Saturday, November 14, 2009

उसके बारे में

सभी जानते हैं उसके संबंध में लेकिन कोई भी उसका नाम अपनी जुबान पर नहीं लाता। नाम उच्चारण करने में बहुत अश्‍लील लगता है। पहले तो बड़े बड़े साइन बोर्डों में, नगरपालिका की दीवारों पर और सिनेमा के पर्दे पर ही उसका नाम दिखाई पड़ता था पर जबसे टेलीविजन लिया है ठीक बैठक के कमरे में उसके बारे में देखने और सुनने को मिलता है। लिहाजा मोहन चिंतित है।

मोहन की दो पुत्रियॉं हैं। एक नौ साल की है और दूसरी छह साल की। दोनों ने टी वी पर आने वाले सभी विज्ञापन याद कर रखे हैं। टूथपेस्ट के बारे में हो या प्रेसर कुकर के बारे में, घड़ी के बारे में हो या आम के अचार के बारे में, कोई भी ऐसा विज्ञापन नहीं जो उन दोनों को याद न हो। दोनों लड़कियॉं समवेत कंठ से टी वी के साथ साथ विज्ञापन की पंक्तियॉं दोहराती हैं। इन्हीं विज्ञापनों में एक उसके बारे में भी होता है। इस विज्ञापन को भी दोनों लड़कियॉं निश्‍छल भाव से दूसरे विज्ञापनों की तरह ही दोहराती हैं।

मोहन और उसकी पत्नी जब उन दोनों के मुँह से उस विज्ञापन को सुनते हैं तो ऐसा दिखाते हैं जेसे सुना ही न हो। ऐसा साहस उन दोनों में से किसी को भी नहीं है कि लड़कियों को मना कर सकें कि उस विशेष विज्ञापन को न दोहरायें। मना करने का कोई कारण भी नहीं सूझता उन दोनों को। इस डर से उनकी नींद हराम हो गयी है कि अगर दोनों में से किसी ने कुछ पूछ दिया कि वह क्या होता है तो वे क्या उत्तर देंगे! पत्नी के सामने तो मो‍हन बहुत बहादुर बनता है, किन्तु उस संभावित प्रश्‍न का उत्तर उसे नहीं सूझता।

'क्या उत्तर देंगे?' पत्नी पूछती है।

'सच बता देना। हर्ज ही क्या है!' मोहन कहता है।

'इतनी कच्ची उमर में क्या वह ठीक समझ पायेंगे! बेकार में गलत दिशा में उनका घ्यान खींचना ठीक होगा? मैं तो कुछ झूठ बोल कर बात टाल दूँगी।'

'नहीं नहीं बच्चों से झूठ नहीं बोलना चाहिये। फिर बच्चे भी तो कुछ समझते हैं ही, तुरन्त पकड़ लेंगे कि झूठ बोला जा रहा है। वे सोचेंगें ऐसा क्या है जो छिपाया जा रहा है। ऐसे में वे इस पर गलत तरीके से सोचेंगे। सच ही बोलना चाहिये।'

'कैसे?' पत्‍नी पूछती है।

'सच जैसे बोलते हैं। वैसे बाहर के देशों में तो इस संबंध में स्कूल में ही बता देते हैं।' मोहन का कहना था।

वे दोनों इसी तरह की बातें करते लेकिन इस समस्या का समाधान कैसे करेंगे इस विषय पर उनकी कोई सुलझी हुई धारणा नहीं थी। सब गोल था। उनकी किस्मत अच्छी थी कि उन दोनों में से किसी ने अभी तक उसके बारे में नहीं पूछा था। वे टी वी के साथ विज्ञापन को दोहराती थीं बस।

किस्मत अच्छी थी केवल अब तक। अब छोटी ने उन्‍हें चिन्ता में डाल दिया था। कहने का अर्थ है कि पहले से अधिक चिन्ता में डाल दिया था। संभावित प्रश्‍न के पूछे जाने की संभावना अचानक बहुत अधिक बढ़ गयी थी। छोटी इस संबंध में बहुत कुछ सोच रही थी। उसकी बातों से यही लगता था। एक दिन उसने अपनी मॉं से पूछा था, 'मम्मी हम लोग दो ही हैं, दीदी और मैं। कितना अच्छा है न। तीन होते तो तुमको कितना कष्‍ट होता? खाने की मेज में जगह नहीं होती और सोने के लिये भी एक और पलंग लगाना पड़ता!'

और एक दिन उसने मोहन से कहा 'पापा स्कूटर में मम्मी और दीदी तो पीछे बैठते हैं और मैं सामने खड़ी होती हूँ। हम लोग तीन होते तो तुम क्या करते? तीसरे बच्चे को कहॉं बिठाते?'

उनके एक पड़ोसी के पॉंच बच्चे हैं। परिवार नियोजन के बारे में बेचारे को तब मालूम हुआ जब बहुत देर हो गयी थी। मोहन की छोटी मुन्नी उन बच्चों के बारे में बहुत चिन्तित थी। कई बार कह चुकी थी कि वे बेचारे एकसाथ बैठकर खाना नहीं खा सकते, एकसाथ पिक्चर नहीं जा सकते इत्यादि।

मोहन और उसकी पत्‍नी हम दो हमारे दो से संतुष्‍ट थे। छोटा परिवार सुखी परिवार। मुन्नी के इन नये प्रश्‍नों से एक नया डर पैदा कर दिया है उनके मन में। जिसको अभी तक असंभव किये बैठे हैं कहीं संभव हो गया तो क्या होगा? क्‍या मुँह दिखाऍंगे इन बच्‍चों को!

खैर यहॉं बात उसके बारे में हो रही थी जिसका विज्ञापन उनकी पुत्रियॉं टी वी के साथ दोहराती हैं। इस संबंध में एक दिन उनका डर साकार हो ही गया। टी वी में विज्ञापन आया। दोनों ने एक साथ दोहराया सुखी वैवाहिक जीवन के लिये ...............। छोटी दौड़ती हुई अपनी मॉं के पास गई और उसने पूछा, 'मम्मी वह क्या होता है?'

यह घटना रसोईघर में हुई। मोहन बैठक से सब देख रहा था। उसने देखा कि उसकी पत्नी सकपका गई है। प्रश्‍न संभावित अवश्‍य था। लेकिन पत्नी को आशा नहीं थी कि यह पहले उसीसे पूछा जाएगा। वह तैयार नहीं थी। सारी प्लानिंग धरी की धरी रह गई। उसने कहा, 'मुझे काम करने दो मुन्नी, जाओ खेलो।'

'क्या मम्मी इतनी रात को भी कोई खेलता है? बताओ न वह क्या होता है?'

'बेटा ऐसा होता है न कि जब अस्पताल में बच्चे पैदा होते हें तो....तो...देखो मेरी रोटी जल गई। मैं बाद में तुमको बता दूँगी हॉं। अभी मुझे खाना बनाने दो।'

'नहीं मम्मी अभी बताओ।'

'कहा ना बाद में बता दूँगी।' मुन्नी को डॉंटते हुए पत्नी ने कहा।

'मुन्‍नी को क्यों डॉंटती हो?' मोहन ने कहा। 'डॉंटना ठीक नहीं है। उसे बता दो। उसकी जिज्ञासा शांत कर दो बस।'

'मुन्‍नी बेटा ऐसा करो अपने डैडी से पूछ लो।' मोहन की पत्नी ने कहा।

मोहन को इसकी आशा नहीं थी। मुन्नी दौड़ती हुई उसके पास गई और उसने पूछा, 'पापा मम्मी नहीं बता रही है। तुम बताओ न वह क्या होता है?'

'मुन्‍नी अपनी मम्मी से बाद में पूछ लेना। देखो मैं अभी कुछ पढ़ रहा हूँ।' मोहन ने बचने का प्रयत्न किया।

'नहीं नहीं अभी बताओ।' मुन्नी ने जिद की और मोहन ने बताना आरंभ किया।

'बेटा ऐसा होता है न कि ....' इसके आगे मोहन की समझ में नहीं आया कि वह क्या बोले। फिर साहस करके आगे कहा। 'ऐसा होता है न कि अस्पताल होता है जहॉं बच्चे पैदा होते हैं...।' इसके बाद उसने अस्पताल और उसकी बिल्डिंग का लंबा चौड़ा विवरण प्रस्तुत किया इस आशा से कि मुन्नी अपना प्रश्‍न भूल जाएगी। वह भूलती भला। उसने कहा 'पापा तुम ठीक नहीं बता रहे हो बताओ न वह क्या होता है?'

'मुन्‍नी मुझे नहीं मालूम है।' मोहन ने हथियार डालते हुये कहा। उसे यह डर लगा हुआ था कि कहीं बड़ी लड़की भी न पहुँच जाय जो अभी टी वी देखने में व्यस्त थी।

'तुम बुद्धू हो और मम्मी भी बुद्धू है। मुझे मालूम है कि वह क्या होता है।' मुन्नी ने उछलते हुये कहा।

पत्‍नी रसोई से बाहर आ गई। दोनों ने एक स्वर में मुन्नी से पूछा, 'तुम क्या जानती हो उसके बारे में?'

'उससे परिवार नियोजन होता है।' मुन्नी ने कहा।

4 comments:

Manish Kumar said...

sahi kah rahe hain aap nayi peedhi hi dheere dheere is asahajta ko mita degi.

श्यामल सुमन said...

एक सार्थक बात को रोचक ढ़ग से आपने प्रस्तुत किया।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

Udan Tashtari said...

निश्चित ही एक सार्थक विषय पर आपने बढ़िया तरीके से विचार रखे हैं.

निपुण पाण्डेय said...

बहुत ही सुन्दर लेख !!!
एक ज्वलंत प्रश्न : कि बच्चों को भारतीय समझ में ये शिक्षा कैसे दी जाये ??
बहुत सुन्दरता से इस माध्यम से समझया है आपने !