Tuesday, December 23, 2008

ऐसे कुछ अशआर चाहिये

इधर कुंठा उधर त्रास है
आँखें वीरान मन नीराश है
डरे सहमे से दिन हैं
काली डरावनी हैं रातें
भटके हुओं को राह दिखाये
ऐसे कुछ चिराग चाहिये
सोते हुओं को जगाये
ऐसे कुछ अशआर चाहिये

ऊँची दीवारें हैं खिड़कियॉं हैं तंग
निकलने के रास्‍ते हो गये हैं बंद
हताशा में है जीवन
घुट रही है मानवता
सीलन को दूर करे
ऐसी एक आग चाहिये
इस आग को हवा करें
ऐसे कुछ अशआर चाहिये

दुश्‍मन तो जाना पहचाना है
यारों से कौन बचाये
खुशगवार चेहरे में
जो हैं रकाबत छिपाये
इस बार जो मौसम बदला
जाड़े ठहर गये
जमे रिश्‍ते जो पिघला दे
ऐसे कुछ अशआर चाहिये

हाथों में थाम कर मशाल
बढ़ रहे हैं पुआल की ओर
ऐसे नासमझ तो न थे फिर
क्‍यों जा रहे हैं विनाश की ओर
इस बार जो हुआ है आर्तनाद
सब के सब सिहर गये
आशा की किरण दिखाये
ऐसे कुछ अशआर चाहिये

मोहब्‍बत की है तुमसे
उल्‍फत की रस्‍में भी निभायेंगे
तेरे शहर में अब आये हैं
प्‍यार तो जतायेंगे
तेरी जुबान में ही सही
हमें तो बस संवाद चाहिये
मेरी बात तुम तक पहुँचे
ऐसे कुछ अशआर चाहिये

चिकने पत्‍ते पर ठहरी है
जिन्‍दगी बूँद ओस की
इस बदहवासी में करें
कैसे बातें होश की
बहुत परेशान हैं हम
कसमकश है जीने की
पॉंव में छाले हैं
कुछ तो ठहराव चाहिये
घावों में मलहम लगाये
ऐसे कुछ अशआर चाहिये

मुझे बारिश की बूँदें
सूरज की तपिस चाहिये
खुली हवा में सॉंस
मेरे सपनों का गॉंव चाहिये
कुँए की जगत में ठॉंव चाहिये
मुझे मेरे हिस्‍से का चॉंद चाहिये
बहुत हो चुकीं रुखसारोजमाल की बातें
अब तो बस इन्‍कलाबी अशआर चाहिये

मथुरा कलौनी

6 comments:

~nm said...

बहुत खूब. समझ नही आ रहा की अच्छी कहूँ या दर्द भारी

रंजना said...

वाह ! सुंदर सार्थक भावाभिव्यक्ति.मन आनंदित हो गया पढ़कर..साधुवाद.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुंदर लिखा अपने कई पंक्तियाँ दिल को छू गई

कसमकश है जीने की
पॉंव में छाले हैं
कुछ तो ठहराव चाहिये
घावों में मलहम लगाये
ऐसे कुछ अशआर चाहिये


और यह तो बहुत अपनी सी लगी

मुझे बारिश की बूँदें
सूरज की तपिस चाहिये
खुली हवा में सॉंस
मेरे सपनों का गॉंव चाहिये
कुँए की जगत में ठॉंव चाहिये
मुझे मेरे हिस्‍से का चॉंद चाहिये..

Vijay Kumar Sappatti said...

bahut hi acchi kavita .

मुझे बारिश की बूँदें
सूरज की तपिस चाहिये
खुली हवा में सॉंस
मेरे सपनों का गॉंव चाहिये
कुँए की जगत में ठॉंव चाहिये
मुझे मेरे हिस्‍से का चॉंद चाहिये

mujhe ye pankhtiyan bahut pasand aayi hai ..

bahut badhai

kabhi mere blog par aayiyenga pls

vijay
poemsofvijay.blogspot.com

Shiv Kumar Mishra said...

सुंदर भावनाएं. शब्दों का अद्भुत संयोजन है.

"अर्श" said...

bahot khub likha hai sahab aapne behatarin kavita dhero badhai aapko..


arsh