प्रेमिका संवाद -2
'सरला, तुम यहाँ!' उसने कहा।
'यहाँ मेरी चचेरी बहन रहती है। मैं उसी के पास आई हूँ। तुम यहाँ कैसे?' सरला ने पूछा। उसने सोचा था कि उसने अपने ऊपर काबू पा लिया है। कितनी भूल कर रही थी वह। प्रेम को देखते ही वह प्रेम विह्वल हो उठी है। क्यों आया है प्रेम यहाँ? यदि प्रेम इसी तरह उसे हर गली-नुक्कड़ पर मिलता रहेगा तो कैसे वह उसे अपने जीवन से दूर कर पायेगी। दूर तो उसे रहना ही था। उसे पूरा विश्वास था कि उसका निर्णय उचित है। प्रेमाशिष जैसे दिलफैंक व्यक्ति के साथ रह कर बार-बार मरने से तो यही अच्छा था कि जी कड़ा कर के उसके जीवन से ही दूर चले जाओ। पर प्रेम ऐसा भी तो नहीं करने दे रहा है।
'मैं अपने मित्र मदन के यहाँ कुछ दिन रहने आया हूँ। तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी याद...'
'प्रेम, अब ऐसी बातें मत करो।' उसे बीच में ही रोक कर सरला ने कहा।
इतने में, जिस ओर से सरला दौड़ कर आई थी, उसी ओर से एक व्यक्ति बड़े कष्ट से दौड़ता हुआ उनके पास पहुँचा। और मुँह खोल कर हाँफने लगा। वह एक साधारण कद का दुबला-पतला व्यक्ति था। गालों की हड्डियाँ आगे को आयी हुई थीं, जिससे आँखें धँसी हुई प्रतीत होती थीं। वह बोलने योग्य हुआ तो उसने कहा,
'तुम बहुत तेज दौड़ती हो सरो। मैं तो हाँफते-हाँफते बेहाल हो गया।'
'मैंने तुम्हें साथ दौड़ने के लिये तो नहीं कहा था, प्रसाद।' सरला ने कहा।
'यह कौन है?' उसने प्रेम की ओर देखते हुए पूछा।
'मेरे मित्र हैं प्रेमाशिष। प्रेमाशिष, इनसे मिलो, इनका नाम है प्रसाद।' सरला ने परिचय कराया।
'मित्र?' प्रसाद ने कहा।
'क्यों क्या तुम्हें कोई आपत्ति है?' सरला ने प्रसाद को घूरते हुए ऊँची आवाज में कहा।
'नहीं-नहीं मुझे कोई आपत्ति नहीं है।' प्रसाद ने जल्दी से कहा।
'अच्छा प्रेम, नमस्ते।' कह कर सरला ने हाथ जोड़े और दौड़ती हुई आगे निकल गई।
सरला के जाने के बाद प्रसाद ने प्रेमाशिष को घूरा और कई क्षणों तक घूरता रहा। प्रेमाशिष को समझ नहीं आया, कि वह प्रसाद का क्या बनाये अर्थात् उसे किस शीर्षक के नीचे ले, शत्रु,मित्र या तटस्थ। हालाँकि सरला ने उससे संबंध विच्छेद कर लिया था। अँगूठी वापस करके किसी प्रकार की आशा की कोई गुंजाइश नहीं रखी थी। फिर भी उसे आशा थी क्योंकि उसका प्यार सच्चा था और उसका मन निर्मल। सरला से मिल कर अभी उसने अपनी नीति निर्धारित कर ली कि, सरला को रिझाओ। यह भी आवश्यक हो गया था कि वह सरला से मिलने-जुलने वाले लोगों के साथ कूटनीति का सहारा ले कर अच्छा व्यवहार रखे। प्रसाद में ऐसी कोई बात नहीं थी जो लोगों को उसके प्रति अच्छे व्यवहार के लिये उकसाए। दुबला-पतला शरीर, गोरे कव्वे-सा चेहरा और खनकती आवाज। ऊपर से तुरर्ा यह कि वह उसे फिल्मी खलनायक के अंदाज में घूर रहा था। खलनायक के अंदाज में ही उसने कहा,
'तुम्हारे बारे में सुन चुका हूँ। सरला ने तुमको तुम्हारी दो टके की अँगूठी वापस कर दी है। अब क्या लेने आये हो?'
प्रेमाशिष इस आकस्मिक हमले के लिये तैयार नहीं था। वह मुँह बाये प्रसाद को देखता रहा।
'देखो, सरला और मेरे खानदान में कई पीढ़ियों से संबंध है। सरला की शादी मेरे साथ होने वाली है। मैं तुमको आगाह किये देता हूँ, कोई ऐसी बेवकूफी मत करना जो तुम्हारे स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हो।' इतना कह कर प्रसाद अकड़ कर उसी ओर चला गया जिस ओर सरला गई थी।
प्रेमाशिष का दिल तो किया कि वह प्रसाद की जबान खींच कर, उसी के हाथ में रख कर, उससे पूछे कि अब बोलो क्या बोलते हो? पर वह अपनी ही निर्धारित की हुई नीति के अनुसार आचरण करने के लिये वाध्य था। वह भी वहॉ से उठ कर जाने की सोच ही रहा था कि उसने देखा एक सुंदर, सुडौल, लड़की दौड़ती हुई उसी की ओर आ रही थी। दौड़ने के श्रम से उसकी साँस तेज चल रही थी तथा उसके चेहरे पर लालिमा छलक आई थी। वह उसकी ओर देख कर मुस्कराई और मुस्कराते हुए आगे निकल गई।
सुबह-सुबह तरुणाई की अरुणाई लिये जब कोई सुंदर चेहरा दिख जाय तो जीवन में कड़ुवाहट के लिये कोई स्थान नहीं रह जाता है। जीवन के प्रति लगाव बढ़ जाता है। किसी शायर ने कितना गलत कहा है कि अच्छी सूरत पर लोग बुरी नजर ही डालते हैं। यह कहना गलत होगा कि प्रेमाशिष बहुत प्रसन्नचित्त हो कर घर की ओर गया। हाँ, यह कहा जा सकता है कि प्रसाद ने उसके मन में जो कड़ुआहट घोल दी थी, सुंदर तरुणी की आकर्षक मुस्कान ने उसका असर कम कर दिया था।
1
अभी और है। आगे कल शाम तक
Wednesday, March 23, 2011
प्रेमिका संवाद
प्रेमिका संवाद ( कहानी - मथुरा कलौनी )
मार्च का महीना था। आम के पेड़ों में बौर आ चुका था। जिस सड़क पर प्रेमाशिष दौड़ रहा था, उसके दोनों ओर आम के पेड़ थे। रस टपकने से ऐसा लग रहा था जैसे सड़क पर शहद से छिड़काव किया गया हो। प्रेमाशिष के जूते चिट-चिट कर रहे थे। दौड़ते-दौड़ते वह हाँफ गया तो सुस्ताने के लिये सड़क के किनारे बने एक सिमेंट के बेंच पर बैठ गया। गंगा किनारे धरती पर कछुए के कूबड़ जैसे टीले पर यह पार्क बना हुआ था। चार किलोमीटर परिधि के घेरे में इसकी अपनी अलग ही दुनिया थी। जिस सड़क के किनारे वह बैठा हुआ था, वह पार्क की मुख्य सड़क थी। सड़क के दोनों ओर सुंदर उद्यानों के बीच मकान बने हुए थे। मकानों के नाम भी बड़े मनभावन थे जैसे शांति निकेतन, फूल गाँव, पेड़ों वाला घर इत्यादि। फूल गाँव, जैसा कि नाम से प्रतीत होता है, फूलों के उद्यानों से घिरा हुआ घर था जो प्रेमाशिष के मित्र मदन का था। प्रेमाशिष आजकल मदन के साथ रह रहा था।
उसने सोचा था घर से दूर, मदन के साथ उसका दिल बहल जायेगा, पर ऐसा नहीं हो पा रहा था। यहाँ के शस्य श्यामल सुरम्य वातावरण में उसे अपनी भूतपूर्व प्रेमिका की याद बार-बार आ रही थी। जो प्रेमाशिष को जानते हैं उनके लिये स्पष्ट किया जाता है कि जिस भूतपूर्व प्रेमिका की याद उसे सता रही थी उसका नाम सरला है। उसी के प्रेम में घायल प्रेमाशिष सोच रहा था कि छोटी-सी यह दुनिया, पहचाने रास्ते हैं, तुम कभी तो मिलोगे तब पूछेंगे कि कुमारी सरला क्या मिल गया आपको हमारा प्यार ठुकरा कर?
मदन के पास आने का दूसरा और मुख्य कारण था जीविकोपार्जन का कुछ ठोस और स्थाई कार्यक्रम बनाना। नौकरी उसे मिल नहीं रही थी। किसी ख्यातिप्राप्त अच्छी कंपनी में अच्छी नौकरी के लिये पचपन प्रतिशत अंकों से पास की हुई उसकी बी.ए. की डिग्री यथेष्ट नहीं थी। सरकारी नौकरी के लिये न तो वह किसी आरक्षित कोटे में आता था और न उसकी वंशावली उपयुक्त थी। अभी तो वह कभी किसी शोरूम में, कभी किसी स्टोर में और कभी किसी परचून की दुकान में काम करके अपने जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ा रहा था।
सरला थी तो आशा और विश्वास था कि यह करेंगे वह करेंगे, पर जब उसने संबंध विच्छेद कर दिया तो उसके साथ सारा उत्साह जाता रहा। चूँकि उत्साह नहीं था इसलिए अब वह बहुत कुछ नहीं कर सकता था, पर नून तेल का कुछ न कुछ समाधान तो हो ही जाना चाहिए। रोज-रोज की झिक-झिक किसे पसंद है। प्रेमिका विहीन जीवन की आवश्यकताएँ ही कितनी, पर इस महँगाई में वे भी भारी पड़ रही थीं।
सुबह की शीतल स्वच्छ बयार पेड़ों पर सरसरा कर बह रही थी। चिड़ियाँ अपनी दिनचर्या में जुट चुकी थीं। यहाँ शांति की अनुभूति इतनी थी कि हवा की सरसराहट और चिड़ियों की चहचहाहट के ऊपर वह अपने हृदय की गति भी सुन पा रहा था। थप..थप..थप..थप।
यह क्या, थप-थप की आवाज तेज होती चली जा रही थी। अब वह दाहिनी ओर से आ रही थी। धत् तेरे की। यहाँ खामोशी में किसी के दौड़ने की आवाज को वह अपने दिल की धड़कन समझ बैठा था। दौड़ने वाली एक लड़की थी जो उसी की ओर आ रही थी। उसने लक्ष्य किया कि वह बहुत कुछ सरला से मिलती थी। उसने ट्रैक सूट भी ठीक वैसा ही पहन रखा था जैसा सरला के पास था। सफेद धारियों वाला गहरे नीले रंग का ट्रैक सूट। कद काठी और दौड़ने का अंदाज सब सरला जैसे ही थे।
प्रेमाशिष अपने ऊपर हँस कर दूसरी ओर देखने लगा। सावन के अंधे को सब हरा ही सूझता है। सरला की चाहत में उसकी कल्पना यथार्थ पर हावी हो रही थी। जब लड़की उसके पास पहुँची तो वह ठिठक गई। उसने उसे उसका नाम लेकर पुकारा, 'प्रेम!'
प्रेमाशिष ने जब उस लड़की को पास से देखा तो उसे मालूम हुआ कि वह क्यों सरला जैसी दिख रही थी। वह स्वयं सरला ही थी।
अभी और है। आगे कल शाम तक
मार्च का महीना था। आम के पेड़ों में बौर आ चुका था। जिस सड़क पर प्रेमाशिष दौड़ रहा था, उसके दोनों ओर आम के पेड़ थे। रस टपकने से ऐसा लग रहा था जैसे सड़क पर शहद से छिड़काव किया गया हो। प्रेमाशिष के जूते चिट-चिट कर रहे थे। दौड़ते-दौड़ते वह हाँफ गया तो सुस्ताने के लिये सड़क के किनारे बने एक सिमेंट के बेंच पर बैठ गया। गंगा किनारे धरती पर कछुए के कूबड़ जैसे टीले पर यह पार्क बना हुआ था। चार किलोमीटर परिधि के घेरे में इसकी अपनी अलग ही दुनिया थी। जिस सड़क के किनारे वह बैठा हुआ था, वह पार्क की मुख्य सड़क थी। सड़क के दोनों ओर सुंदर उद्यानों के बीच मकान बने हुए थे। मकानों के नाम भी बड़े मनभावन थे जैसे शांति निकेतन, फूल गाँव, पेड़ों वाला घर इत्यादि। फूल गाँव, जैसा कि नाम से प्रतीत होता है, फूलों के उद्यानों से घिरा हुआ घर था जो प्रेमाशिष के मित्र मदन का था। प्रेमाशिष आजकल मदन के साथ रह रहा था।
उसने सोचा था घर से दूर, मदन के साथ उसका दिल बहल जायेगा, पर ऐसा नहीं हो पा रहा था। यहाँ के शस्य श्यामल सुरम्य वातावरण में उसे अपनी भूतपूर्व प्रेमिका की याद बार-बार आ रही थी। जो प्रेमाशिष को जानते हैं उनके लिये स्पष्ट किया जाता है कि जिस भूतपूर्व प्रेमिका की याद उसे सता रही थी उसका नाम सरला है। उसी के प्रेम में घायल प्रेमाशिष सोच रहा था कि छोटी-सी यह दुनिया, पहचाने रास्ते हैं, तुम कभी तो मिलोगे तब पूछेंगे कि कुमारी सरला क्या मिल गया आपको हमारा प्यार ठुकरा कर?
मदन के पास आने का दूसरा और मुख्य कारण था जीविकोपार्जन का कुछ ठोस और स्थाई कार्यक्रम बनाना। नौकरी उसे मिल नहीं रही थी। किसी ख्यातिप्राप्त अच्छी कंपनी में अच्छी नौकरी के लिये पचपन प्रतिशत अंकों से पास की हुई उसकी बी.ए. की डिग्री यथेष्ट नहीं थी। सरकारी नौकरी के लिये न तो वह किसी आरक्षित कोटे में आता था और न उसकी वंशावली उपयुक्त थी। अभी तो वह कभी किसी शोरूम में, कभी किसी स्टोर में और कभी किसी परचून की दुकान में काम करके अपने जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ा रहा था।
सरला थी तो आशा और विश्वास था कि यह करेंगे वह करेंगे, पर जब उसने संबंध विच्छेद कर दिया तो उसके साथ सारा उत्साह जाता रहा। चूँकि उत्साह नहीं था इसलिए अब वह बहुत कुछ नहीं कर सकता था, पर नून तेल का कुछ न कुछ समाधान तो हो ही जाना चाहिए। रोज-रोज की झिक-झिक किसे पसंद है। प्रेमिका विहीन जीवन की आवश्यकताएँ ही कितनी, पर इस महँगाई में वे भी भारी पड़ रही थीं।
सुबह की शीतल स्वच्छ बयार पेड़ों पर सरसरा कर बह रही थी। चिड़ियाँ अपनी दिनचर्या में जुट चुकी थीं। यहाँ शांति की अनुभूति इतनी थी कि हवा की सरसराहट और चिड़ियों की चहचहाहट के ऊपर वह अपने हृदय की गति भी सुन पा रहा था। थप..थप..थप..थप।
यह क्या, थप-थप की आवाज तेज होती चली जा रही थी। अब वह दाहिनी ओर से आ रही थी। धत् तेरे की। यहाँ खामोशी में किसी के दौड़ने की आवाज को वह अपने दिल की धड़कन समझ बैठा था। दौड़ने वाली एक लड़की थी जो उसी की ओर आ रही थी। उसने लक्ष्य किया कि वह बहुत कुछ सरला से मिलती थी। उसने ट्रैक सूट भी ठीक वैसा ही पहन रखा था जैसा सरला के पास था। सफेद धारियों वाला गहरे नीले रंग का ट्रैक सूट। कद काठी और दौड़ने का अंदाज सब सरला जैसे ही थे।
प्रेमाशिष अपने ऊपर हँस कर दूसरी ओर देखने लगा। सावन के अंधे को सब हरा ही सूझता है। सरला की चाहत में उसकी कल्पना यथार्थ पर हावी हो रही थी। जब लड़की उसके पास पहुँची तो वह ठिठक गई। उसने उसे उसका नाम लेकर पुकारा, 'प्रेम!'
प्रेमाशिष ने जब उस लड़की को पास से देखा तो उसे मालूम हुआ कि वह क्यों सरला जैसी दिख रही थी। वह स्वयं सरला ही थी।
अभी और है। आगे कल शाम तक
Sunday, March 13, 2011
हम मिले
छिटकी हुई चांदनी में दहकती सी साँसें हैं
अनछुए से अहसाह हैं अनकही सी बातें हैं
द्रवित से मन हैं पिघले से अभिमान हैं
बिंधे-बिंधे से हम हैं टूटे-टूटे से संयम हैं।
चहकती भोर को दो महकते बदन मिले
कोने में दुबके हुए समाज के नियम मिले
अनछुए से अहसाह हैं अनकही सी बातें हैं
द्रवित से मन हैं पिघले से अभिमान हैं
बिंधे-बिंधे से हम हैं टूटे-टूटे से संयम हैं।
चहकती भोर को दो महकते बदन मिले
कोने में दुबके हुए समाज के नियम मिले
- मथुरा कलौनी
Monday, March 7, 2011
हिन्दी
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥
अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन॥
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥
अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन॥
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
Thursday, September 30, 2010
मगनखोला
मैं आया था यहाँ चुपके चुपके
अपनी ही भूमि पर
एक नितांत अजनबी की तरह
कई गाँठों वाली यादों की डोर से
अपना बचपन बाँध कर ले जाने के लिये।
मैं दस साल का था जब मैंने अपना गाँव छोड़ा था। उस समय गाँव की आबादी लगभग 40 थी, जिसमें से लगभग 10 जने फौज में या रोजी रोटी के चक्कर में बाहर रहते थे। साल-दो-साल में छुट्टी आते थे।
मगनखोला की बाईं ओर छोटा गाँव नवगाँव है जो मगनखोला से तो बड़ा ही है और दाहिनी ओर बड़ा गाँव बुडलगाँव है।
हमारा परिवार कलकत्ते जा कर बस गया था। गाँव से संबंध रहता ही था। चिट्ठी-पत्री चलती ही थी। पिता जी रिटायर होने के बाद गाँव में रहने आये थे। एक साल से अधिक नहीं रह पाये। खेती-बाड़ी नहीं कर सकते थे। सुविधाहीन पहाड़ी कठिन जीवन था। करने को कुछ था नहीं। पेन्शन के पैसों से सामान लाकर उस पहाड़ पर खाते थे। फिर साहस कर पिथैरागढ़ में रेस्तराँ खोला। तब का जमाना था। रेस्तराँ चला नहीं। अंत में तराई में घर बना कर वहीं रहने आये तो फिर गाँव का मुँह नहीं देखा। हम बाकी लोग तो बाहर ही बस गये थे। पहाड़ जाने के नाम पर पिथौरागढ़ में ही रुक जाते थे। कभी एक दिन के लिये कभी गाँव भी हो आते।
लगभग यही हाल मगनखोला के अन्य परिवारों का था। देखते देखते गाँव खाली हो गया। और अब तो उजाड़ है।

कुछ साल पहले जब मैं मगनखोला गया था तो यह दृश्य देखा और कैमरे में कैद कर लिया।
ये तीन औरतें, करीब तीन सालों से अकेली मगनखोला में रह रहीं थी। बाएँ वाली रिश्ते में मेरी भाभी लगती हैं।
बीच की लड़की बोल नहीं पाती है, गूँगी है। प्यार से सब उसे लाटी बुलाते हैं। साथ कहने को जग्गू नाम का कुत्ता था। एक रात को बाघ आया। किसी तरह उन तीनों ने अपनी जान बचाई पर जग्गू को नहीं बचा पाये। उसे बाघ ले गया था। और अगले दिन ही उन तीनों ने गाँव छोड़ दिया था।


लाटी पेड़ पर चढ़ी हुई है मेरे लिये नारंगी तोड़ रही है।
यह पिछले साल का चित्र है। वही जगह है, अब यहाँ कोई नहीं रहता है।


घर के सामने की खुली जगह को खाला बोलते हैं। इसी खाला में मेरा बचपन बीता था। यहाँ पर त्यौहारों में और खुशी के अवसरों पर खेल (कुमाऊँनी झोड़ा, सामूहिक नाच) होते थे।
इसी खाला में मैंने पहली बार तिब्बती लामा को देखा था। हमें बचपन में डराया जाता था कि ढंग से रहो नहीं तो लामा अपनी झोली में डाल कर ले जाएगा। इसी खाला में हुड़क्या हुड़क्यानि का नाच भी देखा था।
अखरोट का पेड़। इसके अखरोट हाथ से हलका दबाते ही टूट जाते हैं। अब भी नवगाँव के लोग आते हैं और पुराने दिनों को याद करते हुए अखरोट ले जाते हैं।

गाँव के पास से काली नदी का दृश्य।
मगनखोला का मंदिर। भरे-पूरे दिनों में यहॉं शादी व्याह में लंगर लगते थे।


गाँव की एक ओर जानवरों के रहने के लिये खर्क थे। सब के सभी खर्क अब गिर चुके हैं। खर्क की सीढ़ियों से हिमालय का दृश्य अभी तक याद है।
बीते दिनों को पकड़ने की चेष्टा की
पर गहन सन्नाटे को भेद नहीं पाया
साँसों की आवाज ने चौंकाया
अंदर ही अंदर क्या कुछ फूटा पता नहीं
क्यों हुईं आँखें नम पता नहीं
अब यहाँ कोई नहीं रहता।
अब यहाँ कोई नहीं आता।
यहाँ मेरा बचपन बीता था।
अपनी ही भूमि पर
एक नितांत अजनबी की तरह
कई गाँठों वाली यादों की डोर से
अपना बचपन बाँध कर ले जाने के लिये।
मैं दस साल का था जब मैंने अपना गाँव छोड़ा था। उस समय गाँव की आबादी लगभग 40 थी, जिसमें से लगभग 10 जने फौज में या रोजी रोटी के चक्कर में बाहर रहते थे। साल-दो-साल में छुट्टी आते थे।
मगनखोला की बाईं ओर छोटा गाँव नवगाँव है जो मगनखोला से तो बड़ा ही है और दाहिनी ओर बड़ा गाँव बुडलगाँव है।
हमारा परिवार कलकत्ते जा कर बस गया था। गाँव से संबंध रहता ही था। चिट्ठी-पत्री चलती ही थी। पिता जी रिटायर होने के बाद गाँव में रहने आये थे। एक साल से अधिक नहीं रह पाये। खेती-बाड़ी नहीं कर सकते थे। सुविधाहीन पहाड़ी कठिन जीवन था। करने को कुछ था नहीं। पेन्शन के पैसों से सामान लाकर उस पहाड़ पर खाते थे। फिर साहस कर पिथैरागढ़ में रेस्तराँ खोला। तब का जमाना था। रेस्तराँ चला नहीं। अंत में तराई में घर बना कर वहीं रहने आये तो फिर गाँव का मुँह नहीं देखा। हम बाकी लोग तो बाहर ही बस गये थे। पहाड़ जाने के नाम पर पिथौरागढ़ में ही रुक जाते थे। कभी एक दिन के लिये कभी गाँव भी हो आते।
लगभग यही हाल मगनखोला के अन्य परिवारों का था। देखते देखते गाँव खाली हो गया। और अब तो उजाड़ है।

कुछ साल पहले जब मैं मगनखोला गया था तो यह दृश्य देखा और कैमरे में कैद कर लिया।
ये तीन औरतें, करीब तीन सालों से अकेली मगनखोला में रह रहीं थी। बाएँ वाली रिश्ते में मेरी भाभी लगती हैं।
बीच की लड़की बोल नहीं पाती है, गूँगी है। प्यार से सब उसे लाटी बुलाते हैं। साथ कहने को जग्गू नाम का कुत्ता था। एक रात को बाघ आया। किसी तरह उन तीनों ने अपनी जान बचाई पर जग्गू को नहीं बचा पाये। उसे बाघ ले गया था। और अगले दिन ही उन तीनों ने गाँव छोड़ दिया था।


लाटी पेड़ पर चढ़ी हुई है मेरे लिये नारंगी तोड़ रही है।
यह पिछले साल का चित्र है। वही जगह है, अब यहाँ कोई नहीं रहता है।


घर के सामने की खुली जगह को खाला बोलते हैं। इसी खाला में मेरा बचपन बीता था। यहाँ पर त्यौहारों में और खुशी के अवसरों पर खेल (कुमाऊँनी झोड़ा, सामूहिक नाच) होते थे।
इसी खाला में मैंने पहली बार तिब्बती लामा को देखा था। हमें बचपन में डराया जाता था कि ढंग से रहो नहीं तो लामा अपनी झोली में डाल कर ले जाएगा। इसी खाला में हुड़क्या हुड़क्यानि का नाच भी देखा था।
अखरोट का पेड़। इसके अखरोट हाथ से हलका दबाते ही टूट जाते हैं। अब भी नवगाँव के लोग आते हैं और पुराने दिनों को याद करते हुए अखरोट ले जाते हैं।

गाँव के पास से काली नदी का दृश्य।
मगनखोला का मंदिर। भरे-पूरे दिनों में यहॉं शादी व्याह में लंगर लगते थे।


गाँव की एक ओर जानवरों के रहने के लिये खर्क थे। सब के सभी खर्क अब गिर चुके हैं। खर्क की सीढ़ियों से हिमालय का दृश्य अभी तक याद है।
बीते दिनों को पकड़ने की चेष्टा की
पर गहन सन्नाटे को भेद नहीं पाया
साँसों की आवाज ने चौंकाया
अंदर ही अंदर क्या कुछ फूटा पता नहीं
क्यों हुईं आँखें नम पता नहीं
अब यहाँ कोई नहीं रहता।
अब यहाँ कोई नहीं आता।
यहाँ मेरा बचपन बीता था।
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