें थीं। लिहाजा चिट्ठी-डाकिये पर ही जोर था। पर उस दिन तो लगा था कि चिट्ठी लिखने की बीमारी पार्क में संक्रामक रोग की तरह फैल गई है। टीले वाले घर में जो घटना घटी थी, वह पार्क के इतिहास में नई थी। इतनी बड़ी घटना को अपने तक ही सीमित रखना, परले दर्जे की मूर्खता समझ कर सभी पत्र लिख रहे थे। इनमें से कुछ विशेष पत्र उल्लेखनीय हैं।
चंपा के पति ने सरला के पिता जी को लिखा कि आज ऐसी घटना हो गई है, जिसमें प्रसाद ने सरला के साथ दुर्व्यवहार किया। और यह भी लिखा कि उसकी राय में प्रसाद सरला के लिये उपयुक्त नहीं है।
चंपा ने भी सरला के पिता जी को पत्र लिखा। उसने भी अपने शब्दों में घटना का विवरण देते हुए प्रसाद को अनुपयुक्त बताया। उसने यह भी लिखा कि शायद सरला प्रेमाशिष नाम के एक युवक को चाहती है। पर उन दोनों में किसी कारण अनबन है।
प्रसाद ने भी सरला के पिता जी को पत्र लिखा। उसने लिखा कि सरला ने सरेआम उसके साथ दुर्व्यवहार किया है। उसने यह भी लिखा कि जब दोनों परिवारों में यह बात कई सालों से मालूम है कि सरला की शादी प्रसाद के साथ होने वाली है तो सरला का आचरण अच्छा होना चाहिए था। उसने मर्यादा का उल्लंघन करके महेश, शेखर आदि व्यक्तियों के साथ मित्रता बढ़ाई। अति तो उसने प्रेमाशिष नाम के व्यक्ति के साथ की। सब कुछ जानते हुए भी उन दोनों में अँगूठियों का आदान प्रदान हुआ। इतना होने के बावजूद वह सरला से शादी करने को तैयार है बशर्ते वह भविष्य में ऐसी हरकतें न करने का वादा करे।
प्रेमाशिष ने सरला को पत्र लिखा। उसने लिखा कि वह यानी प्रेमाशिष समझ सकता है कि आज की घटना से उसे यानी सरला को कितना कष्ट पहुँचा होगा। उसे यानी प्रेमाशिष को यह जान कर प्रसन्नता हुई कि उसके यानी सरला के और प्रसाद के बीच कुछ नहीं है। वह प्रसाद की बात पर कुछ टिप्पणी नहीं करना चाहता है, परन्तु यह जान कर उसे आश्चर्य अवश्य हुआ कि सरला के जीवन में उसके यानी प्रेमाशिष के आने के पहले शेखर और महेश नाम के व्यक्ति आ चुके हैं। यह बात उसे अवश्य आश्चर्य में डालती है कि अपने भूतकाल में न झाँकते हुए वह यानी सरला, कैसे प्रेमाशिष के भूतकाल में झाँक कर उसे दोषी ठहरा सकती है। उसे विश्वास है कि अभी शेखर या महेश का महत्व कुछ भी नहीं है। वह समझ सकता है, पर सरला ऐसी समझदार लड़की यह समझाने पर भी क्यों नहीं समझती कि निशा या तारा वाले संबंधों में न कभी दम था और न रहेगा। इस जीवन की उसकी एक ही चाहत है और वह है सदानंदजी की छोटी लड़की, सरला। उसके यानी प्रेमाशिष के इतना लिखने के बावजूद वह यानी सरला अड़ियल टट्टू की तरह अपनी बेवकूफी पर अड़ी रहे तो वह और कुछ नहीं कर सकता है। बस, अपना बचा खुचा जीवन उसी की यानी सरला की याद में बिता देगा।
सरला के पिता जी समझदार इनसान थे। उन्होंने दुनिया देख रखी थी। उन सब पत्रों से जो उनके नाम लिखे गये थे, उन्होने कुछ छाना और कुछ बीना। सरला की माँ से मिलने से पहले का अपना जामाना याद किया। प्रेमाशिष के संबंध में छानबीन की। पूरी तरह से लैस हो कर वे पार्क पहुँचे। उन्होंने चंपा के घर में एक विशाल आयोजन किया और प्रेम और सरला की सगाई की घोषणा कर दी।
इस बीच सरला ने कई बार प्रेम से मिलना चाहा था, पर हर बार झिझक का रुक गई थी। उसके पिताजी ने सब राहें आसान कर दी
थीं, उसके लिये भी और प्रेमाशिष के लिये भी।
यह कहना गलत होगा कि प्रेम पर उसका शक जाता रहा। हाँ, शक के शोलों को समझदारी की राख ने अच्छी तरह ढक लिया था। फिर प्यार तो था ही।
समयोपरांत दोनों की शादी हो गई। मदन और प्रेम का साझेदारी वाला व्यापार भी चल निकला। प्रेम ने वहीं पार्क में घर बना लिया। आजकल के मापदण्डों के विपरीत सरला और शीला में बहुत घनिष्ठता हो गई। दोनों परिवार सुखपूर्वक रहने लगे।
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समाप्त
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प्रेमिका संवाद -1 प्रेमिका संवाद -2 प्रेमिका संवाद - 3 प्रेमिका संवाद - 4
अब आगे-
प्रेमाशिष का मुँह खुल गया। चेहरे पर बेवकूफों सा भाव लिये वह सरला की ओर देखने लगा।
'प्रेम,' सरला उसी रौ में कहती गई, 'किसी भी व्यक्ति में कम से कम थोड़ा तो आत्मसंयम होना चाहिए। जिस लड़की को अभी तुम अपने जाल में फाँस रहे थे , मैंने सुना है कि उसकी सगाई हो चुकी है। मानवता के नाते थोेड़ी तो मानवता दिखाओ। दूसरों की मँगेतरों को तो छोड़ दो।'
प्रेमाशिष के चेहरे के भावों में थोड़ा परिवर्तन हुआ। वह और भी अधिक बेवकूफ लगने लगा।
सरला ने अपना कर्तव्य समझ कर इतना कह तो दिया,पर यह उसके लिये बहुत कष्टदायक सिद्ध हुआ। प्रेम को देख कर, उसके सम्मुख खड़े हो कर बातें करते समय उसका सारा संयम रेत की दीवार की तरह ढहने लगा। बड़ी कठिनाई से उसने अपने को सँभाला। स्वयं को संयत करने के लिये वह बाथरूम की ओर चली गई।
उसे हर हाल में अपने को सँभालना होगा। अभी तो लंबा जीवन उसके सामने है। जीवन के सूखे और कंटकाकीर्ण पथ में ऐसे झटके, अब लगता है मील के पत्थर की तरह आते रहेंगे। उसे सदा सचेत रहना पड़ेगा कि कभी जब प्रेम पास हो तो वह किसी भी क्षणिक कमजोरीवश कही ऐसा न कर दे जैसा उसने नहीं करने का प्रण लिया है। जानबूझ कर तो मक्खी नहीं निगली जाती। फिर उसका आत्मसम्मान भी तो है।
उधर प्रेमाशिष ने मुँह में रखे आलू दम के टुकड़े को जैसे-तैसे उदर में पहुँचाया। उस आलू में अब कोई दम न था। विनोद ने मदन को देखा तो वह एक गिलास पानी ले कर उसके पास पहुँच गया। उसने कहा,
'लो, यह पानी पी लो। ठीक हो जायेगा।'
'काश, हमारी सभी समस्याएँ पानी पीने से ठीक हो जातीं!' प्रेमाशिष ने सोचा। पर उसके मुँह से निकला, 'आँ...।'
'मैं तुमको वहाँ से देख रहा था। तुम्हारा चेहरा देख कर समझ गया कि तुम्हारे गले में कुछ अटक गया है।' विनोद ने कहा।
'आँ...गाँ...।' प्रेमाशिष ने कहा।
कहा जा चुका है कि टीले वाला मकान पार्क का सबसे बड़ा मकान है। उसमें कमरे ही कमरे हैं। नया आदमी तो इन कमरों की भूलभुलैया में भटक कर रह जाय। घर की मालकिन की कृपा से सरला बाथरूम तक पहुँच गई थी। जब वह निकली तो वह अपने हिसाब से उसी ओर बढ़ी जहाँ पार्टी चल रही थी। पर पहुँची एक बड़े लंबे चौड़े गलियारे में, जिसके दोनों ओर पर्दे लगे दरवाजे थे। कुछ देर तो वह पशोपेश में रही कि किस पर्दे को हटा कर अंदर जाए। स्थिति ऐसी थी कि देवकीनंदन खत्री जी होते उसकी जगह, तो वे भी सिर खुजलाने लगते। फिर जो दरवाजा पास था उसी का पर्दा हटा कर वह अंदर घुस गई। यह कोई और ही कमरा था। इस कमरे में मदन एक सोफे में धँसा सिगरेट पी रहा था। संयोग से मदन का मुँह दूसरी ओर था। वह उल्टे पाँव वापस लौट ही रही थी कि दूसरे दरवाजे से शीला कमरे में आई और मदन को संबोधित कर कहने लगी, 'लो तुम यहाँ छिपे हो। चलो, चलते हैं।'
'तुम जाओ। मैं अभी बैठूँगा। आज छुट्टी है, फिर प्रेम भी साथ में है।' मदन ने कहा।
'तुम्हारा दोस्त प्रेम बहुत दुखी व्यक्ति है।' शीला ने कहा। 'वह अभी तक सरला से प्यार करता है।'
'मुझे मालूम है।' मदन ने कहा। 'ऐसे में कोई कुछ नहीं कर सकता है। कुछ मामले आदमी को स्वयं सुलझाने पड़ते हैं।'
'मदन, अभी मेरी बहुत देर तक प्रेम से बातचीत हुई। उसने टीक से तो कुछ नहीं बताया, पर मुझे लगता है कि सरला गलती कर रही है। उसे यदि अंदाज हो जाय कि प्रेम उसे प्रेम करता है तो शायद दो बिछड़े मिल जाएँ।' सरला ने कहा।
पर्दे के पीछे खड़ी सरला ने सोचा, 'तो वह शीला के संबंध में गलती कर रही थी शायद, क्योंकि शीला का मँगेतर प्रेमाशिष का ही मित्र मदन लग रहा था। पर इससे क्या अंतर पड़ता है! चंद्रिका, कमला, निशा, विभा, तारा, सुजाता, सब के बारे में तो वह गलती नहीं कर सकती।
'यह मुश्किल है।' मदन ने कहा। 'क्यों कि सरला को विश्वास है कि प्रेम उससे प्रेम करता है।'
'फिर...फिर...'
'उसे यह भी विश्वास है कि प्रेम सरला के साथ-साथ शहर की उन सभी लड़कियों को प्यार करता है जो अविवाहित हैं।'
'ऐसा कैसे हो सकता है?' शीला ने पूछा।
'सरला ऐसा ही सोचती है। सरला क्या, प्रेम को जानने वाले सभी यही सोचेंगे। क्यों कि उसका पिछला रिकार्ड ही ऐसा है।' मदन ने कहा।
'मदन, तुम अपने मित्र को अधिक जानते हो। पर मुझे तो लगता है कि प्रेम सरला से ही प्रेम करता है। यदि ऐसा है तो पहले की लड़कियों से छेड़छाड़ कोई महत्व नहीं रखती।' शीला न कहा।
क्या सचमुच ऐसा संभव है? सरला सोचने लगी। पर वह अपने विचारों में कायम नहीं रह पायी। कोई खटका हुआ। उसका ध्यान अपनी वर्तमान परिस्थिति पर आ गया। वह वहाँ से हट गयी।
गलियारे के दूसरे छोर पर उसे प्रसाद खड़ा दिखाई पड़ा। उसके खड़े होने का अंदाज बता रहा था कि हम यहाँ यूँ ही खड़े नहीं हैं। उसकी लंबी पतली गर्दन में उसका आवश्यकता से अधिक उभरा हुआ टेंटुआ जिस हिसाब से ऊपर नीचे हो रहा था उससे उसकी मानसिक हलचल का पता चलता था। यदि टेंटुआधारी व्यक्ति के चेहरे से गंभीरता टपक सकती है तो प्रसाद के चेहरे से गंभीरता टपक रही थी।
प्रसाद एक गणितज्ञ था। वह कोई भी समस्या गणित के मॉडल के माध्यम से हल कर सकता था। पर सरला के व्यवहार का वह कोई भी मॉडल नहीं बना पा रहा था। यदि कोई संख्या दो से विभाज्य है, तो है। इसके दो अर्थ नहीं हो सकते। दो और दो का गुणनफल चार ही हो सकता है, कभी चौबीस नहीं। समीकरण के दाहिनी ओर जितनी संख्या है बाईं ओर भी उतनी ही होनी चाहिए। वह बेचारा सरला के साथ अपना कोई समीकरण नहीं बना पा रहा था। विभाजन में शेष बच जा रहा था। गुणनफल शून्य हो जा रहा था। यहाँ तक कि एक और एक मिला कर भी वह अकेला एक ही बच जा रहा था। एक गणितज्ञ के लिए इससे बड़ी व्यथा क्या हो सकती है?
'सरो' उसने पुकारा।
सरला ने अनसुना कर दिया और वह उसके पास से होकर निकलने लगी। अपनी पुकार का कोई असर न पा कर प्रसाद बहुत क्षुब्ध हुआ। इतना कि जितनी देर में आप हलचल कहेंगे उतनी देर में उसका टेंटुआ दो बार ऊपर नीचे हो गया। उसने सरला का रास्ता रोक कर तथा अपनी खनकती आवाज का ट्रेबल बढ़ा कर कहा, 'सरला!'
'क्या है? मुझे अभी परेशान मत करो।' सरला ने कहा।
'तुम्हें मेरी बात सुननी पड़ेगी।' प्रसाद ने कहा।
'देखो प्रसाद, मुझे तुम्हारी कोई बात नहीं सुननी है। जो कहना है बाद में कहना।' सरला ने कहा।
'मैं अभी कहूँगा। मैं और अधिक सहन नहीं कर सकता।'
'क्या सहन नहीं कर सकते?'
'तुम्हारा व्यवहार।'
'तो अच्छा है न। मत सहन करो। मुझसे उलझो ही नहीं।'
बेचारा गणितज्ञ यहीं परास्त हो गया। सरला ने तो बात ही समाप्त कर दी। दूसरी ओर उस प्रेमाशिष के बच्चे को उसने साफ सीधे शब्दों में चेतावनी दी थी, पर उसका भी कोई असर नहीं हुआ। जो हो इस बार वह हार नहीं मानेगा। फैसला करके ही रहेगा, भले ही दशमलव के आवर्तक अंक की भाँति उसे लगे ही क्यों न रहना पड़े।
'देखो सरो,' उसने समझाते हुए कहा, 'जब तुम शेखर के साथ सिनेमा गई थीं, मैंने कुछ नहीं कहा। जब महेश तुम्हारा मित्र बना मैंने कुछ नहीं कहा। पर अब यह प्रेमाशिष मुझसे सहन नहीं होगा। मेरे मना करने के बाद भी अभी तुम उससे बातें कर रही थीं!'
'तुम होते कौन हो, मुझे मना करने वाले?' गुस्से से तिलमिला कर सरला ने कहा।
'मैं कौन होता हूँ? यानी मैं... मैं बताता हूँ मैं कौन होता हूँ। मैं तुम्हारा होने वाला पति हूँ।' लगभग चिल्लाते हुए प्रसाद ने कहा।
'तुम्हारा इतना साहस?' सरला ने कहा।
'तुम्हारे पिता जी ने मुझे चिट्ठी में ...' प्रसाद कहने लगा पर सरला ने उसकी बात बीच में काट कर कहा,
'तो जा कर पिता जी से कहो। अब फिर कभी मेरा रास्ता रोका तो मैं तुम्हारा टेंटुआ दबा दूँगी।' सरला ने कहा। वह पैर पटक कर वहाँ से जाने के लिए उद्यत हुई तो उसने देखा कि पार्टी के लगभग सभी जन उस गलियारे में उपस्थित थे। ग्लानि से उसकी आँखों में ऑसू छलक आये। वह दौड़ती हुई वहाँ से निकल गई।
उस दिन शाम को पार्क में कोई अपने घर से बाहर नहीं निकला। सभी पत्र लेखन में व्यस्त हो गये थे। यह उस समय की बात है जब मोबाइल फोन, वीडियो चैट आदि भविष्य की बातें थीं। लिहाजा चिट्ठी-डाकिये पर ही जोर था। पर उस दिन तो लगा था कि चिट्ठी लिखने की बीमारी पार्क में संक्रामक रोग की तरह फैल गई है। टीले वाले घर में जो घटना घटी थी, वह पार्क के इतिहास में नई थी। इतनी बड़ी घटना को अपने तक ही सीमित रखना, परले दर्जे की मूर्खता समझ कर सभी पत्र लिख रहे थे। इनमें से कुछ विशेष पत्र उल्लेखनीय हैं।
चंपा के पति ने सरला के पिता जी को लिखा कि आज ऐसी घटना हो गई है, जिसमें प्रसाद ने सरला के साथ दुर्व्यवहार किया। और यह भी लिखा कि उसकी राय में प्रसाद सरला के लिये उपयुक्त नहीं है।
चंपा ने भी सरला के पिता जी को पत्र लिखा। उसने भी अपने शब्दों में घटना का विवरण देते हुए प्रसाद को अनुपयुक्त बताया। उसने यह भी लिखा कि शायद सरला प्रेमाशिष नाम के एक युवक को चाहती है। पर उन दोनों में किसी कारण अनबन है।
प्रसाद ने भी सरला के पिता जी को पत्र लिखा। उसने लिखा कि सरला ने सरेआम उसके साथ दुर्व्यवहार किया है। उसने यह भी लिखा कि जब दोनों परिवारों में यह बात कई सालों से मालूम है कि सरला की शादी प्रसाद के साथ होने वाली है तो सरला का आचरण अच्छा होना चाहिए था। उसने मर्यादा का उल्लंघन करके महेश, शेखर आदि व्यक्तियों के साथ मित्रता बढ़ाई। अति तो उसने प्रेमाशिष नाम के व्यक्ति के साथ की। सब कुछ जानते हुए भी उन दोनों में अँगूठियों का आदान प्रदान हुआ। इतना होने के बावजूद वह सरला से शादी करने को तैयार है बशर्ते वह भविष्य में ऐसी हरकतें न करने का वादा करे।
प्रेमाशिष ने सरला को पत्र लिखा। उसने लिखा कि वह यानी प्रेमाशिष समझ सकता है कि आज की घटना से उसे यानी सरला को कितना कष्ट पहुँचा होगा। उसे यानी प्रेमाशिष को यह जान कर प्रसन्नता हुई कि उसके यानी सरला के और प्रसाद के बीच कुछ नहीं है। वह प्रसाद की बात पर कुछ टिप्पणी नहीं करना चाहता है, परन्तु यह जान कर उसे आश्चर्य अवश्य हुआ कि सरला के जीवन में उसके यानी प्रेमाशिष के आने के पहले शेखर और महेश नाम के व्यक्ति आ चुके हैं। यह बात उसे अवश्य आश्चर्य में डालती है कि अपने भूतकाल में न झाँकते हुए वह यानी सरला, कैसे प्रेमाशिष के भूतकाल में झाँक कर उसे दोषी ठहरा सकती है। उसे विश्वास है कि अभी शेखर या महेश का महत्व कुछ भी नहीं है। वह समझ सकता है, पर सरला ऐसी समझदार लड़की यह समझाने पर भी क्यों नहीं समझती कि निशा या तारा वाले संबंधों में न कभी दम था और न रहेगा। इस जीवन की उसकी एक ही चाहत है और वह है सदानंदजी की छोटी लड़की, सरला। उसके यानी प्रेमाशिष के इतना लिखने के बावजूद वह यानी सरला अड़ियल टट्टू की तरह अपनी बेवकूफी पर अड़ी रहे तो वह और कुछ नहीं कर सकता है। बस, अपना बचा खुचा जीवन उसी की यानी सरला की याद में बिता देगा।
सरला के पिता जी समझदार इनसान थे। उन्होंने दुनिया देख रखी थी। उन सब पत्रों से जो उनके नाम लिखे गये थे, उन्होने कुछ छाना और कुछ बीना। सरला की माँ से मिलने से पहले का अपना जामाना याद किया। प्रेमाशिष के संबंध में छानबीन की। पूरी तरह से लैस हो कर वे पार्क पहुँचे। उन्होंने चंपा के घर में एक विशाल आयोजन किया और प्रेम और सरला की सगाई की घोषणा कर दी।
इस बीच सरला ने कई बार प्रेम से मिलना चाहा था, पर हर बार झिझक का रुक गई थी। उसके पिताजी ने सब राहें आसान कर दी
थीं, उसके लिये भी और प्रेमाशिष के लिये भी।
यह कहना गलत होगा कि प्रेम पर उसका शक जाता रहा। हाँ, शक के शोलों को समझदारी की राख ने अच्छी तरह ढक लिया था। फिर प्यार तो था ही।
समयोपरांत दोनों की शादी हो गई। मदन और प्रेम का साझेदारी वाला व्यापार भी चल निकला। प्रेम ने वहीं पार्क में घर बना लिया। आजकल के मापदण्डों के विपरीत सरला और शीला में बहुत घनिष्ठता हो गई। दोनों परिवार सुखपूर्वक रहने लगे।
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समाप्त
Friday, March 25, 2011
प्रेमिका संवाद -4
प्रेमिका संवाद -4
अब तक आपने पढ़ा
प्रेमिका संवाद -1 प्रेमिका संवाद -2 प्रेमिका संवाद - 3
अब आगे-
सरला प्रेमाशिष को दिल की गहराइयों से प्यार करती थी। ऐसा प्यार कभी-कभी कष्टप्रद होता है, जैसा कि सरला अनुभव कर रही थी। वह एक सूझबूझ वाली समझदार युवती थी। उसके पास भावुक हृदय था तो बुद्धियुक्त मस्तिष्क भी था। उसे मालूम हो चुका था कि प्रेमाशिष का प्यार टुकड़े-टुकड़े बँटा है। उसके हिस्से उसके प्यार का एक अणुसूक्ष्म टुकड़ा पड़ा था, जिसका जाहिर है, होना न होना बराबर था। चंद्रिका, कमला, निशा, विभा, तारा, सुजाता... नामों की एक लंबी सूची थी, जिसके अंत में उसका नाम भी था। अब तक शायद कुछ और नाम जुड़ गये हों। उसने सुन रखा था कि प्रेमाशिष की प्रेमिकाएँ एक क्रिकेट के मैदान में भी नहीं समाएंगी। ऐसे में वह क्या आशा कर सकती है! उस भीड़ में समा जाए तो क्या होगा! उसे शायद डीप थर्डमैन क्षेत्र में खड़े होने भर को स्थान मिल जाए। यह उसे स्वीकार्य नहीं था। उसे ऐसा पति चाहिए था, जो केवल उसी का हो। वह उसे चंद्रिका, कमला, निशा, विभा, तारा, सुजाता आदि की भीड़ में बाँटने के लिये तैयार नहीं थी।
इसमें शायद प्रेमाशिष को अधिक दोष नहीं दिया जा सकता है। उसका तो नाम ही प्रेमाशिष है। यदि शहर की सभी लड़कियाँ उसके आगे-पीछे नाचती रहें तो उसे कितना दोष दिया जा सकता है? समझ-बूझ कर पूरे होशोहवास में उसने प्रेमाशिष से दूर रहने का निर्णय लिया था। पर निर्णय लेने से ही बात समाप्त नहीं हो जाती। उस पर बने रहना भी पड़ता है, जो उसे बहुत कष्टप्रद प्रतीत हो रहा था।
सरला न एक नहीं तीन निर्णय लिये थे। एक, वह प्रेमाशिष से दूर रहेगी। जिस गली में तेरा घर हो या गुजर हो बालमा, उस गली में पाँव रखना ही नहीं है। दो, वह कभी शादी नहीं करेगी। चूँकि इस जनम का सारा प्यार वह प्रेम को अर्पण कर चुकी है और प्रेम केवल उसका हो कर नहीं रह सकता है, इसलिए शादी का प्रश्न ही नहीं उठता है। प्रेम को छोड़ कर किसी और से शादी करना तो उस व्यक्ति के गले जिंदा मढ़ने के समान है। ऐसा पाप वह कभी नहीं कर सकती है। तीन, वह अपने जीवन को मानवोपयोगी कार्यों में समर्पित कर देगी। उद्देश्यहीन जीवन चलती-फिरती लाश के समान है। मानसिक शांति के लिये भी उद्देश्य का होना बहुत आवश्यक है, विशेष कर जबकि उसका पहाड़ जैसा तीन-चौथाई जीवन उसके सामने है।
मनुष्य ने कोई अच्छा निर्णय लिया नहीं कि भगवान परीक्षा लेने पहुँच जाते हैं। सरला के पिताजी अचानक उसकी शादी के लिए बहुत सक्रिय हो गये। वे अपनी पुत्री के प्रति बहुत चिंतित हो उठे थे। पुत्री का भरी जवानी में उदासीन होना और शादी न करने का संकल्प करना किसी भी बाप को चिंतातुर कर सकता है।
सरला कुछ दिन शांत से बिताने के लिये अपनी चचेरी बहन चंपा के पास पार्क में चली आई थी। बहन से मिलने की खुशी में वह यह बात एकदम भूल गई कि प्रसाद भी पार्क में ही रहता है। प्रसाद और सरला के परिवार में पुरानी जान पहचान है। बचपन में दोनों एक दूसरे के पड़ोसी रह चुके हैं। तब एकाध बार उन दोनों की शादी का जिक्र हुआ था। उसी आधार पर प्रसाद सरला पर अपना हक समझा था। पर सरला को प्रसाद कभी एक आँख नहीं भाया। यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना उचित है कि एक आँख भाना केवल भाषा का प्रयोग है। ऐसी स्थिति में ऐसा ही कहा जाता है। क्यों कहा जाता है यह लेखक को नहीं मालूम। इसलिए यह न समझ लेना चाहिए कि सरला प्रसाद को केवल एक आँख से देखती थी। उसने उसे जब भी देखा दोनों आँखों से ही देखा, पर वह उसे किसी तरह भी पसंद नहीं आया।
उधर सरला के पिताजी की धारणा दूसरी ही थी। वे प्रसाद को सरला के लिये उपयुक्त पा रहे थे। उन्होंने इस आशय के पत्र प्रसाद, प्रसाद के पिताजी, चंपा के पति और सरला को एक ही डाक से भेज दिये।
प्रसाद एक मेधावी गणितज्ञ था। अधिक मिलनसार तो नहीं था पर पार्क की सामाजिक दुनिया के एक ऐसा पात्र था जो बस था। सरला के प्रति उसका व्यवहार किसी समझदार व्यक्ति का सा नहीं था, जो पार्क में आजकल चर्चा का विषय था। लोगों को आश्चर्य इस बात पर था कि सरला ऐसी समझदार और आधुनिक लड़की प्रसाद को क्यों सहन कर रही है।
उधर सरला की धारणा थी, यदि वह प्रसाद को दुत्कार देती है तो उसके पिताजी किसी दूसरी जगह उसकी बात चलायेंगे, जहाँ उसे फिर इनकार करना पड़ेगा। इससे कोई अप्रिय घटना न घटे, इससे तो यही अच्छा था कि कुछ दिन प्रसाद को सहन कर लो। वह बेवकूफ आदमी कैसे अधिकारपूर्ण स्वर से उसे 'सरो सरो' बुलाता है। उसे वैसे ही अपने बचपन के इस नाम से चिढ़ है, प्रसाद के बुलाने से तो तन-बदन में आग लग जाती है।
मदन प्रेमाशिष को पेड़ों वाले घर की ओर ले जा रहा था। रास्ते में दोनों बातें करते जा रहे थे। मदन कह रहा था,
'प्रेम मुझे विश्वास नहीं होता कि तुम में इतना बड़ा परिवर्तन आ जाएगा। एक समय था तुम तारा और... और... और...।'
'सुजाता।' प्रेमाशिष ने कहा।
'हाँ, तारा और सुजाता। एक समय था जब तुम दोनों के साथ पेंगें बढ़ा रहे थे और जब तुम्हारी पोल खुली थी तो कितना बड़ा झमेला खड़ा हुआ था। पर तुम्हारे चेहरे पर शिकन तक नहीं आई थी। और आज एक सरला तुमको छोड़ कर चली गई तो तुम हाय तौबा मचा रहे हो।' मदन ने कहा।
'सरला से पहले जितनी भी लड़कियाँ थीं, उनका अब कोई महत्व नहीं है। वह तो एक तरह से खिलवाड़ था। सरला... जाने दो, तुम नहीं समझोगे। कभी प्रेम में पड़ोगे तो स्वयं समझ जाओगे।' प्रेमाशिष ने कहा।
पेड़ों वाला घर सामने आ गया था। सामने बड़े-बड़े पेड़ थे और फिर सुंदर मकान था। एक पेड़ पर बड़ा सा झूला पड़ा हुआ था, जिसमें एक लड़की बैठी पुस्तक पढ़ रही थी और हौले-हौले झूल रही थी। प्रेमाशिष ने देखा यह वही लड़की थी जो सुबह उसे देख कर मुस्कराई थी। यह मदन की मँगेतर शीला थी जिसे मदन प्रेमाशिष से मिलाने के लिये उत्सुक था। परिचय कराने के लिये वह तत्पर हुआ तो उसने पाया कि शीला और प्रेमाशिष एक दूसरे को देख कर मुस्करा रहे हैं।
'तुम दोनों एक दूसरे को जानते हो?' आश्चर्य से मदन ने पूछा।
' आज सुबह दौड़ते समय मैंने इनको देखा था।' प्रेमाशिष ने कहा।
'तुमने बताया था कि तुम्हारे मित्र प्रेमाशिष आ रहे हैं। सुबह इनको देख कर मैंने अंदाज लगाया कि यह वही हैं।' उस लड़की ने कहा।
'तुमने ठीक अंदाज लगाया। यही प्रेमाशिष है। और प्रेम, यह शीला है मेरी मँगेतर।'
'तुम्हारी मँगेतर!' प्रेमाशिष ने आश्चर्य करते हुए कहा। 'तुमने कुछ बताया ही नहीं। चुपके-चुपके मँगनी कर ली।'
'बताने का समय ही नहीं मिला प्रेम। एक दिन यह मुझे देख कर मुस्कराई। मुस्कराहट मेरे अंदर तक चली गई। इसके बाद जब मुझे होश आया तो मैंने पाया कि इसके साथ मेरी मँगनी हो चुकी है।' मदन ने नाटकीय अंदाज में कहा।
'मदन तुम इस तरह की बात करोगे तो मैं गुस्सा हो जाऊँगी।' शीला ने कहा।
'नहीं नहीं, शीला, यह गुस्से का अवसर नहीं है।' प्रेमाशिष ने कहा। 'सबसे पहले मेरी बधाई स्वीकार करो।'
'प्रेम मैं तुमको एक बात बताऊँ, अभी-अभी मेरे परिचय कराने से पहले ही जब तुम दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्करा रहे थे तो मेरा दिल धक् से रह गया था।' मदन ने कहा।
'क्यों क्या हो गया था?' शीला ने कौतूहल से पूछा।
'मैं तुमको बता चुका हूँ शीला कि प्रेम के पास हो न हो कोई एक सम्मोहन मंत्र है। यह जिधर से भी गुजरता है, लड़कियाँ अपना दिल थाल में सजा कर इसके सामने रख देती हैं। मैं डर गया था कि कहीं इसने मेरी इकलौती मँगेतर पर कहीं कोई जादू तो नहीं कर डाला, जो जान न पहचान, इसे देख कर मुस्करा रही है। जिस मुस्कान ने मुझे कहीं का नहीं रखा ही...।' मदन कह रहा था और उसकी बात काट कर प्रेमाशिष न कहा,
'क्या बकवास कर रहे हो मदन! शीला, इसकी बातों में मत जाओ। इस प्रकार की हलकी बातों ने मेरा पहले ही बहुत नुकसान कर दिया है।'
शीला ने घड़ी पी दृष्टि गड़ाते हुए कहा, 'टीले वाले मकान पर नहीं जाना है क्या? देर हो रही है, चलें?'
विनोद का घर टीले के शीर्ष भाग में था। इसीलिए उसे टीले वाला घर कहा जाता था। जब ये लोग वहाँ पहुँचे तो वहाँ 10-12 व्यक्ति पहले से ही उपस्थित थे। चूँकि प्रेमाशिष पार्क में आता रहता था, इसलिए अधिकांश लोगों से वह परिचित था। सभी उससे बड़ी गर्मजोशी से मिले। कुछ इस तरफ की बातें हुईं। कुछ उस तरफ की बातें हुईं। फिर सब लोगों ने सब तरफ की बातें कीं। वैसे तो, जैसी उसके मन की अवस्था थी, प्रेमाशिष को पार्टी वार्टी में जाना पसंद नहीं आ रहा था। एक ओर तो आपकी प्रेमिका आपको आईना दिखा कर चली गई थी, दूसरी ओर आपको पार्टी में जाने को कहा जा रहा था। एक बेयरिंग लिफाफे की तरह। पर अब यहाँ पर नाश्ते का सुरुचिपूर्ण आयोजन और चहल चहल देख कर उसे अच्छा ही लग रहा था। वह इसलिए भी प्रसन्न था कि उसके मित्र मदन की सगाई शीला जैसी अच्छी लड़की से हुई थी, जो बहुत ही हँसमुख और मिलनसार थी। वर्ना उसके ऐसे भी मित्र थे जो शादी से पहले तो थे हम प्याला और हम निवाला और शादी के बाद सब गड़बड़ घोटाला। शादी के बाद कुछ तो ऐसे जमींदोज हुए कि जैसे कभी थे ही नहीं।
मदन और शीला की जोड़ी देख कर उसका ध्यान बरबस अपने ऊपर जा रहा था। नाम तो था प्रेमाशिष पर था प्रेम शापित। क्या ही अच्छा होता यदि सरला उसकी होती और उसके साथ होती। खैर, जो नहीं है, नहीं है।
वह शीघ्र ही शीला से घुलमिल गया। दोनों अपनी-अपनी नाश्ते की प्लेट लिये एक किनारे खड़े बातें करते रहे। आलू दम बहुत दमदार था। प्रेमाशिष को याद नहीं पड़ा कि उसने इससे स्वादिष्ट आलू दम पहले कभी खाया हो। उसने शीला का ध्यान आलू दम की ओर आकर्षित किया तो शीला ने उसे बताया कि वह उन अभागियों में से है जो पाव भर खायें तो उनका वजन सेर भर बढ़ जाता है। स्वयं को प्रलोभन से दूर रखकर, चेहरे में दृढ़ता का भाव लिये वह खाली प्लेट रखने चली गई।
इधर प्रेमाशिष आलू दम में चम्मच डुबोते हुए इस बात पर गौर करने लगा कि आजकल की प्लेटें कितनी कम गहरी होती हैं। प्लेट से सिर उठा कर उसने देखा तो पाया कि सरला उसी की ओर आ रही है। उसका दिल धड़ धड़ धड़ धड़ करने लगा। उसने आगे बढ़ कर कहा, 'सड़ला!'
मुँह में आलू हो तो सरला का उच्चारण करना कठिन होता है।
'प्रेम।' सरला ने कहा। उसके कहने में इतनी तेजी थी कि उसके मुँह से निकला 'फ्रेम'।
'सरला ' प्रेम ने कहा।
'प्रेम।' सरला ने कहा। 'तुम्हारे व्यक्तिगत मामले में बोलने का मुझे अधिकार तो नहीं है, पर बोले बिना नहीं रहा जाता।'
'किसने कहा नहीं है। तुम्हें पूरा अधिकार है।' प्रेमाशिष ने कहा।
'मैं जानती हूँ प्रेम कि जो कुछ तुम कर रहे हो, तुम उसे करने के लिये वाध्य हो। फिर भी करने से पहले कुछ तो सोच लेते। मैं पूछती हूँ कि क्या कोई भी लड़की तुमसे बच नहीं सकती?'
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अभी और है। अंतिम किस्त कल शाम तक
अब तक आपने पढ़ा
प्रेमिका संवाद -1 प्रेमिका संवाद -2 प्रेमिका संवाद - 3
अब आगे-
सरला प्रेमाशिष को दिल की गहराइयों से प्यार करती थी। ऐसा प्यार कभी-कभी कष्टप्रद होता है, जैसा कि सरला अनुभव कर रही थी। वह एक सूझबूझ वाली समझदार युवती थी। उसके पास भावुक हृदय था तो बुद्धियुक्त मस्तिष्क भी था। उसे मालूम हो चुका था कि प्रेमाशिष का प्यार टुकड़े-टुकड़े बँटा है। उसके हिस्से उसके प्यार का एक अणुसूक्ष्म टुकड़ा पड़ा था, जिसका जाहिर है, होना न होना बराबर था। चंद्रिका, कमला, निशा, विभा, तारा, सुजाता... नामों की एक लंबी सूची थी, जिसके अंत में उसका नाम भी था। अब तक शायद कुछ और नाम जुड़ गये हों। उसने सुन रखा था कि प्रेमाशिष की प्रेमिकाएँ एक क्रिकेट के मैदान में भी नहीं समाएंगी। ऐसे में वह क्या आशा कर सकती है! उस भीड़ में समा जाए तो क्या होगा! उसे शायद डीप थर्डमैन क्षेत्र में खड़े होने भर को स्थान मिल जाए। यह उसे स्वीकार्य नहीं था। उसे ऐसा पति चाहिए था, जो केवल उसी का हो। वह उसे चंद्रिका, कमला, निशा, विभा, तारा, सुजाता आदि की भीड़ में बाँटने के लिये तैयार नहीं थी।
इसमें शायद प्रेमाशिष को अधिक दोष नहीं दिया जा सकता है। उसका तो नाम ही प्रेमाशिष है। यदि शहर की सभी लड़कियाँ उसके आगे-पीछे नाचती रहें तो उसे कितना दोष दिया जा सकता है? समझ-बूझ कर पूरे होशोहवास में उसने प्रेमाशिष से दूर रहने का निर्णय लिया था। पर निर्णय लेने से ही बात समाप्त नहीं हो जाती। उस पर बने रहना भी पड़ता है, जो उसे बहुत कष्टप्रद प्रतीत हो रहा था।
सरला न एक नहीं तीन निर्णय लिये थे। एक, वह प्रेमाशिष से दूर रहेगी। जिस गली में तेरा घर हो या गुजर हो बालमा, उस गली में पाँव रखना ही नहीं है। दो, वह कभी शादी नहीं करेगी। चूँकि इस जनम का सारा प्यार वह प्रेम को अर्पण कर चुकी है और प्रेम केवल उसका हो कर नहीं रह सकता है, इसलिए शादी का प्रश्न ही नहीं उठता है। प्रेम को छोड़ कर किसी और से शादी करना तो उस व्यक्ति के गले जिंदा मढ़ने के समान है। ऐसा पाप वह कभी नहीं कर सकती है। तीन, वह अपने जीवन को मानवोपयोगी कार्यों में समर्पित कर देगी। उद्देश्यहीन जीवन चलती-फिरती लाश के समान है। मानसिक शांति के लिये भी उद्देश्य का होना बहुत आवश्यक है, विशेष कर जबकि उसका पहाड़ जैसा तीन-चौथाई जीवन उसके सामने है।
मनुष्य ने कोई अच्छा निर्णय लिया नहीं कि भगवान परीक्षा लेने पहुँच जाते हैं। सरला के पिताजी अचानक उसकी शादी के लिए बहुत सक्रिय हो गये। वे अपनी पुत्री के प्रति बहुत चिंतित हो उठे थे। पुत्री का भरी जवानी में उदासीन होना और शादी न करने का संकल्प करना किसी भी बाप को चिंतातुर कर सकता है।
सरला कुछ दिन शांत से बिताने के लिये अपनी चचेरी बहन चंपा के पास पार्क में चली आई थी। बहन से मिलने की खुशी में वह यह बात एकदम भूल गई कि प्रसाद भी पार्क में ही रहता है। प्रसाद और सरला के परिवार में पुरानी जान पहचान है। बचपन में दोनों एक दूसरे के पड़ोसी रह चुके हैं। तब एकाध बार उन दोनों की शादी का जिक्र हुआ था। उसी आधार पर प्रसाद सरला पर अपना हक समझा था। पर सरला को प्रसाद कभी एक आँख नहीं भाया। यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना उचित है कि एक आँख भाना केवल भाषा का प्रयोग है। ऐसी स्थिति में ऐसा ही कहा जाता है। क्यों कहा जाता है यह लेखक को नहीं मालूम। इसलिए यह न समझ लेना चाहिए कि सरला प्रसाद को केवल एक आँख से देखती थी। उसने उसे जब भी देखा दोनों आँखों से ही देखा, पर वह उसे किसी तरह भी पसंद नहीं आया।
उधर सरला के पिताजी की धारणा दूसरी ही थी। वे प्रसाद को सरला के लिये उपयुक्त पा रहे थे। उन्होंने इस आशय के पत्र प्रसाद, प्रसाद के पिताजी, चंपा के पति और सरला को एक ही डाक से भेज दिये।
प्रसाद एक मेधावी गणितज्ञ था। अधिक मिलनसार तो नहीं था पर पार्क की सामाजिक दुनिया के एक ऐसा पात्र था जो बस था। सरला के प्रति उसका व्यवहार किसी समझदार व्यक्ति का सा नहीं था, जो पार्क में आजकल चर्चा का विषय था। लोगों को आश्चर्य इस बात पर था कि सरला ऐसी समझदार और आधुनिक लड़की प्रसाद को क्यों सहन कर रही है।
उधर सरला की धारणा थी, यदि वह प्रसाद को दुत्कार देती है तो उसके पिताजी किसी दूसरी जगह उसकी बात चलायेंगे, जहाँ उसे फिर इनकार करना पड़ेगा। इससे कोई अप्रिय घटना न घटे, इससे तो यही अच्छा था कि कुछ दिन प्रसाद को सहन कर लो। वह बेवकूफ आदमी कैसे अधिकारपूर्ण स्वर से उसे 'सरो सरो' बुलाता है। उसे वैसे ही अपने बचपन के इस नाम से चिढ़ है, प्रसाद के बुलाने से तो तन-बदन में आग लग जाती है।
मदन प्रेमाशिष को पेड़ों वाले घर की ओर ले जा रहा था। रास्ते में दोनों बातें करते जा रहे थे। मदन कह रहा था,
'प्रेम मुझे विश्वास नहीं होता कि तुम में इतना बड़ा परिवर्तन आ जाएगा। एक समय था तुम तारा और... और... और...।'
'सुजाता।' प्रेमाशिष ने कहा।
'हाँ, तारा और सुजाता। एक समय था जब तुम दोनों के साथ पेंगें बढ़ा रहे थे और जब तुम्हारी पोल खुली थी तो कितना बड़ा झमेला खड़ा हुआ था। पर तुम्हारे चेहरे पर शिकन तक नहीं आई थी। और आज एक सरला तुमको छोड़ कर चली गई तो तुम हाय तौबा मचा रहे हो।' मदन ने कहा।
'सरला से पहले जितनी भी लड़कियाँ थीं, उनका अब कोई महत्व नहीं है। वह तो एक तरह से खिलवाड़ था। सरला... जाने दो, तुम नहीं समझोगे। कभी प्रेम में पड़ोगे तो स्वयं समझ जाओगे।' प्रेमाशिष ने कहा।
पेड़ों वाला घर सामने आ गया था। सामने बड़े-बड़े पेड़ थे और फिर सुंदर मकान था। एक पेड़ पर बड़ा सा झूला पड़ा हुआ था, जिसमें एक लड़की बैठी पुस्तक पढ़ रही थी और हौले-हौले झूल रही थी। प्रेमाशिष ने देखा यह वही लड़की थी जो सुबह उसे देख कर मुस्कराई थी। यह मदन की मँगेतर शीला थी जिसे मदन प्रेमाशिष से मिलाने के लिये उत्सुक था। परिचय कराने के लिये वह तत्पर हुआ तो उसने पाया कि शीला और प्रेमाशिष एक दूसरे को देख कर मुस्करा रहे हैं।
'तुम दोनों एक दूसरे को जानते हो?' आश्चर्य से मदन ने पूछा।
' आज सुबह दौड़ते समय मैंने इनको देखा था।' प्रेमाशिष ने कहा।
'तुमने बताया था कि तुम्हारे मित्र प्रेमाशिष आ रहे हैं। सुबह इनको देख कर मैंने अंदाज लगाया कि यह वही हैं।' उस लड़की ने कहा।
'तुमने ठीक अंदाज लगाया। यही प्रेमाशिष है। और प्रेम, यह शीला है मेरी मँगेतर।'
'तुम्हारी मँगेतर!' प्रेमाशिष ने आश्चर्य करते हुए कहा। 'तुमने कुछ बताया ही नहीं। चुपके-चुपके मँगनी कर ली।'
'बताने का समय ही नहीं मिला प्रेम। एक दिन यह मुझे देख कर मुस्कराई। मुस्कराहट मेरे अंदर तक चली गई। इसके बाद जब मुझे होश आया तो मैंने पाया कि इसके साथ मेरी मँगनी हो चुकी है।' मदन ने नाटकीय अंदाज में कहा।
'मदन तुम इस तरह की बात करोगे तो मैं गुस्सा हो जाऊँगी।' शीला ने कहा।
'नहीं नहीं, शीला, यह गुस्से का अवसर नहीं है।' प्रेमाशिष ने कहा। 'सबसे पहले मेरी बधाई स्वीकार करो।'
'प्रेम मैं तुमको एक बात बताऊँ, अभी-अभी मेरे परिचय कराने से पहले ही जब तुम दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्करा रहे थे तो मेरा दिल धक् से रह गया था।' मदन ने कहा।
'क्यों क्या हो गया था?' शीला ने कौतूहल से पूछा।
'मैं तुमको बता चुका हूँ शीला कि प्रेम के पास हो न हो कोई एक सम्मोहन मंत्र है। यह जिधर से भी गुजरता है, लड़कियाँ अपना दिल थाल में सजा कर इसके सामने रख देती हैं। मैं डर गया था कि कहीं इसने मेरी इकलौती मँगेतर पर कहीं कोई जादू तो नहीं कर डाला, जो जान न पहचान, इसे देख कर मुस्करा रही है। जिस मुस्कान ने मुझे कहीं का नहीं रखा ही...।' मदन कह रहा था और उसकी बात काट कर प्रेमाशिष न कहा,
'क्या बकवास कर रहे हो मदन! शीला, इसकी बातों में मत जाओ। इस प्रकार की हलकी बातों ने मेरा पहले ही बहुत नुकसान कर दिया है।'
शीला ने घड़ी पी दृष्टि गड़ाते हुए कहा, 'टीले वाले मकान पर नहीं जाना है क्या? देर हो रही है, चलें?'
विनोद का घर टीले के शीर्ष भाग में था। इसीलिए उसे टीले वाला घर कहा जाता था। जब ये लोग वहाँ पहुँचे तो वहाँ 10-12 व्यक्ति पहले से ही उपस्थित थे। चूँकि प्रेमाशिष पार्क में आता रहता था, इसलिए अधिकांश लोगों से वह परिचित था। सभी उससे बड़ी गर्मजोशी से मिले। कुछ इस तरफ की बातें हुईं। कुछ उस तरफ की बातें हुईं। फिर सब लोगों ने सब तरफ की बातें कीं। वैसे तो, जैसी उसके मन की अवस्था थी, प्रेमाशिष को पार्टी वार्टी में जाना पसंद नहीं आ रहा था। एक ओर तो आपकी प्रेमिका आपको आईना दिखा कर चली गई थी, दूसरी ओर आपको पार्टी में जाने को कहा जा रहा था। एक बेयरिंग लिफाफे की तरह। पर अब यहाँ पर नाश्ते का सुरुचिपूर्ण आयोजन और चहल चहल देख कर उसे अच्छा ही लग रहा था। वह इसलिए भी प्रसन्न था कि उसके मित्र मदन की सगाई शीला जैसी अच्छी लड़की से हुई थी, जो बहुत ही हँसमुख और मिलनसार थी। वर्ना उसके ऐसे भी मित्र थे जो शादी से पहले तो थे हम प्याला और हम निवाला और शादी के बाद सब गड़बड़ घोटाला। शादी के बाद कुछ तो ऐसे जमींदोज हुए कि जैसे कभी थे ही नहीं।
मदन और शीला की जोड़ी देख कर उसका ध्यान बरबस अपने ऊपर जा रहा था। नाम तो था प्रेमाशिष पर था प्रेम शापित। क्या ही अच्छा होता यदि सरला उसकी होती और उसके साथ होती। खैर, जो नहीं है, नहीं है।
वह शीघ्र ही शीला से घुलमिल गया। दोनों अपनी-अपनी नाश्ते की प्लेट लिये एक किनारे खड़े बातें करते रहे। आलू दम बहुत दमदार था। प्रेमाशिष को याद नहीं पड़ा कि उसने इससे स्वादिष्ट आलू दम पहले कभी खाया हो। उसने शीला का ध्यान आलू दम की ओर आकर्षित किया तो शीला ने उसे बताया कि वह उन अभागियों में से है जो पाव भर खायें तो उनका वजन सेर भर बढ़ जाता है। स्वयं को प्रलोभन से दूर रखकर, चेहरे में दृढ़ता का भाव लिये वह खाली प्लेट रखने चली गई।
इधर प्रेमाशिष आलू दम में चम्मच डुबोते हुए इस बात पर गौर करने लगा कि आजकल की प्लेटें कितनी कम गहरी होती हैं। प्लेट से सिर उठा कर उसने देखा तो पाया कि सरला उसी की ओर आ रही है। उसका दिल धड़ धड़ धड़ धड़ करने लगा। उसने आगे बढ़ कर कहा, 'सड़ला!'
मुँह में आलू हो तो सरला का उच्चारण करना कठिन होता है।
'प्रेम।' सरला ने कहा। उसके कहने में इतनी तेजी थी कि उसके मुँह से निकला 'फ्रेम'।
'सरला ' प्रेम ने कहा।
'प्रेम।' सरला ने कहा। 'तुम्हारे व्यक्तिगत मामले में बोलने का मुझे अधिकार तो नहीं है, पर बोले बिना नहीं रहा जाता।'
'किसने कहा नहीं है। तुम्हें पूरा अधिकार है।' प्रेमाशिष ने कहा।
'मैं जानती हूँ प्रेम कि जो कुछ तुम कर रहे हो, तुम उसे करने के लिये वाध्य हो। फिर भी करने से पहले कुछ तो सोच लेते। मैं पूछती हूँ कि क्या कोई भी लड़की तुमसे बच नहीं सकती?'
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अभी और है। अंतिम किस्त कल शाम तक
Thursday, March 24, 2011
प्रेमिका संवाद -3
प्रेमिका संवाद -3
मदन उठ चुका था तथा चाय में उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। अपने मित्र को अनमना देख कर उसने कैफियत पूछी।
'क्या बताऊँ मदन, मेरे किस्मत हमारे गोलपोस्ट की तरह हो गई है। कोई भी उसमें मनमानी से गोल ठोक सकता है।' प्रेमाशिष न मरी हुई आवाज में कहा।
सुबह-सुबह इस तरह घुमा फिरा कर बात मत करो यार। सीधे बताओ कि बात क्या है।सीधे बताने से समझने में सुविधा रहती है।' मदन ने चास की सुड़की मारते हुए कहा।
'अपनी किस्मत को कोस रहा था।' प्रेमाशिष ने कहा।
'क्यों क्या हुआ तुम्हारी किस्मत को?' मदन ने पूछा।
'बहुत कुछ। सबसे पहली बात तो यह है कि मेरी दवाई की दुकान वाली नौकरी चली गई।' प्रेमाशिष ने कहा।
'तुम्हारा यह नौकरी और छोकरी वाला चक्कर मेरी समझ में कभी नहीं आया। कभी नौकरी के लिये छोकरी जाती है और कभी छोकरी के लिये नौकरी। पर दोनों की कमी कभी नहीं हुई तुम्हारे पास। इस बार क्या बात हो गई जो किस्मत को कोस रहे हो?' मदन ने पूछा
'दूसरी बात यह है कि सरला ने संबंध विच्छेद कर दिया है।' उदास प्रेमाशिष ने और भी उदास होते हुए कहा।
'यह अवश्य नई बात है। नौकरी और छोकरी दानों एक साथ चली गईं। अब समझ में आया तुम्हारी उदासी का कारण।' मदन ने कहा।
'मजाक मत करो मदन। और सरला के लिये छोकरी शब्द का प्रयोग न करो तो अच्छा है।' प्रेमाशिष ने कहा।
'क्या नाम बताया, सरला? यार, तुम कब सरला से मिले, कब उससे संबंध स्थापित किया और कब संबंध विच्छेद हुआ! क्योंकि मुझे अच्छी तरह याद है, जब तीन महीने पहले मैं जब तुमसे मिलने आया था तो उस समय तुम्हारी प्रेमिका सुमति नाम की लड़की थी।' मदन ने आश्चर्य करते हुए कहा। उसे मालूम था कि प्रेमाशिष लड़कियों के मामले में पैरों तले घास नहीं उगने देता है। लड़की देखी नहीं कि वह उस पर मर मिटता है। जाने उसके व्यक्तित्व में क्या आकर्षण था कि लड़कियाँ भी उसकी ओर खिंची चली आती थीं। उसके बारे में यह प्रचलित था कि यदि प्रेमाशिष की सभी भूतपूर्व प्रेमिकाओं को एकत्रित किया जा सके तो उनके लिये एक क्रिकेट का मैदान चाहिये। तब भी शायद जगह की समस्या बनी रहेगी। इतना जानने के बाद भी उसके जीवन में लड़कियों का टर्नओवर देख कर आश्चर्य होता है।
'सुमति और उससे पहले की लड़कियाँ तो बस ऐसे ही जान पहचान भर थीं, मदन, पर सरला ने तो मेरी दुनिया ही बदल दी है। उसके बाद मेरे जीवन में और दूसरी लड़की आ ही नहीं सकती है। एक तरह से मैं उसे भूलने के लिये ही तुम्हारे पास आया था। मुझे क्या पता था कि वह भी यहीं है।' प्रेमाशिष ने कहा।
'तुम यहाँ वाली सरला की बात कर रहे हो?'
'हाँ।'
'वही जो अपनी चचेरी बहन के पास रहने आई है?'
'हाँ, वही। अभी दौड़ते हुए मिली थी।'
'उसकी शादी तो प्रसाद से होने वाली है।'
'हाँ, वह भी मिला था। उसे मालूम है कि सरला और मैं शादी करने वाले थे। वह मुझे धमकी भी दे रहा था। कैसा आदमी है यह प्रसाद?' प्रेमाशिष ने पूछा।
'यार, आदमी तो वह ठीक ही था। पर सरला के साथ उसका रवैया किसी की समझ में नहीं आ रहा है। यह सबको मालूम है कि सरला उससे बहुत चिढ़ती है। पर वह सबसे यही कहता फिरता है कि उसकी शादी सरला से होने वाली है। पर उसकी ऐसी-तैसी। तुम्हारा अनादर करने का अधिकार नहीं है उसे।'
'मैं कह रहा था न कि मेरी तो किस्मत ही खराब है।'
'अब इतने दीन भी मत बनो। सरला के मामले में तो मैं कुछ नहीं कर सकता, हाँ, तुम्हारी रोजी-रोटी की समस्या हल हो सकती है, अगर तुम मेरी साझेदारी वाली बात मान लो तो। पहले मानी होती तो अभी तक हम दोनों मालामाल हो गये होते। अब भी देर नहीं हुई है।'
'ठीक है, आज से तुम्हारी और मेरी साझेदारी। तुम कागज तैयार करो और मैं गाँव का मकान बेच कर रुपयों का बंदोबस्त करता हूँ।'
'यह हुई न बात। इसी बात पर मिठाई खाई जाय।'
'खा लेंगे मिठाई भी।'
'अरे तुमने इतना बड़ा निर्णय लिया है, कुछ तो मूड ठीक करो। यह क्या मुँह लटकाए बैठे हो?'
'यह मुँह तो अब जीवन भर लटका ही रहेगा।' प्रेमाशिष ने कहा।
इतने में मदन की माँ ने आकर उन दोनों को याद दिलाया कि विनोद के यहाँ जाना है।
'अरे बाप रे! मैं तो भूल ही गया। तुमको विनोद की याद है न। अरे, वही मोटा, जिससे तुम पिछली बार मिले थे। मैंने तुम्हारे आने के बारे में कहा तो उसने हमें अभी नाश्ते पर बुलाया है।' मदन ने कहा।
'यहाँ की बस यही बात मुझे पसंद नहीं आती है। बात-बेबात में पार्टियाँ।' प्रेमाशिष ने कहा।
'मिलने का कोई तो बहाना चाहिए। फिर हमारी इस छोटी सी पार्क की दुनिया में मनोरंजन का दूसरा साधन भी तो नहीं है। चलो, जल्दी तैयार हो जाओ। आज मैं तुम्हें एक विशेष व्यक्ति से भी मिलवाऊँगा। पहले तुम अपनी यह मुहर्रमी सूरत ठीक कर लो। मुझे लगता है कि तुम सरला वाली घटना का कुछ अधिक ही असर ले रहे हो। तुम्हारा तो सिद्धांत रहा कि तू नहीं और सही, और नहीं और सही।'
'नहीं मदन, सरला के साथ वह बात नहीं है।'
'तुमने बताया नहीं कि सरला ने संबंध क्यों तोड़ा?' मदन ने पूछा।
'गलतफहमी में। तुम निशा को जानते हो न?' प्रेमाशिष ने पूछा।
'हाँ, वही लड़की न, जो तुम्हारे पड़ोस में रहती है?'
'हाँ वही।'
'तुम्हारी भूतपूर्व।'
'हाँ, वही। एक जमाने में वह सोचती थी कि वह मुझसे प्यार करती है। खैर, उस दौर से वह कभी की निकल चुकी है। अभी वह एक परिपक्व युवा महिला है। अब हम दोनों में साधारण दोस्ती है। मुझे लगता है कि किसी ने सरला को इस दोस्ती के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर बता रखा है। सरला के बार-बार तिक-तिक करने पर मैंने उसे बताया कि कोई ऐसी-वैसी बात नहीं है। मैंने उससे वादा भी कर लिया कि मैं कभी निशा से नहीं मिलूँगा।' प्रेमाशिष ने कहा। फिर उसने लंबी साँस ली और आगे कहना आरंभ किया,
'उसके बाद एक दिन निशा अपनी सहेली रत्ना को लेकर मेरे घर आई। दोनों का पिक्चर का प्रोग्राम था। वे मेरे लिये भी टिकट लेती आई थीं। मुझे मना करते नहीं बन पड़ा। मना करने का कोई कारण भी नहीं था। ऐसी-वैसी बात तो थी नहीं। बदकिस्मती यह कि उसी हाल में सरला भी अपनी एक सहेली के साथ पिक्चर देखने आई थी। दो और दो मिला कर उसने बाईस बना डाला और मेरी अँगूठी वापस कर दी।'
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अभी और है। आगे कल शाम तक
मदन उठ चुका था तथा चाय में उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। अपने मित्र को अनमना देख कर उसने कैफियत पूछी।
'क्या बताऊँ मदन, मेरे किस्मत हमारे गोलपोस्ट की तरह हो गई है। कोई भी उसमें मनमानी से गोल ठोक सकता है।' प्रेमाशिष न मरी हुई आवाज में कहा।
सुबह-सुबह इस तरह घुमा फिरा कर बात मत करो यार। सीधे बताओ कि बात क्या है।सीधे बताने से समझने में सुविधा रहती है।' मदन ने चास की सुड़की मारते हुए कहा।
'अपनी किस्मत को कोस रहा था।' प्रेमाशिष ने कहा।
'क्यों क्या हुआ तुम्हारी किस्मत को?' मदन ने पूछा।
'बहुत कुछ। सबसे पहली बात तो यह है कि मेरी दवाई की दुकान वाली नौकरी चली गई।' प्रेमाशिष ने कहा।
'तुम्हारा यह नौकरी और छोकरी वाला चक्कर मेरी समझ में कभी नहीं आया। कभी नौकरी के लिये छोकरी जाती है और कभी छोकरी के लिये नौकरी। पर दोनों की कमी कभी नहीं हुई तुम्हारे पास। इस बार क्या बात हो गई जो किस्मत को कोस रहे हो?' मदन ने पूछा
'दूसरी बात यह है कि सरला ने संबंध विच्छेद कर दिया है।' उदास प्रेमाशिष ने और भी उदास होते हुए कहा।
'यह अवश्य नई बात है। नौकरी और छोकरी दानों एक साथ चली गईं। अब समझ में आया तुम्हारी उदासी का कारण।' मदन ने कहा।
'मजाक मत करो मदन। और सरला के लिये छोकरी शब्द का प्रयोग न करो तो अच्छा है।' प्रेमाशिष ने कहा।
'क्या नाम बताया, सरला? यार, तुम कब सरला से मिले, कब उससे संबंध स्थापित किया और कब संबंध विच्छेद हुआ! क्योंकि मुझे अच्छी तरह याद है, जब तीन महीने पहले मैं जब तुमसे मिलने आया था तो उस समय तुम्हारी प्रेमिका सुमति नाम की लड़की थी।' मदन ने आश्चर्य करते हुए कहा। उसे मालूम था कि प्रेमाशिष लड़कियों के मामले में पैरों तले घास नहीं उगने देता है। लड़की देखी नहीं कि वह उस पर मर मिटता है। जाने उसके व्यक्तित्व में क्या आकर्षण था कि लड़कियाँ भी उसकी ओर खिंची चली आती थीं। उसके बारे में यह प्रचलित था कि यदि प्रेमाशिष की सभी भूतपूर्व प्रेमिकाओं को एकत्रित किया जा सके तो उनके लिये एक क्रिकेट का मैदान चाहिये। तब भी शायद जगह की समस्या बनी रहेगी। इतना जानने के बाद भी उसके जीवन में लड़कियों का टर्नओवर देख कर आश्चर्य होता है।
'सुमति और उससे पहले की लड़कियाँ तो बस ऐसे ही जान पहचान भर थीं, मदन, पर सरला ने तो मेरी दुनिया ही बदल दी है। उसके बाद मेरे जीवन में और दूसरी लड़की आ ही नहीं सकती है। एक तरह से मैं उसे भूलने के लिये ही तुम्हारे पास आया था। मुझे क्या पता था कि वह भी यहीं है।' प्रेमाशिष ने कहा।
'तुम यहाँ वाली सरला की बात कर रहे हो?'
'हाँ।'
'वही जो अपनी चचेरी बहन के पास रहने आई है?'
'हाँ, वही। अभी दौड़ते हुए मिली थी।'
'उसकी शादी तो प्रसाद से होने वाली है।'
'हाँ, वह भी मिला था। उसे मालूम है कि सरला और मैं शादी करने वाले थे। वह मुझे धमकी भी दे रहा था। कैसा आदमी है यह प्रसाद?' प्रेमाशिष ने पूछा।
'यार, आदमी तो वह ठीक ही था। पर सरला के साथ उसका रवैया किसी की समझ में नहीं आ रहा है। यह सबको मालूम है कि सरला उससे बहुत चिढ़ती है। पर वह सबसे यही कहता फिरता है कि उसकी शादी सरला से होने वाली है। पर उसकी ऐसी-तैसी। तुम्हारा अनादर करने का अधिकार नहीं है उसे।'
'मैं कह रहा था न कि मेरी तो किस्मत ही खराब है।'
'अब इतने दीन भी मत बनो। सरला के मामले में तो मैं कुछ नहीं कर सकता, हाँ, तुम्हारी रोजी-रोटी की समस्या हल हो सकती है, अगर तुम मेरी साझेदारी वाली बात मान लो तो। पहले मानी होती तो अभी तक हम दोनों मालामाल हो गये होते। अब भी देर नहीं हुई है।'
'ठीक है, आज से तुम्हारी और मेरी साझेदारी। तुम कागज तैयार करो और मैं गाँव का मकान बेच कर रुपयों का बंदोबस्त करता हूँ।'
'यह हुई न बात। इसी बात पर मिठाई खाई जाय।'
'खा लेंगे मिठाई भी।'
'अरे तुमने इतना बड़ा निर्णय लिया है, कुछ तो मूड ठीक करो। यह क्या मुँह लटकाए बैठे हो?'
'यह मुँह तो अब जीवन भर लटका ही रहेगा।' प्रेमाशिष ने कहा।
इतने में मदन की माँ ने आकर उन दोनों को याद दिलाया कि विनोद के यहाँ जाना है।
'अरे बाप रे! मैं तो भूल ही गया। तुमको विनोद की याद है न। अरे, वही मोटा, जिससे तुम पिछली बार मिले थे। मैंने तुम्हारे आने के बारे में कहा तो उसने हमें अभी नाश्ते पर बुलाया है।' मदन ने कहा।
'यहाँ की बस यही बात मुझे पसंद नहीं आती है। बात-बेबात में पार्टियाँ।' प्रेमाशिष ने कहा।
'मिलने का कोई तो बहाना चाहिए। फिर हमारी इस छोटी सी पार्क की दुनिया में मनोरंजन का दूसरा साधन भी तो नहीं है। चलो, जल्दी तैयार हो जाओ। आज मैं तुम्हें एक विशेष व्यक्ति से भी मिलवाऊँगा। पहले तुम अपनी यह मुहर्रमी सूरत ठीक कर लो। मुझे लगता है कि तुम सरला वाली घटना का कुछ अधिक ही असर ले रहे हो। तुम्हारा तो सिद्धांत रहा कि तू नहीं और सही, और नहीं और सही।'
'नहीं मदन, सरला के साथ वह बात नहीं है।'
'तुमने बताया नहीं कि सरला ने संबंध क्यों तोड़ा?' मदन ने पूछा।
'गलतफहमी में। तुम निशा को जानते हो न?' प्रेमाशिष ने पूछा।
'हाँ, वही लड़की न, जो तुम्हारे पड़ोस में रहती है?'
'हाँ वही।'
'तुम्हारी भूतपूर्व।'
'हाँ, वही। एक जमाने में वह सोचती थी कि वह मुझसे प्यार करती है। खैर, उस दौर से वह कभी की निकल चुकी है। अभी वह एक परिपक्व युवा महिला है। अब हम दोनों में साधारण दोस्ती है। मुझे लगता है कि किसी ने सरला को इस दोस्ती के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर बता रखा है। सरला के बार-बार तिक-तिक करने पर मैंने उसे बताया कि कोई ऐसी-वैसी बात नहीं है। मैंने उससे वादा भी कर लिया कि मैं कभी निशा से नहीं मिलूँगा।' प्रेमाशिष ने कहा। फिर उसने लंबी साँस ली और आगे कहना आरंभ किया,
'उसके बाद एक दिन निशा अपनी सहेली रत्ना को लेकर मेरे घर आई। दोनों का पिक्चर का प्रोग्राम था। वे मेरे लिये भी टिकट लेती आई थीं। मुझे मना करते नहीं बन पड़ा। मना करने का कोई कारण भी नहीं था। ऐसी-वैसी बात तो थी नहीं। बदकिस्मती यह कि उसी हाल में सरला भी अपनी एक सहेली के साथ पिक्चर देखने आई थी। दो और दो मिला कर उसने बाईस बना डाला और मेरी अँगूठी वापस कर दी।'
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अभी और है। आगे कल शाम तक
Wednesday, March 23, 2011
प्रेमिका संवाद -2
प्रेमिका संवाद -2
'सरला, तुम यहाँ!' उसने कहा।
'यहाँ मेरी चचेरी बहन रहती है। मैं उसी के पास आई हूँ। तुम यहाँ कैसे?' सरला ने पूछा। उसने सोचा था कि उसने अपने ऊपर काबू पा लिया है। कितनी भूल कर रही थी वह। प्रेम को देखते ही वह प्रेम विह्वल हो उठी है। क्यों आया है प्रेम यहाँ? यदि प्रेम इसी तरह उसे हर गली-नुक्कड़ पर मिलता रहेगा तो कैसे वह उसे अपने जीवन से दूर कर पायेगी। दूर तो उसे रहना ही था। उसे पूरा विश्वास था कि उसका निर्णय उचित है। प्रेमाशिष जैसे दिलफैंक व्यक्ति के साथ रह कर बार-बार मरने से तो यही अच्छा था कि जी कड़ा कर के उसके जीवन से ही दूर चले जाओ। पर प्रेम ऐसा भी तो नहीं करने दे रहा है।
'मैं अपने मित्र मदन के यहाँ कुछ दिन रहने आया हूँ। तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी याद...'
'प्रेम, अब ऐसी बातें मत करो।' उसे बीच में ही रोक कर सरला ने कहा।
इतने में, जिस ओर से सरला दौड़ कर आई थी, उसी ओर से एक व्यक्ति बड़े कष्ट से दौड़ता हुआ उनके पास पहुँचा। और मुँह खोल कर हाँफने लगा। वह एक साधारण कद का दुबला-पतला व्यक्ति था। गालों की हड्डियाँ आगे को आयी हुई थीं, जिससे आँखें धँसी हुई प्रतीत होती थीं। वह बोलने योग्य हुआ तो उसने कहा,
'तुम बहुत तेज दौड़ती हो सरो। मैं तो हाँफते-हाँफते बेहाल हो गया।'
'मैंने तुम्हें साथ दौड़ने के लिये तो नहीं कहा था, प्रसाद।' सरला ने कहा।
'यह कौन है?' उसने प्रेम की ओर देखते हुए पूछा।
'मेरे मित्र हैं प्रेमाशिष। प्रेमाशिष, इनसे मिलो, इनका नाम है प्रसाद।' सरला ने परिचय कराया।
'मित्र?' प्रसाद ने कहा।
'क्यों क्या तुम्हें कोई आपत्ति है?' सरला ने प्रसाद को घूरते हुए ऊँची आवाज में कहा।
'नहीं-नहीं मुझे कोई आपत्ति नहीं है।' प्रसाद ने जल्दी से कहा।
'अच्छा प्रेम, नमस्ते।' कह कर सरला ने हाथ जोड़े और दौड़ती हुई आगे निकल गई।
सरला के जाने के बाद प्रसाद ने प्रेमाशिष को घूरा और कई क्षणों तक घूरता रहा। प्रेमाशिष को समझ नहीं आया, कि वह प्रसाद का क्या बनाये अर्थात् उसे किस शीर्षक के नीचे ले, शत्रु,मित्र या तटस्थ। हालाँकि सरला ने उससे संबंध विच्छेद कर लिया था। अँगूठी वापस करके किसी प्रकार की आशा की कोई गुंजाइश नहीं रखी थी। फिर भी उसे आशा थी क्योंकि उसका प्यार सच्चा था और उसका मन निर्मल। सरला से मिल कर अभी उसने अपनी नीति निर्धारित कर ली कि, सरला को रिझाओ। यह भी आवश्यक हो गया था कि वह सरला से मिलने-जुलने वाले लोगों के साथ कूटनीति का सहारा ले कर अच्छा व्यवहार रखे। प्रसाद में ऐसी कोई बात नहीं थी जो लोगों को उसके प्रति अच्छे व्यवहार के लिये उकसाए। दुबला-पतला शरीर, गोरे कव्वे-सा चेहरा और खनकती आवाज। ऊपर से तुरर्ा यह कि वह उसे फिल्मी खलनायक के अंदाज में घूर रहा था। खलनायक के अंदाज में ही उसने कहा,
'तुम्हारे बारे में सुन चुका हूँ। सरला ने तुमको तुम्हारी दो टके की अँगूठी वापस कर दी है। अब क्या लेने आये हो?'
प्रेमाशिष इस आकस्मिक हमले के लिये तैयार नहीं था। वह मुँह बाये प्रसाद को देखता रहा।
'देखो, सरला और मेरे खानदान में कई पीढ़ियों से संबंध है। सरला की शादी मेरे साथ होने वाली है। मैं तुमको आगाह किये देता हूँ, कोई ऐसी बेवकूफी मत करना जो तुम्हारे स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हो।' इतना कह कर प्रसाद अकड़ कर उसी ओर चला गया जिस ओर सरला गई थी।
प्रेमाशिष का दिल तो किया कि वह प्रसाद की जबान खींच कर, उसी के हाथ में रख कर, उससे पूछे कि अब बोलो क्या बोलते हो? पर वह अपनी ही निर्धारित की हुई नीति के अनुसार आचरण करने के लिये वाध्य था। वह भी वहॉ से उठ कर जाने की सोच ही रहा था कि उसने देखा एक सुंदर, सुडौल, लड़की दौड़ती हुई उसी की ओर आ रही थी। दौड़ने के श्रम से उसकी साँस तेज चल रही थी तथा उसके चेहरे पर लालिमा छलक आई थी। वह उसकी ओर देख कर मुस्कराई और मुस्कराते हुए आगे निकल गई।
सुबह-सुबह तरुणाई की अरुणाई लिये जब कोई सुंदर चेहरा दिख जाय तो जीवन में कड़ुवाहट के लिये कोई स्थान नहीं रह जाता है। जीवन के प्रति लगाव बढ़ जाता है। किसी शायर ने कितना गलत कहा है कि अच्छी सूरत पर लोग बुरी नजर ही डालते हैं। यह कहना गलत होगा कि प्रेमाशिष बहुत प्रसन्नचित्त हो कर घर की ओर गया। हाँ, यह कहा जा सकता है कि प्रसाद ने उसके मन में जो कड़ुआहट घोल दी थी, सुंदर तरुणी की आकर्षक मुस्कान ने उसका असर कम कर दिया था।
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अभी और है। आगे कल शाम तक
'सरला, तुम यहाँ!' उसने कहा।
'यहाँ मेरी चचेरी बहन रहती है। मैं उसी के पास आई हूँ। तुम यहाँ कैसे?' सरला ने पूछा। उसने सोचा था कि उसने अपने ऊपर काबू पा लिया है। कितनी भूल कर रही थी वह। प्रेम को देखते ही वह प्रेम विह्वल हो उठी है। क्यों आया है प्रेम यहाँ? यदि प्रेम इसी तरह उसे हर गली-नुक्कड़ पर मिलता रहेगा तो कैसे वह उसे अपने जीवन से दूर कर पायेगी। दूर तो उसे रहना ही था। उसे पूरा विश्वास था कि उसका निर्णय उचित है। प्रेमाशिष जैसे दिलफैंक व्यक्ति के साथ रह कर बार-बार मरने से तो यही अच्छा था कि जी कड़ा कर के उसके जीवन से ही दूर चले जाओ। पर प्रेम ऐसा भी तो नहीं करने दे रहा है।
'मैं अपने मित्र मदन के यहाँ कुछ दिन रहने आया हूँ। तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी याद...'
'प्रेम, अब ऐसी बातें मत करो।' उसे बीच में ही रोक कर सरला ने कहा।
इतने में, जिस ओर से सरला दौड़ कर आई थी, उसी ओर से एक व्यक्ति बड़े कष्ट से दौड़ता हुआ उनके पास पहुँचा। और मुँह खोल कर हाँफने लगा। वह एक साधारण कद का दुबला-पतला व्यक्ति था। गालों की हड्डियाँ आगे को आयी हुई थीं, जिससे आँखें धँसी हुई प्रतीत होती थीं। वह बोलने योग्य हुआ तो उसने कहा,
'तुम बहुत तेज दौड़ती हो सरो। मैं तो हाँफते-हाँफते बेहाल हो गया।'
'मैंने तुम्हें साथ दौड़ने के लिये तो नहीं कहा था, प्रसाद।' सरला ने कहा।
'यह कौन है?' उसने प्रेम की ओर देखते हुए पूछा।
'मेरे मित्र हैं प्रेमाशिष। प्रेमाशिष, इनसे मिलो, इनका नाम है प्रसाद।' सरला ने परिचय कराया।
'मित्र?' प्रसाद ने कहा।
'क्यों क्या तुम्हें कोई आपत्ति है?' सरला ने प्रसाद को घूरते हुए ऊँची आवाज में कहा।
'नहीं-नहीं मुझे कोई आपत्ति नहीं है।' प्रसाद ने जल्दी से कहा।
'अच्छा प्रेम, नमस्ते।' कह कर सरला ने हाथ जोड़े और दौड़ती हुई आगे निकल गई।
सरला के जाने के बाद प्रसाद ने प्रेमाशिष को घूरा और कई क्षणों तक घूरता रहा। प्रेमाशिष को समझ नहीं आया, कि वह प्रसाद का क्या बनाये अर्थात् उसे किस शीर्षक के नीचे ले, शत्रु,मित्र या तटस्थ। हालाँकि सरला ने उससे संबंध विच्छेद कर लिया था। अँगूठी वापस करके किसी प्रकार की आशा की कोई गुंजाइश नहीं रखी थी। फिर भी उसे आशा थी क्योंकि उसका प्यार सच्चा था और उसका मन निर्मल। सरला से मिल कर अभी उसने अपनी नीति निर्धारित कर ली कि, सरला को रिझाओ। यह भी आवश्यक हो गया था कि वह सरला से मिलने-जुलने वाले लोगों के साथ कूटनीति का सहारा ले कर अच्छा व्यवहार रखे। प्रसाद में ऐसी कोई बात नहीं थी जो लोगों को उसके प्रति अच्छे व्यवहार के लिये उकसाए। दुबला-पतला शरीर, गोरे कव्वे-सा चेहरा और खनकती आवाज। ऊपर से तुरर्ा यह कि वह उसे फिल्मी खलनायक के अंदाज में घूर रहा था। खलनायक के अंदाज में ही उसने कहा,
'तुम्हारे बारे में सुन चुका हूँ। सरला ने तुमको तुम्हारी दो टके की अँगूठी वापस कर दी है। अब क्या लेने आये हो?'
प्रेमाशिष इस आकस्मिक हमले के लिये तैयार नहीं था। वह मुँह बाये प्रसाद को देखता रहा।
'देखो, सरला और मेरे खानदान में कई पीढ़ियों से संबंध है। सरला की शादी मेरे साथ होने वाली है। मैं तुमको आगाह किये देता हूँ, कोई ऐसी बेवकूफी मत करना जो तुम्हारे स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हो।' इतना कह कर प्रसाद अकड़ कर उसी ओर चला गया जिस ओर सरला गई थी।
प्रेमाशिष का दिल तो किया कि वह प्रसाद की जबान खींच कर, उसी के हाथ में रख कर, उससे पूछे कि अब बोलो क्या बोलते हो? पर वह अपनी ही निर्धारित की हुई नीति के अनुसार आचरण करने के लिये वाध्य था। वह भी वहॉ से उठ कर जाने की सोच ही रहा था कि उसने देखा एक सुंदर, सुडौल, लड़की दौड़ती हुई उसी की ओर आ रही थी। दौड़ने के श्रम से उसकी साँस तेज चल रही थी तथा उसके चेहरे पर लालिमा छलक आई थी। वह उसकी ओर देख कर मुस्कराई और मुस्कराते हुए आगे निकल गई।
सुबह-सुबह तरुणाई की अरुणाई लिये जब कोई सुंदर चेहरा दिख जाय तो जीवन में कड़ुवाहट के लिये कोई स्थान नहीं रह जाता है। जीवन के प्रति लगाव बढ़ जाता है। किसी शायर ने कितना गलत कहा है कि अच्छी सूरत पर लोग बुरी नजर ही डालते हैं। यह कहना गलत होगा कि प्रेमाशिष बहुत प्रसन्नचित्त हो कर घर की ओर गया। हाँ, यह कहा जा सकता है कि प्रसाद ने उसके मन में जो कड़ुआहट घोल दी थी, सुंदर तरुणी की आकर्षक मुस्कान ने उसका असर कम कर दिया था।
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अभी और है। आगे कल शाम तक
प्रेमिका संवाद
प्रेमिका संवाद ( कहानी - मथुरा कलौनी )
मार्च का महीना था। आम के पेड़ों में बौर आ चुका था। जिस सड़क पर प्रेमाशिष दौड़ रहा था, उसके दोनों ओर आम के पेड़ थे। रस टपकने से ऐसा लग रहा था जैसे सड़क पर शहद से छिड़काव किया गया हो। प्रेमाशिष के जूते चिट-चिट कर रहे थे। दौड़ते-दौड़ते वह हाँफ गया तो सुस्ताने के लिये सड़क के किनारे बने एक सिमेंट के बेंच पर बैठ गया। गंगा किनारे धरती पर कछुए के कूबड़ जैसे टीले पर यह पार्क बना हुआ था। चार किलोमीटर परिधि के घेरे में इसकी अपनी अलग ही दुनिया थी। जिस सड़क के किनारे वह बैठा हुआ था, वह पार्क की मुख्य सड़क थी। सड़क के दोनों ओर सुंदर उद्यानों के बीच मकान बने हुए थे। मकानों के नाम भी बड़े मनभावन थे जैसे शांति निकेतन, फूल गाँव, पेड़ों वाला घर इत्यादि। फूल गाँव, जैसा कि नाम से प्रतीत होता है, फूलों के उद्यानों से घिरा हुआ घर था जो प्रेमाशिष के मित्र मदन का था। प्रेमाशिष आजकल मदन के साथ रह रहा था।
उसने सोचा था घर से दूर, मदन के साथ उसका दिल बहल जायेगा, पर ऐसा नहीं हो पा रहा था। यहाँ के शस्य श्यामल सुरम्य वातावरण में उसे अपनी भूतपूर्व प्रेमिका की याद बार-बार आ रही थी। जो प्रेमाशिष को जानते हैं उनके लिये स्पष्ट किया जाता है कि जिस भूतपूर्व प्रेमिका की याद उसे सता रही थी उसका नाम सरला है। उसी के प्रेम में घायल प्रेमाशिष सोच रहा था कि छोटी-सी यह दुनिया, पहचाने रास्ते हैं, तुम कभी तो मिलोगे तब पूछेंगे कि कुमारी सरला क्या मिल गया आपको हमारा प्यार ठुकरा कर?
मदन के पास आने का दूसरा और मुख्य कारण था जीविकोपार्जन का कुछ ठोस और स्थाई कार्यक्रम बनाना। नौकरी उसे मिल नहीं रही थी। किसी ख्यातिप्राप्त अच्छी कंपनी में अच्छी नौकरी के लिये पचपन प्रतिशत अंकों से पास की हुई उसकी बी.ए. की डिग्री यथेष्ट नहीं थी। सरकारी नौकरी के लिये न तो वह किसी आरक्षित कोटे में आता था और न उसकी वंशावली उपयुक्त थी। अभी तो वह कभी किसी शोरूम में, कभी किसी स्टोर में और कभी किसी परचून की दुकान में काम करके अपने जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ा रहा था।
सरला थी तो आशा और विश्वास था कि यह करेंगे वह करेंगे, पर जब उसने संबंध विच्छेद कर दिया तो उसके साथ सारा उत्साह जाता रहा। चूँकि उत्साह नहीं था इसलिए अब वह बहुत कुछ नहीं कर सकता था, पर नून तेल का कुछ न कुछ समाधान तो हो ही जाना चाहिए। रोज-रोज की झिक-झिक किसे पसंद है। प्रेमिका विहीन जीवन की आवश्यकताएँ ही कितनी, पर इस महँगाई में वे भी भारी पड़ रही थीं।
सुबह की शीतल स्वच्छ बयार पेड़ों पर सरसरा कर बह रही थी। चिड़ियाँ अपनी दिनचर्या में जुट चुकी थीं। यहाँ शांति की अनुभूति इतनी थी कि हवा की सरसराहट और चिड़ियों की चहचहाहट के ऊपर वह अपने हृदय की गति भी सुन पा रहा था। थप..थप..थप..थप।
यह क्या, थप-थप की आवाज तेज होती चली जा रही थी। अब वह दाहिनी ओर से आ रही थी। धत् तेरे की। यहाँ खामोशी में किसी के दौड़ने की आवाज को वह अपने दिल की धड़कन समझ बैठा था। दौड़ने वाली एक लड़की थी जो उसी की ओर आ रही थी। उसने लक्ष्य किया कि वह बहुत कुछ सरला से मिलती थी। उसने ट्रैक सूट भी ठीक वैसा ही पहन रखा था जैसा सरला के पास था। सफेद धारियों वाला गहरे नीले रंग का ट्रैक सूट। कद काठी और दौड़ने का अंदाज सब सरला जैसे ही थे।
प्रेमाशिष अपने ऊपर हँस कर दूसरी ओर देखने लगा। सावन के अंधे को सब हरा ही सूझता है। सरला की चाहत में उसकी कल्पना यथार्थ पर हावी हो रही थी। जब लड़की उसके पास पहुँची तो वह ठिठक गई। उसने उसे उसका नाम लेकर पुकारा, 'प्रेम!'
प्रेमाशिष ने जब उस लड़की को पास से देखा तो उसे मालूम हुआ कि वह क्यों सरला जैसी दिख रही थी। वह स्वयं सरला ही थी।
अभी और है। आगे कल शाम तक
मार्च का महीना था। आम के पेड़ों में बौर आ चुका था। जिस सड़क पर प्रेमाशिष दौड़ रहा था, उसके दोनों ओर आम के पेड़ थे। रस टपकने से ऐसा लग रहा था जैसे सड़क पर शहद से छिड़काव किया गया हो। प्रेमाशिष के जूते चिट-चिट कर रहे थे। दौड़ते-दौड़ते वह हाँफ गया तो सुस्ताने के लिये सड़क के किनारे बने एक सिमेंट के बेंच पर बैठ गया। गंगा किनारे धरती पर कछुए के कूबड़ जैसे टीले पर यह पार्क बना हुआ था। चार किलोमीटर परिधि के घेरे में इसकी अपनी अलग ही दुनिया थी। जिस सड़क के किनारे वह बैठा हुआ था, वह पार्क की मुख्य सड़क थी। सड़क के दोनों ओर सुंदर उद्यानों के बीच मकान बने हुए थे। मकानों के नाम भी बड़े मनभावन थे जैसे शांति निकेतन, फूल गाँव, पेड़ों वाला घर इत्यादि। फूल गाँव, जैसा कि नाम से प्रतीत होता है, फूलों के उद्यानों से घिरा हुआ घर था जो प्रेमाशिष के मित्र मदन का था। प्रेमाशिष आजकल मदन के साथ रह रहा था।
उसने सोचा था घर से दूर, मदन के साथ उसका दिल बहल जायेगा, पर ऐसा नहीं हो पा रहा था। यहाँ के शस्य श्यामल सुरम्य वातावरण में उसे अपनी भूतपूर्व प्रेमिका की याद बार-बार आ रही थी। जो प्रेमाशिष को जानते हैं उनके लिये स्पष्ट किया जाता है कि जिस भूतपूर्व प्रेमिका की याद उसे सता रही थी उसका नाम सरला है। उसी के प्रेम में घायल प्रेमाशिष सोच रहा था कि छोटी-सी यह दुनिया, पहचाने रास्ते हैं, तुम कभी तो मिलोगे तब पूछेंगे कि कुमारी सरला क्या मिल गया आपको हमारा प्यार ठुकरा कर?
मदन के पास आने का दूसरा और मुख्य कारण था जीविकोपार्जन का कुछ ठोस और स्थाई कार्यक्रम बनाना। नौकरी उसे मिल नहीं रही थी। किसी ख्यातिप्राप्त अच्छी कंपनी में अच्छी नौकरी के लिये पचपन प्रतिशत अंकों से पास की हुई उसकी बी.ए. की डिग्री यथेष्ट नहीं थी। सरकारी नौकरी के लिये न तो वह किसी आरक्षित कोटे में आता था और न उसकी वंशावली उपयुक्त थी। अभी तो वह कभी किसी शोरूम में, कभी किसी स्टोर में और कभी किसी परचून की दुकान में काम करके अपने जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ा रहा था।
सरला थी तो आशा और विश्वास था कि यह करेंगे वह करेंगे, पर जब उसने संबंध विच्छेद कर दिया तो उसके साथ सारा उत्साह जाता रहा। चूँकि उत्साह नहीं था इसलिए अब वह बहुत कुछ नहीं कर सकता था, पर नून तेल का कुछ न कुछ समाधान तो हो ही जाना चाहिए। रोज-रोज की झिक-झिक किसे पसंद है। प्रेमिका विहीन जीवन की आवश्यकताएँ ही कितनी, पर इस महँगाई में वे भी भारी पड़ रही थीं।
सुबह की शीतल स्वच्छ बयार पेड़ों पर सरसरा कर बह रही थी। चिड़ियाँ अपनी दिनचर्या में जुट चुकी थीं। यहाँ शांति की अनुभूति इतनी थी कि हवा की सरसराहट और चिड़ियों की चहचहाहट के ऊपर वह अपने हृदय की गति भी सुन पा रहा था। थप..थप..थप..थप।
यह क्या, थप-थप की आवाज तेज होती चली जा रही थी। अब वह दाहिनी ओर से आ रही थी। धत् तेरे की। यहाँ खामोशी में किसी के दौड़ने की आवाज को वह अपने दिल की धड़कन समझ बैठा था। दौड़ने वाली एक लड़की थी जो उसी की ओर आ रही थी। उसने लक्ष्य किया कि वह बहुत कुछ सरला से मिलती थी। उसने ट्रैक सूट भी ठीक वैसा ही पहन रखा था जैसा सरला के पास था। सफेद धारियों वाला गहरे नीले रंग का ट्रैक सूट। कद काठी और दौड़ने का अंदाज सब सरला जैसे ही थे।
प्रेमाशिष अपने ऊपर हँस कर दूसरी ओर देखने लगा। सावन के अंधे को सब हरा ही सूझता है। सरला की चाहत में उसकी कल्पना यथार्थ पर हावी हो रही थी। जब लड़की उसके पास पहुँची तो वह ठिठक गई। उसने उसे उसका नाम लेकर पुकारा, 'प्रेम!'
प्रेमाशिष ने जब उस लड़की को पास से देखा तो उसे मालूम हुआ कि वह क्यों सरला जैसी दिख रही थी। वह स्वयं सरला ही थी।
अभी और है। आगे कल शाम तक
Sunday, March 13, 2011
हम मिले
छिटकी हुई चांदनी में दहकती सी साँसें हैं
अनछुए से अहसाह हैं अनकही सी बातें हैं
द्रवित से मन हैं पिघले से अभिमान हैं
बिंधे-बिंधे से हम हैं टूटे-टूटे से संयम हैं।
चहकती भोर को दो महकते बदन मिले
कोने में दुबके हुए समाज के नियम मिले
अनछुए से अहसाह हैं अनकही सी बातें हैं
द्रवित से मन हैं पिघले से अभिमान हैं
बिंधे-बिंधे से हम हैं टूटे-टूटे से संयम हैं।
चहकती भोर को दो महकते बदन मिले
कोने में दुबके हुए समाज के नियम मिले
- मथुरा कलौनी
Monday, March 7, 2011
हिन्दी
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥
अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन॥
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥
अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन॥
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
Thursday, September 30, 2010
मगनखोला
मैं आया था यहाँ चुपके चुपके
अपनी ही भूमि पर
एक नितांत अजनबी की तरह
कई गाँठों वाली यादों की डोर से
अपना बचपन बाँध कर ले जाने के लिये।
मैं दस साल का था जब मैंने अपना गाँव छोड़ा था। उस समय गाँव की आबादी लगभग 40 थी, जिसमें से लगभग 10 जने फौज में या रोजी रोटी के चक्कर में बाहर रहते थे। साल-दो-साल में छुट्टी आते थे।
मगनखोला की बाईं ओर छोटा गाँव नवगाँव है जो मगनखोला से तो बड़ा ही है और दाहिनी ओर बड़ा गाँव बुडलगाँव है।
हमारा परिवार कलकत्ते जा कर बस गया था। गाँव से संबंध रहता ही था। चिट्ठी-पत्री चलती ही थी। पिता जी रिटायर होने के बाद गाँव में रहने आये थे। एक साल से अधिक नहीं रह पाये। खेती-बाड़ी नहीं कर सकते थे। सुविधाहीन पहाड़ी कठिन जीवन था। करने को कुछ था नहीं। पेन्शन के पैसों से सामान लाकर उस पहाड़ पर खाते थे। फिर साहस कर पिथैरागढ़ में रेस्तराँ खोला। तब का जमाना था। रेस्तराँ चला नहीं। अंत में तराई में घर बना कर वहीं रहने आये तो फिर गाँव का मुँह नहीं देखा। हम बाकी लोग तो बाहर ही बस गये थे। पहाड़ जाने के नाम पर पिथौरागढ़ में ही रुक जाते थे। कभी एक दिन के लिये कभी गाँव भी हो आते।
लगभग यही हाल मगनखोला के अन्य परिवारों का था। देखते देखते गाँव खाली हो गया। और अब तो उजाड़ है।

कुछ साल पहले जब मैं मगनखोला गया था तो यह दृश्य देखा और कैमरे में कैद कर लिया।
ये तीन औरतें, करीब तीन सालों से अकेली मगनखोला में रह रहीं थी। बाएँ वाली रिश्ते में मेरी भाभी लगती हैं।
बीच की लड़की बोल नहीं पाती है, गूँगी है। प्यार से सब उसे लाटी बुलाते हैं। साथ कहने को जग्गू नाम का कुत्ता था। एक रात को बाघ आया। किसी तरह उन तीनों ने अपनी जान बचाई पर जग्गू को नहीं बचा पाये। उसे बाघ ले गया था। और अगले दिन ही उन तीनों ने गाँव छोड़ दिया था।


लाटी पेड़ पर चढ़ी हुई है मेरे लिये नारंगी तोड़ रही है।
यह पिछले साल का चित्र है। वही जगह है, अब यहाँ कोई नहीं रहता है।


घर के सामने की खुली जगह को खाला बोलते हैं। इसी खाला में मेरा बचपन बीता था। यहाँ पर त्यौहारों में और खुशी के अवसरों पर खेल (कुमाऊँनी झोड़ा, सामूहिक नाच) होते थे।
इसी खाला में मैंने पहली बार तिब्बती लामा को देखा था। हमें बचपन में डराया जाता था कि ढंग से रहो नहीं तो लामा अपनी झोली में डाल कर ले जाएगा। इसी खाला में हुड़क्या हुड़क्यानि का नाच भी देखा था।
अखरोट का पेड़। इसके अखरोट हाथ से हलका दबाते ही टूट जाते हैं। अब भी नवगाँव के लोग आते हैं और पुराने दिनों को याद करते हुए अखरोट ले जाते हैं।

गाँव के पास से काली नदी का दृश्य।
मगनखोला का मंदिर। भरे-पूरे दिनों में यहॉं शादी व्याह में लंगर लगते थे।


गाँव की एक ओर जानवरों के रहने के लिये खर्क थे। सब के सभी खर्क अब गिर चुके हैं। खर्क की सीढ़ियों से हिमालय का दृश्य अभी तक याद है।
बीते दिनों को पकड़ने की चेष्टा की
पर गहन सन्नाटे को भेद नहीं पाया
साँसों की आवाज ने चौंकाया
अंदर ही अंदर क्या कुछ फूटा पता नहीं
क्यों हुईं आँखें नम पता नहीं
अब यहाँ कोई नहीं रहता।
अब यहाँ कोई नहीं आता।
यहाँ मेरा बचपन बीता था।
अपनी ही भूमि पर
एक नितांत अजनबी की तरह
कई गाँठों वाली यादों की डोर से
अपना बचपन बाँध कर ले जाने के लिये।
मैं दस साल का था जब मैंने अपना गाँव छोड़ा था। उस समय गाँव की आबादी लगभग 40 थी, जिसमें से लगभग 10 जने फौज में या रोजी रोटी के चक्कर में बाहर रहते थे। साल-दो-साल में छुट्टी आते थे।
मगनखोला की बाईं ओर छोटा गाँव नवगाँव है जो मगनखोला से तो बड़ा ही है और दाहिनी ओर बड़ा गाँव बुडलगाँव है।
हमारा परिवार कलकत्ते जा कर बस गया था। गाँव से संबंध रहता ही था। चिट्ठी-पत्री चलती ही थी। पिता जी रिटायर होने के बाद गाँव में रहने आये थे। एक साल से अधिक नहीं रह पाये। खेती-बाड़ी नहीं कर सकते थे। सुविधाहीन पहाड़ी कठिन जीवन था। करने को कुछ था नहीं। पेन्शन के पैसों से सामान लाकर उस पहाड़ पर खाते थे। फिर साहस कर पिथैरागढ़ में रेस्तराँ खोला। तब का जमाना था। रेस्तराँ चला नहीं। अंत में तराई में घर बना कर वहीं रहने आये तो फिर गाँव का मुँह नहीं देखा। हम बाकी लोग तो बाहर ही बस गये थे। पहाड़ जाने के नाम पर पिथौरागढ़ में ही रुक जाते थे। कभी एक दिन के लिये कभी गाँव भी हो आते।
लगभग यही हाल मगनखोला के अन्य परिवारों का था। देखते देखते गाँव खाली हो गया। और अब तो उजाड़ है।

कुछ साल पहले जब मैं मगनखोला गया था तो यह दृश्य देखा और कैमरे में कैद कर लिया।
ये तीन औरतें, करीब तीन सालों से अकेली मगनखोला में रह रहीं थी। बाएँ वाली रिश्ते में मेरी भाभी लगती हैं।
बीच की लड़की बोल नहीं पाती है, गूँगी है। प्यार से सब उसे लाटी बुलाते हैं। साथ कहने को जग्गू नाम का कुत्ता था। एक रात को बाघ आया। किसी तरह उन तीनों ने अपनी जान बचाई पर जग्गू को नहीं बचा पाये। उसे बाघ ले गया था। और अगले दिन ही उन तीनों ने गाँव छोड़ दिया था।


लाटी पेड़ पर चढ़ी हुई है मेरे लिये नारंगी तोड़ रही है।
यह पिछले साल का चित्र है। वही जगह है, अब यहाँ कोई नहीं रहता है।


घर के सामने की खुली जगह को खाला बोलते हैं। इसी खाला में मेरा बचपन बीता था। यहाँ पर त्यौहारों में और खुशी के अवसरों पर खेल (कुमाऊँनी झोड़ा, सामूहिक नाच) होते थे।
इसी खाला में मैंने पहली बार तिब्बती लामा को देखा था। हमें बचपन में डराया जाता था कि ढंग से रहो नहीं तो लामा अपनी झोली में डाल कर ले जाएगा। इसी खाला में हुड़क्या हुड़क्यानि का नाच भी देखा था।
अखरोट का पेड़। इसके अखरोट हाथ से हलका दबाते ही टूट जाते हैं। अब भी नवगाँव के लोग आते हैं और पुराने दिनों को याद करते हुए अखरोट ले जाते हैं।

गाँव के पास से काली नदी का दृश्य।
मगनखोला का मंदिर। भरे-पूरे दिनों में यहॉं शादी व्याह में लंगर लगते थे।


गाँव की एक ओर जानवरों के रहने के लिये खर्क थे। सब के सभी खर्क अब गिर चुके हैं। खर्क की सीढ़ियों से हिमालय का दृश्य अभी तक याद है।
बीते दिनों को पकड़ने की चेष्टा की
पर गहन सन्नाटे को भेद नहीं पाया
साँसों की आवाज ने चौंकाया
अंदर ही अंदर क्या कुछ फूटा पता नहीं
क्यों हुईं आँखें नम पता नहीं
अब यहाँ कोई नहीं रहता।
अब यहाँ कोई नहीं आता।
यहाँ मेरा बचपन बीता था।
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