Showing posts with label हास्‍य व्‍यंग्‍य. Show all posts
Showing posts with label हास्‍य व्‍यंग्‍य. Show all posts

Monday, August 9, 2010

स्वयंवर 2010 – एक इमोशनल अत्याचार

-मथुरा जी, नाटक कर रहे हैं? बहुत अच्छा कर रहे हैं।
-धन्यवाद। 
-कौन सा नाटक कर रहे हैं? 
-स्वयंवर 2010।  
-अरे आप टीवी में कब से बनाने लगे। बताया ही नहीं। हम को भी चांस दीजिए न। हा हा हा।  
-स्वयंवर 2010 नाटक है। रंगशाला में खेला जा रहा है। 
-आछा। हम समझे रियेल्टी शो टाइप का कुछ है। कामेडी है? 
-जी नहीं। ड्रामा है। 
-वो तो हम समझ गये हैं कि यह ड्रामा है यानी नाटक है। 
-हम पूछ रहे थे कि कामेडी है क्या? 
 -कामेडी नहीं है। भावना प्रधान नाटक है। 
-आछा। हँसी का एक्को सीन नहीं है क्या? 
-है न। गंभीर नाटक है पर हँसी के सीन भी हैं। 
-नाटक में हँसी के सीन हैं तो नाटक कामेडी हुआ न। आपने हमको उलझा दिया। नाटक का नाम 2010 है तो कामेडी ही होना चाहिये। 
 -2010 नहीं, स्वयंवर 2010।
-वही। खाली स्वयंवर से ही पता चलता है कि नाटक कामेडी है। अब आप नाम रखे है स्वयंवर 2010, शक की कोई गुंजाइश ही नहीं। नाटक कामेडी ही होगा। आप नाटक में भले ही कुछ विचार-उचार रख दिए होंगे। 
-आप नाटक देखेंगे तो पता चल जाएगा। 
-अरे काहे नहीं देखेंगे। आपका नाटक है हम जरूर देखेंगे।
कितना टिकट रखे हैं? 
-100 रुपया। बहुत अच्छा है। हमको तो आप पास देते ही हैं। इस बार एक पास एक्स्ट्रा दीजिएगा। महेश बाबू को भी हम साथ में ले आयेंगे। आपके लिये नाटक के दर्शक जो बढ़ाने हैं। 


Sunday, May 23, 2010

हम आपको तकलीफ देना नहीं चाहते

जावेद साहब अपने किसी काम से बेंगलोर आये हुए थे। उम्मीद कर रहा था कि आजकल में मुझसे मिलने आयेंगे। फोन करके उन्होंने बताया कि वे कल का लंच मेरे साथ करेंगे क्यों कि लंच के बाद ही उन्हें ट्रेन पकड़नी है। नहीं तो मिलना नहीं हो पायेगा। मैंने कहा कि आप आइए। लंच हमारे साथ कीजिए। और फिर मैं उनको स्टेशन तक छोड़ दूँगा।

'मैं कंपनी की कार में आऊँगा। इसलिए आपको तकलीफ नहीं दूँगा। और देखिए खाने में मेरे लिये कुछ स्पेशल करने की जरूरत नहीं है। नहीं तो मैं नाराज हो जाऊँगा।'

'अरे आप आइए तो सही।'

'मैंने इसलिए कहा कि असल में हमारा मकसद तो आपस में मिलना है। समय नहीं निकाल पाया इसलिए लंच में मिल रहे हैं। ऐसे में मैं आपको बेकार तकलीफ नहीं देना चाहता।'

'जावेद साहब कोई तकलीफ नहीं होगी। इतने दिनों बाद तो हम मिल रहे हैं। गप्पें मारेंगे और खाना साथ में खायेंगे।'

'जरूर जरूर। पर आप तो रोजमरर्ा खाते हैं वही बनाइएगा।'

'ठीक है वही बनायेंगे आप आइए तो सही।'

मैं आपको बता दूँ जावेद साहब एक खब्ती इनसान हैं। कब कौन सी खब्त उन पर सवार होगी आप कह नहीं सकते।

अगले दिन सुबह सुबह उनका फोन आ गया। 'मैं ग्यारह बजे पहुँच जाऊँगा। देखिए जो घर में है वही बनाइएगा। कुछ स्पेशल बनाने की जरूरत नहीं। नहीं तो में नाराज हो जाऊँगा।'

मैंने उनको यकीन दिलाया कि कुछ भी स्पेशल नहीं बनेगा उनके लिये। वे ग्यारह बजे आये। आते ही बोले, 'देखिए आपने यह बहुत गलत काम किया। रसोई से पकवानों की खुशबू आ रही है। आपने भाभी जी से कुछ स्पेशल बनाने को कहा होगा। इसकी क्या जरूरत थी। हमारा मकसद तो मिलना था न।'

आ गया मुझे भी गुस्सा। 'दोपहर खाने का समय हो रहा है। इस समय हम लोग पानी पीकर घुटने पेट में डाल कर नहीं बैठे रहते हैं। रसोई में कुछ बना कर खा लेते हैं। ऐसे में कोई मेहमान आ गया तो हम रसोई बनाना नहीं छोड़ते। आज रविवार है, कुछ न कुछ तो खास बनता ही है। ऐसा एकदम न समझिएगा कि यह सब हम आपके लिये कर रहे हैं। यह सब तो हमने अपने लिये बनाया है। अब जब आप आ गये हैं तो आपको भी वही परोसेंगे न। आपने कहा था कि आपके लिये स्पेशल न बनाया जाय सो हम नहीं बना रहे हैं। यह खाना आपको स्पेशल लगे तो कोई बात नहीं आप नमक के साथ भात खा लीजियेगा।'

इस बात को कई साल बीत गये हैं। अभी उनकी लड़की बेंगलोर तबादले में आई है। उसने फोन किया 'अंकल मैं संडे को आऊँ?'

'हाँ हाँ आ आजाओ। दिन का खाना हमारे साथ ही खाना।'

'ठीक है अंकल। आंटी से कहिएगा कि वे मेरे लिये कुछ भी स्पेशल न बनायें। नहीं तो मैं गुस्सा हो जाऊँगी।'


.

Thursday, February 25, 2010

एक सकारात्मक सोच

लोग कहते है कि मैं नेगेटिव हूँ। यानी हमेशा नेगेटिव सोचता हूँ। मैं कहता हूँ कि मैं जैसा भी हूँ ठीक हूँ। किसी और के लिये नहीं तो कम से कम अपने लिये तो ठीक ही हूँ। और मैं किसी से राय माँगने तो नहीं निकला हूँ न कि भैया मुझे बता दो कि मैं नेगेटिव हूँ या पाजिटिव। और सच कहूँ तो मुझे आज की भाषा के ये शब्द समझ में नहीं आते हैं। नेगेटिव, पाजिटिव। मानो आदमी आदमी न हो कर बैटरी का टर्मिनल हो गया हो।

हम तो भैया ऐसे ही हैं और ऐसे ही रहेंगे। नेगेटिव पाजिटिव जो कहना है कह लो, हमें कोई तकलीफ नहीं हो रही। हमारे पास आने से जब किसी का कुछ घट जाता है तो न आये वह हमारे पास। हम निराशावादी है तो वही सही। हम यह आशा तो नहीं कर रहे हैं न कि आप हमें आशावादी समझें।

फिर एक बार पूछता हूँ कि क्या होता यह नेगेटिव या पाजिटिव। हमारी सोच नेगेटिव है यानी नकारात्मक है तो ठीक है न।

सामने से तीखे सींग वाला बिगड़ैल साँड़ आ रहा है। अब आप सोचते रहें कि आपको कैसा सोचना है या कैसा व्यवहार करना है। नेगेटिव या पाजिटिव। नकारात्मक या सकारात्मक। आप आशावाद का सहारा लेंगे या निराशावाद का। किसका दृष्टिकोण अपनायेंगे अपना या साँड़ का। साँड़ आपको सींग मारेगा और आप घायल हो कर अस्पताल पहुँच जायेंगे। या साँड़ आपको देख कर मुस्करा कर आगे बढ़ जायेगा और आपको अस्पताल जाने की नौबत नहीं आयेगी।

हम तो भैया एक किनारे हट जायेंगे। अनजान जगह हो, व्यक्ति हो, स्थिति हो, मशीनरी हो तो हम तो पहले अपने बचाव का तरीका सोच लेते हैं।

निराशावादी होना भी बहुत लाभदायक होता है। आशा ही निराशा की जननी है। जब आप आशा ही नहीं करेंगे तो निराशा आपके पास फटकेगी कैसे।

Saturday, November 28, 2009

वो बस मुस्कराये और जाँ निकल गई

श्रीमती जी को बेटी दामाद से मिलने की प्रबल इच्छा हुई। मुझसे कहा गया मैं जाती हूँ दुबई। एक महीने के बाद लौटूँगी। तब तक तुम मेरी बिल्लयों की देखभाल करना। मैं अकेला और मेरे साथ दो बिल्लियाँ। बस समझ लीजिये एक महीने तक यही चलेगा। बिल्लियाँ न होती तो मैं 'खोया खोया चाँद खुला आसमाँ' हो जाता। पर क्या करें बिल्लियाँ हैं और उनका अस्तित्व नकारा नहीं जा सकता। पर जब आप एकाकीपन महसूस करते हैं तो बिल्लियों की संगत पर्याप्त नहीं होती। दो टॉग वाले प्राणियों की कमी खलने लगती है। वर्षों पहले लगभग ऐसी ही स्थिति थी जब मैं अकेला बैठा घर में लगभग बोर हो रहा था। उसी बोरियत में मैंने एक कविता लिखी थी

बैठा हूँ आज अकेला मैं
संध्या की बेला है और हाथ में हे मय
और कर रहा हूँ याद
बीते दिनों को हो कर तन्मय

इन चार पंक्तियों को छोड़ कर बाकी की कविता मैंने पहले ही यहाँ पोस्ट कर रखी है।

सोचा कुछ नया लिखूँ। चलो कविता ही सही। कौई मौजूँ विषय? - हाँ क्यों नहीं।
प्यार? - इससे बढ़ कर मौजूँ और क्या हो सकता है!

याद आया कि प्यार पर भी कुछ पहले ही पोस्ट कर चुका हूँ।
ऐसा क्यों होता है कि जिस विषय पर आप लिखना चाहते हैं आप पहले ही लिख चुके होते हैं!

पर प्यार में नया लिखने की बहुत संभावनाएँ हैं।

हजारों लाखों बार परिभाषित होते हुए भी आप पूछने के लिये वाध्य होते हैं कि आखिर है क्या यह प्यार?



इस विषय में हमारे भारत से अधिक जानकार कोई देश नहीं हो सकता। यहॉं साल में कई हजार करोड़ की लागत से साल में 2000 से अधिक फिल्में बनती है। सबका विषय एक ही है प्यार। फिर भी पूछने का दिल करता है कि आखिर है क्या यह प्यार?



60-70 वर्ष से हमारी फिल्में हमें प्यार के बारे में बता रही हैं कि प्यार किया नहीं जाता बस हो जाता है। पर कैसे होता है किसी को नहीं मालूम। Cause and effect वाला सिद्धांत यहाँ लागू नहीं होता। नायक गुफा कुदराओं से, रेगिस्तान से, बर्फीली चोटियों से, आस्‍ट्रेलिया से, अफ्रीका से दहाड़ता है कि प्यार हो गया है। कैसे हुआ, न तुम जानो, न मैं जानूँ। प्रेमी या प्रेमिका भले ही एक दूसरे की आगोश में आ जाय, पर प्यार पकड़ में नहीं आता है।
शायर लोग प्यार के मामले में बहुत कुछ कह गये हैं जिसका अर्थ न वो समझे हैं न किसी और को समझ में आता है। किसी शायर ने कुछ ऐसा भी कहा है 'अभी नादां हो, दिल रखा है तुम्हारे ही लिए, ले जाना जवाँ हो कर।' यह तो सीधे जेल की तरफ ले जाने वाला प्यार है।
प्यार की कुछ रूपों का मुलाहिजा फरमाइए
कॉल सेंटर वाला अपरिपक्व प्यार
जनम जनम का साथ वाला प्यार
जज्बये दिल किसे पेश करूँ वाला प्यार
जज्बये दिल कैसे पेश करूँ वाला प्यार
दिल चाहता है में अक्षय खन्ना वाला प्यार
वैलेन्टाइन डे वाला प्यार।

प्यार पर नीरक्षीर विवेचन होना चाहिये। क्या प्यार है, क्या नहीं है। जैसे, क्या क्षणिक आकर्षण प्यार है? क्या वासना रहित प्यार प्यार है? इत्‍यादि

प्यार पर मेरी एक सद्य:रचित कविता मुलाहिजा फरमाइए

न कहीं खून बहा, न चोट कोई,
वो बस मुस्कराये और जाँ निकल गई

फैशन की महफिल में हसीनों के जलवे थे
पर वाह रे तेरी सादगी, मीठी छुरी चुभो गई

देर में जाना फैशन का एक अंदाज है सादगी
खामखाँ लौ में एक पतिंगा जल गया है कोई

हमें तो इश्क हुआ, खेल इसको समझते हैं वो
हम बिरहा गा रहे हैं, मल्हार गा रहा है कोई

बेगैरत हम भी न थे क्यों जाते उसकी गली
वो तो बेखुदी थी जो हमें वहाँ तक ले गई

गीली रेत पर बना तो दिया है दिल
अब है इंतजार लहर जल्दी से आये कोई

Saturday, November 14, 2009

उसके बारे में

सभी जानते हैं उसके संबंध में लेकिन कोई भी उसका नाम अपनी जुबान पर नहीं लाता। नाम उच्चारण करने में बहुत अश्‍लील लगता है। पहले तो बड़े बड़े साइन बोर्डों में, नगरपालिका की दीवारों पर और सिनेमा के पर्दे पर ही उसका नाम दिखाई पड़ता था पर जबसे टेलीविजन लिया है ठीक बैठक के कमरे में उसके बारे में देखने और सुनने को मिलता है। लिहाजा मोहन चिंतित है।

मोहन की दो पुत्रियॉं हैं। एक नौ साल की है और दूसरी छह साल की। दोनों ने टी वी पर आने वाले सभी विज्ञापन याद कर रखे हैं। टूथपेस्ट के बारे में हो या प्रेसर कुकर के बारे में, घड़ी के बारे में हो या आम के अचार के बारे में, कोई भी ऐसा विज्ञापन नहीं जो उन दोनों को याद न हो। दोनों लड़कियॉं समवेत कंठ से टी वी के साथ साथ विज्ञापन की पंक्तियॉं दोहराती हैं। इन्हीं विज्ञापनों में एक उसके बारे में भी होता है। इस विज्ञापन को भी दोनों लड़कियॉं निश्‍छल भाव से दूसरे विज्ञापनों की तरह ही दोहराती हैं।

मोहन और उसकी पत्नी जब उन दोनों के मुँह से उस विज्ञापन को सुनते हैं तो ऐसा दिखाते हैं जेसे सुना ही न हो। ऐसा साहस उन दोनों में से किसी को भी नहीं है कि लड़कियों को मना कर सकें कि उस विशेष विज्ञापन को न दोहरायें। मना करने का कोई कारण भी नहीं सूझता उन दोनों को। इस डर से उनकी नींद हराम हो गयी है कि अगर दोनों में से किसी ने कुछ पूछ दिया कि वह क्या होता है तो वे क्या उत्तर देंगे! पत्नी के सामने तो मो‍हन बहुत बहादुर बनता है, किन्तु उस संभावित प्रश्‍न का उत्तर उसे नहीं सूझता।

'क्या उत्तर देंगे?' पत्नी पूछती है।

'सच बता देना। हर्ज ही क्या है!' मोहन कहता है।

'इतनी कच्ची उमर में क्या वह ठीक समझ पायेंगे! बेकार में गलत दिशा में उनका घ्यान खींचना ठीक होगा? मैं तो कुछ झूठ बोल कर बात टाल दूँगी।'

'नहीं नहीं बच्चों से झूठ नहीं बोलना चाहिये। फिर बच्चे भी तो कुछ समझते हैं ही, तुरन्त पकड़ लेंगे कि झूठ बोला जा रहा है। वे सोचेंगें ऐसा क्या है जो छिपाया जा रहा है। ऐसे में वे इस पर गलत तरीके से सोचेंगे। सच ही बोलना चाहिये।'

'कैसे?' पत्‍नी पूछती है।

'सच जैसे बोलते हैं। वैसे बाहर के देशों में तो इस संबंध में स्कूल में ही बता देते हैं।' मोहन का कहना था।

वे दोनों इसी तरह की बातें करते लेकिन इस समस्या का समाधान कैसे करेंगे इस विषय पर उनकी कोई सुलझी हुई धारणा नहीं थी। सब गोल था। उनकी किस्मत अच्छी थी कि उन दोनों में से किसी ने अभी तक उसके बारे में नहीं पूछा था। वे टी वी के साथ विज्ञापन को दोहराती थीं बस।

किस्मत अच्छी थी केवल अब तक। अब छोटी ने उन्‍हें चिन्ता में डाल दिया था। कहने का अर्थ है कि पहले से अधिक चिन्ता में डाल दिया था। संभावित प्रश्‍न के पूछे जाने की संभावना अचानक बहुत अधिक बढ़ गयी थी। छोटी इस संबंध में बहुत कुछ सोच रही थी। उसकी बातों से यही लगता था। एक दिन उसने अपनी मॉं से पूछा था, 'मम्मी हम लोग दो ही हैं, दीदी और मैं। कितना अच्छा है न। तीन होते तो तुमको कितना कष्‍ट होता? खाने की मेज में जगह नहीं होती और सोने के लिये भी एक और पलंग लगाना पड़ता!'

और एक दिन उसने मोहन से कहा 'पापा स्कूटर में मम्मी और दीदी तो पीछे बैठते हैं और मैं सामने खड़ी होती हूँ। हम लोग तीन होते तो तुम क्या करते? तीसरे बच्चे को कहॉं बिठाते?'

उनके एक पड़ोसी के पॉंच बच्चे हैं। परिवार नियोजन के बारे में बेचारे को तब मालूम हुआ जब बहुत देर हो गयी थी। मोहन की छोटी मुन्नी उन बच्चों के बारे में बहुत चिन्तित थी। कई बार कह चुकी थी कि वे बेचारे एकसाथ बैठकर खाना नहीं खा सकते, एकसाथ पिक्चर नहीं जा सकते इत्यादि।

मोहन और उसकी पत्‍नी हम दो हमारे दो से संतुष्‍ट थे। छोटा परिवार सुखी परिवार। मुन्नी के इन नये प्रश्‍नों से एक नया डर पैदा कर दिया है उनके मन में। जिसको अभी तक असंभव किये बैठे हैं कहीं संभव हो गया तो क्या होगा? क्‍या मुँह दिखाऍंगे इन बच्‍चों को!

खैर यहॉं बात उसके बारे में हो रही थी जिसका विज्ञापन उनकी पुत्रियॉं टी वी के साथ दोहराती हैं। इस संबंध में एक दिन उनका डर साकार हो ही गया। टी वी में विज्ञापन आया। दोनों ने एक साथ दोहराया सुखी वैवाहिक जीवन के लिये ...............। छोटी दौड़ती हुई अपनी मॉं के पास गई और उसने पूछा, 'मम्मी वह क्या होता है?'

यह घटना रसोईघर में हुई। मोहन बैठक से सब देख रहा था। उसने देखा कि उसकी पत्नी सकपका गई है। प्रश्‍न संभावित अवश्‍य था। लेकिन पत्नी को आशा नहीं थी कि यह पहले उसीसे पूछा जाएगा। वह तैयार नहीं थी। सारी प्लानिंग धरी की धरी रह गई। उसने कहा, 'मुझे काम करने दो मुन्नी, जाओ खेलो।'

'क्या मम्मी इतनी रात को भी कोई खेलता है? बताओ न वह क्या होता है?'

'बेटा ऐसा होता है न कि जब अस्पताल में बच्चे पैदा होते हें तो....तो...देखो मेरी रोटी जल गई। मैं बाद में तुमको बता दूँगी हॉं। अभी मुझे खाना बनाने दो।'

'नहीं मम्मी अभी बताओ।'

'कहा ना बाद में बता दूँगी।' मुन्नी को डॉंटते हुए पत्नी ने कहा।

'मुन्‍नी को क्यों डॉंटती हो?' मोहन ने कहा। 'डॉंटना ठीक नहीं है। उसे बता दो। उसकी जिज्ञासा शांत कर दो बस।'

'मुन्‍नी बेटा ऐसा करो अपने डैडी से पूछ लो।' मोहन की पत्नी ने कहा।

मोहन को इसकी आशा नहीं थी। मुन्नी दौड़ती हुई उसके पास गई और उसने पूछा, 'पापा मम्मी नहीं बता रही है। तुम बताओ न वह क्या होता है?'

'मुन्‍नी अपनी मम्मी से बाद में पूछ लेना। देखो मैं अभी कुछ पढ़ रहा हूँ।' मोहन ने बचने का प्रयत्न किया।

'नहीं नहीं अभी बताओ।' मुन्नी ने जिद की और मोहन ने बताना आरंभ किया।

'बेटा ऐसा होता है न कि ....' इसके आगे मोहन की समझ में नहीं आया कि वह क्या बोले। फिर साहस करके आगे कहा। 'ऐसा होता है न कि अस्पताल होता है जहॉं बच्चे पैदा होते हैं...।' इसके बाद उसने अस्पताल और उसकी बिल्डिंग का लंबा चौड़ा विवरण प्रस्तुत किया इस आशा से कि मुन्नी अपना प्रश्‍न भूल जाएगी। वह भूलती भला। उसने कहा 'पापा तुम ठीक नहीं बता रहे हो बताओ न वह क्या होता है?'

'मुन्‍नी मुझे नहीं मालूम है।' मोहन ने हथियार डालते हुये कहा। उसे यह डर लगा हुआ था कि कहीं बड़ी लड़की भी न पहुँच जाय जो अभी टी वी देखने में व्यस्त थी।

'तुम बुद्धू हो और मम्मी भी बुद्धू है। मुझे मालूम है कि वह क्या होता है।' मुन्नी ने उछलते हुये कहा।

पत्‍नी रसोई से बाहर आ गई। दोनों ने एक स्वर में मुन्नी से पूछा, 'तुम क्या जानती हो उसके बारे में?'

'उससे परिवार नियोजन होता है।' मुन्नी ने कहा।

Monday, January 26, 2009

सूज़ैन का बिस्तर

मीनाक्षी - पहले तुम बोलो।
     
  गनेश - मैं पहले क्यों बोलूँ? पहल तुमने की है। तुम ही पहले बोलो।
     
  मीनाक्षी - नहीं तुम। यू फर्स्ट।
     
  गनेश - सवाल ही नहीं उठता। यू फर्स्ट। लेडीज फर्स्ट।
     
  मीनाक्षी - देखो पहले आप, पहले आप में गाड़ी छूट जाएगी।
     
  गनेश - जिसको गाड़ी पकड़नी हो, वो चिंता करे। अपन की कोई गाड़ी नहीं छूट रही।
     
  मीनाक्षी - हूँ ... तो गणेश मैं...
     
  गनेश - गणेश नहीं, गनेश।
     
  मीनाक्षी - शुद्ध शद तो गणेश है।
     
  गनेश - गनेश मेरा नाम है, कोई व्याकरण का विषय नहीं।
     
  मीनाक्षी - ठीक है ठीक है। लो तुम्हारी शिष्या सूज़ैन आ गई।
 
  सूज़ैन - गानेश, मैं तुमको खोज रही थी।
     
  मीनाक्षी - आओ सूज़ैन, तुम अच्छे मौके पर आई।
     
  सूज़ैन - मैं जब भी आती वही मौका अच्छा होता है।
     
  गनेश - हूँ।
     
  मीनाक्षी - हूँ क्या?
     
  गनेश - मैं जब भी आती हूँ, वही मौका अच्छा होता है।
     
  सूज़ैन - ठीक है गुरु जी। मैं जब भी आती हूँ, वही मौका अच्छा होता है।
     
  मीनाक्षी - गुरु जी?
     
  सूज़ैन - मैंने गानेश को अपना गुरु जी बनाया है।
     
  गनेश - (मुँह बनाता है।) इस वाक्य में बहुत गलतियाँ हैं, सूजन।
     
  मीनाक्षी - क्यों बेचारी का नाम बिगाड़ रहे हो! नाम सूजन नहीं सूज़ैन है।
     
  गनेश - मैं इसको कितनी बार बता चुका हूँ कि मेरा नाम गानेश नहीं गनेश है। पर यह गानेश ही पर अटकी हुई है। अब मैंने भी तय किया है कि मैं इसे सूजन बुलाऊँगा, फिर देखता हूँ इसका मुँह सूजता है कि नहीं।
     
  (मीनाक्षी हँसती है।)
     
  सूज़ैन - सूजन क्या होता है?
     
  मीनाक्षी - थोड़ी देरी के लिए अपना हिंदी अध्याय बंद रखो। मैं जो बताने वाली थी उसे सुनो। कल गनेश हमें बाहर खाना खिला रहा है।
     
  गनेश - मैंने ले जाने की बात की थी, खिलाने की नहीं। सब अपना-अपना बिल चुकाना।
     
  मीनाक्षी - (हँसती है) ठीक है, ठीक है। तुम जैसे कंजूस से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है।
     
  सूज़ैन - गान...गनेश, मुझे तुमसे हिंदी के बारे में बात करनी है।
     
  गनेश - ठीक है।
     
  सूज़ैन - आज शाम को?
     
  गनेश - ठीक है।
     
  सूज़ैन - बिस्तर में?
     
  गनेश - क्या...!!
     
  मीनाक्षी - ये क्या हो रहा है! मैं चलती हूँ।
     
  गनेश - नहीं रुको मीनाक्षी। यह क्या बकवास कर रही हो तुम सूज़ैन?
     
  सूज़ैन - तुम्हारे पास टाइम नहीं है तो...
     
  गनेश - तुम मुझे गुरु मानती हो और ऐसी बातें कर रही हो! तुमने मुझे समझ क्या रखा है।
     
  सूज़ैन - मैंने क्या कहा जो तुम गुस्सा हो रहे हो।
     
  गनेश - बिस्तर में बताने को कह रही हो और कहती हो कि मैंने क्या कहा!
     
  सूज़ैन - बिस्तर में नहीं बताओगे तो समझ में कैसे आएगा।
     
  गनेश - फिर...फिर..
     
  मीनाक्षी - गनेश मुझे लगता है कि यहाँ कुछ गड़बड़ है।
     
  गनेश - कुछ क्या, बहुत गड़बड़ है।
     
  मीनाक्षी - सूज़ैन तुम हिंदी बिस्तर में क्यों सीखना चाहती हो।
     
  सूज़ैन - मुझे प्रॉब्लम है। मैं स्लो हूँ। गनेश डीटेल में बताएगा तो मुझे समझ में आएगा।
     
  (मीनाक्षी हँसने लगती है और हँसते हँसते लोट-पोट हो जाती है।)
     
  गनेश - अब तुमको क्या हुआ!
     
  मीनाक्षी - नहीं समझे? सूज़ैन तुम्हें बिस्तर में नहीं विस्तार में बताने को कह रही है।
     
  गनेश - विस्तार... बिस्तर... विस्तार। हे भगवान! अर्थ का अनर्थ इसी को कहते हैं!
     
  मीनाक्षी सूज़ैन को समझाती है। बिस्तर और विस्तार में अंतर बताती है। सूज़ैन शर्माती है और झिझकती है। फिर तीनों हँसते हैं।