Monday, September 1, 2008

टोपी

अपनी एक पृथक पहचान बनाने की इच्छा सब में होती है, क्या छोटे, क्या बड़े। मूल में शायद यही कारण रहा हो जब मैं बचपन में निरामिष होकर गाँधी टोपी पहनने लगा था। वैसे सच कहूँ तो गाँधी जी और अनके आदर्शों का प्रभाव तो था ही ।

उन दिनों मेरी उस टोपी से घर में माँ-बाप बहुत परेशान हो गए थे। मेरी मित्र मंडली को एक नया खेल मिल गया था कि किस तरह मेरी टोपी उड़ाई जाय। मेरे शिक्षकगण मेरी टोपी को देख कर ऐसा मुँह बनाते थे जैसे अम्ल की खट्टी डकार आई हो।

मुझे तरह-तरह से उकसाया जाने लगा कि बेटे यह क्या टोपी पहनते हो ! इसका रिवाज नहीं है आजकल। या, बेटे देखो माँ को कितना कष्ट होता है जब घर में सामिष भोजन बनता है। तुम्हारे लिए अलग से खाना बनाना पड़ता है।

मुझे स्थिति विडंबनापूर्ण लगी थी। एक ओर तो हमें स्कूल इसलिए भेजा जाता था कि हम गाँधी नेहरु की तरह महान बनें। दूसरी ओर गाँधी जी से प्रभावित हो कर एक छोटा सा कदम उस दिशा में क्या रख दिया बस सभी रास्ते में रोड़े अटकाने लगे थे।

या तो गाँधी जी का प्रभाव मेरे ऊपर अधिक था या मैं बहुत जिद्दी था, क्यों कि न मैंने टोपी पहनना छोड़ा और न ही अपने आहार में परिवर्तन किया। मुझे ले कर मेरे माँ-बाप के चेहरे चिंतित रहने लगे थे। उनकी कानाफूसी बढ़ गई थी।
अध्यापक एक दूसरे को अर्थपूर्ण दृष्टि से देखते रहे और सहपाठीगण षड़यंत्र रचते रहे पर गाँधी टोपी मेरे सिर के ऊपर चिपकी रही।

मैं अपने गणित के अध्यापक को बहुत मानता था। एक वे ही थे जो मेरी टोपी को देख कर अपना मुँह विकृत नहीं करते थे। इन्ही अध्यापक की कक्षा में एक दिन एक लड़के ने पीछे से आकर मेरे सिर से टोपी उठाई और ब्लैकबोर्ड के पास फैंक दी। पूरी कक्षा हो हो कर हँसने लगी थी। अध्यापक ने मेरी टोपी की ओर देखा और फिर मेरी ओर देखा और मुसकुराने लगे। मेरे आश्चर्य का पारावार नहीं। मैंने कहा, 'सर, आप...'

'मैं अगर तुम्हारा सहपाठी होता तो तुम्हारी टोपी कभी की उड़ा देता।' उन्होने कहा था।

उनकी यह बात मुझे कहीं गहरे कोंच गई। मैंने टोपी त्याग दी। निरामिष से सामिष हो गया। समय ने घाव तो भर दिया है पर अभी तक सरसराता है।

बचपन की इस घटना से मुझे टोपी कॉम्प्लेक्स हो गया है। हैट हो या कैप, टोप हो या टोपी सभी प्रकार की टोपियों को देख कर मेरा दिल ललचाता है। काश मैं ये सब बेझिझक पहन पाता! इतिहास की पुस्तकों में जब मैं सभी महान सिरों को किसी ने किसी प्रकार की टोपी के अंदर पाता हूँ तो मेरे दिल में एक मुक्का लगता है।

अभी कुछ दिन पहले टोपी को लेकर मेरे साथ एक और वाकया हुआ है। जाड़ों में ठंड से मेरी नाक बंद हो जा रही थी। इलाज मुझे मालूम था, यानी सिर को ढक कर रखना। उसके लिए आवश्यकता थी एक टोपी की। तो एक दिन साहस करके ऊन की एक मंकी कैप ले ही आया। इरादा था केवल रात को पहनने का क्योंकि रात को कौन देखता है। वैसे भी सिर ढकने की अधिक आवश्यकता रात को ही होती है। पत्नी के सामने टोपी पहनने का तो खैर प्रश्न ही नहीं उठता है। जब पत्नी सो गई तो मैं आधी रात में चुपके से उठा और टोपी निकाल कर पहन ली। कितनी तृप्ति हुई मुझे। कितना आराम आया। बहुत देर तक यूँ ही बैठा रहा और इस नई अनुभूति का आनंद लेता रहा। फिर उस ठंडी रात में सिर में गर्माहट लिए मैं सो गया।

आप अनुमान लगा सकते हैं कि मेरी यह हिमाकत मेरे लिए कितनी महंगी पड़ी। जब किस्मत ही खराब हो तो आप क्या कर सकते हैं। साधारणतया गहन निद्रा में सोनेवाली पत्नी को उस दिन आधी रात में उठना ही था। वह इतनी जोर से चिल्लाई थी कि मेरे बाएँ कान में गूँज अभी तक बाकी है। पड़ोसी तक आ गए थे।

वो दिन है और आज का दिन है, मैं अपनी टोपी पहनने की इच्छा को दबाये जिए जा रहा हूँ। काश मैं विलायत में पैदा होता। वे लोग टोपी के माहात्म्य से अच्छी तरह परिचित हैं। सोने के लिए ऊनी तिकोनी टोपी से लेकर नहाने के लिए बेदिंग कैप तक, प्रत्येक अवसर के लिए टोपियाँ निर्धारित हैं। और हमारे यहाँ! हमारे यहाँ कलियुग इतना घोर हो गया है कि टोपी पहनना और टोपी पहनाना, इनका अर्थ ही बदल गया है।

मथुरा कलौनी

7 comments:

Mrs. Asha Joglekar said...

Achchi topi pehnaee.

मथुरा कलौनी said...

:)

Laxmi N. Gupta said...

मथुरा जी,

टोपी आख्यान बहुत बढ़िया लगा। मज़ा आगया। मेरा भी एक टोपी आख्यान है जो कभी लिखूँगा।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

बचपन की इस घटना से मुझे टोपी कॉम्प्लेक्स हो गया है। हैट हो या कैप, टोप हो या टोपी सभी प्रकार की टोपियों को देख कर मेरा दिल ललचाता है। काश मैं ये सब बेझिझक पहन पाता! इतिहास की पुस्तकों में जब मैं सभी महान सिरों को किसी ने किसी प्रकार की टोपी के अंदर पाता हूँ तो मेरे दिल में एक मुक्का लगता है।

बहुत रोचक लेकिन
व्यंग्य की दृष्टि से भाषा और
शैली दोनों प्रभावशाली है.
.....और..... टोपी काम्प्लेक्स !
क्या प्रयोग है भाई !!
इस शीर्षक में तो पूरा एक
उपन्यास खुलता-सा नज़र आता है.
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शुभकामनाएँ
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

प्रभाकर पाण्डेय said...

बहुत ही सुंदर व्याख्या। मजेदार एवं रोचकता से परिपूर्ण। जीवंत भाषा शैली। बधाई।

Anonymous said...

Tum itna jo muskura rahe ho,
topi ka gham khaye ja rahe ho?!
hum jaan gaye sarkar,
yeh topi ka zikhr baar baar,
agar is mein hi aap ki pechchan,
to hum aapko topi pehnayenge kadardan! :D

- millie

~nm said...

आपके लिए एक पुरूस्कर आपका इंतज़ार कर रहा है.