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Sunday, March 27, 2011

प्रेमिका संवाद -5 (अंतिम किस्‍त )

प्रेमिका संवाद -5

अब तक आपने पढ़ा
प्रेमिका संवाद -1 प्रेमिका संवाद -2 प्रेमिका संवाद - 3 प्रेमिका संवाद - 4

अब आगे-

प्रेमाशिष का मुँह खुल गया। चेहरे पर बेवकूफों सा भाव लिये वह सरला की ओर देखने लगा।

'प्रेम,' सरला उसी रौ में कहती गई, 'किसी भी व्यक्ति में कम से कम थोड़ा तो आत्मसंयम होना चाहिए। जिस लड़की को अभी तुम अपने जाल में फाँस रहे थे , मैंने सुना है कि उसकी सगाई हो चुकी है। मानवता के नाते थोेड़ी तो मानवता दिखाओ। दूसरों की मँगेतरों को तो छोड़ दो।'

प्रेमाशिष के चेहरे के भावों में थोड़ा परिवर्तन हुआ। वह और भी अधिक बेवकूफ लगने लगा।

सरला ने अपना कर्तव्य समझ कर इतना कह तो दिया,पर यह उसके लिये बहुत कष्टदायक सिद्ध हुआ। प्रेम को देख कर, उसके सम्मुख खड़े हो कर बातें करते समय उसका सारा संयम रेत की दीवार की तरह ढहने लगा। बड़ी कठिनाई से उसने अपने को सँभाला। स्वयं को संयत करने के लिये वह बाथरूम की ओर चली गई।

उसे हर हाल में अपने को सँभालना होगा। अभी तो लंबा जीवन उसके सामने है। जीवन के सूखे और कंटकाकीर्ण पथ में ऐसे झटके, अब लगता है मील के पत्थर की तरह आते रहेंगे। उसे सदा सचेत रहना पड़ेगा कि कभी जब प्रेम पास हो तो वह किसी भी क्षणिक कमजोरीवश कही ऐसा न कर दे जैसा उसने नहीं करने का प्रण लिया है। जानबूझ कर तो मक्खी नहीं निगली जाती। फिर उसका आत्मसम्मान भी तो है।

उधर प्रेमाशिष ने मुँह में रखे आलू दम के टुकड़े को जैसे-तैसे उदर में पहुँचाया। उस आलू में अब कोई दम न था। विनोद ने मदन को देखा तो वह एक गिलास पानी ले कर उसके पास पहुँच गया। उसने कहा,

'लो, यह पानी पी लो। ठीक हो जायेगा।'

'काश, हमारी सभी समस्याएँ पानी पीने से ठीक हो जातीं!' प्रेमाशिष ने सोचा। पर उसके मुँह से निकला, 'आँ...।'

'मैं तुमको वहाँ से देख रहा था। तुम्हारा चेहरा देख कर समझ गया कि तुम्हारे गले में कुछ अटक गया है।' विनोद ने कहा।

'आँ...गाँ...।' प्रेमाशिष ने कहा।

कहा जा चुका है कि टीले वाला मकान पार्क का सबसे बड़ा मकान है। उसमें कमरे ही कमरे हैं। नया आदमी तो इन कमरों की भूलभुलैया में भटक कर रह जाय। घर की मालकिन की कृपा से सरला बाथरूम तक पहुँच गई थी। जब वह निकली तो वह अपने हिसाब से उसी ओर बढ़ी जहाँ पार्टी चल रही थी। पर पहुँची एक बड़े लंबे चौड़े गलियारे में, जिसके दोनों ओर पर्दे लगे दरवाजे थे। कुछ देर तो वह पशोपेश में रही कि किस पर्दे को हटा कर अंदर जाए। स्थिति ऐसी थी कि देवकीनंदन खत्री जी होते उसकी जगह, तो वे भी सिर खुजलाने लगते। फिर जो दरवाजा पास था उसी का पर्दा हटा कर वह अंदर घुस गई। यह कोई और ही कमरा था। इस कमरे में मदन एक सोफे में धँसा सिगरेट पी रहा था। संयोग से मदन का मुँह दूसरी ओर था। वह उल्टे पाँव वापस लौट ही रही थी कि दूसरे दरवाजे से शीला कमरे में आई और मदन को संबोधित कर कहने लगी, 'लो तुम यहाँ छिपे हो। चलो, चलते हैं।'

'तुम जाओ। मैं अभी बैठूँगा। आज छुट्टी है, फिर प्रेम भी साथ में है।' मदन ने कहा।

'तुम्हारा दोस्त प्रेम बहुत दुखी व्यक्ति है।' शीला ने कहा। 'वह अभी तक सरला से प्यार करता है।'

'मुझे मालूम है।' मदन ने कहा। 'ऐसे में कोई कुछ नहीं कर सकता है। कुछ मामले आदमी को स्वयं सुलझाने पड़ते हैं।'

'मदन, अभी मेरी बहुत देर तक प्रेम से बातचीत हुई। उसने टीक से तो कुछ नहीं बताया, पर मुझे लगता है कि सरला गलती कर रही है। उसे यदि अंदाज हो जाय कि प्रेम उसे प्रेम करता है तो शायद दो बिछड़े मिल जाएँ।' सरला ने कहा।

पर्दे के पीछे खड़ी सरला ने सोचा, 'तो वह शीला के संबंध में गलती कर रही थी शायद, क्योंकि शीला का मँगेतर प्रेमाशिष का ही मित्र मदन लग रहा था। पर इससे क्या अंतर पड़ता है! चंद्रिका, कमला, निशा, विभा, तारा, सुजाता, सब के बारे में तो वह गलती नहीं कर सकती।

'यह मुश्किल है।' मदन ने कहा। 'क्यों कि सरला को विश्वास है कि प्रेम उससे प्रेम करता है।'

'फिर...फिर...'

'उसे यह भी विश्वास है कि प्रेम सरला के साथ-साथ शहर की उन सभी लड़कियों को प्यार करता है जो अविवाहित हैं।'

'ऐसा कैसे हो सकता है?' शीला ने पूछा।

'सरला ऐसा ही सोचती है। सरला क्या, प्रेम को जानने वाले सभी यही सोचेंगे। क्यों कि उसका पिछला रिकार्ड ही ऐसा है।' मदन ने कहा।

'मदन, तुम अपने मित्र को अधिक जानते हो। पर मुझे तो लगता है कि प्रेम सरला से ही प्रेम करता है। यदि ऐसा है तो पहले की लड़कियों से छेड़छाड़ कोई महत्व नहीं रखती।' शीला न कहा।

क्या सचमुच ऐसा संभव है? सरला सोचने लगी। पर वह अपने विचारों में कायम नहीं रह पायी। कोई खटका हुआ। उसका ध्यान अपनी वर्तमान परिस्थिति पर आ गया। वह वहाँ से हट गयी।

गलियारे के दूसरे छोर पर उसे प्रसाद खड़ा दिखाई पड़ा। उसके खड़े होने का अंदाज बता रहा था कि हम यहाँ यूँ ही खड़े नहीं हैं। उसकी लंबी पतली गर्दन में उसका आवश्यकता से अधिक उभरा हुआ टेंटुआ जिस हिसाब से ऊपर नीचे हो रहा था उससे उसकी मानसिक हलचल का पता चलता था। यदि टेंटुआधारी व्यक्ति के चेहरे से गंभीरता टपक सकती है तो प्रसाद के चेहरे से गंभीरता टपक रही थी।

प्रसाद एक गणितज्ञ था। वह कोई भी समस्या गणित के मॉडल के माध्यम से हल कर सकता था। पर सरला के व्यवहार का वह कोई भी मॉडल नहीं बना पा रहा था। यदि कोई संख्या दो से विभाज्य है, तो है। इसके दो अर्थ नहीं हो सकते। दो और दो का गुणनफल चार ही हो सकता है, कभी चौबीस नहीं। समीकरण के दाहिनी ओर जितनी संख्या है बाईं ओर भी उतनी ही होनी चाहिए। वह बेचारा सरला के साथ अपना कोई समीकरण नहीं बना पा रहा था। विभाजन में शेष बच जा रहा था। गुणनफल शून्य हो जा रहा था। यहाँ तक कि एक और एक मिला कर भी वह अकेला एक ही बच जा रहा था। एक गणितज्ञ के लिए इससे बड़ी व्यथा क्या हो सकती है?

'सरो' उसने पुकारा।

सरला ने अनसुना कर दिया और वह उसके पास से होकर निकलने लगी। अपनी पुकार का कोई असर न पा कर प्रसाद बहुत क्षुब्ध हुआ। इतना कि जितनी देर में आप हलचल कहेंगे उतनी देर में उसका टेंटुआ दो बार ऊपर नीचे हो गया। उसने सरला का रास्ता रोक कर तथा अपनी खनकती आवाज का ट्रेबल बढ़ा कर कहा, 'सरला!'

'क्या है? मुझे अभी परेशान मत करो।' सरला ने कहा।

'तुम्हें मेरी बात सुननी पड़ेगी।' प्रसाद ने कहा।

'देखो प्रसाद, मुझे तुम्हारी कोई बात नहीं सुननी है। जो कहना है बाद में कहना।' सरला ने कहा।

'मैं अभी कहूँगा। मैं और अधिक सहन नहीं कर सकता।'

'क्या सहन नहीं कर सकते?'

'तुम्हारा व्यवहार।'

'तो अच्छा है न। मत सहन करो। मुझसे उलझो ही नहीं।'

बेचारा गणितज्ञ यहीं परास्त हो गया। सरला ने तो बात ही समाप्त कर दी। दूसरी ओर उस प्रेमाशिष के बच्चे को उसने साफ सीधे शब्दों में चेतावनी दी थी, पर उसका भी कोई असर नहीं हुआ। जो हो इस बार वह हार नहीं मानेगा। फैसला करके ही रहेगा, भले ही दशमलव के आवर्तक अंक की भाँति उसे लगे ही क्यों न रहना पड़े।

'देखो सरो,' उसने समझाते हुए कहा, 'जब तुम शेखर के साथ सिनेमा गई थीं, मैंने कुछ नहीं कहा। जब महेश तुम्हारा मित्र बना मैंने कुछ नहीं कहा। पर अब यह प्रेमाशिष मुझसे सहन नहीं होगा। मेरे मना करने के बाद भी अभी तुम उससे बातें कर रही थीं!'

'तुम होते कौन हो, मुझे मना करने वाले?' गुस्से से तिलमिला कर सरला ने कहा।

'मैं कौन होता हूँ? यानी मैं... मैं बताता हूँ मैं कौन होता हूँ। मैं तुम्हारा होने वाला पति हूँ।' लगभग चिल्लाते हुए प्रसाद ने कहा।

'तुम्हारा इतना साहस?' सरला ने कहा।

'तुम्हारे पिता जी ने मुझे चिट्ठी में ...' प्रसाद कहने लगा पर सरला ने उसकी बात बीच में काट कर कहा,

'तो जा कर पिता जी से कहो। अब फिर कभी मेरा रास्ता रोका तो मैं तुम्हारा टेंटुआ दबा दूँगी।' सरला ने कहा। वह पैर पटक कर वहाँ से जाने के लिए उद्यत हुई तो उसने देखा कि पार्टी के लगभग सभी जन उस गलियारे में उपस्थित थे। ग्लानि से उसकी आँखों में ऑसू छलक आये। वह दौड़ती हुई वहाँ से निकल गई।

उस दिन शाम को पार्क में कोई अपने घर से बाहर नहीं निकला। सभी पत्र लेखन में व्यस्त हो गये थे। यह उस समय की बात है जब मोबाइल फोन, वीडियो चैट आदि भविष्य की बातें थीं। लिहाजा चिट्ठी-डाकिये पर ही जोर था। पर उस दिन तो लगा था कि चिट्ठी लिखने की बीमारी पार्क में संक्रामक रोग की तरह फैल गई है। टीले वाले घर में जो घटना घटी थी, वह पार्क के इतिहास में नई थी। इतनी बड़ी घटना को अपने तक ही सीमित रखना, परले दर्जे की मूर्खता समझ कर सभी पत्र लिख रहे थे। इनमें से कुछ विशेष पत्र उल्लेखनीय हैं।

चंपा के पति ने सरला के पिता जी को लिखा कि आज ऐसी घटना हो गई है, जिसमें प्रसाद ने सरला के साथ दुर्व्यवहार किया। और यह भी लिखा कि उसकी राय में प्रसाद सरला के लिये उपयुक्त नहीं है।

चंपा ने भी सरला के पिता जी को पत्र लिखा। उसने भी अपने शब्दों में घटना का विवरण देते हुए प्रसाद को अनुपयुक्त बताया। उसने यह भी लिखा कि शायद सरला प्रेमाशिष नाम के एक युवक को चाहती है। पर उन दोनों में किसी कारण अनबन है।

प्रसाद ने भी सरला के पिता जी को पत्र लिखा। उसने लिखा कि सरला ने सरेआम उसके साथ दुर्व्यवहार किया है। उसने यह भी लिखा कि जब दोनों परिवारों में यह बात कई सालों से मालूम है कि सरला की शादी प्रसाद के साथ होने वाली है तो सरला का आचरण अच्छा होना चाहिए था। उसने मर्यादा का उल्लंघन करके महेश, शेखर आदि व्यक्तियों के साथ मित्रता बढ़ाई। अति तो उसने प्रेमाशिष नाम के व्यक्ति के साथ की। सब कुछ जानते हुए भी उन दोनों में अँगूठियों का आदान प्रदान हुआ। इतना होने के बावजूद वह सरला से शादी करने को तैयार है बशर्ते वह भविष्य में ऐसी हरकतें न करने का वादा करे।

प्रेमाशिष ने सरला को पत्र लिखा। उसने लिखा कि वह यानी प्रेमाशिष समझ सकता है कि आज की घटना से उसे यानी सरला को कितना कष्ट पहुँचा होगा। उसे यानी प्रेमाशिष को यह जान कर प्रसन्नता हुई कि उसके यानी सरला के और प्रसाद के बीच कुछ नहीं है। वह प्रसाद की बात पर कुछ टिप्पणी नहीं करना चाहता है, परन्तु यह जान कर उसे आश्चर्य अवश्य हुआ कि सरला के जीवन में उसके यानी प्रेमाशिष के आने के पहले शेखर और महेश नाम के व्यक्ति आ चुके हैं। यह बात उसे अवश्य आश्चर्य में डालती है कि अपने भूतकाल में न झाँकते हुए वह यानी सरला, कैसे प्रेमाशिष के भूतकाल में झाँक कर उसे दोषी ठहरा सकती है। उसे विश्वास है कि अभी शेखर या महेश का महत्व कुछ भी नहीं है। वह समझ सकता है, पर सरला ऐसी समझदार लड़की यह समझाने पर भी क्यों नहीं समझती कि निशा या तारा वाले संबंधों में न कभी दम था और न रहेगा। इस जीवन की उसकी एक ही चाहत है और वह है सदानंदजी की छोटी लड़की, सरला। उसके यानी प्रेमाशिष के इतना लिखने के बावजूद वह यानी सरला अड़ियल टट्टू की तरह अपनी बेवकूफी पर अड़ी रहे तो वह और कुछ नहीं कर सकता है। बस, अपना बचा खुचा जीवन उसी की यानी सरला की याद में बिता देगा।

सरला के पिता जी समझदार इनसान थे। उन्होंने दुनिया देख रखी थी। उन सब पत्रों से जो उनके नाम लिखे गये थे, उन्होने कुछ छाना और कुछ बीना। सरला की माँ से मिलने से पहले का अपना जामाना याद किया। प्रेमाशिष के संबंध में छानबीन की। पूरी तरह से लैस हो कर वे पार्क पहुँचे। उन्होंने चंपा के घर में एक विशाल आयोजन किया और प्रेम और सरला की सगाई की घोषणा कर दी।

इस बीच सरला ने कई बार प्रेम से मिलना चाहा था, पर हर बार झिझक का रुक गई थी। उसके पिताजी ने सब राहें आसान कर दी
थीं, उसके लिये भी और प्रेमाशिष के लिये भी।

यह कहना गलत होगा कि प्रेम पर उसका शक जाता रहा। हाँ, शक के शोलों को समझदारी की राख ने अच्छी तरह ढक लिया था। फिर प्यार तो था ही।

समयोपरांत दोनों की शादी हो गई। मदन और प्रेम का साझेदारी वाला व्यापार भी चल निकला। प्रेम ने वहीं पार्क में घर बना लिया। आजकल के मापदण्डों के विपरीत सरला और शीला में बहुत घनिष्ठता हो गई। दोनों परिवार सुखपूर्वक रहने लगे।





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समाप्त

Friday, March 25, 2011

प्रेमिका संवाद -4

प्रेमिका संवाद -4


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अब आगे-

सरला प्रेमाशिष को दिल की गहराइयों से प्यार करती थी। ऐसा प्यार कभी-कभी कष्टप्रद होता है, जैसा कि सरला अनुभव कर रही थी। वह एक सूझबूझ वाली समझदार युवती थी। उसके पास भावुक हृदय था तो बुद्धियुक्त मस्तिष्क भी था। उसे मालूम हो चुका था कि प्रेमाशिष का प्यार टुकड़े-टुकड़े बँटा है। उसके हिस्से उसके प्यार का एक अणुसूक्ष्म टुकड़ा पड़ा था, जिसका जाहिर है, होना न होना बराबर था। चंद्रिका, कमला, निशा, विभा, तारा, सुजाता... नामों की एक लंबी सूची थी, जिसके अंत में उसका नाम भी था। अब तक शायद कुछ और नाम जुड़ गये हों। उसने सुन रखा था कि प्रेमाशिष की प्रेमिकाएँ एक क्रिकेट के मैदान में भी नहीं समाएंगी। ऐसे में वह क्या आशा कर सकती है! उस भीड़ में समा जाए तो क्या होगा! उसे शायद डीप थर्डमैन क्षेत्र में खड़े होने भर को स्थान मिल जाए। यह उसे स्वीकार्य नहीं था। उसे ऐसा पति चाहिए था, जो केवल उसी का हो। वह उसे चंद्रिका, कमला, निशा, विभा, तारा, सुजाता आदि की भीड़ में बाँटने के लिये तैयार नहीं थी।

इसमें शायद प्रेमाशिष को अधिक दोष नहीं दिया जा सकता है। उसका तो नाम ही प्रेमाशिष है। यदि शहर की सभी लड़कियाँ उसके आगे-पीछे नाचती रहें तो उसे कितना दोष दिया जा सकता है? समझ-बूझ कर पूरे होशोहवास में उसने प्रेमाशिष से दूर रहने का निर्णय लिया था। पर निर्णय लेने से ही बात समाप्त नहीं हो जाती। उस पर बने रहना भी पड़ता है, जो उसे बहुत कष्टप्रद प्रतीत हो रहा था।

सरला न एक नहीं तीन निर्णय लिये थे। एक, वह प्रेमाशिष से दूर रहेगी। जिस गली में तेरा घर हो या गुजर हो बालमा, उस गली में पाँव रखना ही नहीं है। दो, वह कभी शादी नहीं करेगी। चूँकि इस जनम का सारा प्यार वह प्रेम को अर्पण कर चुकी है और प्रेम केवल उसका हो कर नहीं रह सकता है, इसलिए शादी का प्रश्न ही नहीं उठता है। प्रेम को छोड़ कर किसी और से शादी करना तो उस व्यक्ति के गले जिंदा मढ़ने के समान है। ऐसा पाप वह कभी नहीं कर सकती है। तीन, वह अपने जीवन को मानवोपयोगी कार्यों में समर्पित कर देगी। उद्देश्यहीन जीवन चलती-फिरती लाश के समान है। मानसिक शांति के लिये भी उद्देश्य का होना बहुत आवश्यक है, विशेष कर जबकि उसका पहाड़ जैसा तीन-चौथाई जीवन उसके सामने है।

मनुष्य ने कोई अच्छा निर्णय लिया नहीं कि भगवान परीक्षा लेने पहुँच जाते हैं। सरला के पिताजी अचानक उसकी शादी के लिए बहुत सक्रिय हो गये। वे अपनी पुत्री के प्रति बहुत चिंतित हो उठे थे। पुत्री का भरी जवानी में उदासीन होना और शादी न करने का संकल्प करना किसी भी बाप को चिंतातुर कर सकता है।

सरला कुछ दिन शांत से बिताने के लिये अपनी चचेरी बहन चंपा के पास पार्क में चली आई थी। बहन से मिलने की खुशी में वह यह बात एकदम भूल गई कि प्रसाद भी पार्क में ही रहता है। प्रसाद और सरला के परिवार में पुरानी जान पहचान है। बचपन में दोनों एक दूसरे के पड़ोसी रह चुके हैं। तब एकाध बार उन दोनों की शादी का जिक्र हुआ था। उसी आधार पर प्रसाद सरला पर अपना हक समझा था। पर सरला को प्रसाद कभी एक आँख नहीं भाया। यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना उचित है कि एक आँख भाना केवल भाषा का प्रयोग है। ऐसी स्थिति में ऐसा ही कहा जाता है। क्यों कहा जाता है यह लेखक को नहीं मालूम। इसलिए यह न समझ लेना चाहिए कि सरला प्रसाद को केवल एक आँख से देखती थी। उसने उसे जब भी देखा दोनों आँखों से ही देखा, पर वह उसे किसी तरह भी पसंद नहीं आया।

उधर सरला के पिताजी की धारणा दूसरी ही थी। वे प्रसाद को सरला के लिये उपयुक्त पा रहे थे। उन्होंने इस आशय के पत्र प्रसाद, प्रसाद के पिताजी, चंपा के पति और सरला को एक ही डाक से भेज दिये।

प्रसाद एक मेधावी गणितज्ञ था। अधिक मिलनसार तो नहीं था पर पार्क की सामाजिक दुनिया के एक ऐसा पात्र था जो बस था। सरला के प्रति उसका व्यवहार किसी समझदार व्यक्ति का सा नहीं था, जो पार्क में आजकल चर्चा का विषय था। लोगों को आश्चर्य इस बात पर था कि सरला ऐसी समझदार और आधुनिक लड़की प्रसाद को क्यों सहन कर रही है।

उधर सरला की धारणा थी, यदि वह प्रसाद को दुत्कार देती है तो उसके पिताजी किसी दूसरी जगह उसकी बात चलायेंगे, जहाँ उसे फिर इनकार करना पड़ेगा। इससे कोई अप्रिय घटना न घटे, इससे तो यही अच्छा था कि कुछ दिन प्रसाद को सहन कर लो। वह बेवकूफ आदमी कैसे अधिकारपूर्ण स्वर से उसे 'सरो सरो' बुलाता है। उसे वैसे ही अपने बचपन के इस नाम से चिढ़ है, प्रसाद के बुलाने से तो तन-बदन में आग लग जाती है।

मदन प्रेमाशिष को पेड़ों वाले घर की ओर ले जा रहा था। रास्ते में दोनों बातें करते जा रहे थे। मदन कह रहा था,

'प्रेम मुझे विश्वास नहीं होता कि तुम में इतना बड़ा परिवर्तन आ जाएगा। एक समय था तुम तारा और... और... और...।'

'सुजाता।' प्रेमाशिष ने कहा।

'हाँ, तारा और सुजाता। एक समय था जब तुम दोनों के साथ पेंगें बढ़ा रहे थे और जब तुम्हारी पोल खुली थी तो कितना बड़ा झमेला खड़ा हुआ था। पर तुम्हारे चेहरे पर शिकन तक नहीं आई थी। और आज एक सरला तुमको छोड़ कर चली गई तो तुम हाय तौबा मचा रहे हो।' मदन ने कहा।

'सरला से पहले जितनी भी लड़कियाँ थीं, उनका अब कोई महत्व नहीं है। वह तो एक तरह से खिलवाड़ था। सरला... जाने दो, तुम नहीं समझोगे। कभी प्रेम में पड़ोगे तो स्वयं समझ जाओगे।' प्रेमाशिष ने कहा।

पेड़ों वाला घर सामने आ गया था। सामने बड़े-बड़े पेड़ थे और फिर सुंदर मकान था। एक पेड़ पर बड़ा सा झूला पड़ा हुआ था, जिसमें एक लड़की बैठी पुस्तक पढ़ रही थी और हौले-हौले झूल रही थी। प्रेमाशिष ने देखा यह वही लड़की थी जो सुबह उसे देख कर मुस्कराई थी। यह मदन की मँगेतर शीला थी जिसे मदन प्रेमाशिष से मिलाने के लिये उत्सुक था। परिचय कराने के लिये वह तत्पर हुआ तो उसने पाया कि शीला और प्रेमाशिष एक दूसरे को देख कर मुस्करा रहे हैं।

'तुम दोनों एक दूसरे को जानते हो?' आश्चर्य से मदन ने पूछा।

' आज सुबह दौड़ते समय मैंने इनको देखा था।' प्रेमाशिष ने कहा।

'तुमने बताया था कि तुम्हारे मित्र प्रेमाशिष आ रहे हैं। सुबह इनको देख कर मैंने अंदाज लगाया कि यह वही हैं।' उस लड़की ने कहा।

'तुमने ठीक अंदाज लगाया। यही प्रेमाशिष है। और प्रेम, यह शीला है मेरी मँगेतर।'

'तुम्हारी मँगेतर!' प्रेमाशिष ने आश्चर्य करते हुए कहा। 'तुमने कुछ बताया ही नहीं। चुपके-चुपके मँगनी कर ली।'

'बताने का समय ही नहीं मिला प्रेम। एक दिन यह मुझे देख कर मुस्कराई। मुस्कराहट मेरे अंदर तक चली गई। इसके बाद जब मुझे होश आया तो मैंने पाया कि इसके साथ मेरी मँगनी हो चुकी है।' मदन ने नाटकीय अंदाज में कहा।

'मदन तुम इस तरह की बात करोगे तो मैं गुस्सा हो जाऊँगी।' शीला ने कहा।

'नहीं नहीं, शीला, यह गुस्से का अवसर नहीं है।' प्रेमाशिष ने कहा। 'सबसे पहले मेरी बधाई स्वीकार करो।'

'प्रेम मैं तुमको एक बात बताऊँ, अभी-अभी मेरे परिचय कराने से पहले ही जब तुम दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्करा रहे थे तो मेरा दिल धक्‌ से रह गया था।' मदन ने कहा।

'क्यों क्या हो गया था?' शीला ने कौतूहल से पूछा।

'मैं तुमको बता चुका हूँ शीला कि प्रेम के पास हो न हो कोई एक सम्मोहन मंत्र है। यह जिधर से भी गुजरता है, लड़कियाँ अपना दिल थाल में सजा कर इसके सामने रख देती हैं। मैं डर गया था कि कहीं इसने मेरी इकलौती मँगेतर पर कहीं कोई जादू तो नहीं कर डाला, जो जान न पहचान, इसे देख कर मुस्करा रही है। जिस मुस्कान ने मुझे कहीं का नहीं रखा ही...।' मदन कह रहा था और उसकी बात काट कर प्रेमाशिष न कहा,

'क्या बकवास कर रहे हो मदन! शीला, इसकी बातों में मत जाओ। इस प्रकार की हलकी बातों ने मेरा पहले ही बहुत नुकसान कर दिया है।'

शीला ने घड़ी पी दृष्टि गड़ाते हुए कहा, 'टीले वाले मकान पर नहीं जाना है क्या? देर हो रही है, चलें?'

विनोद का घर टीले के शीर्ष भाग में था। इसीलिए उसे टीले वाला घर कहा जाता था। जब ये लोग वहाँ पहुँचे तो वहाँ 10-12 व्यक्ति पहले से ही उपस्थित थे। चूँकि प्रेमाशिष पार्क में आता रहता था, इसलिए अधिकांश लोगों से वह परिचित था। सभी उससे बड़ी गर्मजोशी से मिले। कुछ इस तरफ की बातें हुईं। कुछ उस तरफ की बातें हुईं। फिर सब लोगों ने सब तरफ की बातें कीं। वैसे तो, जैसी उसके मन की अवस्था थी, प्रेमाशिष को पार्टी वार्टी में जाना पसंद नहीं आ रहा था। एक ओर तो आपकी प्रेमिका आपको आईना दिखा कर चली गई थी, दूसरी ओर आपको पार्टी में जाने को कहा जा रहा था। एक बेयरिंग लिफाफे की तरह। पर अब यहाँ पर नाश्ते का सुरुचिपूर्ण आयोजन और चहल चहल देख कर उसे अच्छा ही लग रहा था। वह इसलिए भी प्रसन्न था कि उसके मित्र मदन की सगाई शीला जैसी अच्छी लड़की से हुई थी, जो बहुत ही हँसमुख और मिलनसार थी। वर्ना उसके ऐसे भी मित्र थे जो शादी से पहले तो थे हम प्याला और हम निवाला और शादी के बाद सब गड़बड़ घोटाला। शादी के बाद कुछ तो ऐसे जमींदोज हुए कि जैसे कभी थे ही नहीं।

मदन और शीला की जोड़ी देख कर उसका ध्यान बरबस अपने ऊपर जा रहा था। नाम तो था प्रेमाशिष पर था प्रेम शापित। क्या ही अच्छा होता यदि सरला उसकी होती और उसके साथ होती। खैर, जो नहीं है, नहीं है।

वह शीघ्र ही शीला से घुलमिल गया। दोनों अपनी-अपनी नाश्ते की प्लेट लिये एक किनारे खड़े बातें करते रहे। आलू दम बहुत दमदार था। प्रेमाशिष को याद नहीं पड़ा कि उसने इससे स्वादिष्ट आलू दम पहले कभी खाया हो। उसने शीला का ध्यान आलू दम की ओर आकर्षित किया तो शीला ने उसे बताया कि वह उन अभागियों में से है जो पाव भर खायें तो उनका वजन सेर भर बढ़ जाता है। स्वयं को प्रलोभन से दूर रखकर, चेहरे में दृढ़ता का भाव लिये वह खाली प्लेट रखने चली गई।

इधर प्रेमाशिष आलू दम में चम्मच डुबोते हुए इस बात पर गौर करने लगा कि आजकल की प्लेटें कितनी कम गहरी होती हैं। प्लेट से सिर उठा कर उसने देखा तो पाया कि सरला उसी की ओर आ रही है। उसका दिल धड़ धड़ धड़ धड़ करने लगा। उसने आगे बढ़ कर कहा, 'सड़ला!'

मुँह में आलू हो तो सरला का उच्चारण करना कठिन होता है।

'प्रेम।' सरला ने कहा। उसके कहने में इतनी तेजी थी कि उसके मुँह से निकला 'फ्रेम'।

'सरला ' प्रेम ने कहा।

'प्रेम।' सरला ने कहा। 'तुम्हारे व्यक्तिगत मामले में बोलने का मुझे अधिकार तो नहीं है, पर बोले बिना नहीं रहा जाता।'

'किसने कहा नहीं है। तुम्हें पूरा अधिकार है।' प्रेमाशिष ने कहा।

'मैं जानती हूँ प्रेम कि जो कुछ तुम कर रहे हो, तुम उसे करने के लिये वाध्य हो। फिर भी करने से पहले कुछ तो सोच लेते। मैं पूछती हूँ कि क्या कोई भी लड़की तुमसे बच नहीं सकती?'

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अभी और है। अंतिम किस्त कल शाम तक

Thursday, March 24, 2011

प्रेमिका संवाद -3

प्रेमिका संवाद -3

मदन उठ चुका था तथा चाय में उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। अपने मित्र को अनमना देख कर उसने कैफियत पूछी।

'क्या बताऊँ मदन, मेरे किस्मत हमारे गोलपोस्ट की तरह हो गई है। कोई भी उसमें मनमानी से गोल ठोक सकता है।' प्रेमाशिष न मरी हुई आवाज में कहा।

सुबह-सुबह इस तरह घुमा फिरा कर बात मत करो यार। सीधे बताओ कि बात क्या है।सीधे बताने से समझने में सुविधा रहती है।' मदन ने चास की सुड़की मारते हुए कहा।

'अपनी किस्मत को कोस रहा था।' प्रेमाशिष ने कहा।

'क्यों क्या हुआ तुम्हारी किस्मत को?' मदन ने पूछा।

'बहुत कुछ। सबसे पहली बात तो यह है कि मेरी दवाई की दुकान वाली नौकरी चली गई।' प्रेमाशिष ने कहा।

'तुम्हारा यह नौकरी और छोकरी वाला चक्कर मेरी समझ में कभी नहीं आया। कभी नौकरी के लिये छोकरी जाती है और कभी छोकरी के लिये नौकरी। पर दोनों की कमी कभी नहीं हुई तुम्हारे पास। इस बार क्या बात हो गई जो किस्मत को कोस रहे हो?' मदन ने पूछा

'दूसरी बात यह है कि सरला ने संबंध विच्छेद कर दिया है।' उदास प्रेमाशिष ने और भी उदास होते हुए कहा।

'यह अवश्य नई बात है। नौकरी और छोकरी दानों एक साथ चली गईं। अब समझ में आया तुम्हारी उदासी का कारण।' मदन ने कहा।

'मजाक मत करो मदन। और सरला के लिये छोकरी शब्द का प्रयोग न करो तो अच्छा है।' प्रेमाशिष ने कहा।

'क्या नाम बताया, सरला? यार, तुम कब सरला से मिले, कब उससे संबंध स्थापित किया और कब संबंध विच्छेद हुआ! क्योंकि मुझे अच्छी तरह याद है, जब तीन महीने पहले मैं जब तुमसे मिलने आया था तो उस समय तुम्हारी प्रेमिका सुमति नाम की लड़की थी।' मदन ने आश्चर्य करते हुए कहा। उसे मालूम था कि प्रेमाशिष लड़कियों के मामले में पैरों तले घास नहीं उगने देता है। लड़की देखी नहीं कि वह उस पर मर मिटता है। जाने उसके व्यक्तित्व में क्या आकर्षण था कि लड़कियाँ भी उसकी ओर खिंची चली आती थीं। उसके बारे में यह प्रचलित था कि यदि प्रेमाशिष की सभी भूतपूर्व प्रेमिकाओं को एकत्रित किया जा सके तो उनके लिये एक क्रिकेट का मैदान चाहिये। तब भी शायद जगह की समस्या बनी रहेगी। इतना जानने के बाद भी उसके जीवन में लड़कियों का टर्नओवर देख कर आश्चर्य होता है।

'सुमति और उससे पहले की लड़कियाँ तो बस ऐसे ही जान पहचान भर थीं, मदन, पर सरला ने तो मेरी दुनिया ही बदल दी है। उसके बाद मेरे जीवन में और दूसरी लड़की आ ही नहीं सकती है। एक तरह से मैं उसे भूलने के लिये ही तुम्हारे पास आया था। मुझे क्या पता था कि वह भी यहीं है।' प्रेमाशिष ने कहा।

'तुम यहाँ वाली सरला की बात कर रहे हो?'

'हाँ।'

'वही जो अपनी चचेरी बहन के पास रहने आई है?'

'हाँ, वही। अभी दौड़ते हुए मिली थी।'

'उसकी शादी तो प्रसाद से होने वाली है।'

'हाँ, वह भी मिला था। उसे मालूम है कि सरला और मैं शादी करने वाले थे। वह मुझे धमकी भी दे रहा था। कैसा आदमी है यह प्रसाद?' प्रेमाशिष ने पूछा।

'यार, आदमी तो वह ठीक ही था। पर सरला के साथ उसका रवैया किसी की समझ में नहीं आ रहा है। यह सबको मालूम है कि सरला उससे बहुत चिढ़ती है। पर वह सबसे यही कहता फिरता है कि उसकी शादी सरला से होने वाली है। पर उसकी ऐसी-तैसी। तुम्हारा अनादर करने का अधिकार नहीं है उसे।'

'मैं कह रहा था न कि मेरी तो किस्मत ही खराब है।'

'अब इतने दीन भी मत बनो। सरला के मामले में तो मैं कुछ नहीं कर सकता, हाँ, तुम्हारी रोजी-रोटी की समस्या हल हो सकती है, अगर तुम मेरी साझेदारी वाली बात मान लो तो। पहले मानी होती तो अभी तक हम दोनों मालामाल हो गये होते। अब भी देर नहीं हुई है।'

'ठीक है, आज से तुम्हारी और मेरी साझेदारी। तुम कागज तैयार करो और मैं गाँव का मकान बेच कर रुपयों का बंदोबस्त करता हूँ।'
'यह हुई न बात। इसी बात पर मिठाई खाई जाय।'

'खा लेंगे मिठाई भी।'

'अरे तुमने इतना बड़ा निर्णय लिया है, कुछ तो मूड ठीक करो। यह क्या मुँह लटकाए बैठे हो?'

'यह मुँह तो अब जीवन भर लटका ही रहेगा।' प्रेमाशिष ने कहा।

इतने में मदन की माँ ने आकर उन दोनों को याद दिलाया कि विनोद के यहाँ जाना है।

'अरे बाप रे! मैं तो भूल ही गया। तुमको विनोद की याद है न। अरे, वही मोटा, जिससे तुम पिछली बार मिले थे। मैंने तुम्हारे आने के बारे में कहा तो उसने हमें अभी नाश्ते पर बुलाया है।' मदन ने कहा।

'यहाँ की बस यही बात मुझे पसंद नहीं आती है। बात-बेबात में पार्टियाँ।' प्रेमाशिष ने कहा।

'मिलने का कोई तो बहाना चाहिए। फिर हमारी इस छोटी सी पार्क की दुनिया में मनोरंजन का दूसरा साधन भी तो नहीं है। चलो, जल्दी तैयार हो जाओ। आज मैं तुम्हें एक विशेष व्यक्ति से भी मिलवाऊँगा। पहले तुम अपनी यह मुहर्रमी सूरत ठीक कर लो। मुझे लगता है कि तुम सरला वाली घटना का कुछ अधिक ही असर ले रहे हो। तुम्हारा तो सिद्धांत रहा कि तू नहीं और सही, और नहीं और सही।'

'नहीं मदन, सरला के साथ वह बात नहीं है।'

'तुमने बताया नहीं कि सरला ने संबंध क्यों तोड़ा?' मदन ने पूछा।

'गलतफहमी में। तुम निशा को जानते हो न?' प्रेमाशिष ने पूछा।

'हाँ, वही लड़की न, जो तुम्हारे पड़ोस में रहती है?'

'हाँ वही।'

'तुम्हारी भूतपूर्व।'

'हाँ, वही। एक जमाने में वह सोचती थी कि वह मुझसे प्यार करती है। खैर, उस दौर से वह कभी की निकल चुकी है। अभी वह एक परिपक्व युवा महिला है। अब हम दोनों में साधारण दोस्ती है। मुझे लगता है कि किसी ने सरला को इस दोस्ती के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर बता रखा है। सरला के बार-बार तिक-तिक करने पर मैंने उसे बताया कि कोई ऐसी-वैसी बात नहीं है। मैंने उससे वादा भी कर लिया कि मैं कभी निशा से नहीं मिलूँगा।' प्रेमाशिष ने कहा। फिर उसने लंबी साँस ली और आगे कहना आरंभ किया,

'उसके बाद एक दिन निशा अपनी सहेली रत्ना को लेकर मेरे घर आई। दोनों का पिक्चर का प्रोग्राम था। वे मेरे लिये भी टिकट लेती आई थीं। मुझे मना करते नहीं बन पड़ा। मना करने का कोई कारण भी नहीं था। ऐसी-वैसी बात तो थी नहीं। बदकिस्मती यह कि उसी हाल में सरला भी अपनी एक सहेली के साथ पिक्चर देखने आई थी। दो और दो मिला कर उसने बाईस बना डाला और मेरी अँगूठी वापस कर दी।'


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अभी और है। आगे कल शाम तक

Wednesday, March 23, 2011

प्रेमिका संवाद -2

प्रेमिका संवाद -2


'सरला, तुम यहाँ!' उसने कहा।

'यहाँ मेरी चचेरी बहन रहती है। मैं उसी के पास आई हूँ। तुम यहाँ कैसे?' सरला ने पूछा। उसने सोचा था कि उसने अपने ऊपर काबू पा लिया है। कितनी भूल कर रही थी वह। प्रेम को देखते ही वह प्रेम विह्वल हो उठी है। क्यों आया है प्रेम यहाँ? यदि प्रेम इसी तरह उसे हर गली-नुक्कड़ पर मिलता रहेगा तो कैसे वह उसे अपने जीवन से दूर कर पायेगी। दूर तो उसे रहना ही था। उसे पूरा विश्वास था कि उसका निर्णय उचित है। प्रेमाशिष जैसे दिलफैंक व्यक्ति के साथ रह कर बार-बार मरने से तो यही अच्छा था कि जी कड़ा कर के उसके जीवन से ही दूर चले जाओ। पर प्रेम ऐसा भी तो नहीं करने दे रहा है।

'मैं अपने मित्र मदन के यहाँ कुछ दिन रहने आया हूँ। तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी याद...'

'प्रेम, अब ऐसी बातें मत करो।' उसे बीच में ही रोक कर सरला ने कहा।

इतने में, जिस ओर से सरला दौड़ कर आई थी, उसी ओर से एक व्यक्ति बड़े कष्ट से दौड़ता हुआ उनके पास पहुँचा। और मुँह खोल कर हाँफने लगा। वह एक साधारण कद का दुबला-पतला व्यक्ति था। गालों की हड्डियाँ आगे को आयी हुई थीं, जिससे आँखें धँसी हुई प्रतीत होती थीं। वह बोलने योग्य हुआ तो उसने कहा,

'तुम बहुत तेज दौड़ती हो सरो। मैं तो हाँफते-हाँफते बेहाल हो गया।'

'मैंने तुम्हें साथ दौड़ने के लिये तो नहीं कहा था, प्रसाद।' सरला ने कहा।

'यह कौन है?' उसने प्रेम की ओर देखते हुए पूछा।

'मेरे मित्र हैं प्रेमाशिष। प्रेमाशिष, इनसे मिलो, इनका नाम है प्रसाद।' सरला ने परिचय कराया।

'मित्र?' प्रसाद ने कहा।

'क्यों क्या तुम्हें कोई आपत्ति है?' सरला ने प्रसाद को घूरते हुए ऊँची आवाज में कहा।

'नहीं-नहीं मुझे कोई आपत्ति नहीं है।' प्रसाद ने जल्दी से कहा।

'अच्छा प्रेम, नमस्ते।' कह कर सरला ने हाथ जोड़े और दौड़ती हुई आगे निकल गई।

सरला के जाने के बाद प्रसाद ने प्रेमाशिष को घूरा और कई क्षणों तक घूरता रहा। प्रेमाशिष को समझ नहीं आया, कि वह प्रसाद का क्या बनाये अर्थात् उसे किस शीर्षक के नीचे ले, शत्रु,मित्र या तटस्थ। हालाँकि सरला ने उससे संबंध विच्छेद कर लिया था। अँगूठी वापस करके किसी प्रकार की आशा की कोई गुंजाइश नहीं रखी थी। फिर भी उसे आशा थी क्योंकि उसका प्यार सच्चा था और उसका मन निर्मल। सरला से मिल कर अभी उसने अपनी नीति निर्धारित कर ली कि, सरला को रिझाओ। यह भी आवश्यक हो गया था कि वह सरला से मिलने-जुलने वाले लोगों के साथ कूटनीति का सहारा ले कर अच्छा व्यवहार रखे। प्रसाद में ऐसी कोई बात नहीं थी जो लोगों को उसके प्रति अच्छे व्यवहार के लिये उकसाए। दुबला-पतला शरीर, गोरे कव्वे-सा चेहरा और खनकती आवाज। ऊपर से तुरर्ा यह कि वह उसे फिल्मी खलनायक के अंदाज में घूर रहा था। खलनायक के अंदाज में ही उसने कहा,

'तुम्हारे बारे में सुन चुका हूँ। सरला ने तुमको तुम्हारी दो टके की अँगूठी वापस कर दी है। अब क्या लेने आये हो?'

प्रेमाशिष इस आकस्मिक हमले के लिये तैयार नहीं था। वह मुँह बाये प्रसाद को देखता रहा।

'देखो, सरला और मेरे खानदान में कई पीढ़ियों से संबंध है। सरला की शादी मेरे साथ होने वाली है। मैं तुमको आगाह किये देता हूँ, कोई ऐसी बेवकूफी मत करना जो तुम्हारे स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हो।' इतना कह कर प्रसाद अकड़ कर उसी ओर चला गया जिस ओर सरला गई थी।

प्रेमाशिष का दिल तो किया कि वह प्रसाद की जबान खींच कर, उसी के हाथ में रख कर, उससे पूछे कि अब बोलो क्या बोलते हो? पर वह अपनी ही निर्धारित की हुई नीति के अनुसार आचरण करने के लिये वाध्य था। वह भी वहॉ से उठ कर जाने की सोच ही रहा था कि उसने देखा एक सुंदर, सुडौल, लड़की दौड़ती हुई उसी की ओर आ रही थी। दौड़ने के श्रम से उसकी साँस तेज चल रही थी तथा उसके चेहरे पर लालिमा छलक आई थी। वह उसकी ओर देख कर मुस्कराई और मुस्कराते हुए आगे निकल गई।

सुबह-सुबह तरुणाई की अरुणाई लिये जब कोई सुंदर चेहरा दिख जाय तो जीवन में कड़ुवाहट के लिये कोई स्थान नहीं रह जाता है। जीवन के प्रति लगाव बढ़ जाता है। किसी शायर ने कितना गलत कहा है कि अच्छी सूरत पर लोग बुरी नजर ही डालते हैं। यह कहना गलत होगा कि प्रेमाशिष बहुत प्रसन्नचित्त हो कर घर की ओर गया। हाँ, यह कहा जा सकता है कि प्रसाद ने उसके मन में जो कड़ुआहट घोल दी थी, सुंदर तरुणी की आकर्षक मुस्कान ने उसका असर कम कर दिया था।


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अभी और है। आगे कल शाम तक

प्रेमिका संवाद

प्रेमिका संवाद ( कहानी - मथुरा कलौनी )

मार्च का महीना था। आम के पेड़ों में बौर आ चुका था। जिस सड़क पर प्रेमाशिष दौड़ रहा था, उसके दोनों ओर आम के पेड़ थे। रस टपकने से ऐसा लग रहा था जैसे सड़क पर शहद से छिड़काव किया गया हो। प्रेमाशिष के जूते चिट-चिट कर रहे थे। दौड़ते-दौड़ते वह हाँफ गया तो सुस्ताने के लिये सड़क के किनारे बने एक सिमेंट के बेंच पर बैठ गया। गंगा किनारे धरती पर कछुए के कूबड़ जैसे टीले पर यह पार्क बना हुआ था। चार किलोमीटर परिधि के घेरे में इसकी अपनी अलग ही दुनिया थी। जिस सड़क के किनारे वह बैठा हुआ था, वह पार्क की मुख्य सड़क थी। सड़क के दोनों ओर सुंदर उद्यानों के बीच मकान बने हुए थे। मकानों के नाम भी बड़े मनभावन थे जैसे शांति निकेतन, फूल गाँव, पेड़ों वाला घर इत्यादि। फूल गाँव, जैसा कि नाम से प्रतीत होता है, फूलों के उद्यानों से घिरा हुआ घर था जो प्रेमाशिष के मित्र मदन का था। प्रेमाशिष आजकल मदन के साथ रह रहा था।

उसने सोचा था घर से दूर, मदन के साथ उसका दिल बहल जायेगा, पर ऐसा नहीं हो पा रहा था। यहाँ के शस्य श्यामल सुरम्य वातावरण में उसे अपनी भूतपूर्व प्रेमिका की याद बार-बार आ रही थी। जो प्रेमाशिष को जानते हैं उनके लिये स्पष्ट किया जाता है कि जिस भूतपूर्व प्रेमिका की याद उसे सता रही थी उसका नाम सरला है। उसी के प्रेम में घायल प्रेमाशिष सोच रहा था कि छोटी-सी यह दुनिया, पहचाने रास्ते हैं, तुम कभी तो मिलोगे तब पूछेंगे कि कुमारी सरला क्या मिल गया आपको हमारा प्यार ठुकरा कर?

मदन के पास आने का दूसरा और मुख्य कारण था जीविकोपार्जन का कुछ ठोस और स्थाई कार्यक्रम बनाना। नौकरी उसे मिल नहीं रही थी। किसी ख्यातिप्राप्त अच्छी कंपनी में अच्छी नौकरी के लिये पचपन प्रतिशत अंकों से पास की हुई उसकी बी.ए. की डिग्री यथेष्ट नहीं थी। सरकारी नौकरी के लिये न तो वह किसी आरक्षित कोटे में आता था और न उसकी वंशावली उपयुक्त थी। अभी तो वह कभी किसी शोरूम में, कभी किसी स्टोर में और कभी किसी परचून की दुकान में काम करके अपने जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ा रहा था।

सरला थी तो आशा और विश्वास था कि यह करेंगे वह करेंगे, पर जब उसने संबंध विच्छेद कर दिया तो उसके साथ सारा उत्साह जाता रहा। चूँकि उत्साह नहीं था इसलिए अब वह बहुत कुछ नहीं कर सकता था, पर नून तेल का कुछ न कुछ समाधान तो हो ही जाना चाहिए। रोज-रोज की झिक-झिक किसे पसंद है। प्रेमिका विहीन जीवन की आवश्यकताएँ ही कितनी, पर इस महँगाई में वे भी भारी पड़ रही थीं।

सुबह की शीतल स्वच्छ बयार पेड़ों पर सरसरा कर बह रही थी। चिड़ियाँ अपनी दिनचर्या में जुट चुकी थीं। यहाँ शांति की अनुभूति इतनी थी कि हवा की सरसराहट और चिड़ियों की चहचहाहट के ऊपर वह अपने हृदय की गति भी सुन पा रहा था। थप..थप..थप..थप।

यह क्या, थप-थप की आवाज तेज होती चली जा रही थी। अब वह दाहिनी ओर से आ रही थी। धत् तेरे की। यहाँ खामोशी में किसी के दौड़ने की आवाज को वह अपने दिल की धड़कन समझ बैठा था। दौड़ने वाली एक लड़की थी जो उसी की ओर आ रही थी। उसने लक्ष्य किया कि वह बहुत कुछ सरला से मिलती थी। उसने ट्रैक सूट भी ठीक वैसा ही पहन रखा था जैसा सरला के पास था। सफेद धारियों वाला गहरे नीले रंग का ट्रैक सूट। कद काठी और दौड़ने का अंदाज सब सरला जैसे ही थे।

प्रेमाशिष अपने ऊपर हँस कर दूसरी ओर देखने लगा। सावन के अंधे को सब हरा ही सूझता है। सरला की चाहत में उसकी कल्पना यथार्थ पर हावी हो रही थी। जब लड़की उसके पास पहुँची तो वह ठिठक गई। उसने उसे उसका नाम लेकर पुकारा, 'प्रेम!'

प्रेमाशिष ने जब उस लड़की को पास से देखा तो उसे मालूम हुआ कि वह क्यों सरला जैसी दिख रही थी। वह स्वयं सरला ही थी।

अभी और है। आगे कल शाम तक

Wednesday, June 2, 2010

एक झूठ

कहानियों के लिये सामग्री हमें आसपास की जीवन से मिल जाती है। पात्रों के जीवन में झॉंक कर और कुछ कल्पलना के रंग भर कर कहानी बन ही जाती है। सावधानी यह बरतनी पड़ती है कि पात्र या घटनायें बहुत करीब की न हों। बच्चे क्या सोचेंगे, भाई साहब कहीं बुरा न मान जायँ आदि के चक्कर में रोचक उपन्यासों का मसाला धरा का धरा रह जाता है।

कभी कभी ऐसा भी होता है कि पाठक कपोल कल्पित घटना को सच मान बैठते हैं। ' ऐसी कल्पमना तो कोई कर ही नहीं सकता है, जरूर आपके साथ ऐसा घटा है!'

बहरहाल, आप बताइये कि यह कहानी सच्ची है या नही। मुझे तो लगता है कि इस कहानी का नायक झूठ बोल रहा है। ....




कहते हैं युवावस्था में मन मचल जाता है, दृष्टि फिसल जाती है इत्यादि। रूमानी साहित्य में कालेज-जीवन में ऐसी घटनाओं के होने का वर्णन मिलता है। मेरा छात्र-जीवन अतीत के गर्त में कहीं है तो सही पर उसका वर्णन यहाँ पर विषयांतर होगा। संप्रति नैनीताल में मेरे पास इन सब बातों के लिये समय ही नहीं है। अपने बारे में कभी कभी-कभार सोच लेता हूँ बस। मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है मानो मैंने लड़कपन से सीधे प्रौढ़ावस्था में प्रवेश कर लिया हो, बीच के युवावस्था वाले भाग को लाँघ कर।

अभी मैं अपने विशाल परिवार के भरण-पोषण में लगा हुआ हूँ। साधन कहने को मेरे पास एक छोटा-सा होटल है, होटल क्या है, नीचे 8-10 जनों के लिये बैठने की व्यवस्था और ऊपर रहने की थेड़ी जगह बस। ऊपर रहने की थोड़ी जगह टूरिस्टों को ध्यान में रख कर नहीं बनाई गई थी। ऐसा भी एक समय था, जब ऊपर के सभी कमरे मेरे एकछत्र अधिकार में थे। जब से पिता जी क्षय रोग से ग्रस्त हो कर स्थाई रूप से सेनिटोरियम में रहने लगे थे तब से मेरी आवश्यकताओं के साथ-साथ मेरा आवास भी सिकुड़ गया था। सबसे छोटा कमरा अपने लिये रख कर बाकी मैंने टूरिस्टों के लिये सजा दिये थे।

मेरे होटल की विशेषता यह है कि मेरी अंग्रेजी भाषा के ज्ञान में पब्लिक स्कूल का टच है। सभ्यता और प्रगतिशीलता का एक मापदण्ड यह भी है कि आप अंग्रजी किस तरह बोलते हैं। मैं अपने रोजमरर्ा पहनने के कपड़ों में भी अपनी इस पब्लिक-स्कूली इमेज को बरकरार रखता हूँ। इससे कुछ टूरिस्ट प्रभावित होते हैं। कुछ तो इतने प्रभावित हुये हैं कि वे जब भी नैनीताल आते हैं मेरे ही होटल में ठहरते हैं। मिस्टर पंडित भी ऐसे ही एक टूरिस्ट हैं।

मैंने स्वयं को एक अनुशासन में जकड़ा हुआ है। फिर भी ऐसा नहीं है कि मैं किसी सुंदर तरुणी को देख कर आँखें फेर लेता हूँ। सीजन में नैनीताल में सुन्दर, विवाहित, अविवाहित और सद्य:विवाहित रमणियों का बाहुल्य होता है। कभी क्षण दो क्षण के लिये किसी पर दृष्टि ठहर जाती है। इससे आगे कुछ नहीं। जब मिस्टर पंडित पहली बार मेरे होटल में ठहरने आये थे तो उनकी पुत्री जानकी पर मेरी दृष्टि ठहरी थी। मैंने उसको अपनी ओर देखते पाया था।

बात इतनी ही होती तो कुछ नहीं था। वैसे अब भी कुछ नहीं है। हाँ इतना है कि बात दृष्टि के आदान-प्रदान तक ही सीमित नहीं रही थी। कुछ आागे भी बढ़ी थी।

पहली बार वे लोग बीस दिन ठहरे थे। चार जनों का परिवार था। मिस्टर पंडित, उनकी चुपचाप सी रहनेवाली पत्नी, जानकी और उसकी किशोरी बहन अंजना। उनको घुमाने में कुछ अधिक ही उत्साह दिखया था मैंने। यह अतिरिक्त उत्साह जानकी के लिये ही हो ऐसी बात नहीं है। मिस्टर पंडित बहुत ही मिलनसार व्यक्ति हैं। उनके लिये कुछ अतिरिक्त करने को मन करता है। एक दिन मैं उनको घुमाने स्नो व्यू के पीछे वाले जंगल में ले गया था। उन दिनों वहाँ बुरूँज के फूलों की छटा छाई हुई थी। जंगल के बीच रास्ता तो क्या कोई पगडंडी भी नहीं थी। मुझे याद है झाड़ियों के काँटों से सभी को खरोंच लग गई थी। मिस्टर पंडित बहुत उत्साहित थे। सबसे आगे वही चल रहे थे। अंजना ने अपनी माँ को सँभाला हुआ था। और जानकी भी साथ थी। हर छोटी बड़ी झाड़ी को पार करने के लिये वह मेरा हाथ पकड़ रही थी। यह बिना मतलब के हाथ पकड़ा-पकड़ी और छुआ-छुव्वल का खेल आगे भी चलता रहा। यह जानकी का खेल था। इसे मैंने आरंभ नहीं किया था।

मैं पंडित परिवार के साथ बहुत घुलमिल गया था। उनको हँसाने के लिये मैं उटपटाँग हरकतें किया करता था। मुझे याद है कि एक बार मैंने जानकी के उकसाने पर चाय नमक के साथ पी थी। इस पर वह इतना हँसी थी कि दूसरे दिन मैंने अपनी चाय में टमाटर की सॉस मिला ली थी। चुटकुलों की किताब से खोज-खोज कर चुटीले चुटकुले उनको सुनाता था। उन दिनों मैं बहुत प्रफुल्लित रहता था। क्यों न रहता, मुझे मिस्टर पंडित से बीस दिनों के रहने-खाने के लिये मोटी रकम जो मिलने वाली थी। उन दिनों जानकी मुझे सर के बल खड़ा हाने को कहती तो शायद हो जाता।

छह महीने बाद ही वे 15 दिनों के लिये फिर नैनीताल आये थे। होटल की बुकिंग के लिये जानकी ने मुझे पत्र लिखा था। पत्र लंबा था। कुछ विशेष नहीं, उसके पहली बार के नैनीताल प्रवास की घटनाओं का जिक्र था। पत्र मैंने सँभाल कर रखा हुआ था। टूरिस्टों से मिलनेवाले सभी पत्र मैं सँभाल कर रखता हूँ।

मैं बहुत सुबह ही इंतजाम आदि करने रेस्तराँ में आ जाता था। मेरे नीचे उतरने के कुछ क्षणों बाद ही जानकी भी नीचे उतर आती थी। हम दोनों अक्सर सुबह की चाय एक साथ पीते थे। जाने किस बात को लेकर एकदिन मैंने उससे मजाक में पूछा था,

'कोई खोज रखा है अपने लिये क्या!'

'हाँ।' उसने कहा था। एक हाथ की अँगुलियाँ उसने दूसरे हाथ में फँसा रखी थीं। जुड़े हुये हाथों से अपना निचला होंठ दबाते हुये उसने उत्तर दिया था। उत्तर देते समय वह स्थिर-चित नहीं थी। या हो सकता है यह मेरा वहम रहा हो। मैं उससे नकारात्मक उत्तर की आशा कर रहा था। उसके हाँ कहने से मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था। उस समय मैंने लक्ष्य किया कि वह मेरी ओर ही देख रही थी। मुझे लगा था जैसे वह जानना चाहती हो कि उसकी हाँ का मेरो ऊपर क्या प्रभाव पड़ा।

'वह क्रिश्चियन है' मेरे साथ आँखें चार होते ही उसने कहा था। ( आगे की कहानी इसी शनिवार को)

Sunday, January 10, 2010

तुमने कुछ कहा होता - दूसरा और अंतिम भाग

एक दिन बड़े आत्मविश्वास के साथ मुस्कराते हुए सुमति मेरे पास आई और अपनी शादी का कार्ड दे कर चली गई। मैं आसमान से ऐसा गिरा कि किसी खजूर पर भी नहीं अटका। चारों खाने चित। और तब मुझे पता चला कि सुमति को खो कर मैं क्या खो रहा हूँ। चार दिन तक तो मेरे दिमाग में एक ही सवाल था कि यह क्या हो गया। पर अब पछताए होत क्या...।

मैं एक व्यवहारिक जीव हूँ। मैंने स्वयं को समझा बुझा लिया कि सुमति की शादी हो रही है तो अच्छा ही है। मैं उसका बालसखा हूँ, मुझे तो प्रसन्न होना चाहिए। जब मैंने ही मंशा नहीं दिखाई तो उसे क्या पड़ी थी।

आज जब मैं इस बारे मैं सोचता हूँ तो पाता हूँ कि अन्य सब लड़कियों में भी मैं सुमति को ही तलाशता था। कितना नासमझ था मैं, कितना अंधा था मैं। जो पास थी उसे ही मैं दूर दूसरे परिवेश में खोज रहा था। पता नहीं क्यों उन दिनों मुझे सुमति मेंं एक आकर्षणहीन सादापन ही दिखाई पड़ता था। हो सकता है यह मेरी नजर का धोखा हो। शायद मैं घूम फिर कर और दुनिया देख कर ही घर लौटना चाहता था। यदि मैं देखना चाहता तो वह सब ग्लैमर जो मैं बाहर खोजता फिर रहा था, सुमति में मौजूद था। लड़कपन वाली सुमति और युवती सुमति में मैंने कभी अंतर किया ही नहीं। अपनी कच्ची समझ के कारण एक समझदार, सुलझी हुई और शायद समर्पित लड़की को मैं देख ही नहीं पाया।

आजकल अवकाश के क्षणों में मैं यह भी सोचता हूँ कि क्या कमी थी उन लड़कियों में जिनसे मैंने किनारा कर लिया था। सभी तो अच्छी लड़कियाँ थीं। सबका अपना अपना व्यक्तित्व था। आज समझ में आता है कि वे मुझे क्यों नहीं जँचीं, क्यों कि उनमें कोई भी सुमति नहीं थी। मेरे बिना जाने मेरे गहन भीतर तो सुमति बैठी हुई थी।




खैर, सुमति की शादी हो गई। मैंने स्वयं को समझा लिया कि चलो जो हुआ अच्छा हुआ। इसी में संतोष कर लूँ कि सुमति सुखी है। पर मेरे अंदर शादी करने का उत्साह जाता रहा। अपने मन की क्या कहूँ, सुमति के प्रति अहसास हुआ भी तो कब? सुमति के जाने के बाद। और अपना यह प्यार अपना विकराल रूप लेकर मेरे सामने तब खड़ा हुआ जब मैं सुमति से मिलने गया था उसके घर। तब उसकी शादी हुए सालभर हो गया था।

बहुत बड़ा परिवार था। औरतों और बच्चों की भीड़ थी। उसी भीड़ में सुमति भी थी। बड़ी, मँझली आदि बहुओं के बीच वह खो कर रह गई थी। वह एक अमीर परिवार था। सब कुछ था पर वह नहीं था जो होना चाहिए था। मर्दों की दुनिया अलग थी और औरतों की अलग। पत्नी होनी चाहिए थी, इसलिए थी। केवल वंशवृद्धि के लिए। पति आजाद था, पर पत्नी सास श्वशुर जेठ जेठानियों के अधीन थी।

मुझे वहाँ घुटन महसूस हुई। आया था सुमति से मिलने पर वहाँ औरतों और बच्चों की रेलपेल में उससे बात भी नहीं हो पाई। वहाँ से वापस लौटते समय सुमति के साथ कुछ मिनटों का एकांत मिला तो मैंने उससे पूछा, 'खुश तो हो न सुमति?'

सुमति ने कोई उत्तर नहीं दिया। फिर पता नहीं क्या सोच कर मैंने उसे कुरेदा। मुझे आभास तो मिल ही गया था कि ऐसे माहौल में सुमति खुश नहीं हो सकती। मैंने उससे कहा, 'उस दिन जब तुमने पूरे आत्मविश्वास के साथ मुस्करा कर मुझे अपनी शादी का कार्ड दिया था तो जानती हो मुझे कितनी ठेस पहुँची...'

सुमति बिफर गई। उसने मेरी बात पूरी नहीं होने दी। 'उस तरह मुस्कराने के लिए मैं चार दिनों से अभ्यास कर रही थी शशि। मेरा भी आत्मसम्मान हो सकता है यह तुम्हें ध्यान नहीं आया।'

उसकी ऑखें डबडबा आईं। एक ढुलकते हुए आँसू को उसने अपनी तर्जनी में ले लिया।

'तुमने तो साले मेरा जीवन ही बरबाद कर दिया।' उसने कहा था।

उसकी वह छवि आज तक मेरी आँखों के सामने तैरती है। वह छवि धूमिल पड़े और उम्रेदराज में कुछ साल बचे हों तो शायद मेरी भी शादी हो जाय। जब तक वह छवि धूमिल नहीं पड़ती शादी करके दूसरी गलती करने का मन नहीं है।
समाप्त






Thursday, January 7, 2010

तुमने कुछ कहा होता - एक लघु कथा





मैंने शादी न करने की कसम नहीं खा रखी है। पर हुई नहीं है मेरी शादी अभी तक। अपना सुव्यवस्थित व्यवसाय है। रंग-रूप, कद-काठी औसत से बहुत अच्छे हैं। चालचलन साधारण मापदण्डों के हिसाब से दोष रहित ही है। मतलब यह कि अब तक शादी हो जानी चाहिए थी। सभी पूछते भी हैं कि शादी क्यों नहीं की अब तक, कब कर रहे हो, इत्यादि। पर पता नहीं है। मुझे कोई जल्दी नहीं है।

नहीं नहीं, ऐसा कहना गलत होगा। मुझे पता है कि मेरी शादी क्यों नहीं हो रही है। मैं अपने अंदर शादी के लिये कोई उत्साह नहीं पाता हूँ। पर किसी जमाने में शादी के लिये उत्साह अपनी चरम सीमा में था। उस जमाने में इतना उत्साह, इतनी उतावली रहती थी कि एक प्रेम प्रसंग सामाप्त होते न होते मैं दूसरे में फँस जाता था।

जब मैं छोटा था, यही दस बारह साल का रहा हूँगा जब एक परिवार हमारे पड़ोस में रहने के लिए आया। उस परिवार की बड़ी लड़की का नाम था सुमति। वह मुझसे तीन चार साल छोटी थी। वह मेरी सहपाठिन बनी। साथ पढ़ते खेलते हमलोग बड़े हुए। बड़े हुए तो पता चला कि हम दोनों के परिवार इच्छुक हैं कि हम दोनों की आपस में शादी हो जाय। मैंने इस बात पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था। हाँ, मुझे सुमति को चिढ़ाने का एक हथियार मिल गया था। तब चिढ़कर सुमति मुझे साला कह कर गाली देती थी। क्या होता था उसकी इस गाली में? मुझे घायल करने की नीयत? उलाहना? खिसियाहट? काश, मैंने जानने का प्रयत्न किया होता।

हमारी शादी नहीं हुई। मेरे कहने का अर्थ है हमारी एक दूसरे के साथ शादी नहीं हुई। आजकल मैं कभी कभी कारण ढूँढ़ने का प्रयत्न करता हूँ। जब दोनों परिवार इच्छुक थे तो शादी क्यों नहीं हुई? मेरे परिवार की ओर से शायद कारण था मेरी माँ की बीमारी। या मेरी बहन की शादी। या हो सकता है कारण हमारा आर्थिक अभाव रहा हो। या मेरी ओर से उत्साह का अभाव। बहुत संभव है सभी स्थितियाँ मिल का एक बहुत बड़ा कारण बन गई हों। पिता जी शायद सोचते थे कि लड़की तो बगल में है, सुविधा से शादी कर देंगे। पिता जी कहते तो शायद मैं बिना ना-नू किए सुमति से शादी कर लेता। पर पिता जी को सुविधा नहीं मिली। बहन की शादी के पश्चात् माँ ने बीमारी में दम तोड़ दिया। और माँ की बरसी से पहले ही पिता जी भी हमें छोड़ कर चल दिये। उस समय सुमति एम ए फायनल में थी और परीक्षा के लिए तैयारी कर रही थी। मैंने तो बी एस सी करने के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी थी। मैं एक व्यवसाय करने लगा था।

पिता जी के जाते जाते मेरा व्यवसाय जमने लगा था। तब मुझे उचित जीवन साथी की फिक्र हुई। सुमति तो थी ही पर मैं चाहता था कि मुझे कोई दूसरी लड़की भी मिले। यानी लड़की ने बचपन में आपकी बहती हुई नाक देखी हो तो यह आवश्यक नहीं कि उसी से शादी की जाय। फिर मेरा दुनिया का अनुभव ही क्या था। दुनिया से मेरा मतलब है लड़कियों का। मैं बचपन से एक ही लड़की को जानता था। उससे शादी करने के बाद पता चले कि दुनिया सुमति में ही नहीं सिमटी हुई है तो कैसा लगेगा! और भी लड़कियाँ हैं जो शायद सुमति से बहुत अच्छी निकलें। इधर उधर ताक झाँक करने में हर्ज ही क्या है। कोई नहीं मिली तो सुमति तो है ही।

तो इस ताक झाँक में मैं ललिता, अरुणा, बार्बी आदि के दौर से गुजरा। कहीं आभिजात्य आड़े आया तो कहीं धर्म। एक दो लड़कियों से तो मैंने स्वयं किनारा कर लिया था।

इस बीच मेरी सुमति से भी यदा कदा मुलाकात हो ही जाती थी। कभी मुझे लगता था कि वह मुझसे उतनी सहज नहीं है। या क्या यह मेरा भ्रम था? कभी लगता था कि हमारे बीच वही पुरानी सहजता है। या क्या यह भी मेरा भ्रम था?

मेरी लड़कियों से मित्रता के बारे में न कभी सुमति ने कुछ पूछा ओर न ही मैंने उसे इस संबंध में कुछ बताने की आवश्यकता समझी। मेरे मस्तिष्क के किसी कोने में यह विचार कर रहा था कि मुझे सुमति से शादी करनी चाहिये उधर सुमति और उसके परिवार का कुछ दूसरा ही प्रोग्राम बन रहा था जिसकी मुझे कोई खबर नहीं थी। खबर होती कैसे, उस समय तो मैं बार्बी की अधकटी जुल्फों में उलझने की चेष्टा कर रहा था।



कहानी बस थोड़ी और है। दूसरा और अंतिम भाग आगामी इतवार तक...

Thursday, July 9, 2009

सब कुछ ठीक ठाक है

अवकाश प्राप्त करने के बाद पिताजी गाँव चंदनी में बस गये हैं। बीस बीघा जमीन है। जमीन के बीचोबीच आरामदेह और सुरुचिपूर्ण मकान बनाया है। दाहिने और बाएँ पड़ोस में उनके मित्र बसे हुए हैं। यारदोस्त अच्छे हें। पेन्शन है। बैंक में अच्छा बैलेन्स है। मतलब पिताजी सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे हैं। हाँ, एक दुख उनको अवश्य है। उन्हीं के शब्दों में उनका इकलौता लड़का नालायक निकला। यह बात और हैे कि मैं कितना ही लायक क्यों न बनूँ उनकी दृष्टि में सदा नालायक ही रहूँगा। मुझे नालायक सिद्ध करने के लिए उनके पास सैंकड़ों उदाहरण हैं। पर एक बात वह विशेष जोर दे कर कहते हैं, वह यह कि चंद्रिका जैसी रूपवान और बुद्धिवान लड़की से मैंने शादी नहीं की।

रूप और बुद्धि के साथ चंद्रिका में एक और गुण यह है कि वह पिता जी के अभिन्न मित्र कृष्णकुमार जी की सुपुत्री है। चंदनी में दाहिने पड़ोस में कृष्णकुमार जी ही रहते हैं। कलकत्ते में भी हमारे दोनों परिवार साथ ही रहते थे। दोनों परिवारों के बड़े चाहते थे कि चंद्रिका और मेरी शादी हो जाय। छुटपन में तो यह एक दूसरे को चिढ़ाने का विषय था। बड़े हुए तो वह अपने रास्ते लगी और मैं अपने। वह अपने पहले से ही बड़े मस्तिष्क में अधिक से अधिक ज्ञान भरने की चिंता में लगी और मैं रोजी रोटी की चिंता में। इस दौर हमारा मिलना भी बहुत कम हो गया था।

मुझे अच्छी नौकरी मिल गई और जीवन स्थिर हुआ तो घरवालों ने तिकतिक लगानी शुरू की कि बच्चू अब शादी कर लो, चंद्रिका तुम्हारे लिए बैठी नहीं रहेगी, इत्यादि। तब मैंने सोचा हर्ज ही क्या है। विचार करने पर यह विचार मुझे पसंद आने लगा कि मेरी शादी अब हो ही जानी चाहिये। शुभकार्य आरंभ करने के लिए मैंने चंद्रिका को फोन किया। चूँकि मामला व्यक्तिगत था इसलिए घर से दूर विक्टोरिया मेमोरियल में मिलने का प्लान बनाया।
ठीक समय पर चंद्रिका आई। उसे देख कर मुझे लगा कि इस बीच हम दोनों कितने कम मिले थे। सबसे पहली चीज मैंने लक्ष्य की वह चंद्रिका का चश्मा था।

'तुमने चश्मा कब से लगाना शुरू कर दिया?'

'बहुत दिन हो गए।'

'बताया भी नहीं!'

'इसमें बताने लायक कौन सी बात है!'

यह सचमुच बताने योग्य कोई बात नहीं थी। मैंने चंद्रिका को बुला तो लिया था पर असल विषय को छेड़ने में मुझे घबराहट हो रहीं थी। हालाँकि पहले कोई भी ऐसी बात नहीं होती थी जिस पर मैं चंद्रिका से सहजता से बात नहीं कर सकता था। युवावस्था ने विशेष कर चंद्रिका की युवावस्था ने हमारे बीच की सहजता समाप्त कर दी थी। फिर पता नहीं क्यों वह चश्मा बहुत आड़े आ रहा था।

'तुम्हारी परीक्षा कब है?' मैंने पूछा था।

'कौन सी परीक्षा?'

'एम. ए. की।'

'कहॉ रहते हो? एम.ए. तो मैंने पिछले साल ही पास कर लिया था।'

'पर तुम्हारे पिता जी तो कह रहे थे कि तुम अध्ययन में बहुत व्यस्त रहती हो।'

'हाँ आजकल मैं जीवविज्ञान पर व्यक्तिगत रूप से अध्ययन कर रही हूँ।'

'एम.ए. में तो तुम्हारा विषय मनोविज्ञान था।'

'हाँ। '

'तो अब जीवविज्ञान क्यों?'

'जीव विज्ञान क्यों नहीं?' उसने अपने चश्मों के पीछे से विचित्र भाव से मुझे देखा था। मानो वह अपने जीवविज्ञान के ज्ञान का प्रयोग मुझ पर कर रही हो।

'तुम क्या कर रहे हो आजकल?' अब उसके पूछने की बारी थी।

'नौकरी कर रहा हूँ। मैंने कुछ दिन पहले तुमको बताया तो था।'

'हाँ, मुझे मालूम है। मेरे कहने का मतलब था नौकरी के अलावा क्या कर रहे हो?'

'नौकरी के अलावा!'

'मेरा मतलब अध्ययन आदि था।'

'ओ अध्ययन! उससे तो मैंने छुटकारा पा लिया है।'

मैंने उसे अपनी ओर फिर उसी विचित्र भाव से देखते हुए पाया था। तब मुझे याद आया कि अध्ययन पर उसके विचार क्या हैं। 'खाली समय में कुछ पढ़ लेता हूँ।' मैंने बड़बड़ा कर कहा था।

'आजकल क्या पढ़ रहे हो?'

'आजकल सूरज का एक उपन्यास...'

'सूरज?'

'मेरा मतलब था सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।' मैंने जल्दी से कहा था। इससे पहले कि अध्ययन पर हमारी बहस छिड़े मैंने असल मुद्दे में बात कर लेना उचित समझा था।

'चंद्रिका।'

'बोलो।'

'मैंने तुम्हें एक विशेष बात करने के लिए बुलाया है।'

'मुझे मालूम है।'

'मालूम है! कैसे मालूम है?'

'सीधी सी बात है प्रताप। तुमने मुझे घर न बुला कर इतनी दूर यहाँ बुलाया है। और आजकल हम दोनों के घरों में में जो बात हो रही है उसे छोड़ कर और क्या बात हो सकती है?'

'चलो तुमने बात आसान कर दी। तो क्या कहती हो, हम अपने माँ बाप को प्रसन्न कर दें?'

मेरी बात सुन कर वह खिलखिला कर हँसने लगी थी। मुझे बुरा लगा था। 'इसमें हँसने की कौन की बात है?' मैंने पूछा था।

'हँसने की ही तो बात है। ऐसा कह कर शायद ही किसी ने आज तक किसी लड़की का हाथ माँगा होगा।'

'तो क्या हुआ, थोड़ा अनूठापन ही सही।'

'प्रताप क्या तुम अपने माँबाप को प्रसन्न करने के लिए शादी कर रहे हो?' अब वह थोेड़ी संजीदा हो गई थी।

'मैं भी प्रसन्न होऊँगा। अब यह भी बताना पड़ेगा?'

इसके बाद वह थोड़ी देर तक कुछ नहीं बोली थी।

'क्या सोच रही हो?' मैंने पूछा था।

'सोच रही थी कि हमारा वैवाहिक जीवन कैसा रहेगा।'

'कैसा रहेगा माने? अच्छा रहेगा।'

'तुम अध्ययन में विश्वास नहीं रखते हो।' उसके लहजे में शिकायत थी।

'तो क्या हुआ। आवश्यकता पड़ी तो थोड़ा बहुत अध्ययन मैं भी कर लिया करूँगा।'

'तुम मेरी जीवनशैली में बाधा तो नहीं डालोगे?'

'मेरा अपमान मत करो, चंद्रिका। तुम मुझे बचपन से जानती हो। उल्टा सीधा सोचना बंद करो। हमारे बड़े यही चाहते है कि हम दोनों शादी कर लें। अब मैं तुमसे पूछता हूँ कि क्या तुम मुझसे शादी करोगी ?'

'हाँ प्रताप।' उसने कहा था और मेरा हाथ थाम लिया था।


मुझे प्रसन्न होना चाहिए था कि एक सुंदर और सुशिक्षित कन्या से मेरी शादी तय हो गई है। पर नहीं। उस दिन घर लौटा तो मन में सब कुछ उलझा उलझा था। पहले इस संबंध में गहराई से सोचा नहीं था और अब कोई छोर पकड़ में नहीं आ रहा था। ऊँट किसी करवट सीधा नहीं बैठ रहा था। लगता था कोई बहुत बड़ी मूर्खता कर डाली थी मैंने। मनोविज्ञान में एम.ए.। जीवविज्ञान में व्यक्तिगत अध्ययन। जब देखो कोई मोटी किताब पढ़ती रहती थी। चंद्रिका जैसी पुस्तकमुखी के साथ जीवन बिताने की बात सोच कैसे ली मैंने। वह तो मुझे संदर्भ दे कर बतायेगी कि प्यार कैसे करना चाहिए। दो दिनों में ही मेरी अवस्था हवा निकले टायर सी हो गई। ....


(कहानी का दूसरा और अंतिम भाग दिनांक 12 जुलाई को)

Sunday, October 12, 2008

मोहनी मूरत

प्रिया में वे सभी गुण थे जो एक ऑफिस एसिस्टेंट के पद के लिए आवश्यक होते हैं। मोहिनी मूरत और सोहिनी सूरत। प्रचुर मेधा। सभी कुछ ठीक-ठाक और सुंदर। रिक्त पद के लिए उसका चयन हो गया।

सच बोलूँ तो मैं नहीं चाहता था कि ऑफिस एसिस्टेंट के पद के लिए प्रिया का चयन हो। मेरे लंबे अनुभव ने मुझे सिखाया है कि यदि कोई कन्या आपकी अधीनस्थ हो और प्रिया जैसी संघातिक रूपवती हो, तो वह अपने रूप के दंभ में इस तरह लिप्त होती है कि अंग्रजी में 'पेन इन दि नेक' यानी गर्दन का दर्द और हिंदी में सिर का दर्द साबित होती है। परंतु मेरा सौभाग्य कि प्रिया के संबंध में मेरे भय एकदम व्यर्थ सिद्ध हुए। वह एक आडंबर विहीन, परिश्रमी और कार्यकुशल लड़की निकली। हम कभी कितना गलत सोचते हैं।

एक दिन प्रिया एक विचित्र अनुरोध ले कर मेरे पास आई। वह ऑफिस के लेडीज टॉयलेट में एक फुल-लेन्थ आईना चाहती थी। पहले तो मुझे समझ में ही नहीं आया कि वह क्या चाहती है। जब समझ में आया तो विश्वास नहीं हुआ। यानी एक ऑफिस में पूरे शरीर को दर्शाने वाला आईना किसने देखा-सुना है। मैंने हंस कर उससे कहा कि वह पूरे आईने को भूल जाए और वाश बेसिन के ऊपर जो छोटा आईना है उसी से काम चलाए। मैं अधिक-से-अधिक उसे एक छोटा स्टूल दे सकता था, जिस पर खड़े हो कर वह वाश बेसिन के ऊपर लगे आईने में स्वयं को इंस्टालमेंट में देख सकती थी। जब मैंने उससे ऐसा कहा तो मेरे इस सरल परिहास पर उसे हँसी नहीं आई। पर अपना आईना वह भूली नहीं। उसने एक जिद सी पकड़ ली थी। उसे जब भी अवसर मिलता वह आईना माँगना नहीं भूलती।

उसके बार-बार माँगने से मैं इस तरह द्रवित हो गया था कि यदि मैं कहीं का राजा होता तो खुशी-खुशी अपना आधा राज्य उसे दे देता। मैंने बड़ी मुश्किल से उसे विश्वास दिलाया कि ऑफिस में लेडीज टॉयलेट में फुल-लेन्थ आईना लगवाना मेरे अधिकार क्षेत्र के बाहर है। अब वह यह अनुरोध करने लगी कि मैं मैनेजर के पास जाऊँ।

'असंभव।' मैंने कहा, ' अपनी बाल-प्वाइंट पेन के लिए जब भी नए रीफिल की आवश्यकता पड़ती है, मुझे उसे पुराना इस्तेमाल किया हुआ रीफिल दिखना पड़ता है, तक जा कर वह नया रीफिल सेंक्शन करता है। हमारा मैनेजर इस कदर कंजूस है। अब मैं उससे टॉयलेट में पूरे आईने की बात करूँ तो शायद उसकी हृदयगति ही रुक जाय।'

मेरी बात पर प्रिया को विश्वास नहीं हुआ। उसने मुझसे पूछा, ' मैं जाऊँ मैनेजर के पास।'

उसका ऐसा कहना मुझे कहीं छू गया। यह उसकी अच्छी प्रकृति थी कि उसने पहले मुझसे पूछा। नहीं तो उसकी जैसी मोहिनी-मूरत-सोहिनी-सूरत-लड़कियाँ सीधे चेयरमैन के ऑफिस में जा सकती हैं। एक अदना मैनेजर की क्या बिसात?

पर मैं अपने मैनेजर को अच्छी तरह जानता था। उसके जैसा शुष्क प्रकृति वाला व्यक्ति शायद ही कहीं हो। उसमें रस के नाम पर था रेगिस्तान ही रेगिस्तान। प्रिया की सोहनी सूरत से वह नहीं प्रभावित होने वाला था।

'उससे छह आईनों के लिए कहना।' मैंने राय दी।
'छह क्यों, मुझे तो केवल एक चाहिए।' प्रिया ने कहा। मुझे मालूम था कि वह ऐसा ही कहेगी।

'इस ऑफिस में यदि किसी एक वस्तु की आवश्यकता होती है तो छह माँगनी पड़ती हैं। मुझे मालूम है, मैनेजर के खानदान में मोल-भाव करने की बड़ी पुरानी परंपरा है। मेरी मानो, छह माँगना। यदि उसका मूड ठीक रहा तो शायद तुम्हें एक आईना सेंक्शन कर दे। गुड लक!' मैंने कहा।

प्रिया मैनेजर के कमरे में गई और पाँच मिनटों में बाहर आ गई। उसके चेहरे के भाव देख कर मैं समझ गया कि उसे सफलता नहीं मिली। मुझे उसके ऊपर अपार दया आई। भगवान ने उसे इतनी मोहिनी सूरत दी है, पर क्या फायदा? इतिहास साक्षी है कि अच्छी सूरत के कारण लोग राजपाट छोड़ देते हैं। पर यहाँ एक कंजूस मैनेजर की मुट्ठी से प्रिया एक साधारण आईना नहीं छुड़ा पाई। भले ही उसमें रूप का दंभ न हो पर उसके स्वाभिमान को तो ठेस पहुँचनी ही थी।

'यह क्या हो गया है, मेरी तो समझ में ही नहीं आ रहा है।' उसने खोए हुए अंदाज में कहा।

'टेक इट ईजी प्रिया! तुम चिंता न करो। मैं कुछ-न-कुछ करूँगा तुम्हारे आईने के लिए।' मैंने उसे दिलासा देने का प्रयत्न किया।

'तुम समझ नहीं रहे हो। मैनेजर ने मुझे छह आईने सेंक्शन कर दिए हैं।' प्रिया ने कहा।

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