जावेद साहब अपने किसी काम से बेंगलोर आये हुए थे। उम्मीद कर रहा था कि आजकल में मुझसे मिलने आयेंगे। फोन करके उन्होंने बताया कि वे कल का लंच मेरे साथ करेंगे क्यों कि लंच के बाद ही उन्हें ट्रेन पकड़नी है। नहीं तो मिलना नहीं हो पायेगा। मैंने कहा कि आप आइए। लंच हमारे साथ कीजिए। और फिर मैं उनको स्टेशन तक छोड़ दूँगा।
'मैं कंपनी की कार में आऊँगा। इसलिए आपको तकलीफ नहीं दूँगा। और देखिए खाने में मेरे लिये कुछ स्पेशल करने की जरूरत नहीं है। नहीं तो मैं नाराज हो जाऊँगा।'
'अरे आप आइए तो सही।'
'मैंने इसलिए कहा कि असल में हमारा मकसद तो आपस में मिलना है। समय नहीं निकाल पाया इसलिए लंच में मिल रहे हैं। ऐसे में मैं आपको बेकार तकलीफ नहीं देना चाहता।'
'जावेद साहब कोई तकलीफ नहीं होगी। इतने दिनों बाद तो हम मिल रहे हैं। गप्पें मारेंगे और खाना साथ में खायेंगे।'
'जरूर जरूर। पर आप तो रोजमरर्ा खाते हैं वही बनाइएगा।'
'ठीक है वही बनायेंगे आप आइए तो सही।'
मैं आपको बता दूँ जावेद साहब एक खब्ती इनसान हैं। कब कौन सी खब्त उन पर सवार होगी आप कह नहीं सकते।
अगले दिन सुबह सुबह उनका फोन आ गया। 'मैं ग्यारह बजे पहुँच जाऊँगा। देखिए जो घर में है वही बनाइएगा। कुछ स्पेशल बनाने की जरूरत नहीं। नहीं तो में नाराज हो जाऊँगा।'
मैंने उनको यकीन दिलाया कि कुछ भी स्पेशल नहीं बनेगा उनके लिये। वे ग्यारह बजे आये। आते ही बोले, 'देखिए आपने यह बहुत गलत काम किया। रसोई से पकवानों की खुशबू आ रही है। आपने भाभी जी से कुछ स्पेशल बनाने को कहा होगा। इसकी क्या जरूरत थी। हमारा मकसद तो मिलना था न।'
आ गया मुझे भी गुस्सा। 'दोपहर खाने का समय हो रहा है। इस समय हम लोग पानी पीकर घुटने पेट में डाल कर नहीं बैठे रहते हैं। रसोई में कुछ बना कर खा लेते हैं। ऐसे में कोई मेहमान आ गया तो हम रसोई बनाना नहीं छोड़ते। आज रविवार है, कुछ न कुछ तो खास बनता ही है। ऐसा एकदम न समझिएगा कि यह सब हम आपके लिये कर रहे हैं। यह सब तो हमने अपने लिये बनाया है। अब जब आप आ गये हैं तो आपको भी वही परोसेंगे न। आपने कहा था कि आपके लिये स्पेशल न बनाया जाय सो हम नहीं बना रहे हैं। यह खाना आपको स्पेशल लगे तो कोई बात नहीं आप नमक के साथ भात खा लीजियेगा।'
इस बात को कई साल बीत गये हैं। अभी उनकी लड़की बेंगलोर तबादले में आई है। उसने फोन किया 'अंकल मैं संडे को आऊँ?'
'हाँ हाँ आ आजाओ। दिन का खाना हमारे साथ ही खाना।'
'ठीक है अंकल। आंटी से कहिएगा कि वे मेरे लिये कुछ भी स्पेशल न बनायें। नहीं तो मैं गुस्सा हो जाऊँगी।'
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4 comments:
अजी आप नहीं समझे? इस का मतलब ही है कुछ स्पेशल जरूर बनाइए।
ऐसा भी होता है जी......क्या करें..;)
हा हा! अब तो स्पेशल की बनती है. :)
"जावेद साहब एक खब्ती इनसान हैं। कब कौन सी खब्त उन पर सवार होगी आप कह नहीं सकते।"
"अब तो स्पेशल बनवा ही देना"
"धन्यवाद्" आने और सलाह दोनों के लिए
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