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Monday, June 26, 2017

कुछ छूट गया

करने को बहुत है और समय है बहुत कम
कुछ न कुछ छूट ही जाता है
अब छूट ही गया तो ऐसा भी कुछ नहीं
न शोर हुआ, न धमाका हुआ और
न दुनिया ही रुकी
फिर भी अपराध-बोध होता है कि
कुछ छूट गया
बहुत दिनों से यह चिट्ठा छूटा हुआ है।

Friday, May 28, 2010

ऐसा भी होता है

दिखने में दुबले-पतले लेकिन स्वस्थ। उम्र होगी 75 के आस पास। स्मार्टली मंच में आये। कुछ औपचारिक संबोधन के बाद आप बीती सुनाने लगे। उन्हीं के शब्दों में।

मुझे अपनी पत्नी की बहुत चिता लगी रहती है। अभी वह 72 साल की है। वैसे तो वह बहुत एक्टिव है। चलती फिरती है। ऐसी कोई विशेष व्याधि भी नहीं है। ब्लड प्रेशर 120 – 80 ही रहता है। पर पिछले एक साल से कान कम सुनने लगी है। डाक्टरों को दिखाने को कहो तो भड़क उठती है। कहती है कि मैं एकदम ठीक हूँ। इधर मुझे चिंता यह लगी रहती है कि कभी सड़क में गाड़ी का हार्न नहीं सुनाई पड़ा या बस की आवाज नहीं सुनाई पड़ी तो दुर्घटना हो सकती है।

मैंने डाक्टर के पास जाने की बहुत जिद की तो उसने मुझे धमकी दी कि ज्यादा डाक्टर-डाक्टर करोगे तो तुम्हारे कान के नीचे एक जड़ दूँगी।

मैं परेशान और किंकर्तव्यविमूढ़। तभी मुझे अपनी पहचान में एक इएनटी की याद आई। उसको खोज निकाला, फोन किया, अपनी परेशानी बताई। उसने सांत्वना दी कि चिंता करने की कोई बात नहीं है। आज कल ऐसे ऐसे इलाज निकले हैं जिनकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। उसने राय दी कि पत्नी को क्लिनिक में न ले आऊँ। सीधे उसके घर पर मिलूँ। वहाँ देखा जाएगा। पर मेरी पत्नी को पहले ही भनक लग गई। वह इतना भड़की, इतना भड़की कि मुझे डर लग गया कहीं सचमुच ही वह मेरे कान के नीचे जड़ न दे। और मुझे बहरा ही न कर दे।

मैं अपने उस इएनटी मित्र के पास गया। मैंने हथियार डाल दिये। मैंने कहा कि मैं अपनी पत्नी को इलाज के लिये उसके पास नहीं ला सकता। तब उसने मुझसे कहा कि मैं पता लगाऊँ कि कितनी दूर तक मेरी पत्नी साधारण वार्तालाप सुन सकती है। उसके बाद सोचेंगे कि क्या करना है। डाक्टर ने मुझे पूरी तरह हिदायत दी कि कैसे क्या करना है। लिहाजा जब पत्नी रसोई में थी मैं बाहर के दरवाजे के पास गया और पूछा
'लक्ष्मी आज खाने में क्या बना रही हो?'
उत्तर नदारद।

फिर मैं दस कदम आगे बढ़ा और वही सवाल दोहराया। उसने सुना ही नहीं। फिर उत्तर नदारद।

मैं आगे बढ़ा और रसाई के दरवाजे से कहा
'लक्ष्मी आज खाने में क्या बना रही हो?'
उत्तर नदारद।

मैं बहुत डर गया। हालत बहुत खराब लग रही थी। मैं उसके एकदम पास गया और पूछा 'लक्ष्मी आज खाने में क्या बना रही हो?'

लक्ष्मी चिल्ला कर बोली, 'क्या हो गया है तुमको, बहरे हो गये हो क्या। वही सवाल बार बार क्यों पूछ रहे हो। तीन बार तो बता चुकी हूँ कि आज खाने में बिसिबेले भात है।

फिर उन सज्जन ने अपने कान से सुनने वाला यंत्र निकाला और कहा प्राब्लम लक्ष्मी के साथ नहीं मेरे साथ थी।

वहाँ दो सौ आदमियों की भीड़ थी। एक क्षण तो सन्नाटा रहा, अगले क्षण हॅसी का जो दौरा पड़ा लगता था छत गिर जाएगी।

Sunday, May 9, 2010

जरा ऊँचे स्वर में बोलिये

मुझमें एक व्याधि है, वह यह कि जब आप मुझसे बहुत धीमे स्वर में बात करते हैं तो मेरी समझ में नहीं आता है। सुनाई पड़ता है कि आप कुछ कह रहे हैं पर समझ में नहीं आता है कि आप क्या कह रहे हैं। यह हो सकता है आपको मामूली बात लगे पर यह एक भयंकर समस्या है।

जब छोटा था तो समझ में ही नहीं आता था कि सब मेरा मजाक क्यों उड़ाते हैं। बातें मेरी लोगों की समझ में क्यों नहीं आती हैं? ऐसा क्या है जो औरों में है और मुझमें नहीं है। इस ऊँचा सुनने की व्याधि ने मुझे अंतर्मुखी बना दिया था।

पता नहीं कब, पर एक दिन मेरी समझ में आ ही गया कि मेरी समस्या क्या है। मैंने समाधान यह निकाला कि समझ में नहीं आये तो पूछो। उसी बात को दूसरी बार दोहराने में लोग बहुधा अपना स्वर ऊँचा कर लेते हैं।

एक स्थिति का जायजा लीजिये। आपको ऊँचा सुनने की आदत है। आपका बॉस आपको बुलाता है। बहुत धीमे स्वर में आपको कुछ निर्देश देता है। आपको सुनाई तो पड़ा कि आपसे कुछ करने के लिये कहा गया है, पर यह एकदम पल्ले नहीं पड़ा कि क्या कहा गया। यह स्थिति घर में पत्नी के साथ आ सकती है, आफिस में आ सकती है। मित्रों की बैठक में आ सकती है अंतरर्ाष्ट्रीय सम्मेलन में आ सकती है। कवि सम्मेलन में आ सकती है। हर उस जगह आ सकती है जहाँ लोगों ने ठान रखी हो कि वे आपसे धीमे स्वर में बात करेंगे। मधुमक्खी की तरह भनभनाहट वाले स्वर में।

तो ऐसे में क्या करेंगे आप। मैं तो जैसा कि मैंने कहा है मैं आव देखता हूँ न ताव, सीधे-सीधे पूछ बैठता हूँ कि कृपया आपने मुझसे जो कहा उसे ऊँचे स्वर में दोहराइये क्यों कि मैं समझा नहीं आपने क्या कहा।

मैंने तो एक रणनीति ही बना ली है। बस ऐलान कर देता हूँ कि मैं ऊँचा सुनता हूँ। कुछ लोग विश्वास कर लेते हैं कि मैं सचमुच ऊँचा सुनता हूँ। कुछ नहीं नहीं भी करते। ऐसे एलान में बचने का निकास रहता है। जैसे, आपने ऐसा कहा था क्या, मैंने तो नहीं सुना। आपको तो मालूम ही है कि मैं ऊँचा सुनता हूँ।

कुछ लोग तो आदतन नीचे स्वर में बोलते हैं। उनको ऊँचा बोलने के लिये कहा जाय तो ऊँचे स्वर में बोलने लगेंगे पर कुछ समय बाद ही फिर अपने उसी पुराने धीमे स्वर में आ जाते हैं। उनको बार बार ऊँचा बोलने के लिये टोकना भी अच्छा नहीं लगता, विशेष कर जब आपको छोड़ कर सभी लोग बड़ी तन्मयता से उन्हें सुन रहे होते हैं। आप कितनी बार उन्हें टोकेंगे!

कुछ लोग यह जानते हुये भी कि आप ऊँचा सुनते है, ऊँचा नहीं बोलेंगे। उनका अहम् इतना बड़ा होता है कि उन्हें लगता है कि उनके ऊँचा बोलने से उनके अहम् में क्रैक पड़ जायेगा। ऐसे लोगों से सावधान रहना पड़ता है। भग्न अहम् वाले लागे आपके स्वस्थ्य के लिये हानिकारक सिद्ध हो सकते हैं।

ऊँचा सुनने वालों की एक और समस्या है। औरों की हो न हो, पर मेरी है। वक्ता धीमे स्वर में बोल रहा है और आपको बात समझ में नहीं आ रही है। तो सुनने वाले का ध्यान भटकेगा या नहीं। जैसे किसी मीटिंग में, वक्ता आपको समझा रहा है कि किसी विशेष समस्या का कैसे सामना करना चाहिये और आप वक्ता के बगल में बैठी सुंदरी को कल्पना के घोड़े उड़ाये ले जा रहे हैं।

खैर अपनी इस समस्या के साथ काफी वक्त गुजार लिया है। अब तो हम बड़े गर्व के साथ कहते हैं कि हम सठिया गये हैं इसलिये आप हमसे साफ साफ और ऊँचे स्वर में बोलिये।

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Friday, December 5, 2008

गोल्‍डक्‍लास में फैशन




मैंने जब सिनेमा देखना आरंभ किया था तो कलकत्‍ते के एक फटीचर हाल में पर्दे के एकदम सामने की टिकट पाँच आने में आती थी। स्‍कूल गोल कर कितनी पिक्‍चरें वहॉं देखी थीं! लड़कपन पार कर जब कालेज में दाखिला लिया तो अपने को अपग्रेड किया तथा बालकनी में पिक्‍चर देखना आरंभ किया। आजकल मल्‍टीप्‍लेक्‍स का जमाना है। डेढ़ सौ रुपये दे कर पिक्‍चर देखनी पड़ती है। यहॉं तक तो ठीक है। पर आज तक कोई मुझे पॉंच सौ रुपये दे कर गोल्‍डक्‍लास मल्‍टीप्‍लेक्‍स में सिनेमा देखने के लिये मजबूर नहीं कर सका। पर जब उपहार स्‍वरूप पॉच-पॉंच सौ की दो टिकटें मिलीं तो सोचा चलो यह अनुभव भी सही।

तो साहब हम भी सपत्‍नीक गोल्‍डक्‍लास में पिक्‍चर देखने पहुँचे। हाल में लोग बहुत कम थे जो स्‍वाभाविक ही है। लोग इतनी मँहंगी टिकट ले कर क्‍यों सिनेमा देखने लगे जब कि बगल के हाल में वही पिक्‍चर डेढ़ सौ रुपयों में देखी जा सकती है।

हॉल में सीटें इतनी बड़ी कि एक सीट में दो समा जॉंय। सीट में बैठना तो असंभव था। या तो आप अधलेटे बैठिये या पूरे ही लेट जाइये। सीट में कंबल भी रखा हुआ था। कई लोग तो कंबल ओढ़ कर लेट गये थे। चलो पिक्‍चर बोर हुई तो आप तीन घंटे की नींद ले सकते हैं।

अब लेट कर पर्दे की ओर देखा तो पाया कि पर्दे का निचला हिस्‍सा तो आराम से दिखता है पर पर्दे का ऊपर का हिस्‍सा देखने के लिये सिर को पीछे की ओर करना पड़ता है जो गरदन के लिये कड़ा ही कष्‍टप्रद कोंण है। हॉल की सीटें श्रीमती जी को बहुत हास्‍यास्‍पद लग रही थीं। हँसते-हँसते उनका बुरा हाल हो रहा था। पिक्‍चर समाप्‍त होने पर हमें एक दूसरे को सहारा देकर सीट से उठाना पड़ा था। वे प्रसन्‍न थीं कि चलो इस अवांछनीय अनुभव पर कम से कम टिकटों पर अपना पैसा नहीं खर्च करना पड़ा।

वहॉं हाल में ही खाने पीने की भी व्‍यवस्‍था है। हरएक सीट में एक-एक साइड टेबल लगा था जिसमें मीनू कार्ड भी रखा हुआ था। पत्‍नी से सलाहमशवरा कर दो सैंडविच और एक बोतल पानी का आर्डर दिया। हॉल के धुँधले प्रकाश में दाम ठीक से दिखे नहीं। बिल आया पॉंचसौ एकतीस रुपये! पॉंच सौ एकतीस रुपये किस बात के! न स्‍वाद, न सर्विस, न वातावरण। उनकी हँसी एक गंभीर सोचमुद्रा में बदल गई।

अब आते हैं पिक्‍चर पर। पिक्‍चर थी फैशन। हमदोनों को पिक्‍चर बहुत पसंद आई। चलो कम से कम पिक्‍चर अच्‍छी लगी। शाम पूरी बेकार नहीं गई। पिक्‍चर अच्‍छी तो थी पर एक बात कहना चाहूँगा कि पूरी पिक्‍चर में कई सीन ऐसे थे जिनमें युवतियॉं बहुत कम वस्‍त्रों में रैंप पर इठला रही थीं। और लगभग पूरी पिक्‍चर में कैमरे का फोकस नीचे ही रहा था। अब आप अंदाज लगा सकते हैं कि मैं कैसे अनुभव से गुजरा। सीट में अधलेटा बैठने के बाद वैसे ही पर्दे के ऊपरी भाग को देखने में कष्‍ट हो रहा था ऊपर से पूरी पिक्‍चर में कैमरे का लो-ऐंगल! नहीं-नहीं मैं आपत्ति नहीं कर रहा हूँ मैं तो केवल अपना अनुभव आपके साथ बॉंट रहा हूँ।