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Sunday, March 13, 2011

हम मिले

छिटकी हुई चांदनी में दहकती सी साँसें हैं
अनछुए से अहसाह हैं अनकही सी बातें हैं
द्रवित से मन हैं पिघले से अभिमान हैं
बिंधे-बिंधे से हम हैं टूटे-टूटे से संयम हैं।
 चहकती भोर को दो महकते बदन मिले
कोने में दुबके हुए समाज के नियम मिले 
 - मथुरा कलौनी

Thursday, September 30, 2010

मगनखोला

मैं आया था यहाँ चुपके चुपके
अपनी ही भूमि पर
एक नितांत अजनबी की तरह
कई गाँठों वाली यादों की डोर से
अपना बचपन बाँध कर ले जाने के लिये।

मैं दस साल का था जब मैंने अपना गाँव छोड़ा था। उस समय गाँव की आबादी लगभग 40 थी, जिसमें से लगभग 10 जने फौज में या रोजी रोटी के चक्कर में बाहर रहते थे। साल-दो-साल में छुट्टी आते थे।

मगनखोला की बाईं ओर छोटा गाँव नवगाँव है जो मगनखोला से तो बड़ा ही है और दाहिनी ओर बड़ा गाँव बुडलगाँव है।

हमारा परिवार कलकत्ते जा कर बस गया था। गाँव से संबंध रहता ही था। चिट्ठी-पत्री चलती ही थी। पिता जी रिटायर होने के बाद गाँव में रहने आये थे। एक साल से अधिक नहीं रह पाये। खेती-बाड़ी नहीं कर सकते थे। सुविधाहीन पहाड़ी कठिन जीवन था। करने को कुछ था नहीं। पेन्शन के पैसों से सामान लाकर उस पहाड़ पर खाते थे। फिर साहस कर पिथैरागढ़ में रेस्तराँ खोला। तब का जमाना था। रेस्तराँ चला नहीं। अंत में तराई में घर बना कर वहीं रहने आये तो फिर गाँव का मुँह नहीं देखा। हम बाकी लोग तो बाहर ही बस गये थे। पहाड़ जाने के नाम पर पिथौरागढ़ में ही रुक जाते थे। कभी एक दिन के लिये कभी गाँव भी हो आते।

लगभग यही हाल मगनखोला के अन्य परिवारों का था। देखते देखते गाँव खाली हो गया। और अब तो उजाड़ है।




कुछ साल पहले जब मैं मगनखोला गया था तो यह दृश्‍य देखा और कैमरे में कैद कर लिया।
ये तीन औरतें, करीब तीन सालों से अकेली मगनखोला में रह रहीं थी। बाएँ वाली रिश्ते में मेरी भाभी लगती हैं।
बीच की लड़की बोल नहीं पाती है, गूँगी है। प्यार से सब उसे लाटी बुलाते हैं। साथ कहने को जग्गू नाम का कुत्ता था। एक रात को बाघ आया। किसी तरह उन तीनों ने अपनी जान बचाई पर जग्गू को नहीं बचा पाये। उसे बाघ ले गया था। और अगले दिन ही उन तीनों ने गाँव छोड़ दिया था।







लाटी पेड़ पर चढ़ी हुई है मेरे लिये नारंगी तोड़ रही है।






















यह पिछले साल का चित्र है। वही जगह है, अब यहाँ कोई नहीं रहता है।





घर के सामने की खुली जगह को खाला बोलते हैं। इसी खाला में मेरा बचपन बीता था। यहाँ पर त्यौहारों में और खुशी के अवसरों पर खेल (कुमाऊँनी झोड़ा, सामूहिक नाच) होते थे।
इसी खाला में मैंने पहली बार तिब्बती लामा को देखा था। हमें बचपन में डराया जाता था कि ढंग से रहो नहीं तो लामा अपनी झोली में डाल कर ले जाएगा। इसी खाला में हुड़क्या हुड़क्यानि का नाच भी देखा था।

अखरोट का पेड़। इसके अखरोट हाथ से हलका दबाते ही टूट जाते हैं। अब भी नवगाँव के लोग आते हैं और पुराने दिनों को याद करते हुए अखरोट ले जाते हैं।


गाँव के पास से काली नदी का दृश्य।











मगनखोला का मंदिर। भरे-पूरे दिनों में यहॉं शादी व्‍याह में लंगर लगते थे।









गाँव की एक ओर जानवरों के रहने के लिये खर्क थे। सब के सभी खर्क अब गिर चुके हैं। खर्क की सीढ़ियों से हिमालय का दृश्य अभी तक याद है।









बीते दिनों को पकड़ने की चेष्टा की
पर गहन सन्नाटे को भेद नहीं पाया
साँसों की आवाज ने चौंकाया
अंदर ही अंदर क्या कुछ फूटा पता नहीं
क्यों हुईं आँखें नम पता नहीं

अब यहाँ कोई नहीं रहता।
अब यहाँ कोई नहीं आता।

यहाँ मेरा बचपन बीता था।

Friday, April 30, 2010

कौन है जो कहकहे सब बटोर कर ले गया

बनने का बड़ा शोर था कैसे खामोशी से ढह गया।
कौन है जो कहकहे सब बटोर कर ले गया

नादॉं तो न थे हम, इन्तहॉं थी मस्ती की।
खतरों से बेखबर रवानी में बहते गये।

बेमुरव्वत तो आशियॉं जला के चले गये
हम जल भी न सके, सुलग कर रह गये।

कॉफी की महफिलें, देर से आना बनाकर बहाना
चले थे साथ जो दो कदम, वही याद करके रह गये

Saturday, November 28, 2009

वो बस मुस्कराये और जाँ निकल गई

श्रीमती जी को बेटी दामाद से मिलने की प्रबल इच्छा हुई। मुझसे कहा गया मैं जाती हूँ दुबई। एक महीने के बाद लौटूँगी। तब तक तुम मेरी बिल्लयों की देखभाल करना। मैं अकेला और मेरे साथ दो बिल्लियाँ। बस समझ लीजिये एक महीने तक यही चलेगा। बिल्लियाँ न होती तो मैं 'खोया खोया चाँद खुला आसमाँ' हो जाता। पर क्या करें बिल्लियाँ हैं और उनका अस्तित्व नकारा नहीं जा सकता। पर जब आप एकाकीपन महसूस करते हैं तो बिल्लियों की संगत पर्याप्त नहीं होती। दो टॉग वाले प्राणियों की कमी खलने लगती है। वर्षों पहले लगभग ऐसी ही स्थिति थी जब मैं अकेला बैठा घर में लगभग बोर हो रहा था। उसी बोरियत में मैंने एक कविता लिखी थी

बैठा हूँ आज अकेला मैं
संध्या की बेला है और हाथ में हे मय
और कर रहा हूँ याद
बीते दिनों को हो कर तन्मय

इन चार पंक्तियों को छोड़ कर बाकी की कविता मैंने पहले ही यहाँ पोस्ट कर रखी है।

सोचा कुछ नया लिखूँ। चलो कविता ही सही। कौई मौजूँ विषय? - हाँ क्यों नहीं।
प्यार? - इससे बढ़ कर मौजूँ और क्या हो सकता है!

याद आया कि प्यार पर भी कुछ पहले ही पोस्ट कर चुका हूँ।
ऐसा क्यों होता है कि जिस विषय पर आप लिखना चाहते हैं आप पहले ही लिख चुके होते हैं!

पर प्यार में नया लिखने की बहुत संभावनाएँ हैं।

हजारों लाखों बार परिभाषित होते हुए भी आप पूछने के लिये वाध्य होते हैं कि आखिर है क्या यह प्यार?



इस विषय में हमारे भारत से अधिक जानकार कोई देश नहीं हो सकता। यहॉं साल में कई हजार करोड़ की लागत से साल में 2000 से अधिक फिल्में बनती है। सबका विषय एक ही है प्यार। फिर भी पूछने का दिल करता है कि आखिर है क्या यह प्यार?



60-70 वर्ष से हमारी फिल्में हमें प्यार के बारे में बता रही हैं कि प्यार किया नहीं जाता बस हो जाता है। पर कैसे होता है किसी को नहीं मालूम। Cause and effect वाला सिद्धांत यहाँ लागू नहीं होता। नायक गुफा कुदराओं से, रेगिस्तान से, बर्फीली चोटियों से, आस्‍ट्रेलिया से, अफ्रीका से दहाड़ता है कि प्यार हो गया है। कैसे हुआ, न तुम जानो, न मैं जानूँ। प्रेमी या प्रेमिका भले ही एक दूसरे की आगोश में आ जाय, पर प्यार पकड़ में नहीं आता है।
शायर लोग प्यार के मामले में बहुत कुछ कह गये हैं जिसका अर्थ न वो समझे हैं न किसी और को समझ में आता है। किसी शायर ने कुछ ऐसा भी कहा है 'अभी नादां हो, दिल रखा है तुम्हारे ही लिए, ले जाना जवाँ हो कर।' यह तो सीधे जेल की तरफ ले जाने वाला प्यार है।
प्यार की कुछ रूपों का मुलाहिजा फरमाइए
कॉल सेंटर वाला अपरिपक्व प्यार
जनम जनम का साथ वाला प्यार
जज्बये दिल किसे पेश करूँ वाला प्यार
जज्बये दिल कैसे पेश करूँ वाला प्यार
दिल चाहता है में अक्षय खन्ना वाला प्यार
वैलेन्टाइन डे वाला प्यार।

प्यार पर नीरक्षीर विवेचन होना चाहिये। क्या प्यार है, क्या नहीं है। जैसे, क्या क्षणिक आकर्षण प्यार है? क्या वासना रहित प्यार प्यार है? इत्‍यादि

प्यार पर मेरी एक सद्य:रचित कविता मुलाहिजा फरमाइए

न कहीं खून बहा, न चोट कोई,
वो बस मुस्कराये और जाँ निकल गई

फैशन की महफिल में हसीनों के जलवे थे
पर वाह रे तेरी सादगी, मीठी छुरी चुभो गई

देर में जाना फैशन का एक अंदाज है सादगी
खामखाँ लौ में एक पतिंगा जल गया है कोई

हमें तो इश्क हुआ, खेल इसको समझते हैं वो
हम बिरहा गा रहे हैं, मल्हार गा रहा है कोई

बेगैरत हम भी न थे क्यों जाते उसकी गली
वो तो बेखुदी थी जो हमें वहाँ तक ले गई

गीली रेत पर बना तो दिया है दिल
अब है इंतजार लहर जल्दी से आये कोई

Thursday, November 12, 2009

एक पल



यह नि:शब्द रात यह स्वच्छ चांदनी पेडों पर
यह झींगुर का बोलना यह मेढक की टर्र टर्र
शहर के कोलाहल से दूर इस गांव में
क्या यह स्वर्ग उतरा है धरती पर

यह तारों भरा आसमान यह मधुर मंद बयार
हौले हौले से उडते ये तुम्हारे केश अपार
यह चांदनी कितनी रहस्यमय लगती है तुम पर
प्रिये टहरो, बैठ जाओ उस पत्थर पर

यह चंचल नयन तुम्हारे लिए एक मंद हास
कर रहे शरारत होंठ बोलने का है कुछ प्रयास
क्यों न भूलें भूत औ भविष्यत हम
यही तो है पल इसी के लिए जींएं हम

आगे तो मिलेंगे नित्य जीवन के झमेले
कल तो आयेंगे छोटे बडे दुखों के मेले
चलो बदल डालते हैं समय काल का विधान
बनाते हैं एक आयु इसी पल को खींच तान

मथुरा कलौनी

Monday, July 6, 2009

बहुत मनुहार के बाद भी...



कहानी रुकी नहीं

हम अनदेखा करते गये, होनी थी कि टली नहीं
मोड़ ले कर आगे बढ़ गई, कहानी रुकी नहीं

विकट पगडंडियाँ थी और घूप थी तेज
हम प्यासे रह गये पनिहारिन थी कि रुकी नहीं

बहती रही पुरवाई, और भीगती गई पलकें
साश्रु नयनों से पर एक भी आँसू टपका नहीं

हवाओं ने रुख फेरा और दिन जल्दी ढला नहीं,
रोशनी करते रहे रात भर सुबह का कोई पता नहीं

अब कौन जाने क्या है क्षितिज के उस पार
वहाँं जाने की राह कभी हमें मिली नहीं

करवटो की कहानी सिलवटों मे उलझती गई
मन का हिंडोला था कि कभी रुका नहीं

जिह्वा में अंकुश था होंठ थरथरा कर रह गये
बदलते गये अर्थ मौन के, शब्दों का पता नहीं

कुछ भी तो नहीं होता सरल यदि हम पी लेते गरल
जिन्दगी के घूँट पीते रहे, पर जिन्दगानी रुकी नहीं

बहुत मनुहार के बाद भी पाहुन रुका नहीं
प्यार होते होते रह गया पर हुआ नहीं

मथुरा कलौनी

Friday, June 26, 2009

कभी आ कर तो देखो



रस्में पुरानी ही सही, पांव की बेड़ियां ही सही
हो कर दूसरों के, रस्में निभाकर तो देखो

तुम्हारी थी दुनियाँ तुम्हारी ही है दुनियाँ
हमें भी कभी दुनियाँदारी सिखा कर तो देखो

खुली हवा में सांस ले ली, मेड़ों मे अठखेलियां कर ली
अब बंद है आशियाना, इसमें समा कर तो देखो

आदतें वही औ' लीक पर चल रही है जिन्दगी
कभी कदम से कदम मिला कर तो देखो

न चांद हमारा, न चांदनी हमारी
अनजान डगर पे चलना सिखा कर तो देखो

नैना लगा कर हारे, सपने संजोए बैठे हैं
दौड़े आयेंगे हम, बुला कर तो देखो

मथुरा कलौनी

Sunday, March 8, 2009

होली

होली

कहीं पिचकारी की मार, कहीं रंगों की बौछार है
कहीं उड रहा अबीर, तो कहीं गुलाल है

भीगी चोली है, भीगा है चोला भी
कुछ रंग यहॉं हैं, कुछ रंग वहॉं भी हैं

कुछ रंग चरणों में अर्पित, कुछ माथे पर शोभित हैं
कौन अपना कौन पराया है, रंगों ने भेद मिटाया है

रंग है भंग है, पर नहीं रंग में भंग है
जोश है उमंग है, रवानी है तरंग है

रंगों की भाषा है रंगों की ही बोली है
कोई किसी का हो लिया तो कोई हो ली है

कितनी ही गहरी नहीं लगती गाली है
देखो किसी ने मन की गांठ खोली है

भूलो गिले शिकवे, छेड अपनों से ही होती है
होली के रंग में रंग जाओ, बुरा न मानो होली है

मथुरा कलौनी

Friday, February 6, 2009

गंदगी उलीचने के बहाने

आजकल भारतीय संस्‍कृति को लेकर लोग बहुत परेशान हैं। मैं भी परेशान हूँ। आजकल 'पब कल्‍चर' की बात चल रही है। मुझे तो ये शब्‍द ही समझ में नहीं आते हैं। पब में जाना पब कल्‍चर कहलाता है तो जो रेस्‍तरॉ में जाना क्‍या कहलायेगा। सिनेमा कल्‍चर कभी सुनने में नहीं आया। भारतीय संस्‍कृति दस हजार वर्षों से भी अधिक पुरानी है। तब न सिनेमा थे न रेस्‍तरॉ। आज भारतीय संस्‍कृति को इनके दुस्‍प्रभाव से बचाने के लिये कोई सेना क्‍यों नहीं है।

यदि हम अपने को वाह्य प्रभाव से बचा कर कूपमंडूक बन जायें तो बसुधैवकुटुम्‍बकम् का राग हम कैसे आलाप सकते हैं!

10000 साल पुरानी संस्‍कृति की रक्षा करने के लिये क्‍या हम उस युग के वल्‍कल वस्‍त्र धारण कर लें।

हमारी आदि नारियॉं सोमरस का पान करती थीं। यज्ञ में भाग लेती थीं। हमारे वेदों की कई त्रऋचायें उन्‍हीं ने रची थीं। यदि वे हमारी संस्‍कृति का अंग हैं तो आज कुछ लड़कियों के पब में जाने से भारतीय संस्‍कृति कैसे डांवाडोल होने लगी!

कई सेनायें खड़ी हो गई हैं हमारी संस्‍कृति को बचाने के लिये। पर संकट किससे है!!

ऐसे ही कई सवालों से परेशान हूँ। इस परेशानी में यह कविता बन पड़ी है...



कब तक...

यथार्थ से दूर
आदर्श से परे
थोथे सिद्धांतों के
नारे लगाते रहे।
गंदगी उलीचने के बहाने
गंदगी में जीते रहे।

न समेट पाए साहस इतना
अपनी निरर्थकता से
दो चार हो सकें।
मुख आइने में देखते
अपने से आँखें चुराते रहे।

जिसकी भी लाठी रही
वह भैंस खोल कर ले गया।
चलता है चलता रहेगा
यह राष्ट्रगीत हम गाते रहे।

राम की आयोध्या
राम का मंदिर
राम का नाम हम भुनाते रहे।
राम जब भी आए
बनवास उनको हम देते रहे।

मथुरा कलौनी

Tuesday, December 23, 2008

ऐसे कुछ अशआर चाहिये

इधर कुंठा उधर त्रास है
आँखें वीरान मन नीराश है
डरे सहमे से दिन हैं
काली डरावनी हैं रातें
भटके हुओं को राह दिखाये
ऐसे कुछ चिराग चाहिये
सोते हुओं को जगाये
ऐसे कुछ अशआर चाहिये

ऊँची दीवारें हैं खिड़कियॉं हैं तंग
निकलने के रास्‍ते हो गये हैं बंद
हताशा में है जीवन
घुट रही है मानवता
सीलन को दूर करे
ऐसी एक आग चाहिये
इस आग को हवा करें
ऐसे कुछ अशआर चाहिये

दुश्‍मन तो जाना पहचाना है
यारों से कौन बचाये
खुशगवार चेहरे में
जो हैं रकाबत छिपाये
इस बार जो मौसम बदला
जाड़े ठहर गये
जमे रिश्‍ते जो पिघला दे
ऐसे कुछ अशआर चाहिये

हाथों में थाम कर मशाल
बढ़ रहे हैं पुआल की ओर
ऐसे नासमझ तो न थे फिर
क्‍यों जा रहे हैं विनाश की ओर
इस बार जो हुआ है आर्तनाद
सब के सब सिहर गये
आशा की किरण दिखाये
ऐसे कुछ अशआर चाहिये

मोहब्‍बत की है तुमसे
उल्‍फत की रस्‍में भी निभायेंगे
तेरे शहर में अब आये हैं
प्‍यार तो जतायेंगे
तेरी जुबान में ही सही
हमें तो बस संवाद चाहिये
मेरी बात तुम तक पहुँचे
ऐसे कुछ अशआर चाहिये

चिकने पत्‍ते पर ठहरी है
जिन्‍दगी बूँद ओस की
इस बदहवासी में करें
कैसे बातें होश की
बहुत परेशान हैं हम
कसमकश है जीने की
पॉंव में छाले हैं
कुछ तो ठहराव चाहिये
घावों में मलहम लगाये
ऐसे कुछ अशआर चाहिये

मुझे बारिश की बूँदें
सूरज की तपिस चाहिये
खुली हवा में सॉंस
मेरे सपनों का गॉंव चाहिये
कुँए की जगत में ठॉंव चाहिये
मुझे मेरे हिस्‍से का चॉंद चाहिये
बहुत हो चुकीं रुखसारोजमाल की बातें
अब तो बस इन्‍कलाबी अशआर चाहिये

मथुरा कलौनी

Wednesday, August 13, 2008

युद्धभूमि

कल यहाँ युद्ध का उन्माद था
आज लाशों की सड़ाँध
ले कर आया नया प्रभात है
अब यहाँ कोई नहीं आयेगा
यहाँ न तोपों की गर्जन है
न ही कैमरे और न बरखा दत्त है

चुके हुये युद्ध में कौन रुचि दिखाता है
एक नये युद्ध की खोज में आज का संवाददाता है।

इस युद्धभूमि में एक बार फिर
मनभावन हरियाली छायेगी
खेत लहलहायेंगे
और प्रतीक्षा करेंगे
एक नये उन्माद की
एक नये विनाश की

वही धरती है वही आसमान
क्षितिज सिमटता जा रहा है
रुदन और क्रंदन ही जीवन स्पंदन
बनता जा रहा है

कौन करेगा शांति नृत्य
कौन पहनेगा पायल
अब बचा ही है कौन
जिसके पाँव नहीं हों घायल

-मथुरा कलौनी