Thursday, November 5, 2009

अलोहा

कभी कभी अपराध बोध होता है कि मैंने बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा। अधिकतर सोच में पड़ जाता हूँ कि लिखूँ तो क्या लिखूँ। यह कंप्यूटर की देन है कि मुझे RSI व्याधि है। यानी देर तक कीबोर्ड प्रयोग करने पर मेरे हाथ में दर्द होने लगता है। मैं मन को सांत्वना दे लेता हूँ कि मुझे नहीं लिखने का बहाना ढ़ूँढ़ने की आवश्यकता नहीं है। अरे विषय मिल भी जाय तो क्या हुआ, टाइप तो नहीं कर पाऊँगा न! हाथ में दर्द जो होने लगेगा!

पर पढ़ने में जो कोई बाधा नहीं। न सृजन की व्यथा, न RSI । तो साहब जब मुझे लिखना चाहिए और जब मैं लिखने के लिये समय निकालता हूँ तो लिखने से जान छुड़ाने के लिये मैं ब्लॉग पढ़ता हूँ। विशेष कर टिप्पणियाँ पढ़ने में मुझे बहुत आनंद आता है। मैंने पाया है कि अँंग्रजी ब्लागों में लोग रचना या विषय से अभिभूत हो कर टिप्पणी करते हैं या अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। हिन्दी ब्लॉगों के टिप्पणीकार थोड़ा हट कर हैं। अधिकांश तो रचना का एक अंश copy paste कर लिखते हैं 'बहुत खूब'। कुछ केवल 'बहुत बढ़िया' लिख कर खिसक लेते हैं। यह 'बहुत खूब' या 'बहुत बढ़िया' बिल्ली के म्याऊँ जैसा है। पता ही नहीं चलता कि म्याऊँ में क्या छिपा है, प्यार, गुस्सा, तारीफ या गाली। बहुत कुछ होनोलूलू के 'अलोहा' जैसा। पहले लगा कि वहाँ स्वागत में 'अलोहा' कहते हैं। पर शीघ्र ही पता चला कि आओ तो 'अलोहा', जाओ तो 'अलोहा', खाओ तो 'अलोहा' कुछ नहीं करो तब भी 'अलोहा'।
ऐसे ही साहब मुझे हिन्दी ब्लॉगों की 'बहुत खूब' या 'बहुत बढ़िया' टिप्पणियाँ लगती हैं।

मजे की बात यह है कि ये 'बहुत खूब' या 'बहुत बढ़िया' टिप्पणियाँ लिखने वाले प्राय: हिन्दी के हर ब्लॉग में मिल जाते हैं। ऐसा लगता है कि टिप्पणी लिखने वाला यह दृढ़ निश्चय कर कंप्यूटर खोलता है कि कल मैंने 175 टिप्पणियाँ दी थीं आज कमसेकम 200 टिप्पणियाँ तो अवश्य दूँगा।

आप पूछेंगे कि ऐसी टिप्पणियाँ पढ़ने में मुझे क्या मनोरंजन मिलता है।

मैंने उन टिप्पणीकारों के नाम नोट कर रखे हैं। मुझे लगता है कि कहीं न कहीं ये टिप्पणीकार सजग हो जाते हैं कि भैया मैंने आज 50 जगह 'बहुत खूब' लिखा है और 55 जगह 'बहुत बढ़िया'। कहीं कोई पकड़ न ले या शायद थोड़ा अपराध बोध हो कि मैंने तो ब्लॉग पढ़ा ही नहीं और बिना पढ़े ही 'बहुत बढ़िया' टीप दिया तो वे copy paste 'बहुत बढ़िया' या copy paste 'बहुत खूब' टीप मारते हैं।

ऐसा नहीं कि ऐसे टिप्पणीकार ब्लॉग पढ़ते ही नहीं। कभी कभी जल्दी में पढ़ भी लेते है। अब समझने का झंझट कौन उठाये। आज का टारगेट 200 टिप्पणियाँ जो हैं। तो साहब 'बहुत खूब' या 'बहुत बढ़िया से सेफ टिप्पणी और क्या हो सकती है।

इससे अच्छा खेल क्या हो सकता है कि आप अनुमान लगायें कि भैया इसने तो ब्लॉग पढ़ा है या केवल सरसरी निगाह से देखा है, या एकदम पढा ही नहीं है।

अलोहा।

2 comments:

विकास उपाध्याय said...

बहुत बढ़िया !!
सोचा की पहला बहुत बढ़िया मेरी तरफ से आये क्योंकि आम तौर पर मुझे blogs पढ़ने का मौका नहीं मिलता है ... और हिंदी लिखने (type करने में) वर्तनी की गलतियाँ कुछ ज्यादा ही होंगी तो डर लगता है और शर्मिंदगी भी महसूस होती है. लगता है, हिंदी चिट्ठे पढे जायें और कुछ लिखने की कोशिश की जाये, तभी कुछ काम बनेगा :-)
आप लिखते रहिये और मैं पढ़ता रहूँगा. शायद अभी वो स्थिति नहीं है की क्या अच्छा लगा और क्या बुरा लगा ऐसी कोई टिपण्णी की जाये, समय के साथ शायद वो भी आ जायेगा!!!
विकास

प्रवीण पाण्डेय said...

अलोहा । :)