<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333</id><updated>2012-02-10T10:25:27.131+05:30</updated><category term='वैलेन्टाइन डे'/><category term='व्‍यंग्‍य'/><category term='संस्‍मरण'/><category term='यात्रा'/><category term='अंतर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन'/><category term='विषकन्या'/><category term='नाटक'/><category term='कहानी'/><category term='होली'/><category term='अँग्रेजी'/><category term='व्यंग्य'/><category term='काव्‍य'/><category term='कब तक रहें कुँवारे'/><category term='कविता'/><category term='व्‍लॉग'/><category term='युद्धभूमि'/><category term='कलायन'/><category term='प्यार'/><category term='लेख'/><category term='हिन्दी'/><category term='अनुभव'/><category term='ब्‍लैक फॉरेस्‍ट'/><category term='हास्‍य व्‍यंग्‍य'/><category term='मेरी कहानी'/><category term='पुरस्‍कार'/><category term='हास्‍य'/><title type='text'>कच्‍चा चिट्ठा</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>78</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-4164523504410047193</id><published>2011-03-27T14:23:00.005+05:30</published><updated>2011-03-27T15:01:28.073+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>प्रेमिका संवाद -5 (अंतिम किस्‍त )</title><content type='html'>प्रेमिका संवाद -5&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तक आपने पढ़ा &lt;br /&gt;&lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/blog-post_23.html"&gt;प्रेमिका संवाद -1&lt;/a&gt; &lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/2.html"&gt;प्रेमिका संवाद -2&lt;/a&gt; &lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/3.html"&gt;प्रेमिका संवाद - 3&lt;/a&gt; &lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/4.html"&gt;प्रेमिका संवाद - 4&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आगे- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेमाशिष का मुँह खुल गया। चेहरे पर बेवकूफों सा भाव लिये वह सरला की ओर देखने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'प्रेम,' सरला उसी रौ में कहती गई, 'किसी भी व्यक्ति में कम से कम थोड़ा तो आत्मसंयम होना चाहिए। जिस लड़की को अभी तुम अपने जाल में फाँस रहे थे , मैंने सुना है कि उसकी सगाई हो चुकी है। मानवता के नाते थोेड़ी तो मानवता दिखाओ। दूसरों की मँगेतरों को तो छोड़ दो।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेमाशिष के चेहरे के भावों में थोड़ा परिवर्तन हुआ। वह और भी अधिक बेवकूफ लगने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला ने अपना कर्तव्य समझ कर इतना कह तो दिया,पर यह उसके लिये बहुत कष्टदायक सिद्ध हुआ। प्रेम को देख कर, उसके सम्मुख खड़े हो कर बातें करते समय उसका सारा संयम रेत की दीवार की तरह ढहने लगा। बड़ी कठिनाई से उसने अपने को सँभाला। स्वयं को संयत करने के लिये वह बाथरूम की ओर चली गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे हर हाल में अपने को सँभालना होगा। अभी तो लंबा जीवन उसके सामने है। जीवन के सूखे और कंटकाकीर्ण पथ में ऐसे झटके, अब लगता है मील के पत्थर की तरह आते रहेंगे। उसे सदा सचेत रहना पड़ेगा कि कभी जब प्रेम पास हो तो वह किसी भी क्षणिक कमजोरीवश कही ऐसा न कर दे जैसा उसने नहीं करने का प्रण लिया है। जानबूझ कर तो मक्खी नहीं निगली जाती। फिर उसका आत्मसम्मान भी तो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर प्रेमाशिष ने मुँह में रखे आलू दम के टुकड़े को जैसे-तैसे उदर में पहुँचाया। उस आलू में अब कोई दम न था। विनोद ने मदन को देखा तो वह एक गिलास पानी ले कर उसके पास पहुँच गया। उसने कहा,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'लो, यह पानी पी लो। ठीक हो जायेगा।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'काश, हमारी सभी समस्याएँ पानी पीने से ठीक हो जातीं!' प्रेमाशिष ने सोचा। पर उसके मुँह से निकला, 'आँ...।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं तुमको वहाँ से देख रहा था। तुम्हारा चेहरा देख कर समझ गया कि तुम्हारे गले में कुछ अटक गया है।' विनोद ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'आँ...गाँ...।' प्रेमाशिष ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहा जा चुका है कि टीले वाला मकान पार्क का सबसे बड़ा मकान है। उसमें कमरे ही कमरे हैं।  नया आदमी तो इन कमरों की भूलभुलैया में भटक कर रह जाय। घर की मालकिन की कृपा से सरला बाथरूम तक पहुँच गई थी। जब वह निकली तो वह अपने हिसाब से उसी ओर बढ़ी जहाँ पार्टी चल रही थी। पर पहुँची एक बड़े लंबे चौड़े गलियारे में, जिसके दोनों ओर पर्दे लगे दरवाजे थे। कुछ देर तो वह पशोपेश में रही कि किस पर्दे को हटा कर अंदर जाए। स्थिति ऐसी थी कि देवकीनंदन खत्री जी होते उसकी जगह, तो वे भी सिर खुजलाने लगते। फिर जो दरवाजा पास था उसी का पर्दा हटा कर वह अंदर घुस गई। यह कोई और ही कमरा था। इस कमरे में मदन एक सोफे में धँसा सिगरेट पी रहा था। संयोग से मदन का मुँह दूसरी ओर था। वह उल्टे पाँव वापस लौट ही रही थी कि दूसरे दरवाजे से शीला कमरे में आई और मदन को संबोधित कर कहने लगी, 'लो तुम यहाँ छिपे हो। चलो, चलते हैं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम जाओ। मैं अभी बैठूँगा। आज छुट्टी है, फिर प्रेम भी साथ में है।' मदन ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हारा दोस्त प्रेम बहुत दुखी व्यक्ति है।' शीला ने कहा। 'वह अभी तक सरला से प्यार करता है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मुझे मालूम है।' मदन ने कहा। 'ऐसे में कोई कुछ नहीं कर सकता है।  कुछ मामले आदमी को स्वयं सुलझाने पड़ते हैं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मदन, अभी मेरी बहुत देर तक प्रेम से बातचीत हुई। उसने टीक से तो कुछ नहीं बताया, पर मुझे लगता है कि सरला गलती कर रही है। उसे यदि अंदाज हो जाय कि प्रेम उसे प्रेम करता है तो शायद दो बिछड़े मिल जाएँ।' सरला ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर्दे के पीछे खड़ी सरला ने सोचा, 'तो वह शीला के संबंध में गलती कर रही थी शायद, क्योंकि शीला का मँगेतर प्रेमाशिष का ही मित्र मदन लग रहा था। पर इससे क्या अंतर पड़ता है! चंद्रिका, कमला, निशा, विभा, तारा, सुजाता, सब के बारे में तो वह गलती नहीं कर सकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'यह मुश्किल है।' मदन ने कहा। 'क्यों कि सरला को विश्वास है कि प्रेम उससे प्रेम करता है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'फिर...फिर...'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'उसे यह भी विश्वास है कि प्रेम सरला के साथ-साथ शहर की उन सभी लड़कियों को प्यार करता है जो अविवाहित हैं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'ऐसा कैसे हो सकता है?' शीला ने पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सरला ऐसा ही सोचती है। सरला क्या, प्रेम को जानने वाले सभी यही सोचेंगे। क्यों कि उसका पिछला रिकार्ड ही ऐसा है।' मदन ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मदन, तुम अपने मित्र को अधिक जानते हो। पर मुझे तो लगता है कि प्रेम सरला से ही प्रेम करता है। यदि ऐसा है तो पहले की लड़कियों से छेड़छाड़ कोई महत्व नहीं रखती।' शीला न कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या सचमुच ऐसा संभव है? सरला सोचने लगी। पर वह अपने विचारों में कायम नहीं रह पायी। कोई खटका हुआ। उसका ध्यान अपनी वर्तमान परिस्थिति पर आ गया। वह वहाँ से हट गयी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गलियारे के दूसरे छोर पर उसे प्रसाद खड़ा दिखाई पड़ा। उसके खड़े होने का अंदाज बता रहा था कि हम यहाँ यूँ ही खड़े नहीं हैं। उसकी लंबी पतली गर्दन में उसका आवश्यकता से अधिक उभरा हुआ टेंटुआ जिस हिसाब से ऊपर नीचे हो रहा था उससे उसकी मानसिक हलचल का पता चलता  था। यदि टेंटुआधारी व्यक्ति के चेहरे से गंभीरता टपक सकती है तो प्रसाद के चेहरे से गंभीरता टपक रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रसाद एक गणितज्ञ था। वह कोई भी समस्या गणित के मॉडल के माध्यम से हल कर सकता था। पर सरला के व्यवहार का वह कोई भी मॉडल नहीं बना पा रहा था। यदि कोई संख्या दो से विभाज्य है, तो है। इसके दो अर्थ नहीं हो सकते। दो और दो का गुणनफल चार ही हो सकता है, कभी चौबीस नहीं। समीकरण के दाहिनी ओर जितनी संख्या है बाईं ओर भी उतनी ही होनी चाहिए। वह बेचारा सरला के साथ अपना कोई समीकरण नहीं बना पा रहा था। विभाजन में शेष बच जा रहा था। गुणनफल शून्य हो जा रहा था। यहाँ तक कि एक और एक मिला कर भी वह अकेला एक ही बच जा रहा था। एक गणितज्ञ के लिए इससे बड़ी व्यथा क्या हो सकती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सरो' उसने पुकारा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला ने अनसुना कर दिया और वह उसके पास से होकर निकलने लगी। अपनी पुकार का कोई असर न पा कर प्रसाद बहुत क्षुब्ध हुआ। इतना कि जितनी देर में आप हलचल कहेंगे उतनी देर में उसका टेंटुआ दो बार ऊपर नीचे हो गया। उसने सरला का रास्ता रोक कर तथा अपनी खनकती आवाज का ट्रेबल बढ़ा कर कहा, 'सरला!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्या है? मुझे अभी परेशान मत करो।' सरला ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हें मेरी बात सुननी पड़ेगी।' प्रसाद ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'देखो प्रसाद, मुझे तुम्हारी कोई बात नहीं सुननी है। जो कहना है बाद में कहना।' सरला ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं अभी कहूँगा। मैं और अधिक सहन नहीं कर सकता।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्या सहन नहीं कर सकते?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हारा व्यवहार।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तो अच्छा है न। मत सहन करो। मुझसे उलझो ही नहीं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा गणितज्ञ यहीं परास्त हो गया। सरला ने तो बात ही समाप्त कर दी। दूसरी ओर उस प्रेमाशिष के बच्चे को उसने साफ सीधे शब्दों में चेतावनी दी थी, पर उसका भी कोई असर नहीं हुआ। जो हो इस बार वह हार नहीं मानेगा। फैसला करके ही रहेगा, भले ही दशमलव के आवर्तक अंक की भाँति उसे लगे ही क्यों न रहना पड़े।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'देखो सरो,' उसने समझाते हुए कहा, 'जब तुम शेखर के साथ सिनेमा गई थीं, मैंने कुछ नहीं कहा। जब महेश तुम्हारा मित्र बना मैंने कुछ नहीं कहा। पर अब यह प्रेमाशिष मुझसे सहन नहीं होगा। मेरे मना करने के बाद भी अभी तुम उससे बातें कर रही थीं!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम होते कौन हो, मुझे मना करने वाले?' गुस्से से तिलमिला कर सरला ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं कौन होता हूँ? यानी मैं... मैं बताता हूँ मैं कौन होता हूँ। मैं तुम्हारा होने वाला पति हूँ।' लगभग चिल्लाते हुए प्रसाद ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हारा इतना साहस?' सरला ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हारे पिता जी ने मुझे चिट्ठी में ...' प्रसाद कहने लगा पर सरला ने उसकी बात बीच में काट कर कहा,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तो जा कर पिता जी से कहो। अब फिर कभी मेरा रास्ता रोका तो मैं तुम्हारा टेंटुआ दबा दूँगी।' सरला ने कहा। वह पैर पटक कर वहाँ से जाने के लिए उद्यत हुई तो उसने देखा कि पार्टी के लगभग सभी जन उस गलियारे में उपस्थित थे। ग्लानि से उसकी आँखों में ऑसू छलक आये। वह दौड़ती हुई वहाँ से निकल गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन शाम को पार्क में कोई अपने घर से बाहर नहीं निकला। सभी पत्र लेखन में व्यस्त हो गये थे। यह उस समय की बात है जब मोबाइल फोन, वीडियो चैट आदि भविष्य की बातें थीं।  लिहाजा चिट्ठी-डाकिये पर ही जोर था। पर उस दिन तो लगा था कि चिट्ठी लिखने की बीमारी पार्क में संक्रामक रोग की तरह फैल गई है। टीले वाले घर में जो घटना घटी थी, वह पार्क के इतिहास में नई थी। इतनी बड़ी घटना को अपने तक ही सीमित रखना, परले दर्जे की मूर्खता समझ कर सभी पत्र लिख रहे थे। इनमें से कुछ विशेष पत्र उल्लेखनीय हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंपा के पति ने सरला के पिता जी को लिखा कि आज ऐसी घटना हो गई है, जिसमें प्रसाद ने सरला के साथ दुर्व्यवहार किया। और यह भी लिखा कि उसकी राय में प्रसाद सरला के लिये उपयुक्त नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंपा ने भी सरला के पिता जी को पत्र लिखा। उसने भी अपने शब्दों में घटना का विवरण देते हुए प्रसाद को अनुपयुक्त बताया। उसने यह भी लिखा कि शायद सरला प्रेमाशिष नाम के एक युवक को चाहती है। पर उन दोनों में किसी कारण अनबन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रसाद ने भी सरला के पिता जी को पत्र लिखा। उसने लिखा कि सरला ने सरेआम उसके साथ दुर्व्यवहार किया है। उसने यह भी लिखा कि जब दोनों परिवारों में यह बात कई सालों से मालूम है कि सरला की शादी प्रसाद के साथ होने वाली है तो सरला का आचरण अच्छा होना चाहिए था। उसने मर्यादा का उल्लंघन करके महेश, शेखर आदि व्यक्तियों के साथ मित्रता बढ़ाई। अति तो उसने प्रेमाशिष नाम के व्यक्ति के साथ की। सब कुछ जानते हुए भी उन दोनों में अँगूठियों का आदान प्रदान हुआ। इतना होने के बावजूद वह सरला से शादी करने को तैयार है बशर्ते वह भविष्य में ऐसी हरकतें न करने का वादा करे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेमाशिष ने सरला को पत्र लिखा। उसने लिखा कि वह यानी प्रेमाशिष समझ सकता है कि आज की घटना से उसे यानी सरला को कितना कष्ट पहुँचा होगा। उसे यानी प्रेमाशिष को यह जान कर प्रसन्नता हुई कि उसके यानी सरला के और प्रसाद के बीच कुछ नहीं है। वह प्रसाद की बात पर कुछ टिप्पणी नहीं करना चाहता है, परन्तु यह जान कर उसे आश्चर्य अवश्य हुआ कि सरला के जीवन में उसके यानी प्रेमाशिष के आने के पहले शेखर और महेश नाम के व्यक्ति आ चुके हैं। यह बात उसे अवश्य आश्चर्य में डालती है कि अपने भूतकाल में न झाँकते हुए वह यानी सरला, कैसे प्रेमाशिष के भूतकाल में झाँक कर उसे दोषी ठहरा सकती है। उसे विश्वास है कि अभी शेखर या महेश का महत्व कुछ भी नहीं है। वह समझ सकता है, पर सरला ऐसी समझदार लड़की यह समझाने पर भी क्यों नहीं समझती कि निशा या तारा वाले संबंधों में न कभी दम था और न रहेगा। इस जीवन की उसकी एक ही चाहत है और वह है सदानंदजी की छोटी लड़की, सरला। उसके यानी प्रेमाशिष के इतना लिखने के बावजूद वह यानी सरला अड़ियल टट्टू की तरह अपनी बेवकूफी पर अड़ी रहे तो वह और कुछ नहीं कर सकता है। बस, अपना बचा खुचा जीवन उसी की यानी सरला की याद में बिता देगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला के पिता जी समझदार इनसान थे। उन्होंने दुनिया देख रखी थी। उन सब पत्रों से जो उनके नाम लिखे गये थे, उन्होने कुछ छाना और कुछ बीना। सरला की माँ से मिलने से पहले का अपना जामाना याद किया। प्रेमाशिष के संबंध में छानबीन की। पूरी तरह से लैस हो कर वे पार्क पहुँचे। उन्होंने चंपा के घर में एक विशाल आयोजन किया और प्रेम और सरला की सगाई की घोषणा कर दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच सरला ने कई बार प्रेम से मिलना चाहा था, पर हर बार झिझक का रुक गई थी। उसके पिताजी ने सब राहें आसान कर दी &lt;br /&gt;थीं, उसके लिये भी और प्रेमाशिष के लिये भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कहना गलत होगा कि प्रेम पर उसका शक जाता रहा। हाँ, शक के शोलों को समझदारी की राख ने अच्छी तरह ढक लिया था। फिर प्यार तो था ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समयोपरांत दोनों की शादी हो गई। मदन और प्रेम का साझेदारी वाला व्यापार भी चल निकला। प्रेम ने वहीं पार्क में घर बना लिया। आजकल के मापदण्डों के विपरीत सरला और शीला में बहुत घनिष्ठता हो गई। दोनों परिवार सुखपूर्वक रहने लगे।&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/blog-post_23.html"&gt;1&lt;/a&gt;   &lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/2.html"&gt;2&lt;/a&gt;  &lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/3.html"&gt; 3&lt;/a&gt;  &lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/4.html"&gt;4&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;समाप्त&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-4164523504410047193?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/4164523504410047193/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=4164523504410047193' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/4164523504410047193'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/4164523504410047193'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/5.html' title='प्रेमिका संवाद -5 (अंतिम किस्‍त )'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-3448807250378893071</id><published>2011-03-25T13:01:00.003+05:30</published><updated>2011-03-25T13:12:14.506+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>प्रेमिका संवाद -4</title><content type='html'>प्रेमिका संवाद -4&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तक आपने पढ़ा &lt;br /&gt;&lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/blog-post_23.html"&gt;प्रेमिका संवाद -1&lt;/a&gt;   &lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/2.html"&gt; प्रेमिका संवाद -2&lt;/a&gt;         &lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/3.html"&gt;प्रेमिका संवाद - 3&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आगे- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला प्रेमाशिष को दिल की गहराइयों से प्यार करती थी। ऐसा प्यार कभी-कभी कष्टप्रद होता है, जैसा कि सरला अनुभव कर रही थी। वह एक सूझबूझ वाली समझदार युवती थी। उसके पास भावुक हृदय था तो बुद्धियुक्त मस्तिष्क भी था। उसे मालूम हो चुका था कि प्रेमाशिष का प्यार टुकड़े-टुकड़े बँटा है। उसके हिस्से उसके प्यार का एक अणुसूक्ष्म टुकड़ा पड़ा था, जिसका जाहिर है, होना न होना बराबर था। चंद्रिका, कमला, निशा, विभा, तारा, सुजाता... नामों की एक लंबी सूची थी, जिसके अंत में उसका नाम भी था। अब तक शायद कुछ और नाम जुड़ गये हों। उसने सुन रखा था कि प्रेमाशिष की प्रेमिकाएँ एक क्रिकेट के मैदान में भी नहीं समाएंगी। ऐसे में वह क्या आशा कर सकती है! उस भीड़ में समा जाए तो क्या होगा!  उसे शायद डीप थर्डमैन क्षेत्र में खड़े होने भर को स्थान मिल जाए। यह उसे स्वीकार्य नहीं था। उसे ऐसा पति चाहिए था, जो केवल उसी का हो। वह उसे  चंद्रिका, कमला, निशा, विभा, तारा, सुजाता आदि की भीड़ में बाँटने के लिये तैयार नहीं थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें शायद प्रेमाशिष को अधिक दोष नहीं दिया जा सकता है। उसका तो नाम ही प्रेमाशिष है। यदि शहर की सभी लड़कियाँ उसके आगे-पीछे नाचती रहें तो उसे कितना दोष दिया जा सकता है? समझ-बूझ कर पूरे होशोहवास में उसने प्रेमाशिष से दूर रहने का निर्णय लिया था। पर निर्णय लेने से ही बात समाप्त नहीं हो जाती। उस पर बने रहना भी पड़ता है, जो उसे बहुत कष्टप्रद प्रतीत हो रहा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला न एक नहीं तीन निर्णय लिये थे। एक, वह प्रेमाशिष से दूर रहेगी। जिस गली में तेरा घर हो या गुजर हो बालमा, उस गली में पाँव रखना ही नहीं है। दो, वह कभी शादी नहीं करेगी। चूँकि इस जनम का सारा प्यार वह प्रेम को अर्पण कर चुकी है और प्रेम केवल उसका हो कर नहीं रह सकता है, इसलिए शादी का प्रश्न ही नहीं उठता है। प्रेम को छोड़ कर किसी और से शादी करना तो उस व्यक्ति के गले जिंदा मढ़ने के समान है। ऐसा पाप वह कभी नहीं कर सकती है। तीन, वह अपने जीवन को मानवोपयोगी कार्यों में समर्पित कर देगी। उद्देश्यहीन जीवन चलती-फिरती लाश के समान है।  मानसिक शांति के लिये भी उद्देश्य का होना बहुत आवश्यक है, विशेष कर जबकि उसका पहाड़ जैसा तीन-चौथाई जीवन उसके सामने है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनुष्य ने कोई अच्छा निर्णय लिया नहीं कि भगवान परीक्षा लेने पहुँच जाते हैं। सरला के पिताजी अचानक उसकी शादी के लिए बहुत सक्रिय हो गये। वे अपनी पुत्री के प्रति बहुत चिंतित हो उठे थे। पुत्री का भरी जवानी में उदासीन होना और शादी न करने का संकल्प करना किसी भी बाप को चिंतातुर कर सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला कुछ दिन शांत से बिताने के लिये अपनी चचेरी बहन चंपा के पास पार्क में चली आई थी। बहन से मिलने की खुशी में वह यह बात एकदम भूल गई कि प्रसाद भी पार्क में ही रहता है। प्रसाद और सरला के परिवार में पुरानी जान पहचान है। बचपन में दोनों एक दूसरे के पड़ोसी रह चुके हैं। तब एकाध बार उन दोनों की शादी का जिक्र हुआ था। उसी आधार पर प्रसाद सरला पर अपना हक समझा था। पर सरला को प्रसाद कभी एक आँख नहीं भाया। यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना उचित है कि एक आँख भाना केवल भाषा का प्रयोग है। ऐसी स्थिति में ऐसा ही कहा जाता है। क्यों कहा जाता है यह लेखक को नहीं मालूम। इसलिए यह न समझ लेना चाहिए कि सरला प्रसाद को केवल एक आँख से देखती थी। उसने उसे जब भी देखा दोनों आँखों से ही देखा, पर वह उसे किसी तरह भी पसंद नहीं आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर सरला के पिताजी की धारणा दूसरी ही थी। वे प्रसाद को सरला के लिये उपयुक्त पा रहे थे। उन्होंने इस आशय के पत्र प्रसाद, प्रसाद के पिताजी, चंपा के पति और सरला को एक ही डाक से भेज दिये।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;प्रसाद एक मेधावी गणितज्ञ था। अधिक मिलनसार तो नहीं था पर पार्क की सामाजिक दुनिया के एक ऐसा पात्र था जो बस था। सरला के प्रति उसका व्यवहार किसी समझदार व्यक्ति का सा नहीं था, जो पार्क में आजकल चर्चा का विषय था। लोगों को आश्चर्य इस बात पर था कि सरला ऐसी समझदार और आधुनिक लड़की प्रसाद को क्यों सहन कर रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर सरला की धारणा थी, यदि वह प्रसाद को दुत्कार देती है तो उसके पिताजी किसी दूसरी जगह उसकी बात चलायेंगे, जहाँ उसे फिर इनकार करना पड़ेगा। इससे कोई अप्रिय घटना न घटे, इससे तो यही अच्छा था कि कुछ दिन प्रसाद को सहन कर लो। वह बेवकूफ आदमी कैसे अधिकारपूर्ण स्वर से उसे 'सरो सरो' बुलाता है। उसे वैसे ही अपने बचपन के इस नाम से चिढ़ है, प्रसाद के बुलाने से तो तन-बदन में आग लग जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मदन प्रेमाशिष को पेड़ों वाले घर की ओर ले जा रहा था। रास्ते में दोनों बातें करते जा रहे थे। मदन कह रहा था,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'प्रेम मुझे विश्वास नहीं होता कि तुम में इतना बड़ा परिवर्तन आ जाएगा। एक समय था तुम तारा और... और... और...।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सुजाता।' प्रेमाशिष ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ, तारा और सुजाता। एक समय था जब तुम दोनों के साथ पेंगें बढ़ा रहे थे और जब तुम्हारी पोल खुली थी तो कितना बड़ा झमेला खड़ा हुआ था। पर तुम्हारे चेहरे पर शिकन तक नहीं आई थी। और आज एक सरला तुमको छोड़ कर चली गई तो तुम हाय तौबा मचा रहे हो।' मदन ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सरला से पहले जितनी भी लड़कियाँ थीं, उनका अब कोई महत्व नहीं है। वह तो एक तरह से खिलवाड़ था। सरला... जाने दो, तुम नहीं समझोगे। कभी प्रेम में पड़ोगे तो स्वयं समझ जाओगे।' प्रेमाशिष ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेड़ों वाला घर सामने आ गया था। सामने बड़े-बड़े पेड़ थे और फिर सुंदर मकान था। एक पेड़ पर बड़ा सा झूला पड़ा हुआ था, जिसमें एक लड़की बैठी पुस्तक पढ़ रही थी और हौले-हौले झूल रही थी। प्रेमाशिष ने देखा यह वही लड़की थी जो सुबह उसे देख कर मुस्कराई थी। यह मदन की मँगेतर शीला थी जिसे मदन प्रेमाशिष से मिलाने के लिये उत्सुक था। परिचय कराने के लिये वह तत्पर हुआ तो उसने पाया कि शीला और प्रेमाशिष एक दूसरे को देख कर मुस्करा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम दोनों एक दूसरे को जानते हो?' आश्चर्य से मदन ने पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;' आज सुबह दौड़ते समय मैंने इनको देखा था।' प्रेमाशिष ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुमने बताया था कि तुम्हारे मित्र प्रेमाशिष आ रहे हैं। सुबह इनको देख कर मैंने अंदाज लगाया कि यह वही हैं।' उस लड़की ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुमने ठीक अंदाज लगाया। यही प्रेमाशिष है। और प्रेम, यह शीला है मेरी मँगेतर।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हारी मँगेतर!' प्रेमाशिष ने आश्चर्य करते हुए कहा। 'तुमने कुछ बताया ही नहीं। चुपके-चुपके मँगनी कर ली।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बताने का समय ही नहीं मिला प्रेम। एक दिन यह मुझे देख कर मुस्कराई। मुस्कराहट मेरे अंदर तक चली गई।  इसके बाद जब मुझे होश आया तो मैंने पाया कि इसके साथ मेरी मँगनी हो चुकी है।' मदन ने नाटकीय अंदाज में कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मदन तुम इस तरह की बात करोगे तो मैं गुस्सा हो जाऊँगी।' शीला ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं नहीं, शीला, यह गुस्से का अवसर नहीं है।' प्रेमाशिष ने कहा। 'सबसे पहले मेरी बधाई स्वीकार करो।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'प्रेम मैं तुमको एक बात बताऊँ, अभी-अभी मेरे परिचय कराने से पहले ही जब तुम दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्करा रहे थे तो मेरा दिल धक्‌ से रह गया था।' मदन ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्यों क्या हो गया था?' शीला ने कौतूहल से पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं तुमको बता चुका हूँ शीला कि प्रेम के पास हो न हो कोई एक सम्मोहन मंत्र है। यह जिधर से भी गुजरता है, लड़कियाँ अपना दिल थाल में सजा कर इसके सामने रख देती हैं। मैं डर गया था कि कहीं इसने मेरी इकलौती मँगेतर पर कहीं कोई जादू तो नहीं कर डाला, जो जान न पहचान, इसे देख कर मुस्करा रही है। जिस मुस्कान ने मुझे कहीं का नहीं रखा ही...।' मदन कह रहा था और उसकी बात काट कर प्रेमाशिष न कहा, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्या बकवास कर रहे हो मदन! शीला, इसकी बातों में मत जाओ। इस प्रकार की हलकी बातों ने मेरा पहले ही बहुत नुकसान कर दिया है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शीला ने घड़ी पी दृष्टि गड़ाते हुए कहा, 'टीले वाले मकान पर नहीं जाना है क्या? देर हो रही है, चलें?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विनोद का घर टीले के शीर्ष भाग में था। इसीलिए उसे टीले वाला घर कहा जाता था। जब ये लोग वहाँ पहुँचे तो वहाँ 10-12 व्यक्ति पहले से ही उपस्थित थे। चूँकि प्रेमाशिष पार्क में आता रहता था, इसलिए अधिकांश लोगों से वह परिचित था। सभी उससे बड़ी गर्मजोशी से मिले। कुछ इस तरफ की बातें हुईं। कुछ उस तरफ की बातें हुईं। फिर सब लोगों ने सब तरफ की बातें कीं। वैसे तो, जैसी उसके मन की अवस्था थी, प्रेमाशिष को पार्टी वार्टी में जाना पसंद नहीं आ रहा था। एक ओर तो आपकी प्रेमिका आपको आईना दिखा कर चली गई थी, दूसरी ओर आपको पार्टी में जाने को कहा जा रहा था। एक बेयरिंग लिफाफे की तरह। पर अब यहाँ पर नाश्ते का सुरुचिपूर्ण आयोजन और चहल चहल देख कर उसे अच्छा ही लग रहा था। वह इसलिए भी प्रसन्न था कि उसके मित्र मदन की सगाई शीला जैसी अच्छी लड़की से हुई थी, जो बहुत ही हँसमुख और मिलनसार थी। वर्ना उसके ऐसे भी मित्र थे जो शादी से पहले तो थे हम प्याला और हम निवाला और शादी के बाद सब गड़बड़ घोटाला। शादी के बाद कुछ तो ऐसे जमींदोज हुए कि जैसे कभी थे ही नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मदन और शीला की जोड़ी देख कर उसका ध्यान बरबस अपने ऊपर जा रहा था। नाम तो था प्रेमाशिष पर था प्रेम शापित। क्या ही अच्छा होता यदि सरला उसकी होती और उसके साथ होती। खैर, जो नहीं है, नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह शीघ्र ही शीला से घुलमिल गया। दोनों अपनी-अपनी नाश्ते की प्लेट लिये एक किनारे खड़े  बातें करते रहे। आलू दम बहुत दमदार था। प्रेमाशिष को याद नहीं पड़ा कि उसने इससे स्वादिष्ट आलू दम पहले कभी खाया हो। उसने शीला का ध्यान आलू दम की ओर आकर्षित किया तो शीला ने उसे बताया कि वह उन अभागियों में से है जो पाव भर खायें तो उनका वजन सेर भर बढ़ जाता है। स्वयं को प्रलोभन से दूर रखकर, चेहरे में दृढ़ता का भाव लिये वह खाली प्लेट रखने चली गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर प्रेमाशिष आलू दम में चम्मच डुबोते हुए इस बात पर गौर करने लगा कि आजकल की प्लेटें कितनी कम गहरी होती हैं। प्लेट से सिर उठा कर उसने देखा तो पाया कि सरला उसी की ओर आ रही है। उसका दिल धड़ धड़ धड़ धड़ करने लगा। उसने आगे बढ़ कर कहा, 'सड़ला!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुँह में आलू हो तो सरला का उच्चारण करना कठिन होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'प्रेम।' सरला ने कहा। उसके कहने में इतनी तेजी थी कि उसके मुँह से निकला 'फ्रेम'।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सरला ' प्रेम ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'प्रेम।' सरला ने कहा। 'तुम्हारे व्यक्तिगत मामले में बोलने का मुझे अधिकार तो नहीं है, पर बोले बिना नहीं रहा जाता।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'किसने कहा नहीं है। तुम्हें पूरा अधिकार है।' प्रेमाशिष ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं जानती हूँ प्रेम कि जो कुछ तुम कर रहे हो, तुम उसे करने के लिये वाध्य हो। फिर भी करने से पहले कुछ तो सोच लेते। मैं पूछती हूँ  कि क्या कोई भी लड़की तुमसे बच नहीं सकती?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/blog-post_23.html"&gt;1&lt;/a&gt;   &lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/2.html"&gt;2&lt;/a&gt;   &lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/3.html"&gt;3&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;अभी और है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अंतिम किस्त कल शाम तक&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-3448807250378893071?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/3448807250378893071/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=3448807250378893071' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/3448807250378893071'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/3448807250378893071'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/4.html' title='प्रेमिका संवाद -4'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-5336513982624280634</id><published>2011-03-24T12:10:00.006+05:30</published><updated>2011-03-24T12:15:27.812+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>प्रेमिका संवाद -3</title><content type='html'>प्रेमिका संवाद -3&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मदन उठ चुका था तथा चाय में उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। अपने मित्र को अनमना देख कर उसने कैफियत पूछी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्या बताऊँ मदन, मेरे किस्मत हमारे गोलपोस्ट की तरह हो गई है। कोई भी उसमें मनमानी से गोल ठोक सकता है।' प्रेमाशिष न मरी हुई आवाज में कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह-सुबह इस तरह घुमा फिरा कर बात मत करो यार। सीधे बताओ कि बात क्या है।सीधे बताने से समझने में सुविधा रहती है।' मदन ने चास की सुड़की मारते हुए कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अपनी किस्मत को कोस रहा था।' प्रेमाशिष ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्यों क्या हुआ तुम्हारी किस्मत को?' मदन ने पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बहुत कुछ। सबसे पहली बात तो यह है कि मेरी दवाई की दुकान वाली नौकरी चली गई।' प्रेमाशिष ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हारा यह नौकरी और छोकरी वाला चक्कर मेरी समझ में कभी नहीं आया। कभी नौकरी के लिये छोकरी जाती है और कभी छोकरी के लिये नौकरी। पर दोनों की कमी कभी नहीं हुई तुम्हारे पास। इस बार क्या बात हो गई जो किस्मत को कोस रहे हो?' मदन ने पूछा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'दूसरी बात यह है कि सरला ने संबंध विच्छेद कर दिया है।' उदास प्रेमाशिष ने और भी उदास होते हुए कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'यह अवश्य नई बात है। नौकरी और छोकरी दानों एक साथ चली गईं। अब समझ में आया तुम्हारी उदासी का कारण।' मदन ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मजाक मत करो मदन। और सरला के लिये छोकरी शब्द का प्रयोग न करो तो अच्छा है।' प्रेमाशिष ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्या नाम बताया, सरला? यार, तुम कब सरला से मिले, कब उससे संबंध स्थापित किया और कब संबंध विच्छेद हुआ! क्योंकि मुझे अच्छी तरह याद है, जब तीन महीने पहले मैं जब तुमसे मिलने आया था तो उस समय तुम्हारी प्रेमिका सुमति नाम की लड़की थी।' मदन ने आश्चर्य करते हुए कहा। उसे मालूम था कि प्रेमाशिष लड़कियों के मामले में पैरों तले घास नहीं उगने देता है। लड़की देखी नहीं कि वह उस पर मर मिटता है। जाने उसके व्यक्तित्व में क्या आकर्षण था कि लड़कियाँ भी उसकी ओर खिंची चली आती थीं। उसके बारे में यह प्रचलित था कि यदि प्रेमाशिष की सभी भूतपूर्व प्रेमिकाओं को एकत्रित किया जा सके तो उनके लिये एक क्रिकेट का मैदान चाहिये। तब भी शायद जगह की समस्या बनी रहेगी। इतना जानने के बाद भी उसके जीवन में लड़कियों का टर्नओवर देख कर आश्चर्य होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सुमति और उससे पहले की लड़कियाँ तो बस ऐसे ही जान पहचान भर थीं, मदन, पर सरला ने तो मेरी दुनिया ही बदल दी है। उसके बाद मेरे जीवन में और दूसरी लड़की आ ही नहीं सकती है। एक तरह से मैं उसे भूलने के लिये ही तुम्हारे पास आया था। मुझे क्या पता था कि वह भी यहीं है।' प्रेमाशिष ने कहा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम यहाँ वाली सरला की बात कर रहे हो?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'वही जो अपनी चचेरी बहन के पास रहने आई है?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ, वही। अभी दौड़ते हुए मिली थी।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'उसकी शादी तो प्रसाद से होने वाली है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ, वह भी मिला था। उसे मालूम है कि सरला और मैं शादी करने वाले थे। वह मुझे धमकी भी दे रहा था। कैसा आदमी है यह प्रसाद?' प्रेमाशिष ने पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'यार, आदमी तो वह ठीक ही था। पर सरला के साथ उसका रवैया किसी की समझ में नहीं आ रहा है। यह सबको मालूम है कि सरला उससे बहुत चिढ़ती है। पर वह सबसे यही कहता फिरता है कि उसकी शादी सरला से होने वाली है। पर उसकी ऐसी-तैसी। तुम्हारा अनादर करने का अधिकार नहीं है उसे।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं कह रहा था न कि मेरी तो किस्मत ही खराब है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अब इतने दीन भी मत बनो। सरला के मामले में तो मैं कुछ नहीं कर सकता, हाँ, तुम्हारी रोजी-रोटी की समस्या हल हो सकती है, अगर तुम मेरी साझेदारी वाली बात मान लो तो। पहले मानी होती तो अभी तक हम दोनों मालामाल हो गये होते। अब भी देर नहीं हुई है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'ठीक है, आज से तुम्हारी और मेरी साझेदारी। तुम कागज तैयार करो और मैं गाँव का मकान बेच कर रुपयों का बंदोबस्त करता हूँ।'&lt;br /&gt;'यह हुई न बात। इसी बात पर मिठाई खाई जाय।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'खा लेंगे मिठाई भी।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अरे तुमने इतना बड़ा निर्णय लिया है, कुछ तो मूड ठीक करो। यह क्या मुँह लटकाए बैठे हो?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'यह मुँह तो अब जीवन भर लटका ही रहेगा।' प्रेमाशिष ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने में मदन की माँ ने आकर उन दोनों को याद दिलाया कि विनोद के यहाँ जाना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अरे बाप रे! मैं तो भूल ही गया। तुमको विनोद की याद है न। अरे, वही मोटा, जिससे तुम पिछली बार मिले थे। मैंने तुम्हारे आने के बारे में कहा तो उसने हमें अभी नाश्ते पर बुलाया है।' मदन ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'यहाँ की बस यही बात मुझे पसंद नहीं आती है। बात-बेबात में पार्टियाँ।' प्रेमाशिष ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मिलने का कोई तो बहाना चाहिए। फिर हमारी इस छोटी सी पार्क की दुनिया में मनोरंजन का दूसरा साधन भी तो नहीं है। चलो, जल्दी तैयार हो जाओ। आज मैं तुम्हें एक विशेष व्यक्ति से भी मिलवाऊँगा। पहले तुम अपनी यह मुहर्रमी सूरत ठीक कर लो। मुझे लगता है कि तुम सरला वाली घटना का कुछ अधिक ही असर ले रहे हो। तुम्हारा तो सिद्धांत रहा कि तू नहीं और सही, और नहीं और सही।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं मदन, सरला के साथ वह बात नहीं है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुमने बताया नहीं कि सरला ने संबंध क्यों तोड़ा?' मदन ने पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'गलतफहमी में। तुम निशा को जानते हो न?' प्रेमाशिष ने पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ, वही लड़की न, जो तुम्हारे पड़ोस में रहती है?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ वही।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हारी भूतपूर्व।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ, वही। एक जमाने में वह सोचती थी कि वह मुझसे प्यार करती है।  खैर, उस दौर से वह कभी की निकल चुकी है। अभी वह एक परिपक्व युवा महिला है। अब हम दोनों में साधारण दोस्ती है। मुझे लगता है कि किसी ने सरला को इस दोस्ती के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर बता रखा है। सरला के बार-बार तिक-तिक करने पर मैंने उसे बताया कि कोई ऐसी-वैसी बात नहीं है। मैंने उससे वादा भी कर लिया कि मैं कभी निशा से नहीं मिलूँगा।' प्रेमाशिष ने कहा। फिर उसने लंबी साँस ली और आगे कहना आरंभ किया,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'उसके बाद एक दिन निशा अपनी सहेली रत्ना को लेकर मेरे घर आई। दोनों का पिक्चर का प्रोग्राम था। वे मेरे लिये भी टिकट लेती आई थीं। मुझे मना करते नहीं बन पड़ा। मना करने का कोई कारण भी नहीं था। ऐसी-वैसी बात तो थी नहीं। बदकिस्मती यह कि उसी हाल में सरला भी अपनी एक सहेली के साथ पिक्चर देखने आई थी। दो और दो मिला कर उसने बाईस बना डाला और मेरी अँगूठी वापस कर दी।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/blog-post_23.html"&gt;1&lt;/a&gt;   &lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/2.html"&gt;2&lt;/a&gt;   &lt;a href="http://"&gt;3&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अभी और है। आगे कल शाम तक&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-5336513982624280634?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/5336513982624280634/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=5336513982624280634' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/5336513982624280634'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/5336513982624280634'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/3.html' title='प्रेमिका संवाद -3'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-2902176546587628419</id><published>2011-03-23T18:26:00.001+05:30</published><updated>2011-03-23T18:30:33.560+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>प्रेमिका संवाद -2</title><content type='html'>प्रेमिका संवाद -2&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सरला, तुम यहाँ!' उसने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'यहाँ मेरी चचेरी बहन रहती है। मैं उसी के पास आई हूँ। तुम यहाँ कैसे?' सरला ने पूछा। उसने सोचा था कि उसने अपने ऊपर काबू पा लिया है। कितनी भूल कर रही थी वह। प्रेम को देखते ही वह प्रेम विह्वल हो उठी है। क्यों आया है प्रेम यहाँ? यदि प्रेम इसी तरह उसे हर गली-नुक्कड़ पर मिलता रहेगा तो कैसे वह उसे अपने जीवन से दूर कर पायेगी। दूर तो उसे रहना ही था। उसे पूरा विश्वास था कि उसका निर्णय उचित है। प्रेमाशिष जैसे दिलफैंक व्यक्ति के साथ रह कर बार-बार मरने से तो यही अच्छा था कि जी कड़ा कर के उसके जीवन से ही दूर चले जाओ। पर प्रेम ऐसा भी तो नहीं करने दे रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं अपने मित्र मदन के यहाँ कुछ दिन रहने आया हूँ। तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी याद...'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'प्रेम, अब ऐसी बातें मत करो।' उसे बीच में ही रोक कर सरला ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने में, जिस ओर से सरला दौड़ कर आई थी, उसी ओर से एक व्यक्ति बड़े कष्ट से दौड़ता हुआ उनके पास पहुँचा। और मुँह खोल कर हाँफने लगा। वह एक साधारण कद का दुबला-पतला व्यक्ति था। गालों की हड्डियाँ आगे को आयी हुई थीं, जिससे आँखें धँसी हुई प्रतीत होती थीं। वह बोलने योग्य हुआ तो उसने कहा,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम बहुत तेज दौड़ती हो सरो। मैं तो हाँफते-हाँफते बेहाल हो गया।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैंने तुम्हें साथ दौड़ने के लिये तो नहीं कहा था, प्रसाद।' सरला ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'यह कौन है?' उसने प्रेम की ओर देखते हुए पूछा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मेरे मित्र हैं प्रेमाशिष। प्रेमाशिष, इनसे मिलो, इनका नाम है प्रसाद।' सरला ने परिचय कराया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मित्र?' प्रसाद ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्यों क्या तुम्हें कोई आपत्ति है?' सरला ने प्रसाद को घूरते हुए ऊँची आवाज में कहा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं-नहीं मुझे कोई आपत्ति नहीं है।' प्रसाद ने जल्दी से कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अच्छा प्रेम, नमस्ते।' कह कर सरला ने हाथ जोड़े और दौड़ती हुई आगे निकल गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला के जाने के बाद प्रसाद ने प्रेमाशिष को घूरा और कई क्षणों तक घूरता रहा। प्रेमाशिष को समझ नहीं आया, कि वह प्रसाद का क्या बनाये अर्थात् उसे किस शीर्षक के नीचे ले, शत्रु,मित्र या तटस्थ। हालाँकि सरला ने उससे संबंध विच्छेद कर लिया था। अँगूठी वापस करके किसी प्रकार की आशा की कोई गुंजाइश नहीं रखी थी।  फिर भी उसे आशा थी क्योंकि  उसका प्यार सच्चा था और उसका मन निर्मल। सरला से मिल कर अभी उसने अपनी नीति निर्धारित कर ली कि, सरला को रिझाओ। यह भी आवश्यक हो गया था कि वह सरला से मिलने-जुलने वाले लोगों के साथ कूटनीति का सहारा ले कर अच्छा व्यवहार रखे। प्रसाद में ऐसी कोई बात नहीं थी जो लोगों को उसके प्रति अच्छे व्यवहार के लिये उकसाए। दुबला-पतला शरीर, गोरे कव्वे-सा चेहरा और खनकती आवाज। ऊपर से तुरर्ा यह कि वह उसे फिल्मी खलनायक के अंदाज में घूर रहा था। खलनायक के अंदाज में ही उसने कहा,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हारे बारे में सुन चुका हूँ। सरला ने तुमको तुम्हारी दो टके की अँगूठी वापस कर दी है। अब क्या लेने आये हो?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेमाशिष इस आकस्मिक हमले के लिये तैयार नहीं था। वह मुँह बाये प्रसाद को देखता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'देखो, सरला और मेरे खानदान में कई पीढ़ियों से संबंध है। सरला की शादी मेरे साथ होने वाली है। मैं तुमको आगाह किये देता हूँ, कोई ऐसी बेवकूफी मत करना जो तुम्हारे स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हो।' इतना कह कर प्रसाद अकड़ कर उसी ओर चला गया जिस ओर सरला गई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेमाशिष का दिल तो किया कि वह प्रसाद की जबान खींच कर, उसी के हाथ में रख कर, उससे पूछे कि अब बोलो क्या बोलते हो? पर वह अपनी ही निर्धारित की हुई नीति के अनुसार आचरण करने के लिये वाध्य था। वह भी वहॉ से उठ कर जाने की सोच ही रहा था कि उसने देखा एक सुंदर, सुडौल, लड़की दौड़ती हुई उसी की ओर आ रही थी। दौड़ने के श्रम से उसकी साँस तेज चल रही थी तथा उसके चेहरे पर लालिमा छलक आई थी। वह उसकी ओर देख कर मुस्कराई और मुस्कराते हुए आगे निकल गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह-सुबह तरुणाई की अरुणाई लिये जब कोई सुंदर चेहरा दिख जाय तो जीवन में कड़ुवाहट के लिये कोई स्थान नहीं रह जाता है। जीवन के प्रति लगाव बढ़ जाता है। किसी शायर ने कितना गलत कहा है कि अच्छी सूरत पर लोग बुरी नजर ही डालते हैं। यह कहना गलत होगा कि प्रेमाशिष बहुत प्रसन्नचित्त हो कर घर की ओर गया। हाँ, यह कहा जा सकता है कि प्रसाद ने उसके मन में जो कड़ुआहट घोल दी थी, सुंदर तरुणी की आकर्षक मुस्कान ने उसका असर कम कर दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/blog-post_23.html"&gt;1 &lt;/a&gt;  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अभी और है। आगे कल शाम तक&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-2902176546587628419?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/2902176546587628419/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=2902176546587628419' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/2902176546587628419'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/2902176546587628419'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/2.html' title='प्रेमिका संवाद -2'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-2030081956534033221</id><published>2011-03-23T14:02:00.001+05:30</published><updated>2011-03-23T14:04:49.521+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>प्रेमिका संवाद</title><content type='html'>प्रेमिका संवाद                                 ( कहानी - मथुरा कलौनी )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मार्च का महीना था। आम के पेड़ों में बौर आ चुका था। जिस सड़क पर प्रेमाशिष दौड़ रहा था, उसके दोनों ओर आम के पेड़ थे। रस टपकने से ऐसा लग रहा था जैसे सड़क पर शहद से छिड़काव किया गया हो। प्रेमाशिष के जूते चिट-चिट कर रहे थे। दौड़ते-दौड़ते वह हाँफ गया तो सुस्ताने के लिये सड़क के किनारे बने एक सिमेंट के बेंच पर बैठ गया। गंगा किनारे धरती पर कछुए के कूबड़ जैसे टीले पर यह पार्क बना हुआ था। चार किलोमीटर परिधि के घेरे में इसकी अपनी अलग ही दुनिया थी। जिस सड़क के किनारे वह बैठा हुआ था, वह पार्क की मुख्य सड़क थी। सड़क के दोनों ओर सुंदर उद्यानों के बीच मकान बने हुए थे। मकानों के नाम भी बड़े मनभावन थे जैसे शांति निकेतन, फूल गाँव, पेड़ों वाला घर इत्यादि। फूल गाँव, जैसा कि नाम से प्रतीत होता है, फूलों के उद्यानों से घिरा हुआ घर था जो प्रेमाशिष के मित्र मदन का था। प्रेमाशिष आजकल मदन के साथ रह रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने सोचा था घर से दूर, मदन के साथ उसका दिल बहल जायेगा, पर ऐसा नहीं हो पा रहा था। यहाँ के शस्य श्यामल सुरम्य वातावरण में उसे अपनी भूतपूर्व प्रेमिका की याद बार-बार आ रही थी। जो प्रेमाशिष को जानते हैं उनके लिये स्पष्ट किया जाता है कि जिस भूतपूर्व प्रेमिका की याद उसे सता रही थी उसका नाम सरला है। उसी के प्रेम में घायल प्रेमाशिष सोच रहा था कि छोटी-सी यह दुनिया, पहचाने रास्ते हैं, तुम कभी तो मिलोगे तब पूछेंगे कि कुमारी सरला क्या मिल गया आपको हमारा प्यार ठुकरा कर?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मदन के पास आने का दूसरा और मुख्य कारण था जीविकोपार्जन का कुछ ठोस और स्थाई कार्यक्रम बनाना। नौकरी उसे मिल नहीं रही थी। किसी ख्यातिप्राप्त अच्छी कंपनी में अच्छी नौकरी के लिये पचपन प्रतिशत अंकों से पास की हुई उसकी बी.ए. की डिग्री यथेष्ट नहीं थी। सरकारी नौकरी के लिये न तो वह किसी आरक्षित कोटे में आता था और न उसकी वंशावली उपयुक्त थी। अभी तो वह कभी किसी शोरूम में, कभी किसी स्टोर में और कभी किसी परचून की दुकान में काम करके अपने जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ा रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरला थी तो आशा और विश्वास था कि यह करेंगे वह करेंगे, पर जब उसने संबंध विच्छेद कर दिया तो उसके साथ सारा उत्साह जाता रहा। चूँकि उत्साह नहीं था इसलिए अब वह बहुत कुछ नहीं कर सकता था, पर नून तेल का कुछ न कुछ समाधान तो हो ही जाना चाहिए। रोज-रोज की झिक-झिक किसे पसंद है। प्रेमिका विहीन जीवन की आवश्यकताएँ ही कितनी, पर इस महँगाई में वे भी भारी पड़ रही थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह की शीतल स्वच्छ बयार पेड़ों पर सरसरा कर बह रही थी। चिड़ियाँ अपनी दिनचर्या में जुट चुकी थीं। यहाँ शांति की अनुभूति इतनी थी कि हवा की सरसराहट और चिड़ियों की चहचहाहट के ऊपर वह अपने हृदय की गति भी सुन पा रहा था। थप..थप..थप..थप।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह क्या, थप-थप की आवाज तेज होती चली जा रही थी। अब वह दाहिनी ओर से आ रही थी। धत् तेरे की। यहाँ खामोशी में किसी के दौड़ने की आवाज को वह अपने दिल की धड़कन समझ बैठा था। दौड़ने वाली एक लड़की थी जो उसी की ओर आ रही थी। उसने लक्ष्य किया कि वह बहुत कुछ सरला से मिलती थी। उसने ट्रैक सूट भी ठीक वैसा ही पहन रखा था जैसा सरला के पास था। सफेद धारियों वाला गहरे नीले रंग का ट्रैक सूट। कद काठी और दौड़ने का अंदाज सब सरला जैसे ही थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेमाशिष अपने ऊपर हँस कर दूसरी ओर देखने लगा। सावन के अंधे को सब हरा ही सूझता है। सरला की चाहत में उसकी कल्पना यथार्थ पर हावी हो रही थी। जब लड़की उसके पास पहुँची तो वह ठिठक गई। उसने उसे उसका नाम लेकर पुकारा, 'प्रेम!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेमाशिष ने जब उस लड़की को पास से देखा तो उसे मालूम हुआ कि वह क्यों सरला जैसी दिख रही थी। वह स्वयं सरला ही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी और है। आगे कल शाम तक&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-2030081956534033221?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/2030081956534033221/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=2030081956534033221' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/2030081956534033221'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/2030081956534033221'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/blog-post_23.html' title='प्रेमिका संवाद'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' 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/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/5270957304142035181/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=5270957304142035181' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/5270957304142035181'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/5270957304142035181'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2011/03/blog-post_13.html' title='हम मिले'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' 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src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-7719400349523057924</id><published>2010-09-30T22:01:00.020+05:30</published><updated>2010-10-01T13:06:41.698+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्‍मरण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>मगनखोला</title><content type='html'>मैं आया था यहाँ चुपके चुपके&lt;br /&gt;अपनी ही भूमि पर &lt;br /&gt;एक नितांत अजनबी की तरह&lt;br /&gt;कई गाँठों वाली यादों की डोर से&lt;br /&gt;अपना बचपन बाँध कर ले जाने के लिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं दस साल का था जब मैंने अपना गाँव छोड़ा था। उस समय गाँव की आबादी लगभग 40 थी, जिसमें से लगभग 10 जने फौज में या रोजी रोटी के चक्कर में बाहर रहते थे। साल-दो-साल में छुट्टी आते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगनखोला  की बाईं ओर छोटा गाँव नवगाँव है जो मगनखोला से तो बड़ा ही है और दाहिनी ओर बड़ा गाँव बुडलगाँव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा परिवार कलकत्ते जा कर बस गया था। गाँव से संबंध रहता ही था। चिट्ठी-पत्री चलती ही थी।  पिता जी रिटायर होने के बाद गाँव में रहने आये थे। एक साल से अधिक नहीं रह पाये। खेती-बाड़ी नहीं कर सकते थे। सुविधाहीन पहाड़ी कठिन जीवन था। करने को कुछ था नहीं। पेन्शन के पैसों से सामान लाकर उस पहाड़ पर खाते थे। फिर साहस कर पिथैरागढ़ में रेस्तराँ खोला। तब का जमाना था। रेस्तराँ चला नहीं।  अंत में तराई में घर बना कर वहीं रहने आये तो फिर गाँव का मुँह नहीं देखा। हम बाकी लोग तो बाहर ही बस गये थे। पहाड़ जाने के नाम पर पिथौरागढ़ में ही रुक जाते थे।  कभी एक दिन के लिये कभी गाँव भी हो आते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग यही हाल मगनखोला के अन्य परिवारों का था।  देखते देखते गाँव खाली हो गया। और अब तो उजाड़ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKWC2ifq60I/AAAAAAAAB9M/3SsCdlWYq8I/s1600/00014.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 320px; height: 214px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKWC2ifq60I/AAAAAAAAB9M/3SsCdlWYq8I/s320/00014.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5522964391523969858" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कुछ साल पहले जब मैं मगनखोला गया था तो यह दृश्‍य देखा और कैमरे में कैद कर लिया।&lt;br /&gt;ये तीन औरतें, करीब तीन सालों से अकेली मगनखोला में रह रहीं थी। बाएँ वाली रिश्ते में मेरी भाभी लगती हैं।&lt;br /&gt;बीच की लड़की बोल नहीं पाती है, गूँगी है। प्यार से सब उसे लाटी बुलाते हैं। साथ कहने को जग्गू नाम का कुत्ता था। एक रात को बाघ आया। किसी तरह उन तीनों ने अपनी जान बचाई पर जग्गू को नहीं बचा पाये। उसे बाघ ले गया था। और अगले दिन ही उन तीनों ने गाँव छोड़ दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKS9W5ts24I/AAAAAAAAB78/4pF-wTyND8M/s1600/Lati+on+tree+Magankhola.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 320px; height: 214px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKS9W5ts24I/AAAAAAAAB78/4pF-wTyND8M/s320/Lati+on+tree+Magankhola.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5522747244210346882" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKS9W7TpqOI/AAAAAAAAB8E/wWYGgNK_7TI/s1600/Magankhola+2.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 320px; height: 214px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKS9W7TpqOI/AAAAAAAAB8E/wWYGgNK_7TI/s320/Magankhola+2.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5522747244637956322" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लाटी पेड़ पर चढ़ी हुई है मेरे लिये नारंगी तोड़ रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह पिछले साल का चित्र है। वही जगह है,  अब यहाँ कोई नहीं रहता है।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKTOS4vQ1tI/AAAAAAAAB80/yH02xAhKQs4/s1600/Magankhola1.jpg"&gt;&lt;img style="display: block; margin: 0px auto 10px; text-align: center; cursor: pointer; width: 320px; height: 214px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKTOS4vQ1tI/AAAAAAAAB80/yH02xAhKQs4/s320/Magankhola1.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHTO_ID_5522765866926659282" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKTOzNwNXmI/AAAAAAAAB88/e6qRvDPd02Y/s1600/Walnut+tree+Magankhola.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 214px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKTOzNwNXmI/AAAAAAAAB88/e6qRvDPd02Y/s320/Walnut+tree+Magankhola.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5522766422323584610" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;घर के सामने की खुली जगह को खाला बोलते हैं। इसी खाला में मेरा बचपन बीता था। यहाँ पर त्यौहारों में और खुशी के अवसरों पर खेल (कुमाऊँनी झोड़ा, सामूहिक नाच) होते थे।&lt;br /&gt;इसी खाला में मैंने पहली बार तिब्बती लामा को देखा था। हमें बचपन में डराया जाता था कि ढंग से रहो नहीं तो लामा अपनी झोली में डाल कर ले जाएगा। इसी खाला में हुड़क्या हुड़क्यानि का नाच भी देखा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखरोट का पेड़। इसके अखरोट हाथ से हलका दबाते ही  टूट जाते हैं।  अब भी नवगाँव के लोग आते हैं और पुराने दिनों को याद करते हुए अखरोट ले जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKTBBIcz9QI/AAAAAAAAB8c/qj1DKiaRrQo/s1600/Kali+1.jpg"&gt;&lt;img style="float: right; margin: 0pt 0pt 10px 10px; cursor: pointer; width: 320px; height: 214px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKTBBIcz9QI/AAAAAAAAB8c/qj1DKiaRrQo/s320/Kali+1.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5522751268255429890" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;गाँव के पास से काली नदी का दृश्य।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगनखोला का मंदिर। भरे-पूरे दिनों में यहॉं शादी व्‍याह में लंगर लगते थे।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKTPOCjcj2I/AAAAAAAAB9E/G1z8xBS-g54/s1600/Devashtan+Magankhola.jpg"&gt;&lt;img style="display: block; margin: 0px auto 10px; text-align: center; cursor: pointer; width: 320px; height: 214px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKTPOCjcj2I/AAAAAAAAB9E/G1z8xBS-g54/s320/Devashtan+Magankhola.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5522766883173732194" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKTBV5GDqII/AAAAAAAAB8k/wqs64WiNVBM/s1600/DSC04693+enhanced.jpg"&gt;&lt;img style="float: left; margin: 0pt 10px 10px 0pt; cursor: pointer; width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKTBV5GDqII/AAAAAAAAB8k/wqs64WiNVBM/s320/DSC04693+enhanced.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5522751624910710914" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव की एक ओर जानवरों के रहने के लिये खर्क थे। सब के सभी खर्क अब गिर चुके हैं। खर्क की सीढ़ियों से हिमालय का दृश्य अभी तक याद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीते दिनों को पकड़ने की चेष्टा की&lt;br /&gt;पर गहन सन्नाटे को भेद नहीं पाया&lt;br /&gt;साँसों की आवाज ने चौंकाया&lt;br /&gt;अंदर ही अंदर क्या कुछ फूटा पता नहीं&lt;br /&gt;क्यों हुईं आँखें नम पता नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब यहाँ कोई नहीं रहता।&lt;br /&gt;अब यहाँ कोई नहीं आता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ मेरा बचपन बीता था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-7719400349523057924?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/7719400349523057924/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=7719400349523057924' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7719400349523057924'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7719400349523057924'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='मगनखोला'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TKWC2ifq60I/AAAAAAAAB9M/3SsCdlWYq8I/s72-c/00014.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-7190208153779219596</id><published>2010-08-09T17:23:00.002+05:30</published><updated>2010-08-09T17:27:09.003+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्‍य व्‍यंग्‍य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्‍मरण'/><title type='text'>स्वयंवर 2010 – एक इमोशनल अत्याचार</title><content type='html'>मथुरा जी, नाटक कर रहे है। बहुत अच्छा कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन्यवाद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौन सा नाटक कर रहे हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वयंवर 2010&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे आप टीवी में कब से बनाने लगे। बताया ही नहीं। हम को भी चांस दीजिए न। हा हा हा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वयंवर 2010 नाटक है। रंगशाला में खेला जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आछा। हम समझे रियेल्टी शो टाइप का कुछ है। कामेडी है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जी नहीं। ड्रामा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो तो हम समझ गये हैं कि यह ड्रामा है यानी नाटक है। हम पूछ रहे थे कि कामेडी है क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कामेडी नहीं है। भावना प्रधान नाटक है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आछा। हँसी का एक्को सीन नहीं है क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है न। गंभीर नाटक है पर हँसी के सीन भी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाटक में हँसी के सीन हैं तो नाटक कामेडी हुआ न। आपने हमको उलझा दिया। नाटक का नाम 2010 है तो कामेडी ही होना चाहिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2010 नहीं, स्वयंवर 2010&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वही। खाली स्वयंवर से ही पता चलता है कि नाटक कामेडी है। अब आप नाम रखे है  स्वयंवर 2010, शक की कोई गुंजाइश ही नहीं। नाटक कामेडी ही होगा। आप नाटक में भले ही कुछ विचार उचार रख दिए होंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप नाटक देखेंगे तो पता चल जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे काहे नहीं देखेंगे। आपका नाटक है हम जरूर देखेंगे। कितना टिकट रखे हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;100 रुपया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत अच्छा है। हमको तो आप पास देते ही हैं। इस बार एक पास एक्स्ट्रा दीजिएगा। महेश बाबू को भी हम साथ में ले आयेंगे। आपके लिये नाटक के दर्शक जो बढ़ाने हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-7190208153779219596?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/7190208153779219596/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=7190208153779219596' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7190208153779219596'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7190208153779219596'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2010/08/2010.html' title='स्वयंवर 2010 – एक इमोशनल अत्याचार'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-6542202851788875552</id><published>2010-06-05T11:53:00.008+05:30</published><updated>2010-06-05T12:34:35.455+05:30</updated><title type='text'>एक झूठ - शेष कहानी</title><content type='html'>उसे जितनी दूर तक जाना चाहिये था वह उतनी दूर ही गया। क्या  यह सच था ? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह अपने आप से ही झूठ बोल रहा हो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TAnuhjL7bNI/AAAAAAAABvs/F6mjITo6_iQ/s1600/nainital+lake+2.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TAnuhjL7bNI/AAAAAAAABvs/F6mjITo6_iQ/s320/nainital+lake+2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5479172681821285586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;'कब से जानती हो उसे?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'वैसे तो उसे मैं बहुत दिनों से जानती हूँ। मेरे साथ ही पढ़ता था।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'और ऐसे कब से जानती हो!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'एक साल से।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'शादी करोगी उससे?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हारे घरवाले जानते हैं?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मान जायेंगे!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं।' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'फिर!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'पता नहीं। मैंने बहुत सोचा पर कुछ समझ में नहीं आता।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'लड़का क्या कहता है?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कुछ नहीं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कुछ तो कहता होगा।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं, इस बारे में कुछ नहीं कहता। बस कहता है कि समय आने पर देखा जायेगा।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'और समय कब आयेगा?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'आ गया है। कुछ रिश्ते आये हैं। एक पर मम्मी और डैडी गंभीरता से सोच रहे हैं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'और तुम्हें अभी तक पता नहीं है कि तुम दोनों क्या करने वाले हो?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर में जानकी ने नकारात्मक में सिर हिलाया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'उसके माँ-बाप क्या कहते हैं?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'वे तो मुझे बहुत मानते हैं। ऐसा बर्ताव करते हैं जैसे मनमोहन मुझसे एक या दो दिन में ही शादी करने वाला हो।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'और मनमोहन तुमसे कुछ नहीं कहता है!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह चुप ही रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'उसे मालूम है तुम्हारे लिये रिश्ते आ रहे हैं?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'फिर वह चुप कैसे रह सकता है!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'वह कहता है कि मैं अपने मॉ-बाप से बात करूँ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अपने माँ-बाप से बात करने का साहस है तुममें?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर एक बार वह चुप रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'वह करता क्या है?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नौकरी की तलाश में है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जानकी, तुमने कभी सोचा है कि वह तुम्हारे साथ केवल समय बिताना चाहता है?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'यह कैसे कह सकते हैं आप!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं तुमसे केवल पूछ रहा हूँ। कभी गौर किया है इस बारे में तुमने?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'वह मुझसे शादी करना चाहता है। उसने मुझे अंगूठी भी दे रखी है।'कुछ उत्तेजित होते हुये उसने कहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम मुझे यह सब क्यों बता रही हो!'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;'आप पूछ रहे हैं, इसलिये।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, जो भी करना सोच समझ कर करना। मैंने बुजुर्गी ओढ़ते हुये कहा था। बात मेरे लिये विशेष महत्व नहीं रखती थी। मेरे विचार से लड़की गलती कर रही थी। उसे सावधान करना मेरा कर्तव्य था, वह मैंने कर दिया। आगे वह जाने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी बात जानकी को अच्छी नहीं लगी थी। उसके हाव-भाव यही बता रहे थे। मैं सोच रहा था कि वह अब उठ कर चली जायेगी।  वह गई नहीं, बैठी रही। बातों का सिलसिला कायम रखने के लिये मैंने उससे पूछा था,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'गर्मी की छुट्टियों में जब तुम आई थीं, तो तुमने उस लड़के के संबंध में कुछ नहीं कहा था।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'आपने पूछा ही नहीं था।' उसने कहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मुझे क्या मालूम था जो पूछता! जिस तरह तुम मुझसे घुलमिल गई थीं, उससे मैं तो कुछ और ही सोच रहा था।' मैंने कहा था और कहने के साथ ही मैं सोचने लगा था कि यह मैं क्या कह गया। जानकी यदि यह पूछे कि मैं क्या सोच रहा था तो असमंजस में पड़ जाऊँगा। जानकी ने पूछा भी था। 'कुछ नहीं, ऐसे ही..' कह कर मैंने बात वहीं समाप्त करने की चेष्टा की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं, बताइये न।' जिद करते हुये जानकी ने कहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TAntqnms7II/AAAAAAAABvk/CSdexAfqzfc/s1600/Rhododendrons.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 253px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TAntqnms7II/AAAAAAAABvk/CSdexAfqzfc/s320/Rhododendrons.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5479171738114518146" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;किसी लड़की के साथ आपने बुरूँज के फूल तोड़े हों और वह जानकी की तरह आपके पास बैठ कर जिद कर रही हो तो वह लड़की आपको उस समय प्यारी लगेगी ही। जानकी उस समय मुझे भी प्यारी लग रही थी। उसका हाथ मैंने अपने हाथ में ले लिया था। उसने भी छुड़ाने का कोई प्रयत्न नहीं किया था। उसी समय अंजना उसे खोजती हुई आई थी। वह उठ कर उसके साथ चली गई थी और मैं सोचता रह गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे पास ढेरों काम थे। मैं उनमें जुट गया था। लेकिन दिमाग में जानकी थी। मैं यही सोच रहा था कि कहीं वह बेवकूफी न कर बैठे। दोपहर खाने के बाद जब पंडित परिवार आराम कर रहा था वह फिर नीचे मेरे पास आई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जानकी मैं तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था। मुझे नही लगता कि तुम्हारी जोड़ी मनमोहन के साथ बैठेगी।' मैंने कहा था।&lt;br /&gt;'यह कैसे कह सकते हैं आप?' उसने पूछा था। इस समय उसके स्वर में उत्तेजना नहीं थी।&lt;br /&gt;'तुम जानती ही कितना हो उसको? चोरी छिपे मिलती होगी, वह भी थोड़े समय के लिये। मुझे तो यह भी विश्वास नहीं है कि तुम उससे प्यार करती हो।'&lt;br /&gt;'करती हूँ।' जानकी ने कहा था। मुझे उसकी आवाज खोखली लगी थी।&lt;br /&gt;'मुझे पूर्णतया विश्वास नहीं होता।' मैंने कहा था। 'अच्छा एक बात बताओ, मेरे साथ बात करना तुम्हें कैसा लगता हे?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अच्छा लगता है।' उसने कहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'केवल अच्छा लगता है, बस! यह जो अपने भेद बता रही हो मुझे, पिछली गर्मी में इतना घूमीं मेरे साथ, यह सब क्या यह नहीं दिखाता कि यह अच्छा लगने की सीमा से कुछ अधिक ही है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ, बहुत अच्छा लगता हे।' उसने कहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्या यह अच्छा लगना प्यार में नहीं बदल सकता!' मैंने कहा था। आशा के विपरीत वह मेरी बात से विचलित नहीं हुई थी। शांत और सयाने भाव में उसने उत्तर दिया था,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'प्यार और अच्छा लगना एक बात थोड़े ही है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'प्यार जब होता है तो कोई धमाका थेड़े ही होता है? बस ऐसे ही तो आरंभ होता है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'शायद।' उसने बहुत धीमे स्वर में उत्तर दिया था।&lt;br /&gt;'शायद क्या? ऐसे ही होता है।'मैने कहा था । 'मान लो, तुमको किसी कारणवश छह या सात महीनों के लिये यहीं मेरे होटल में रुकना पड़ जाय तो क्या हमारे संबंध गाढ़े नहीं हो जायेंगे? तुम मेरे संबंध मेंे बबहुत कुछ जान जाओगी और मैं तुम्हारे संबंध में। मेरा तो विश्वास हे कि तुम मुझसे ही प्यार करने लग जाओगी। मनमोहन अतीत का विषय हो जायेगा।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं क्या जानूँ?' उसने कहा था।&lt;br /&gt;'यह जो तुम मैं क्या जानूँ बोल रही हो न, मैंने अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुये कहा था,'उसी से पा चलता है कि बात संभव है। नहीं तो तुम कहतीं कि ऐसा हो ही नहीं सकता है। तुम बोलतीं कि मनमोहन को प्यार करने के बाद कोई दूसरा व्यक्ति तुम्हारे जीवन में आ ही नहीं सकता।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं क्या जानूँ?' उसका एक ही उत्तर था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद हम दोनों के बीच थेड़ी चुप्पी छा गई थी। वह क्या सोचने लगी थी यह तो वही जाने, लेकिन थोड़ी देर केलिये मेरे जहन में यह सवाल उभरा था कि क्या यह संभव है?  थेड़ी देर से अधिक मैं इस सवाल पर हीं ठहर सका था। मेरे मामा-चाचा क्या कहते! भाई भूखे हैं, बहन अनब्याही है, बाप क्षय रोग का मरीज है और द्वारका अपनी जिम्मेदारी को ताक पर रख कर इश्क फरमा रहा है। लेकिन मनमोहन के प्रति जानकी का मोह मुझे अच्छा नहीं लग रहा था या यूँ कहना चाहिये गलत लग रहा था।  इसलिये उसी बात को आगे बढ़ाते हुये मैंने जानकी से कहा था,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अच्छा जानकी, एक बात बताओ। अभी जो परिस्थिति मैंने बाताई है, उसमे तुम मुझसे प्यार करने लगोगी या नहीं?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'पहले आप बताइये।' जानकी ने कहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं क्या बताऊँ?' मैंने पूछा था। जान कर अनजान बनते हुये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'उस परिस्थिति में आप मुझसे प्यार करने लगते या नहीं?' शब्दों में लटकते हुये जानकी ने पूछा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मैं उसे अपने मामा-चाचा, भाई-बहन की बात क्या बताता। मैंने उत्तर दिया था,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैंने यह प्रश्न ही इसलिये पूछा है कि यह संभव है। कम से कम मेरी ओर से। तुम्हारी बात तुम बताओ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं क्या बताऊँ?' उसने कहा था। जैसे मुझसे कह रही हो कि मेरे इस 'मैं क्या बताऊँ' में तुम अपने मन की बात खोज सकते हो खोज लो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जो तुम्हारी समझ में आता है, बताओ।' मैंने उसे प्रोत्साहित करते हुये कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हो सकता है जो आप कह रहे हैं वह संभव हो।' जानकी ने कहा था और कहने के साथ उसने अपनी आँखें झुका ली थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका चेहरा रक्तिम हो रहा था। शायद वह नहीं चाहती थी कि उसके मन के भाव मैं उसके चेहरे पर पढ़ूँ, इसीलिये वह 'अभी मैं चलती हूँ' कह कर झट से उठ खड़ी हुई थी।  मैं भी उसके साथ उठ गया था। पल के शतांश भर के लिये वह ठिठकी खड़ी रही, जिस समय मैंने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया था और उसके साथ ही वह मुझसे आलिंगनबद्ध हो गई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन लोगों के नैनीताल से जाने के बाद, एक-दो दिन में ही मुझे जानकी का पत्र मिला था। उसने पूछा था कि वह मेरे प्रति क्यों आकर्षित हो रही है जब कि वह मनमोहन से प्रेम करती है! मनमोहन के साथ तो उसका व्यवहार बातों तक ही सीमित था, लेकिन मेरे साथ तो वह बहुत आगे बढ़ गई थी। पत्र के अंत में जानकी ने हमारे संबंध के औचित्य पर भी शंका प्रकट की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद उसका दूसरा पत्र नहीं आया। ऐसा नहीं कि मुझे उसके दूसरे पत्र की प्रतीक्षा नहीं थी। प्रतीक्षा थी। स्वभावत: मैं जानकी को लेकर सपने देखने की बेवकूफी तो नहीं कर सकता था। हाँ, मुझे यह चिंता अवश्य थी कि कहीं जानकी मनमोहन को ले कर बचपना न कर बैठे। इसलिये जानकी का पत्र न आने पर मुझे बेचैनी हुई थी। दूसरी और महत्वपूर्ण बात यह थी कि वे लोग मेरे अच्छे ग्राहक थे। नैनीताल में बड़ी तगड़ी प्रतिद्वंद्विता रहती है। अपने बँधे-बँधाये ग्राहक खोना कोई नहीं चाहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो-तीन महीने तो ऐसे ही बीत गये। फिर मैंने मिस्टर पंडित को लिखा कि इस गर्मी के सीजनकी बुकिंग के लिये पत्र आ रहे हैं। यदि वे लोग आ रहे हैं तो मैं अपना होटल उनके लिये ही बुक करना चाहूँगा, क्यों कि वे लोग मेरे पुराने, नियमित और अच्छे ग्राहक हैं। फिर परिवार की कुशलक्षेम के साथ मैंने जानकी की कुशलक्षेम भी पूछी थी। उत्तर मिस्टर पंडित ने ही दिया था। मेरे पत्र के लिये उन्होंने मुझे धन्यवाद दिया था। लिखा था 'हम लोग कुशपूर्वक हैं', इस 'हमलोग' में जानकी के साथ उनके परिवार के सभी सदस्य आ गये थे। उन्होंने मई की 7 तारीख से 10 तारीख तक होट की बुकिंग के लिये भी लिखा था।  मैंने बुकिंग पक्की करके, इस आशय का पत्र लिख भेजा था। जिसका उत्तर नहीं आया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, मई की 7 तारीख की सुबह वे लोग पहुँच गये थे। मैं उनको लेने बस अड्डे गया था। बस अड्डे से वापस होटल आते समय जानकी अपनी माँ-बहन के साथ ही रही थी। पिछली बार की तरह दो कदम ठिठक कर मेरे साथ नहीं हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होटल पहुँच कर वे लोग अपना सामान खोलने लगे और मैंने चाय भिजा दी। मैं नीचे रेस्तारॉ में ही बैठा रहा। आशा थी कि शायद पहले की तरह जानकी मेरे साथ चाय पीने  नीचे आये। सीढ़ियों से पहले अंजना उतरी थी।  आते ही उसने कहना आरंभ किया था,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'द्वारका जी आपको एक ताजा खबर सुनाती हूँ, जानकी दीदी...'  वह अपनी बात पूरी नहीं कर पाई थी। जानकी ने, जो उसके पीछे ही सीढ़ियाँ उतर रही थी , उसे डाँट कर चुप करा दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'चलो भई, हम चुप हो जाते हैं। तुम्हीं बताओ अपनी सगाई की बात।' अंजना ने कहा था। तब मेरी समझ में आया था कि क्यो जानकी मुझसे कतरा रहीं थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सगाई हो गई जानकी?' मैंने पूछा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जी।' जानकी ने कहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बधाई हो।'  मैंने कहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंजना एक बार मेरी ओर और एक बार अपनी दीदी की ओर देखते हुये बोली थी,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'द्वारका जी, आपने पूछा ही नहीं कि सगाई किसके साथ हुई है!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मनमोहन के साथ?' मैंने अंजना की ओर देखते हुये पूछा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मनमोहन के साथ! अरे आप गलती कर ही गये न। मनमोहन का केस तो शुरू से ही बहुत कमजोर था। वह तो किसी गिनती में था ही नहीं। आपका केस जो...'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानकी ने उसकी बात पूरी नहीं करने दी थी। जोर से डाँट कर कहा था,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अंजू, क्या बकवास लगा रखी है। जो मुँह में आता है बक देती है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'ठीक है बाबा, मैं चलती हूँ। लगता है मेरी यहाँ आवश्यकता नहीं है।' कह कर और मुँह बना कर अंजना वहाँ से चली गई थी।&lt;br /&gt;'आप अंजना की बातो का बुरा मत मानियेगा। मुँह में जो आता हे बक देती है।' जानकी ने कहा था।&lt;br /&gt;'बुरा मानने लायक उसने कुछ कहा ही नहीं।' मैंने कहा था। फिर मैंने जानकी पूछा था कि क्या वह चाय पीयेगी?&lt;br /&gt;'नहीं मैं ऊपर पी चुकी। ' जानकी ने कहा था।&lt;br /&gt;'पहले तो ऊपर नहीं पीती थीं। मेरे साथ ही पीती थीं। अब क्या हो गया? मंगनी हो गई है, इसलिये?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं नहीं, ऐसी बात नहीं है। आपने ऊपर भिजवाई थी, वहीं पी ली।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'एक और कप पीओ।' मैंने जोर दे कर कहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाय पीते हुये बातों का टूटा हुआ सिलसिला जोड़ने की चेष्टा करते हुये मैंने कहा था,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्या तुम अपनी सगाई से खुश हो जानकी?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं इस संबंध में सोचती ही नहीं। जैसे पहले थी वैसी ही अब भी हूँ।' उसने कहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुमने मनमोहन से क्या कहा?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कुछ नहीं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुमने उसे बताया तक नहीं कि तुम्हारी सगाई हो गई है!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'उसे मालूम है।' उसके उत्तर में कुछ रुखाई थी। एक निश्चयात्मकता थी, जैसे कह रही हो कि मनमोहन जब था तब था। अब मनमोहन से कहीं अच्छा पात्र मिल गया है, इसलिये अब उसमें मेरी दिलचश्पी नहीं रही। एक कठोरता थी, जैसे कह रही हो कि सभी भूल करते हैं, मैंने भी की है, जिसे याद दिलाये जाने की आवयश्यकता नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हारा नया मंगेतर कैसा है?' मैंने पूछा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अच्छे हैं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'उससे तुम्हारी चिट्ठी चलती है?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्या लिखता है वह?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'इससे आपको क्या?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानकी से मुझे ऐसे उत्तर की अपेक्षा नहीं थी। कहा भी उसने बड़ी रुखाई के साथ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ मेरा पूछना गलत हो सकता है, ' मैंने कहा था, 'लेकिन पिछली बार जब तुमने मुझे मनमोहन के साथ घटी सभी छोटी-बड़ी बातें बाताई थीं, उसी से...'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'पिछली बार भी मैं आपको ऐसा ही उत्तर देने वाली थी, लेकिन आप बुरा मान जायेंगे कर के...' आखिरी शब्द को लंबा खींचत हुये उसने वाक्य पूरा किया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका उत्तर सुन कर मेरे अंदर एक तीव्र इच्छा यह जागी कि किसी तरह जानकी को चोट पहुँचाओ। कुछ ऐसा कहो कि वह तिलमिला जाय। मैं केवल इतना भर कह कर रह गया,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं जानकी, पिछली बार तुम मुझको ऐसा उत्तर नहीं देने वाली थीं, क्यों कि पिछली बार तुम्हें मेरी आवश्यकता थी जो अब नहीं रही।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद फिर कभी जानकी से मेरी एकांत में बात नहीं हुई। अब तो थोड़े ही दिनों में उसकी शादी होने वाली है। बात आई गई हो गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानकी के बारे में कभी कभार सोच लेता हूँ, बस। जानकी इतने दिनों मेरे होटल में रही। उसकी याद तो आयेगी ही। जितने भी टूरिस्ट नियमित रूप से मेरे होटल में आते हैं, उनकी याद आती ही है। उन्हीं को ले कर तो मेरा व्यवसाय है। अब मिस्टर पंडित अगली बार जब आयेंगे तो उनसे जानकी के बारे में पूछना स्वाभविक ही होगा। मैं अपने अनुशासन की जकड़ से कभी बाहर निकल ही नहीं सकता। अपने ही अनुशासन को ताक पर रखना दुर्बलता है, और मैं द्वारकानंद कभी दुर्बल हो ही नहीं सकता। दुर्बल होना मेरे लिये विलासिता है। बस इतना ही कह सकता हूँ कि जानकी के साथ बीते कुछ अंतरंग क्षणों में मैंने अपने आप को सीमित रूप से निरंकुश कर दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.......&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-6542202851788875552?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/6542202851788875552/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=6542202851788875552' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/6542202851788875552'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/6542202851788875552'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2010/06/blog-post_05.html' title='एक झूठ - शेष कहानी'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/TAnuhjL7bNI/AAAAAAAABvs/F6mjITo6_iQ/s72-c/nainital+lake+2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-4822705100596393208</id><published>2010-06-02T16:39:00.003+05:30</published><updated>2010-06-02T16:45:02.820+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>एक झूठ</title><content type='html'>&lt;em&gt;कहानियों के लिये सामग्री हमें आसपास की जीवन से मिल जाती है। पात्रों के जीवन में झॉंक कर और कुछ कल्पलना के रंग भर कर कहानी बन ही जाती है। सावधानी यह बरतनी पड़ती है कि पात्र या घटनायें बहुत करीब की न हों। बच्चे क्या सोचेंगे, भाई साहब कहीं बुरा न मान जायँ आदि के चक्कर में रोचक उपन्यासों का मसाला धरा का धरा रह जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी कभी ऐसा भी होता है कि पाठक कपोल कल्पित घटना को सच मान बैठते हैं। ' ऐसी कल्पमना तो कोई कर ही नहीं सकता है, जरूर आपके साथ ऐसा घटा है!' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, आप बताइये कि यह कहानी सच्ची है या नही। मुझे तो लगता है कि इस कहानी का नायक झूठ बोल रहा है। ....&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं युवावस्था में मन मचल जाता है, दृष्टि फिसल जाती है इत्यादि। रूमानी साहित्य में कालेज-जीवन में ऐसी घटनाओं के होने का वर्णन मिलता है। मेरा छात्र-जीवन अतीत के गर्त में कहीं है तो सही पर उसका वर्णन यहाँ पर विषयांतर होगा। संप्रति नैनीताल में मेरे पास इन सब बातों के लिये समय ही नहीं है। अपने बारे में कभी कभी-कभार सोच लेता हूँ बस। मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है मानो मैंने लड़कपन से सीधे प्रौढ़ावस्था में प्रवेश कर लिया हो, बीच के युवावस्था वाले भाग को लाँघ कर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी मैं अपने विशाल परिवार के भरण-पोषण में लगा हुआ हूँ। साधन कहने को मेरे पास एक छोटा-सा होटल है, होटल क्या है, नीचे 8-10 जनों के लिये बैठने की व्यवस्था और ऊपर रहने की थेड़ी जगह बस। ऊपर रहने की थोड़ी जगह टूरिस्टों को ध्यान में रख कर नहीं बनाई गई थी। ऐसा भी एक समय था, जब ऊपर के सभी कमरे मेरे एकछत्र अधिकार में थे। जब से पिता जी क्षय रोग से ग्रस्त हो कर स्थाई रूप से सेनिटोरियम में रहने लगे थे तब से मेरी आवश्यकताओं के साथ-साथ मेरा आवास भी सिकुड़ गया था। सबसे छोटा कमरा अपने लिये रख कर बाकी मैंने टूरिस्टों के लिये सजा दिये थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे होटल की विशेषता यह है कि मेरी अंग्रेजी भाषा के ज्ञान में पब्लिक स्कूल का टच है। सभ्यता और प्रगतिशीलता का एक मापदण्ड यह भी है कि आप अंग्रजी किस तरह बोलते हैं।  मैं अपने रोजमरर्ा पहनने के कपड़ों में भी अपनी इस पब्लिक-स्कूली इमेज को बरकरार रखता हूँ।  इससे कुछ टूरिस्ट प्रभावित होते हैं। कुछ तो इतने प्रभावित हुये हैं कि वे जब भी नैनीताल आते हैं मेरे ही होटल में ठहरते हैं। मिस्टर पंडित भी ऐसे ही एक टूरिस्ट हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने स्वयं को एक अनुशासन में जकड़ा हुआ है। फिर भी ऐसा नहीं है कि मैं किसी सुंदर तरुणी को देख कर आँखें फेर लेता हूँ।  सीजन में नैनीताल में सुन्दर, विवाहित, अविवाहित और सद्य:विवाहित रमणियों का बाहुल्य होता है। कभी क्षण दो क्षण के लिये किसी पर दृष्टि ठहर जाती है। इससे आगे कुछ नहीं। जब मिस्टर पंडित पहली बार मेरे होटल में ठहरने आये थे तो उनकी पुत्री जानकी पर मेरी दृष्टि ठहरी थी। मैंने उसको अपनी ओर देखते पाया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात इतनी ही होती तो कुछ नहीं था। वैसे अब भी कुछ नहीं है। हाँ इतना है कि बात दृष्टि के आदान-प्रदान तक ही सीमित नहीं रही थी। कुछ आागे भी बढ़ी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली बार वे लोग बीस दिन ठहरे थे। चार जनों का परिवार था। मिस्टर पंडित, उनकी चुपचाप सी रहनेवाली पत्नी, जानकी और उसकी किशोरी बहन अंजना। उनको घुमाने में कुछ अधिक ही उत्साह दिखया था मैंने।  यह अतिरिक्त उत्साह जानकी के लिये ही हो ऐसी बात नहीं है। मिस्टर पंडित बहुत ही मिलनसार व्यक्ति हैं। उनके लिये कुछ अतिरिक्त करने को मन करता है। एक दिन मैं उनको घुमाने स्नो व्यू के पीछे वाले जंगल में ले गया था। उन दिनों वहाँ बुरूँज के फूलों की छटा छाई हुई थी। जंगल के बीच रास्ता तो क्या कोई पगडंडी भी नहीं थी। मुझे याद है झाड़ियों के काँटों से सभी को खरोंच लग गई थी। मिस्टर पंडित बहुत उत्साहित थे। सबसे आगे वही चल रहे थे। अंजना ने अपनी माँ को सँभाला हुआ था। और जानकी भी साथ थी। हर छोटी बड़ी झाड़ी को पार करने के लिये वह मेरा हाथ पकड़ रही थी। यह बिना मतलब के हाथ पकड़ा-पकड़ी और छुआ-छुव्वल का खेल आगे भी चलता रहा।  यह जानकी का खेल था। इसे मैंने आरंभ नहीं किया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं पंडित परिवार के साथ बहुत घुलमिल गया था। उनको हँसाने के लिये मैं उटपटाँग हरकतें किया करता था। मुझे याद है कि एक बार मैंने जानकी के उकसाने पर चाय नमक के साथ पी थी। इस पर वह इतना हँसी थी कि दूसरे दिन मैंने अपनी चाय में टमाटर की सॉस मिला ली थी। चुटकुलों की किताब से खोज-खोज कर चुटीले चुटकुले उनको सुनाता था। उन दिनों मैं बहुत प्रफुल्लित रहता था। क्यों न रहता, मुझे मिस्टर पंडित से बीस दिनों के रहने-खाने के लिये मोटी रकम जो मिलने वाली थी। उन दिनों जानकी मुझे सर के बल खड़ा हाने को कहती तो शायद हो जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छह महीने बाद ही वे 15 दिनों के लिये फिर नैनीताल आये थे। होटल की बुकिंग के लिये जानकी ने मुझे पत्र लिखा था। पत्र लंबा था। कुछ विशेष नहीं, उसके पहली बार के नैनीताल प्रवास की घटनाओं का जिक्र था। पत्र मैंने सँभाल कर रखा हुआ था। टूरिस्टों से मिलनेवाले सभी पत्र मैं सँभाल कर रखता हूँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं बहुत सुबह ही इंतजाम आदि करने रेस्तराँ में आ जाता था। मेरे नीचे उतरने के  कुछ क्षणों  बाद ही जानकी भी नीचे उतर आती थी। हम दोनों अक्सर सुबह की चाय एक साथ पीते थे। जाने किस बात को लेकर एकदिन मैंने उससे मजाक में पूछा था,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कोई खोज रखा है अपने लिये क्या!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ।' उसने कहा था। एक हाथ की अँगुलियाँ उसने दूसरे हाथ में फँसा रखी थीं। जुड़े हुये हाथों से अपना निचला होंठ दबाते हुये उसने उत्तर दिया था। उत्तर देते समय वह स्थिर-चित नहीं थी। या हो सकता है यह मेरा वहम रहा हो।  मैं उससे नकारात्मक उत्तर की आशा कर रहा था। उसके हाँ कहने से मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था। उस समय मैंने लक्ष्य किया कि वह मेरी ओर ही देख रही थी। मुझे लगा था जैसे वह जानना चाहती हो कि उसकी हाँ का मेरो ऊपर क्या प्रभाव पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'वह क्रिश्चियन है' मेरे साथ आँखें चार होते ही उसने कहा था। ( आगे की कहानी इसी शनिवार को)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-4822705100596393208?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/4822705100596393208/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=4822705100596393208' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/4822705100596393208'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/4822705100596393208'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='एक झूठ'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-9171856942898139378</id><published>2010-05-28T21:53:00.001+05:30</published><updated>2010-05-28T21:55:55.676+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुभव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्‍य'/><title type='text'>ऐसा भी होता है</title><content type='html'>दिखने में दुबले-पतले लेकिन स्वस्थ। उम्र होगी 75 के आस पास। स्मार्टली मंच में आये। कुछ औपचारिक संबोधन के बाद आप बीती सुनाने लगे। उन्हीं के शब्दों में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे अपनी पत्नी की बहुत चिता लगी रहती है। अभी वह 72 साल की है। वैसे तो वह बहुत एक्टिव है। चलती फिरती है। ऐसी कोई विशेष व्याधि भी नहीं है। ब्लड प्रेशर 120 – 80 ही रहता है। पर पिछले एक साल से कान कम सुनने लगी है। डाक्टरों को दिखाने को कहो तो भड़क उठती है। कहती है कि मैं एकदम ठीक हूँ। इधर मुझे चिंता यह लगी रहती है कि कभी सड़क में गाड़ी का हार्न नहीं सुनाई पड़ा या बस की आवाज नहीं सुनाई पड़ी तो दुर्घटना हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने डाक्टर के पास जाने की बहुत जिद की तो उसने मुझे धमकी दी कि ज्यादा डाक्टर-डाक्टर करोगे तो तुम्हारे कान के नीचे एक जड़ दूँगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं परेशान और किंकर्तव्यविमूढ़। तभी मुझे अपनी पहचान में एक इएनटी की याद आई। उसको खोज निकाला, फोन किया, अपनी परेशानी बताई। उसने सांत्वना दी कि चिंता करने की कोई बात नहीं है। आज कल ऐसे ऐसे इलाज निकले हैं जिनकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।  उसने राय दी कि पत्नी को क्लिनिक में न ले आऊँ। सीधे उसके घर पर मिलूँ। वहाँ देखा जाएगा। पर मेरी पत्नी को पहले ही भनक लग गई। वह इतना भड़की, इतना भड़की कि मुझे डर लग गया कहीं सचमुच ही वह मेरे कान के नीचे जड़ न दे। और मुझे बहरा ही न कर दे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अपने उस इएनटी मित्र के पास गया। मैंने हथियार डाल दिये। मैंने कहा कि मैं अपनी पत्नी को इलाज के लिये उसके पास नहीं ला सकता। तब उसने मुझसे कहा कि मैं पता लगाऊँ कि कितनी दूर तक मेरी पत्नी साधारण वार्तालाप सुन सकती है। उसके बाद सोचेंगे कि क्या करना है। डाक्टर ने मुझे पूरी तरह हिदायत दी कि कैसे क्या करना है। लिहाजा जब पत्नी रसोई में थी मैं बाहर के दरवाजे के पास गया और पूछा&lt;br /&gt;'लक्ष्मी आज खाने में क्या बना रही हो?'&lt;br /&gt;उत्तर नदारद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर मैं दस कदम आगे बढ़ा और वही सवाल दोहराया। उसने सुना ही नहीं। फिर उत्तर नदारद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं आगे बढ़ा और रसाई के दरवाजे से कहा&lt;br /&gt;'लक्ष्मी आज खाने में क्या बना रही हो?'&lt;br /&gt;उत्तर नदारद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं बहुत डर गया। हालत बहुत खराब लग रही थी। मैं उसके एकदम पास गया और पूछा 'लक्ष्मी आज खाने में क्या बना रही हो?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लक्ष्मी चिल्ला कर बोली, 'क्या हो गया है तुमको, बहरे हो गये हो क्या। वही सवाल बार बार क्यों पूछ रहे हो। तीन बार तो बता चुकी हूँ कि आज खाने में बिसिबेले भात है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर उन सज्जन ने  अपने कान से सुनने वाला यंत्र निकाला और कहा प्राब्लम लक्ष्मी के साथ नहीं मेरे साथ थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहाँ दो सौ आदमियों की भीड़ थी। एक क्षण तो सन्नाटा रहा, अगले क्षण हॅसी का जो दौरा पड़ा लगता था छत गिर जाएगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-9171856942898139378?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/9171856942898139378/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=9171856942898139378' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/9171856942898139378'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/9171856942898139378'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2010/05/blog-post_28.html' title='ऐसा भी होता है'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-1582391503960375690</id><published>2010-05-23T19:42:00.000+05:30</published><updated>2010-05-23T19:44:50.293+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्‍य व्‍यंग्‍य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्‍मरण'/><title type='text'>हम आपको तकलीफ देना नहीं चाहते</title><content type='html'>जावेद साहब अपने किसी काम से बेंगलोर आये हुए थे। उम्मीद कर रहा था कि आजकल में मुझसे मिलने आयेंगे। फोन करके उन्होंने बताया कि वे कल का लंच मेरे साथ करेंगे क्यों कि लंच के बाद ही उन्हें ट्रेन पकड़नी है। नहीं तो मिलना नहीं हो पायेगा। मैंने कहा कि आप आइए। लंच हमारे साथ कीजिए। और फिर मैं उनको स्टेशन तक छोड़ दूँगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं कंपनी की कार में आऊँगा। इसलिए आपको तकलीफ नहीं दूँगा। और देखिए खाने में मेरे लिये कुछ स्पेशल करने की जरूरत नहीं है। नहीं तो मैं नाराज हो जाऊँगा।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अरे आप आइए तो सही।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैंने इसलिए कहा कि असल में हमारा मकसद तो आपस में मिलना है। समय नहीं निकाल पाया इसलिए लंच में मिल रहे हैं। ऐसे में मैं आपको बेकार तकलीफ नहीं देना चाहता।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जावेद साहब कोई तकलीफ नहीं होगी। इतने दिनों बाद तो हम मिल रहे हैं। गप्पें मारेंगे और खाना साथ में खायेंगे।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जरूर जरूर। पर आप तो रोजमरर्ा खाते हैं वही बनाइएगा।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'ठीक है वही बनायेंगे आप आइए तो सही।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं आपको बता दूँ जावेद साहब एक खब्ती इनसान हैं। कब कौन सी खब्त उन पर सवार होगी आप कह नहीं सकते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन सुबह सुबह उनका फोन आ गया। 'मैं ग्यारह बजे पहुँच जाऊँगा। देखिए जो घर में है वही बनाइएगा। कुछ स्पेशल बनाने की जरूरत नहीं। नहीं तो में नाराज हो जाऊँगा।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उनको यकीन दिलाया कि कुछ भी स्पेशल नहीं बनेगा उनके लिये। वे ग्यारह बजे आये। आते ही बोले, 'देखिए आपने यह बहुत गलत काम किया। रसोई से पकवानों की खुशबू आ रही है। आपने भाभी जी से कुछ स्पेशल बनाने को कहा होगा। इसकी क्या जरूरत थी। हमारा मकसद तो मिलना था न।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आ गया मुझे भी गुस्सा। 'दोपहर  खाने का समय हो रहा है। इस समय हम लोग पानी पीकर घुटने पेट में डाल कर नहीं बैठे रहते हैं। रसोई में कुछ बना कर खा लेते हैं। ऐसे में कोई मेहमान आ गया तो हम रसोई बनाना नहीं छोड़ते। आज रविवार है, कुछ न कुछ तो खास बनता ही है। ऐसा एकदम न समझिएगा कि यह सब हम आपके लिये कर रहे हैं। यह सब तो हमने अपने लिये बनाया है। अब जब आप आ गये हैं तो आपको भी वही परोसेंगे न। आपने कहा था कि आपके लिये स्पेशल न बनाया जाय सो हम नहीं बना रहे हैं। यह खाना आपको स्पेशल लगे तो कोई बात नहीं आप नमक के साथ भात खा लीजियेगा।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बात को कई साल बीत गये हैं। अभी उनकी लड़की बेंगलोर तबादले में आई है। उसने फोन किया 'अंकल मैं संडे को आऊँ?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ हाँ आ आजाओ। दिन का खाना हमारे साथ ही खाना।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'ठीक है अंकल। आंटी से कहिएगा कि वे मेरे लिये कुछ भी स्पेशल न बनायें। नहीं तो मैं गुस्सा हो जाऊँगी।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-1582391503960375690?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/1582391503960375690/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=1582391503960375690' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/1582391503960375690'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/1582391503960375690'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2010/05/blog-post_23.html' title='हम आपको तकलीफ देना नहीं चाहते'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-7511519793237750872</id><published>2010-05-11T15:16:00.002+05:30</published><updated>2010-05-11T15:23:28.643+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विषकन्या'/><title type='text'>विषकन्या</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/S-knydGJJxI/AAAAAAAABvM/bxw2fJUbV-Q/s1600/Vishkanya+Cover.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/S-knydGJJxI/AAAAAAAABvM/bxw2fJUbV-Q/s320/Vishkanya+Cover.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5469946970175514386" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन पहले मैंने एक लघु उपन्यास 'विषकन्या' की रचना की थी। उपन्यास में रहस्य और रोमांच तो है ही, साथ ही मैंने हास्य का पुट देने का प्रयत्न किया था। मुलाहिजा फरमाइये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार में जिन्दा लाश&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेला को इन्तजार करते चालीस मिनट हो गए थे। एक तो खड़े खड़े उसके पाँव दुख रहे थे। ऊपर से साढ़े दस बज गए थे। सामने रेस्तराँ खुल गया था और आते जाते लोग उसे घूर रहे थे। पर विक्टर का कहीं नामोनिशान नहीं। यह बेला के स्वभाव में नहीं था कि वह किसी का एहसान ले। जिन्दगी में इतना अनुभव तो उसे हो ही गया था  कि एहसान एक बोझ होता है जो कभी सरल रिश्ते को भी जटिल बना सकता है। पर विक्टर की बात कुछ और थी। विक्टर उसका पार्टनर था। फिर उसका घर ऐसी जगह था कि आफिस जाने के लिए दो बसें बदलनी पड़़ती थीं। अगर कभी सीधी बस मिल भी गई तो वह कभी भी समय से नहीं पहुँचाती थी। विक्टर के पास कार थी। जब उसने कहा कि आज वह सीधे आफिस जा रहा है इसलिए वह उसके साथ कार में आफिस आ सकती है, तो उसने हामी भर दी। बस में धक्के खाने से तो अच्छा था कि वह विक्टर का साथ झेल ले। विक्टर कभी समय से पहुँचे तो, उसके लेने के लिए। आज से अब और नहीं करेगी वह विक्टर का इंतजार। गुस्से में आग बबूला हो कर वह टैक्सी स्टैंड की ओर मुड़ी ही थी कि विक्टर अपने छकड़े पर आ पहुँचा।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;'पैंतालीस मिनटों से मैं यहाँ पर खड़ी हूँ। तुमने इतना भी नहीं सोचा .......!' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'शांत बेला, शांत। लोग देख रहे हैं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'देखते हैं तो देखने दो। हद होती है! तुमने मुझे पैंतालीस मिनट सड़क पर खड़ा रखा। खड़े-खड़े पाँव दुख गए। आने जाने वाले लोग घूर रहे हैं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि लोग तुम्हें घूर रहे हैं। तुम्हें मेरा शुक्रगुजार होना चाहिए कि मैंने तुम्हें यह मौका दिया कि लोग तुम्हें देखें। तुम्हें घूरें।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'विक्टर तुम अपनी बकवास बंद करो।' बेला ने लगभग चीखते हुए कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अरे अरे क्या गजब कर रही हो। सड़क पर इस तरह चिल्लाओगी तो लोग समझेंगे कि मैं तुम्हें छेड़ रहा हूँ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मेरी बला से। बल्कि मैं तो खुश हूँगी अगर लोग ऐसा समझें और तुम्हें जूते चप्पलों से पूजें।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'ठीक है भई। तुम्हारा गुस्सा भी ठीक है। सॉरी, आने में देर हो गई।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'देर हो गई! पैंतालीस मिनट!! क्या बहाना बनाकर आए हो?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बहाना नहीं, ठोस कारण है। नब्बे किलो तो होगा ही।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्या बक रहे हो?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जिसके कारण देर हुई उसका वजन बता रहा था। इधर देखो।' कह कर उसने कार की पिछली सीट की ओर इशारा किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेला ने देखा और उसकी आँखें फट पड़ी। मुँह स्प्रिंग लगे बक्से के ढक्कन की तरह खुल गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मुँह बंद करो।' विक्टर ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'लाश!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'लाश नहीं बेहोश है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कौन है यह?' बेला ने पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मुझे क्या मालूम?' लापरवाही-सी दिखाते हुए विक्टर ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हारे ऐसा कहने का क्या मतलब है विक्टर! तुम्हारी कार की पिछली सीट में एक आदमी बेहोश पड़ा है। इस बेहोश आदमी के साथ तुम मुझे पिकअप करने आ रहे हो। मैं पूछती हूँ तो कहते हो कि मुझे क्या मालूम। आखिर क्या जताना चाहते हो तुम! तुम्हारी प्राब्लम क्या है विक्टर?' बेला ने कहा।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;कुछ आने जाने वाले लोग रुक कर कार की पिछली सीट पर पडे़ व्यक्ति को देखने लगे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'चलो पहले कार में बैठो, नहीं तो यहाँ मजमा लग जाएगा।' विक्टर ने कहा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कौन है यह?' कार चल पड़ी तो बेला ने पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मुझे नहीं मालूम।' विक्टर ने उसी लापरवाही से कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'विक्टर, कार रोको।' बेला ने आदेश दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्यों?' विक्टर ने पूछा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं तुम्हारे साथ नहीं जाना चाहती।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'पर क्यों?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'एक तो तुमने इतना इंतजार करवाया और अब पहेलियाँ बुझा रहे हो? ढंग से बात नहीं कर सकते हो? मेरी ऐसी कोई मजबूरी भी नहीं है कि मैं तुम्हें झेलती रहूँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरा उपन्यास यहाँ उपलब्ध है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.abook2read.com/vishkanya.html&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-7511519793237750872?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://www.abook2read.com/vishkanya.html' title='विषकन्या'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/7511519793237750872/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=7511519793237750872' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7511519793237750872'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7511519793237750872'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2010/05/blog-post_11.html' title='विषकन्या'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/S-knydGJJxI/AAAAAAAABvM/bxw2fJUbV-Q/s72-c/Vishkanya+Cover.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-7427141564050711882</id><published>2010-05-09T10:45:00.001+05:30</published><updated>2010-05-09T10:48:52.046+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुभव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>जरा ऊँचे स्वर में बोलिये</title><content type='html'>मुझमें एक व्याधि है, वह यह कि जब आप मुझसे बहुत धीमे स्वर में बात करते हैं तो मेरी समझ में नहीं आता है। सुनाई पड़ता है कि आप कुछ कह रहे हैं पर समझ में नहीं आता है कि आप क्या कह रहे हैं। यह हो सकता है आपको मामूली बात लगे पर यह एक भयंकर समस्या है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब छोटा था तो समझ में ही नहीं आता था कि सब मेरा मजाक क्यों उड़ाते हैं। बातें मेरी लोगों की समझ में क्यों नहीं आती हैं? ऐसा क्या है जो औरों में है और मुझमें नहीं है। इस ऊँचा सुनने की व्याधि ने मुझे अंतर्मुखी बना दिया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं कब, पर एक दिन मेरी समझ में आ ही गया कि मेरी समस्या क्या है। मैंने समाधान यह निकाला कि समझ में नहीं आये तो पूछो। उसी बात को दूसरी बार दोहराने में लोग बहुधा अपना स्वर ऊँचा कर लेते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक स्थिति का जायजा लीजिये। आपको ऊँचा सुनने की आदत है। आपका बॉस आपको बुलाता है। बहुत धीमे स्वर में आपको कुछ निर्देश देता है। आपको सुनाई तो पड़ा कि आपसे कुछ करने के लिये कहा गया है, पर यह एकदम पल्ले नहीं पड़ा कि क्या कहा गया। यह स्थिति घर में पत्नी के साथ आ सकती है, आफिस में आ सकती है। मित्रों की बैठक में आ सकती है अंतरर्ाष्ट्रीय सम्मेलन में आ सकती है। कवि सम्मेलन में आ सकती है। हर उस जगह आ सकती है जहाँ लोगों ने ठान रखी हो कि वे आपसे धीमे स्वर में बात करेंगे। मधुमक्खी की तरह भनभनाहट वाले स्वर में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो ऐसे में क्या करेंगे आप।  मैं तो जैसा कि मैंने कहा है मैं आव देखता हूँ न ताव, सीधे-सीधे पूछ बैठता हूँ कि कृपया आपने मुझसे जो कहा उसे ऊँचे स्वर में दोहराइये क्यों कि मैं समझा नहीं आपने क्या कहा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने तो एक रणनीति ही  बना ली है। बस ऐलान कर देता हूँ कि मैं ऊँचा सुनता हूँ। कुछ लोग विश्वास कर लेते हैं कि मैं सचमुच ऊँचा सुनता हूँ।  कुछ नहीं नहीं भी करते। ऐसे एलान में बचने का निकास रहता है। जैसे, आपने ऐसा कहा था क्या, मैंने तो नहीं सुना। आपको तो मालूम ही है कि मैं ऊँचा सुनता हूँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग तो आदतन नीचे स्वर में बोलते हैं। उनको ऊँचा बोलने के लिये कहा जाय तो ऊँचे स्वर में बोलने लगेंगे पर कुछ समय बाद ही फिर अपने उसी पुराने धीमे स्वर में आ जाते हैं। उनको बार बार ऊँचा बोलने के लिये टोकना भी अच्छा नहीं लगता, विशेष कर जब आपको छोड़ कर सभी लोग बड़ी तन्मयता से उन्हें सुन रहे होते हैं। आप कितनी बार उन्हें टोकेंगे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग यह जानते हुये भी कि आप ऊँचा सुनते है, ऊँचा नहीं बोलेंगे। उनका अहम् इतना बड़ा होता है कि उन्हें लगता है कि उनके ऊँचा बोलने से उनके अहम् में क्रैक पड़ जायेगा। ऐसे लोगों से सावधान रहना पड़ता है। भग्न अहम् वाले लागे आपके स्वस्थ्य के लिये हानिकारक सिद्ध हो सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊँचा सुनने वालों की एक और समस्या है। औरों की हो न हो, पर मेरी है। वक्ता धीमे स्वर में बोल रहा है और आपको बात समझ में नहीं आ रही है। तो सुनने वाले का ध्यान भटकेगा या नहीं।  जैसे किसी मीटिंग में, वक्ता आपको समझा रहा है कि किसी विशेष समस्या का कैसे सामना करना चाहिये और आप वक्ता के बगल में बैठी सुंदरी को कल्पना के घोड़े उड़ाये ले जा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर अपनी इस समस्या के साथ काफी वक्त गुजार लिया है। अब तो हम बड़े गर्व के साथ कहते हैं कि हम सठिया गये हैं इसलिये आप हमसे साफ साफ और ऊँचे स्वर में बोलिये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-7427141564050711882?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/7427141564050711882/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=7427141564050711882' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7427141564050711882'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7427141564050711882'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='जरा ऊँचे स्वर में बोलिये'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-7452588930383535848</id><published>2010-04-30T10:07:00.004+05:30</published><updated>2010-04-30T17:05:51.723+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कौन है जो कहकहे सब बटोर कर ले गया</title><content type='html'>बनने का बड़ा शोर था कैसे खामोशी से ढह गया। &lt;br /&gt;कौन है जो कहकहे सब बटोर कर ले गया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नादॉं तो न थे हम, इन्तहॉं थी मस्ती  की। &lt;br /&gt;खतरों से बेखबर रवानी में बहते गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेमुरव्वत तो आशियॉं जला के चले गये &lt;br /&gt;हम जल भी न सके, सुलग कर रह गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कॉफी की महफिलें, देर से आना बनाकर बहाना&lt;br /&gt;चले थे साथ जो दो कदम, वही याद करके रह गये&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-7452588930383535848?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/7452588930383535848/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=7452588930383535848' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7452588930383535848'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7452588930383535848'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='कौन है जो कहकहे सब बटोर कर ले गया'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-7140526429455616607</id><published>2010-02-25T18:37:00.003+05:30</published><updated>2010-02-25T18:47:11.144+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्‍य व्‍यंग्‍य'/><title type='text'>एक सकारात्मक सोच</title><content type='html'>लोग कहते है कि मैं नेगेटिव हूँ। यानी हमेशा नेगेटिव सोचता हूँ। मैं कहता हूँ कि मैं जैसा भी हूँ ठीक हूँ। किसी और के लिये नहीं तो कम से कम अपने लिये तो ठीक ही हूँ। और मैं किसी से राय माँगने तो नहीं निकला हूँ न कि भैया मुझे बता दो कि मैं नेगेटिव हूँ या पाजिटिव। और सच कहूँ तो मुझे आज की भाषा के ये शब्द समझ में नहीं आते हैं। नेगेटिव, पाजिटिव। मानो आदमी आदमी न हो कर बैटरी का टर्मिनल हो गया हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम तो भैया ऐसे ही हैं और ऐसे ही रहेंगे। नेगेटिव पाजिटिव जो कहना है कह लो, हमें कोई तकलीफ नहीं हो रही। हमारे पास आने से जब किसी का  कुछ घट जाता है तो न आये वह हमारे पास। हम निराशावादी है तो वही सही। हम यह आशा तो नहीं कर रहे हैं न कि आप हमें आशावादी समझें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर एक बार पूछता हूँ कि क्या होता यह नेगेटिव या पाजिटिव। हमारी सोच नेगेटिव है यानी नकारात्मक है तो ठीक है न।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामने से तीखे सींग वाला बिगड़ैल साँड़ आ रहा है। अब आप सोचते रहें कि आपको कैसा सोचना है या कैसा व्यवहार करना है। नेगेटिव या पाजिटिव। नकारात्मक या सकारात्मक। आप आशावाद का सहारा लेंगे या निराशावाद का। किसका दृष्टिकोण अपनायेंगे अपना या साँड़ का। साँड़ आपको सींग मारेगा और आप घायल हो कर अस्पताल पहुँच जायेंगे। या साँड़ आपको देख कर मुस्करा कर आगे बढ़ जायेगा और आपको अस्पताल जाने की नौबत नहीं आयेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम तो भैया एक किनारे हट जायेंगे। अनजान जगह हो, व्यक्ति हो, स्थिति हो, मशीनरी हो तो हम तो पहले अपने बचाव का तरीका सोच लेते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; निराशावादी होना भी बहुत लाभदायक होता है। आशा ही निराशा की जननी है। जब आप आशा ही नहीं करेंगे तो निराशा आपके पास फटकेगी कैसे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-7140526429455616607?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/7140526429455616607/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=7140526429455616607' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7140526429455616607'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7140526429455616607'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='एक सकारात्मक सोच'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-6232080656551724062</id><published>2010-01-27T10:28:00.001+05:30</published><updated>2010-01-27T10:50:48.293+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नाटक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कलायन'/><title type='text'>हाई वोल्ट वाली जानलेवा मुस्कान</title><content type='html'>चेहरा सुदर्शन हो और भोलापन लिये हुये हो तो यह अच्छे नाक-नक्श और भोलेपन का यह मेल बड़ा जानलेवा सिद्ध हो सकता है। चेहरा देख कर ही इनके सौ खून माफ कर देने को दिल करता है। यहाँ पर उनकी बात नहीं हो रही है जो बड़े जतन से भोलापन ओढ़े रहते है जिनके बारे में कहा गया है कि 'भोली सूरतिया दिल के बड़े खोटे इत्यादि। हम बात कर रहे है उनकी जिनका भोलापन जन्मजात होता है। यह और बात है कि वे अपने इस भोलेपन की शक्ति को जानते हैं और इसका प्रयोग भी करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही एक युवक हमारी कलायन नाट्य संस्था में भी हैं। आजकल हमारी नाट्य संस्था दो नाटकों के बीच में है। यानी पिछले नाटक का मंचन हो चुका है और अगला अभी आरंभ नहीं हुआ है। बड़ा ही कष्टप्रद और उलझाने वाला होता है यह समय। अन्य नाट्य संस्थाओं में भी शायद ऐसा होता हो हमारी संस्था में तो ऐसा होता ही है कि सभी कलाकार मंच पर अभिनय करने के इच्छुक रहते हैं। नाटक को मंच तक लाने में जो पापड़ बेलने पड़ते हैं उससे उनको कोई मतलब नहीं होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी कुछ करने की इच्छा बड़ी बलवती होती है, और बहुत कुछ कर गुजरने की क्षमता भी रखते हैं पर अपनी इसी इच्छा को ही वे अपनी उपलब्धि मान बैठते है। ये सज्जन भी ऐसे ही हैं। यह तथ्य स्वीकारने में मुझे बहुत कष्ट होता है पर करने के लिये मुझे वाध्य किया जा रहा है। कैसे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिहाजा फरमाइये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत पहले ही तय हो गया था कि अगला नाटक चंद्रकान्ता होगा। नाटक तो मैंने बहुत पहले ही लिख लिया था पर मंचन के लिये यथेष्ट साहस नहीं जुटा पा रहा था। कलायन सभी ने सदस्यों ने भरपूर सहयोग देने का तो वादा किया है पर मैंने अपने अनुभव से सीखा है कि ऐसे वादों का अर्थ यह निकलता है कि 'आप आगे बढ़िये अभिनय करने के लिये हम तैयार हैं'।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंद्रिय शिथिलता कहिये या कुछ और कि मैं नाटक आरंभ नहीं कर पा रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर मैं ने सोचा यह जो सभी भरपूर सहयोग का वादा कर रहे हैं इसका लाभ उठाना चाहिये। मैंने इन सुदर्शन व्यक्तित्व वाले सज्जन के जिम्मे एक काम सौंपा। वह था, नाटक चंद्रकान्ता के लिये टेकनिकल टीम का गठन करना। पिछले अक्टूबर से वे इस काम में लगे हैं। पर दिसंबर तक टीम नहीं जुटी। कभी पूछा कि क्यों भई काम कितना आगे बढ़ा तो उत्तर मिलता था कभी 'मैं फलाँ से बात करनेवाला हूँ' तो कभी 'मैं सोच रहा हूँ फलाँ को आजमाया जाय।'&lt;br /&gt;मैं कहता ' भई दिसंबर जाने वाला है, ऐसे तो नाटक आरंभ होने में बहुत देर हो जायेगी।'&lt;br /&gt;इसके उत्तर में एक हाई वोल्ट की जानलेवा मुस्कान। और मैं चारों खाने चित।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे विश्वास है इन सज्जन ने टेकनिकल टीम के गठन का प्रयास अवश्य किया होगा। पर मस्तिष्क की उपज को क्रियान्वित करना और बात है। इस कारण से, या उस कारण से या कई करणों से टीम नहीं जुटी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे अपने ऊपर बहुत ग्लानि हुई कि एक नवजवान के कमजोर कंधों में मैंने इतना बड़ा बोझ डाल दिया। इस उमर में जब उन्नति करने भावना होती है, उत्साह होता है। देश को भी आगे बढ़ाना होता है। और कहाँ मैंने यह एक इतना बड़ा काम जिससे न तो देश की उन्नति होती है और न ही अपना करिअर आगे बढ़ता है, इनको सौंप दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिहाजा मैंने उनका बोझ हलका कर दिया और उनके जिम्मे इतना ही काम सौंपा कि बस कलायन के वरिष्ठ कलाकारों की एक मीटिंग बुलाओ। उसी मीटिंग में सब मिल करक तय करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर मिलते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे भूल गया सर।&lt;br /&gt;आज तो ऑफिस में सॉस लेने की फरसत भी नहीं मिली।&lt;br /&gt;आज नहीं हो पायेगा, किसी शादी में जाना है।&lt;br /&gt;कल मैं नहीं आ पाया सर, क्या बताऊँ बॉस ने रात के दस बजे तक छोड़ा ही नहीं। बाकी लोग आये थे क्या?&lt;br /&gt;कल मैं कोलकाता जा रहा हूँ।&lt;br /&gt;कभी सामना हो गया तो, जी हाँ आप समझ गये होंगे, वही हाई वोल्ट वाली जानलेवा मुस्कान और मैं चारों खाने चित।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-6232080656551724062?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/6232080656551724062/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=6232080656551724062' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/6232080656551724062'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/6232080656551724062'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2010/01/blog-post_27.html' title='हाई वोल्ट वाली जानलेवा मुस्कान'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-7858864012746077336</id><published>2010-01-10T09:00:00.001+05:30</published><updated>2010-01-10T09:00:00.297+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>तुमने कुछ कहा होता -  दूसरा और अंतिम भाग</title><content type='html'>एक दिन बड़े आत्मविश्वास के साथ मुस्कराते हुए सुमति मेरे पास आई और अपनी शादी का कार्ड दे कर चली गई। मैं आसमान से ऐसा गिरा कि किसी खजूर पर भी नहीं अटका। चारों खाने चित। और तब मुझे पता चला कि सुमति को खो कर मैं क्या खो रहा हूँ। चार दिन तक तो मेरे दिमाग में एक ही सवाल था कि यह क्या हो गया। पर अब पछताए होत क्या...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एक व्यवहारिक जीव हूँ। मैंने स्वयं को समझा बुझा लिया कि सुमति की शादी हो रही है तो अच्छा ही है। मैं उसका बालसखा हूँ, मुझे तो प्रसन्न होना चाहिए। जब मैंने ही मंशा नहीं दिखाई तो उसे क्या पड़ी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज जब मैं इस बारे मैं सोचता हूँ तो पाता हूँ कि अन्य सब लड़कियों में भी मैं सुमति को ही तलाशता था। कितना नासमझ था मैं, कितना अंधा था मैं। जो पास थी उसे ही मैं दूर दूसरे परिवेश में खोज रहा था। पता नहीं क्यों उन दिनों मुझे सुमति मेंं एक आकर्षणहीन सादापन ही दिखाई पड़ता था। हो सकता है यह मेरी नजर का धोखा हो। शायद मैं घूम फिर कर और दुनिया देख कर ही घर लौटना चाहता था। यदि मैं देखना चाहता तो वह सब ग्लैमर जो मैं बाहर खोजता फिर रहा था, सुमति में मौजूद था। लड़कपन वाली सुमति और युवती सुमति में मैंने कभी अंतर किया ही नहीं। अपनी कच्ची समझ के कारण एक समझदार, सुलझी हुई और शायद समर्पित लड़की को मैं देख ही नहीं पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकल अवकाश के क्षणों में मैं यह भी सोचता हूँ कि क्या कमी थी उन लड़कियों में जिनसे मैंने किनारा कर लिया था। सभी तो अच्छी लड़कियाँ थीं। सबका अपना अपना व्यक्तित्व था। आज समझ में आता है कि वे मुझे क्यों नहीं जँचीं, क्यों कि उनमें कोई भी सुमति नहीं थी। मेरे बिना जाने मेरे गहन भीतर तो सुमति बैठी हुई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SyndTmdyScI/AAAAAAAABt4/obYJgRZeEgM/s1600-h/For+Illustration(tanakpur).jpg"&gt;&lt;img style="TEXT-ALIGN: center; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 240px; DISPLAY: block; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5416103355702462914" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SyndTmdyScI/AAAAAAAABt4/obYJgRZeEgM/s320/For+Illustration(tanakpur).jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;खैर, सुमति की शादी हो गई। मैंने स्वयं को समझा लिया कि चलो जो हुआ अच्छा हुआ। इसी में संतोष कर लूँ कि सुमति सुखी है। पर मेरे अंदर शादी करने का उत्साह जाता रहा। अपने मन की क्या कहूँ, सुमति के प्रति अहसास हुआ भी तो कब? सुमति के जाने के बाद। और अपना यह प्यार अपना विकराल रूप लेकर मेरे सामने तब खड़ा हुआ जब मैं सुमति से मिलने गया था उसके घर। तब उसकी शादी हुए सालभर हो गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत बड़ा परिवार था। औरतों और बच्चों की भीड़ थी। उसी भीड़ में सुमति भी थी। बड़ी, मँझली आदि बहुओं के बीच वह खो कर रह गई थी। वह एक अमीर परिवार था। सब कुछ था पर वह नहीं था जो होना चाहिए था। मर्दों की दुनिया अलग थी और औरतों की अलग। पत्नी होनी चाहिए थी, इसलिए थी। केवल वंशवृद्धि के लिए। पति आजाद था, पर पत्नी सास श्वशुर जेठ जेठानियों के अधीन थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे वहाँ घुटन महसूस हुई। आया था सुमति से मिलने पर वहाँ औरतों और बच्चों की रेलपेल में उससे बात भी नहीं हो पाई। वहाँ से वापस लौटते समय सुमति के साथ कुछ मिनटों का एकांत मिला तो मैंने उससे पूछा, 'खुश तो हो न सुमति?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुमति ने कोई उत्तर नहीं दिया। फिर पता नहीं क्या सोच कर मैंने उसे कुरेदा। मुझे आभास तो मिल ही गया था कि ऐसे माहौल में सुमति खुश नहीं हो सकती। मैंने उससे कहा, 'उस दिन जब तुमने पूरे आत्मविश्वास के साथ मुस्करा कर मुझे अपनी शादी का कार्ड दिया था तो जानती हो मुझे कितनी ठेस पहुँची...'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुमति बिफर गई। उसने मेरी बात पूरी नहीं होने दी। 'उस तरह मुस्कराने के लिए मैं चार दिनों से अभ्यास कर रही थी शशि। मेरा भी आत्मसम्मान हो सकता है यह तुम्हें ध्यान नहीं आया।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी ऑखें डबडबा आईं। एक ढुलकते हुए आँसू को उसने अपनी तर्जनी में ले लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुमने तो साले मेरा जीवन ही बरबाद कर दिया।' उसने कहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी वह छवि आज तक मेरी आँखों के सामने तैरती है। वह छवि धूमिल पड़े और उम्रेदराज में कुछ साल बचे हों तो शायद मेरी भी शादी हो जाय। जब तक वह छवि धूमिल नहीं पड़ती शादी करके दूसरी गलती करने का मन नहीं है।&lt;br /&gt;समाप्त&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-7858864012746077336?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/7858864012746077336/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=7858864012746077336' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7858864012746077336'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7858864012746077336'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='तुमने कुछ कहा होता -  दूसरा और अंतिम भाग'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SyndTmdyScI/AAAAAAAABt4/obYJgRZeEgM/s72-c/For+Illustration(tanakpur).jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-2581789007007794301</id><published>2010-01-07T16:40:00.001+05:30</published><updated>2010-01-07T17:19:01.130+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>तुमने कुछ कहा होता - एक लघु कथा</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SynbtpLtDVI/AAAAAAAABtw/lhXZc79ih5c/s1600-h/TKKH.jpg"&gt;&lt;img style="TEXT-ALIGN: center; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 289px; DISPLAY: block; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5416101604085271890" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SynbtpLtDVI/AAAAAAAABtw/lhXZc79ih5c/s320/TKKH.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;मैंने शादी न करने की कसम नहीं खा रखी है। पर हुई नहीं है मेरी शादी अभी तक। अपना सुव्यवस्थित व्यवसाय है। रंग-रूप, कद-काठी औसत से बहुत अच्छे हैं। चालचलन साधारण मापदण्डों के हिसाब से दोष रहित ही है। मतलब यह कि अब तक शादी हो जानी चाहिए थी। सभी पूछते भी हैं कि शादी क्यों नहीं की अब तक, कब कर रहे हो, इत्यादि। पर पता नहीं है। मुझे कोई जल्दी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;नहीं नहीं, ऐसा कहना गलत होगा। मुझे पता है कि मेरी शादी क्यों नहीं हो रही है। मैं अपने अंदर शादी के लिये कोई उत्साह नहीं पाता हूँ। पर किसी जमाने में शादी के लिये उत्साह अपनी चरम सीमा में था। उस जमाने में इतना उत्साह, इतनी उतावली रहती थी कि एक प्रेम प्रसंग सामाप्त होते न होते मैं दूसरे में फँस जाता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैं छोटा था, यही दस बारह साल का रहा हूँगा जब एक परिवार हमारे पड़ोस में रहने के लिए आया। उस परिवार की बड़ी लड़की का नाम था सुमति। वह मुझसे तीन चार साल छोटी थी। वह मेरी सहपाठिन बनी। साथ पढ़ते खेलते हमलोग बड़े हुए। बड़े हुए तो पता चला कि हम दोनों के परिवार इच्छुक हैं कि हम दोनों की आपस में शादी हो जाय। मैंने इस बात पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था। हाँ, मुझे सुमति को चिढ़ाने का एक हथियार मिल गया था। तब चिढ़कर सुमति मुझे साला कह कर गाली देती थी। क्या होता था उसकी इस गाली में? मुझे घायल करने की नीयत? उलाहना? खिसियाहट? काश, मैंने जानने का प्रयत्न किया होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी शादी नहीं हुई। मेरे कहने का अर्थ है हमारी एक दूसरे के साथ शादी नहीं हुई। आजकल मैं कभी कभी कारण ढूँढ़ने का प्रयत्न करता हूँ। जब दोनों परिवार इच्छुक थे तो शादी क्यों नहीं हुई? मेरे परिवार की ओर से शायद कारण था मेरी माँ की बीमारी। या मेरी बहन की शादी। या हो सकता है कारण हमारा आर्थिक अभाव रहा हो। या मेरी ओर से उत्साह का अभाव। बहुत संभव है सभी स्थितियाँ मिल का एक बहुत बड़ा कारण बन गई हों। पिता जी शायद सोचते थे कि लड़की तो बगल में है, सुविधा से शादी कर देंगे। पिता जी कहते तो शायद मैं बिना ना-नू किए सुमति से शादी कर लेता। पर पिता जी को सुविधा नहीं मिली। बहन की शादी के पश्चात् माँ ने बीमारी में दम तोड़ दिया। और माँ की बरसी से पहले ही पिता जी भी हमें छोड़ कर चल दिये। उस समय सुमति एम ए फायनल में थी और परीक्षा के लिए तैयारी कर रही थी। मैंने तो बी एस सी करने के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी थी। मैं एक व्यवसाय करने लगा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता जी के जाते जाते मेरा व्यवसाय जमने लगा था। तब मुझे उचित जीवन साथी की फिक्र हुई। सुमति तो थी ही पर मैं चाहता था कि मुझे कोई दूसरी लड़की भी मिले। यानी लड़की ने बचपन में आपकी बहती हुई नाक देखी हो तो यह आवश्यक नहीं कि उसी से शादी की जाय। फिर मेरा दुनिया का अनुभव ही क्या था। दुनिया से मेरा मतलब है लड़कियों का। मैं बचपन से एक ही लड़की को जानता था। उससे शादी करने के बाद पता चले कि दुनिया सुमति में ही नहीं सिमटी हुई है तो कैसा लगेगा! और भी लड़कियाँ हैं जो शायद सुमति से बहुत अच्छी निकलें। इधर उधर ताक झाँक करने में हर्ज ही क्या है। कोई नहीं मिली तो सुमति तो है ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो इस ताक झाँक में मैं ललिता, अरुणा, बार्बी आदि के दौर से गुजरा। कहीं आभिजात्य आड़े आया तो कहीं धर्म। एक दो लड़कियों से तो मैंने स्वयं किनारा कर लिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच मेरी सुमति से भी यदा कदा मुलाकात हो ही जाती थी। कभी मुझे लगता था कि वह मुझसे उतनी सहज नहीं है। या क्या यह मेरा भ्रम था? कभी लगता था कि हमारे बीच वही पुरानी सहजता है। या क्या यह भी मेरा भ्रम था?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी लड़कियों से मित्रता के बारे में न कभी सुमति ने कुछ पूछा ओर न ही मैंने उसे इस संबंध में कुछ बताने की आवश्यकता समझी। मेरे मस्तिष्क के किसी कोने में यह विचार कर रहा था कि मुझे सुमति से शादी करनी चाहिये उधर सुमति और उसके परिवार का कुछ दूसरा ही प्रोग्राम बन रहा था जिसकी मुझे कोई खबर नहीं थी। खबर होती कैसे, उस समय तो मैं बार्बी की अधकटी जुल्फों में उलझने की चेष्टा कर रहा था। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;कहानी बस थोड़ी और है। दूसरा और अंतिम भाग आगामी इतवार तक...&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-2581789007007794301?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/2581789007007794301/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=2581789007007794301' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/2581789007007794301'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/2581789007007794301'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/12/blog-post_3261.html' title='तुमने कुछ कहा होता - एक लघु कथा'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SynbtpLtDVI/AAAAAAAABtw/lhXZc79ih5c/s72-c/TKKH.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-2528995888019755540</id><published>2009-12-29T17:47:00.000+05:30</published><updated>2009-12-29T17:48:47.902+05:30</updated><title type='text'>चारों ओर चिल्लपों मची है</title><content type='html'>चारों ओर चिल्लपों मची है कि यह साल गुजर रहा है और नया साल आ रहा है। जब सभी इस तरह हमें बताने में जुटे हैं तो हम भी ऐलानिया तौर पर मान लेते हैं कि यह साल गुजर रहा है और नया साल आ रहा है। वैसे सच कहूँ मुझे पहले से ही मालूम था कि यह साल गुजर रहा है और नया साल आ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब लोग पीछे देख रहे हैं। लेखा जोखा कर रहे हैं कि इस गुजरते साल में क्या क्या हुआ। कौन सी फिल्म हिट रही। कौन सी हीरोइन सेक्सी रही। यह सब हमें ऐसे बताया जा रहा है जैसे कि दिसंबर के जाते न जाते उस हीरोइन की सेक्स अपील समाप्त हो जायेगी।&lt;br /&gt; तो हमने भी साहब पीछे देखना शुरू किया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोमबत्ती जलाई तो परवाना याद आया&lt;br /&gt;दिसंबर में ही गुजरा जमाना याद आया&lt;br /&gt;हम करते रहे काक चेष्टा बकुल ध्यानम&lt;br /&gt;उनको कोई ले उड़ा हमें फसाना याद आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब और पीछे नहीं देखा जाता। चलिये आगे देखते हैं।&lt;br /&gt;सही समय है ज्ञान की बाँटने के लिये। जॉर्ज कारलिन के बारे में पढ़ रहा था। उनकी कही कुछ बातें यहाँ दे रहा हूँ।मुलाहिजा फरमाइये-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह विडंबना ही है कि&lt;br /&gt;हमारी इमारतें ऊँची हैं पर हमारी सहनशक्ति छोटी है&lt;br /&gt;चौैड़ी सड़कें हैं पर सँकरा दृष्टिकोण है&lt;br /&gt;हमारे खर्चे बड़े है पर हमारे पास जो भी है बहुत कम है&lt;br /&gt;हम खरीदते ज्यादा हैंे पर आनंदित कम ही होते हैं&lt;br /&gt;घर बड़े हैं परिवार छोटे। सुविधायें अधिक पर समय कम&lt;br /&gt;डिग्रियाँ अधिक हैं पर अक्ल कम है। अधिक ज्ञान पर समझ कम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; नया साल आप सब लोगों के लिये सुख, शांति और समृद्धि लाये।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-2528995888019755540?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/2528995888019755540/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=2528995888019755540' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/2528995888019755540'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/2528995888019755540'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/12/blog-post_29.html' title='चारों ओर चिल्लपों मची है'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-4952244328440265920</id><published>2009-12-24T13:51:00.003+05:30</published><updated>2009-12-24T13:53:38.149+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्‍मरण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यंग्य'/><title type='text'>मैं भी कहाँ शिकायत कर रहा हूँ!</title><content type='html'>दफ्तरी जीवन से अवकाश प्राप्त करने के बाद अपनी दिनचर्या एकदम बदल गई है। सुबह देर से नींद खुलती है। आलस के मारे बिस्तर छोड़ते छोड़ते आठ तो बज ही जाते हैं। सुबह घूमने की इच्छा इच्छा ही रह गई है। आज दृढ़ निश्चय के साथ सुबह प्रात: भ्रमण के निकला तो वह दिखाई पड़ा। चुस्त दुरुस्त कंधे में झोला लटकाये हुये। वह मुझे देख कर मुस्कराया। प्रत्युत्तर में मैंने भी अपनी लुभावनी मुस्कान बिखेर दी। पहल उसीने की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मॉर्निंग वाक' को जा रहे हैं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जी हाँ'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अभी इतनी देर में!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्यों अभी नौ ही तो बजा है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मेरे लिये तो नौ बजे बहुत देर हो जाती है। मैं साढ़े सात बजे ही निकल जाता हूँ। बहुत ही अच्छा समय रहता है 'मॉर्निंग वाक' के लिये।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सही फरमाया आपने। पर नौ बजे भी कोई देर नहीं हुई है। वैसे समय अपना है, मैं ऑफिस जाने के झंझट से मुक्त हो चुका हूँ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'रिटायर तो मैं भी हो चुका हूँ। दस साल पहले। फिर भी देखिये हर रोज सुबह साढ़े सात बजे बिना नागा निकल जाता हूँ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस हिसाब से वह कमर में हाथ रख कर इत्मिनान से बातें कर रहा था, मुझे लगा कि ढील दे दो तो वह घंटों ऐसे ही खड़े खड़े बातें करता रहेगा। मैंने इतने कष्ट के साथ यह मॉर्निंग वाक की रुटीन बनाई है, वह टूट जायेगी। एक बार रुटीन टूटी तो फिर शुरू करने में कई दिन निकल जायेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह कहे जा रहा था, 'एक घंटा वाक करता हूँ। तेज चाल वाला ब्रिस्क वाक, समझ रहे हैं ने आप। उसके बाद में पार्क में बैठ कर आधा घंटा प्राणायाम करता हूँ। अभी बाजार से हरी सब्जी  ले कर लौट रहा हूँ। मैं नाश्ते में रोज हरी सब्जी खाता हूँ। दस साल पहले रिटायर हुआ। मुझे देखिये अभी तक फिटफाट हूँ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'फिर भी काम तो रहते ही हैं।' कह कर खिसियानी सी हँसी के साथ आगे बढ़ गया। जान बची लाखों पाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जान कहाँ बची साहब चार दिनों के बाद वे फिर दिख गये। मैं कन्नी काट कर निकले ही वाला था कि उन्होंने धर दबोचा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'आज फिर आप देर से निकले हैं। अब तो धूप भी निकल आई है। यह देखिये आज मुझे ताजे टमाटर मिल गये। मैं रोज सुबह टमाटर का रस पीता हूँ। आप भी पिया कीजिये। स्वास्थ्य के लिये बड़े लाभदायक हैं टमाटर।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अभी मैं चलता हूँ, मुझे देर हो जायेगी।' मैंने जान छुड़ाने का प्रयत्न किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अरे आप तो कहते थे कि समय अपना है।' और वह ह ह ह ह कर हँसने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने का मन तो हुआ कि समय अपना है तो क्या तुम पर लुटा दूँ। पर बिना कुछ कहे कुढ़ता हुआ आगे निकल गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और मैंने मार्निंग वाक का अपना रास्ता बदल दिया। अपनी किस्मत इस नये रूट पर भी एक दिन उससे फिर मुलाकात हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अरे तो आप इस तरफ से जाते हैं। तभी आपसे इतने दिन मुलाकात नहीं हुई।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जी।'  मैंने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ यह रास्ता आपके लिये आसान पड़ता होगा। इसमें कम चलना पड़ता है। अपना तो वही मेन रोड वाला रास्ता है। पूरे छह किलोमीटर का है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जलभुन कर मैंने पूछा, 'तो आप आज इस तरफ कैसे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'आगे नुक्कड़ पर हरी सब्जी वाला बैठता है। यह देखिये ताजा मेथी। मधुमेह में बहुत लाभदायक है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तो आपको मधुमेह है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ वही एक बीमारी है। नहीं तो देख लीजिये मैं एकदम फिटफाट हूँ। दस साल हो गये हैं मेरी रिटायरमेंट को। आप कब रिटायर हुये?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मुझे भी दस साल हो गये हैं।' मैंने कह दिया हालाँकि मुझे अभी दो ही साल हुये हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तो आप भी अड़सठ साल के हैं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं तो मैंने अभी अठहत्तरवाँ पूरा किया है।' मैंने जड़ दिया। उसके मुँह पर जो भाव आये उन्हें देख कर मुझे अपूर्व सुखानुभूति हुई। अपने इस झूठ पर मुझे गर्व होने लगा। मैंने अपना बासठवाँ साल ही पूरा किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अभी तो आप कह रहे थे कि आपको रिटायर हुये दस साल ही हुये हैं।' वह बहुत ही कन्फ्यूज्ड लग रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जी हाँ। मैं एक वैज्ञानिक हूँ। हमारे यहाँ रिटायरमेंट नहीं होता है। जब तक काम करने की इच्छा हो करो। दस साल पहले मैंने सोचा कि अब बहुत हो गया। अब रिटायर हो कर अपने बाकी शौक पूरे करूँ। अड़सठ साल में ही रिटायरमेंट ले लिया।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'आप लगते तो नहीं हैं अठहत्तर साल के।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जी मैं अठहत्तर साल का ही हूँ।' अब मुझे उससे बात करने मैं बहुत मजा आने लगा था। 'देखिये अभी तक एकदम फिटफाट हूँ।रोज छह बजे से आठ बजे तक कराटे की प्रैक्टिस करता हूँ। नौ बजे से दस बजे तक प्रात: भ्रमण के लिये जाता हूँ। आप भी आइये मेरे साथ। छह बजे से कराटे की प्रैक्टिस कीजिये। नौ बजे मानिर्ंग वाक कीजिये। आपकी यह मधुमेह की बीमारी भी दूर हो जायेगी। आप हैं तो अभी अड़सठ के पर दिखने में मुझसे बड़े लगते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अच्छा अभी मैं चलता हूँं। घर में इंतजार हो रहा होगा।' वह खिसकने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कल से आप आ रहे हैं तो कराटे के लिये।' मैंने पीछे से आवाज दी। कहीं हाँ बोल देता तो लेने के देने पड़ जाते पर वह हाँ बालने टाइप का नहीं लगा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह दिन है और आज का दिन है वह मुझे जब भी दिखाई पड़ता है हमेशा दूसरी तरफ के फुटपाथ पर दिखाई पड़ता है। मुझे देखते ही फुटपाथ बदल लेता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मैं भी कहाँ शिकायत कर रहा हूँ!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-4952244328440265920?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/4952244328440265920/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=4952244328440265920' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/4952244328440265920'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/4952244328440265920'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/12/blog-post_24.html' title='मैं भी कहाँ शिकायत कर रहा हूँ!'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-564078831772777404</id><published>2009-12-17T19:06:00.003+05:30</published><updated>2009-12-17T19:10:34.994+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यात्रा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्‍मरण'/><title type='text'>बस हाइजैक</title><content type='html'>यह घटना वास्तव में घटी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात का समय था। बस हल्द्वानी से दिल्ली जा रही थी। रात के करीब दो बजे बस रामपुर पहुँची, वहाँ चार व्यक्ति बस में चढ़े। उस समय  बस के यात्री निद्रा की विभिन्न अवस्थाओं में थे। कोई खरर्ाटे ले रहा था तो कोई करवट बदल रहा था। उन चारों पर किसी का ध्यान नहीं दिया। उन्होंने सीटें से ही रिजर्व करा रखीं थीं। कंडक्टर ने उन्हें खाली सीटों में बिठाया। मुरादाबाद बाईपास पार होते ही उन चारों में से एक जिसके चेहरे में चेचक के दाग थे ड्राइवर के पास गया और उसकी कनपटी में रिवाल्वर सटा दी। बस को वे लोग एक सुनसान खेत में ले गये और रिवाल्वरों के जोर पर यात्रियों को एक एक करके बाहर निकाला और उनके गहने पैसे लूट कर  अपने साथ लाए बोरों में भर लिया। उसके बाद उन लोगों ने बस और पैसेंजरों को छोड़ दिया। लुटी हुई बस आगे बढ़ गई।&lt;br /&gt;बस गजरौला करीब आधे घंटे के लिये एक ढाबे में रुक कर आगे बढ़ ही रही थी कि वे चार फिर आ गए। चेचक के दाग वाला उनका मुखिया लग रहा था। उसने बस के यात्रियों से कहा, आप लोगों का सब सामान हम लौटा रहे है। सामान नीचे दरी में पड़ा हुआ है। अपना सामान उठा लीजिए। इसके बाद वे कार में बैठ कर रफूचक्कर हो गये। यात्रियों ने देखा कि लूटा हुआ कैश तो वहाँ नहीं था पर गहने और सब सामान दरी में था।&lt;br /&gt; लुटेरों की इस अजीब हरकत का खुलासा बस के ड्राइवर ने किया। इस हाईवे पर जब कोई भी बस लुटती है तो उसका एक बँधा हुआ रेट पुलिस को जाता है। बस से लुटेरे कितना ही क्यों न लूट लें पुलिस को उससे कोई मतलब नहीं। उनको उनकी पूर्व निर्धारित राशि मिलनी चाहिए। इस बस को लूटने पर उन चारों ने पाया कि कुल मिला के सामान की कीमत से पुलिस का ही चुकता नहीं होगा। उन्होंने सामान लौटा दिया। पुलिस को बता देंगे कि सामान कम निकला इसलिए लौटा दिया। इस तरह वे पुलिस को देने से, यानी घाटे के सौदे से बच जायेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-564078831772777404?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/564078831772777404/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=564078831772777404' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/564078831772777404'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/564078831772777404'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/12/blog-post_17.html' title='बस हाइजैक'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-3891913608170563493</id><published>2009-12-15T22:51:00.002+05:30</published><updated>2009-12-15T23:05:23.997+05:30</updated><title type='text'>चिराग का भूत - हँसी से भरपूर प्रहसन</title><content type='html'>आदमी की इच्छाओं का अंत नहीं। यदि आपको चिराग का जिन्न मिल जाए तो आप उससे क्या माँगेंगे! पढ़िए एक हँसी से भरपूर प्रहसन। - मथुरा कलौनी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चिराग का भूत&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;स्थान - रास्ता&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पथिक - (स्वगत) यह पेड़ की छाँव में कौन बैठा हुआ है। कोई बेचारा लगता है। किस्मत का मारा लगता है। सूरत रोनी है। इसके साथ हुई बात कोई अनहोनी है। जरा पूछ कर तो देखूँ क्या दुख है इसको। ( प्रकट) क्यों भैया क्या दुख है तुमको?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - कौन हो भई तुम?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - मैं एक पथिक हूँ। विश्राम करने के लिए इस पेड़ की छाँव में आया। यहाँ आ कर तुमको बैठे पाया। सोचा पूछ कर देखूँ क्या दुख है तुमको। क्यों भैया क्या दुख है तुमको?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - कोई एक दुख हो तो बताऊँ। कोई एक गम हो तो सुनाऊँ। यहाँ तो किस्सा इस तरह है कि जब से मैंने होश सम्हाला है, दुखों को ही पाला है। मुझे पहले एक दुख मिला। उस पहले दुख से उबरा ही था कि मुझे दूसरा दुख मिला। फिर तीसरा, फिर चौथा। तुमको गिनती आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - पूरी गिनती गिन जाओगे तो भी मेरे दुखों का पार न पाओगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - वह तो बता रही है तुम्हारी सूरत। दुखों की बने हो तुम एक बड़ी मूरत। चलो अपना कोई नया ताजा दुख सुनाओ। तुम्हारा जी भी हल्का हो जाएगा, मेरा मन भी बहल जाएगा। मैं कर लूँगा थोड़ा विश्राम और तुम को भी आएगा आराम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - कहते हो तो बताता हूँ। अपने गम की दास्तान सुनाता हूँ। अभी परसों की बात है। मैं थका माँदा अपने घर पहुँचा। जैसे सिर मुड़ाते ही ओले बरसते हैं, मेरे घर में घुसते ही शोले बरसते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पथिक - क्या तुम्हारी बीवी तुमको मारती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - नहीं नहीं मेरी बीवी तो बहुत अच्छी है। बस गाय समझ लो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - गाय! गाय भी तो सींग मारती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - मेरी बीवी क्या मारेगी मुझको। बस मेरी किस्मत ही ऐसी है कि मैं ही खा लेता हूँ उसके हाथ से मार। कभी एक दो कभी दो चार। परसों की बात बता रहा था। बीवी ने सेव मँगाए थे और मैं खाली हाथ गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - यह तो तुमने गलती की। बीवी ने मँगाए थे सेव तो ले जाते सेव। यह कौन सी बड़ी बात थी। सेव ही तो माँगे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - हाँ माँगे तो थे उसने केवल सेव। पर मैं कहाँ से ले जाता सेव। सेव क्या पेड़ में उगते हैं कि जब चाहो तोड़ लो। बाजार में मिलते हैं सेव। वह भी सौ रुपये किलो। और मेरे पास बस का किराया भी नहीं था तो कहाँ से ले जाता सेव!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - क्या बीवी ने बहुत मारा। मेरे कहने का मतलब है क्या तुमने अपनी बीवी के हाथों बहुत मार खाई?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - हाँ आँ...फिर उसने मुझे धक्का दे कर बाहर निकाल दिया और मेरे मुँह पर दरवाजा बंद कर दिया। खटाक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - फिर क्या हुआ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - उद्देश्यहीन, भटकता हुआ मैं यहीं आ पहुँचा। यहाँ आकर क्या देखता हूँ कि उधर पत्थरों के बीच में एक चिराग दबा हुआ है। मैंने पत्थरों को हटा कर चिराग को निकाला। बहुत ही सुंदर चिराग था। उस पर धूल और मिट्टी चिपकी हुई थी। मैंने उस पर से मिट्टी हटाई और रुमाल से उसे साफ करने लगा। अभी मैं उसे रुमाल से रगड़ ही रहा था कि.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दृश्‍य बेचारा और जिन्‍न।&lt;br /&gt;जिन्न प्रकट होता है।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - (अँगड़ाई लेता है) इस बार तो बहुत ही लंबे अरसे के बाद किसी ने चिराग को रगड़ा। अरे बापरे यह तो ट्वेंटीफर्स्ट सेंचुरी है। चिराग किसने रगड़ा, कौन बना मेरा मालिक!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - भूत... भूत... भूत... भूत...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - (स्वगत) तो ये है मेरा नया मालिक। (प्रकट ) गुड इविनिंग सरकार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - भूत... भूत... भूत... भूत...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - ओ मेरे आका॥ ओ मेरे सरकार आपने मुझको बुलाया, और मैं आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - मैंने तुमको नहीं बुलाया... मैंने तुमको नहीं बुलाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - अरे कैसे नहीं बुलाया! यह कौन सा जमाना है भाई ? कोई मुझे बुलाता और खुद भागता!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - भूत... भूत... भूत...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - डरो मत सरकार, डरो मत सर, डरो मत बडी, डरो मत बाबा, डूड।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - कौन हो तुम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - मैं जिन्न हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - जिन्न?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - हाँ जिन्न। हिंदी में भूत, उर्दू में जिन्न और अँग्रेजी में जिनी हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - भूत...भूत... बचाओ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - (स्वगत ) ऐसा डरपोक आदमी मैंने पहले कभी नहीं देखा। ( प्रकट ) हाई डूड! मैं आपका सेवक हूँ सरकार ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - मुझे बहुत खुशी हुई आपसे मिल कर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - मैं आपका सेवक हूँ सरकार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - भूत महाराज क्या सेवा करूँ मैं आपकी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - सेवा मैं करूँगा सरकार आपकी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - नहीं भूत महाराज॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - (स्वगत) ये क्या हो रहा है? मैं बहुत कनफ्यूज हो गया हूँ। ( प्रकट) सरकार आप मुझे यह बतायें कि आपने मुझे क्यों बुलाया?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - यह क्या गजब कर रहे हो भूत महाराज। मेरी हिम्मत कि मैं आपको बुलाऊँ। आप विश्वास कीजिए महाराज कि मैंने आपको नहीं बुलाया। माँ कसम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - अरे कैसे नहीं बुलाया! आपने उस चिराग को रगड़ा कि नहीं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - मैं उसे साफ कर रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - हुकुम मेरे आका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - माने?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - क्या माने?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - अभी तुमने क्या कहा। हुकुम मुन्नका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - हुकुम मुन्नका नहीं, हुकुम मेरे आका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - इसका मतलब क्या हुआ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - हुकुम मेरे आका माने आप हुकुम करो मेरे मालिक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - कौन है तुम्हारा मालिक?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - आप हैं मेरे आका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - ए भैया, क्यों मेरा मजाक उड़ा रहे हो। मैं पहले ही बहुत परेशान हूँ। मुझे और परेशान न करो। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो और आपना रास्ता नापो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - ये मैं नहीं कर सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - क्यों नहीं कर सकते। मुझे काका भी बुलाते हो....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - काका नहीं आका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - जो भी हो मुझे आका काका बुलाते हो और परेशान भी करते हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - (स्वगत ) वाह क्या आदमी मिला है! एक हजार साल में ही जमाना इतना बदल गया है। आदमी इतना भी बेवकूफ हो सकता है? (प्रकट) देखो मेरे आका जब कोई उस चिराग को रगड़ता है तो मैं हाजिर हो जाता हूँ। चिराग रगड़ने वाले का दास बन जाता हूँ। और वह जो भी माँगता है मैं हाजिर कर देता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - क्या कहा... आप चिराग रगड़ने वाले के दास बन जाते हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - जी सरकार यही प्रोटोकॉल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - अलादीन के चिराग की तरह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - यह चिराग अभी आपके पास है सरकार और मैं आपका दास। हुकुम मेरे आका। आप जो भी माँगेंगे मैं हाजिर कर दूँगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - मैं जो भी माँगूँ तुम दे सकते हो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - हाँ सरकार आपने चिराग रगड़ कर मुझे बुलाया और मैं चला आया। अब आप जो भी माँगोगे मैं हाजिर कर दूँगा। हुकुम मेरे आका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - तुम यह बार हुकुम मेरे आका। मत बोलो। मुझे डर लगता है और भागने का दिल करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - बोलना पड़ता है सरकार। यह हमारे कोड ऑफ कंडक्ट में लिखा हुआ है। डरिए मत सरकार! माँगिए। हुकुम मेरे आका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - क्या माँगूँ। प्यास लगी है, घर से बाहर निकालने से पहले बीवी ने पानी भी नहीं पिलाया। भूत महाराज आप एक पानी का गिलास हाजिर कर दीजिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - अभी लीजिए सरकार।  नहीं  सरकार माफ कीजिए। यह मैं नहीं कर सकता।&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - क्यों?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - मुझे नहीं मालूम यह पानी का गिलास क्या होता है। सोने का गिलास होता है, चाँदी का गिलास होता है पर पानी का गिलास क्या होता है, मुझे नहीं मालूम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - पानी का गिलास माने एक गिलास में पानी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - ओ आपको पानी चाहिए। ऐसा बोलिए न। यह लीजिए सरकार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - अरे, यह आपने कैसे किया? वाह आप तो बहुत कमाल के भूत हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - हुकुम मेरे आका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - आप मुझे सेव ला कर दे सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - सेव?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - हाँ सेव।.... एपल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - ओ एपल! यह लीजिए सरकार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - भूत महाराज?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - हुकुम मेरे आका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - मुझे अमीर बना दीजिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - अरब का अमीर सरकार?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - कहीं का भी बनाइए पर बनाइए अमीर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - अभी लीजिए सरकार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - यह क्या!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - लड़की सरकार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - लड़की क्यों?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - सरकार अमीर आदमी का बहुत बेगम। रिच मैन, मैनी वाइभ्ज। जितना बड़ा अमीर उतना बड़ा हरम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - ओ भूत मालिक, ओ जिन्न महाराज अमीर बनने के लिए रुपये चाहिए। लड़की नहीं। क्या तुम मुझे रुपये दे सकते हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - हुकुम मेरे आका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - मुझे 100 रुपये दो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - यह लीजिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - मुझे 10,000 रुपये दो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - यह लीजिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - अरे वाह। आप तो बहुत ही काम के भूत निकले। अब मुझे बीवी से मार खाने की जरूरत नहीं। जो जो चाहिए माँग लेता हूँ। भूत महाराज एक पेन चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - यह लीजिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - कागज चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - यह लीजिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - आप यह कागज और कलम लीजिए। मुझे जो जो चाहिए मैं बोलता हूँ।þ और आप लिखते जाइए ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - हुकुम मेरे आका।&lt;br /&gt;बेचारा - लिखिए बाटा शू कंपनी का एक जोड़ी जूता। नहीं नहीं दो जोड़ी जूते। दोनों के साइज सात। रेमंड कंपनी के दो उलन पैंट। एरो कंपनी की दो शर्ट। जौकी कंपनी के आधे दर्जन अंडरवीयर। इसको एक दर्जन कर दीजिए। लिखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - हॉं सरकार लिखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - आगे लिखिए, ओल्ड स्पाइस का आफ्टरशेव लोशन, जिलेट का शेविंग किट, बनारस की जरी वाली दो साड़ियाँ, एक हरी और एक धानी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बेहोशी का संगीत। जिन्न लिखते लिखते बेहोश हो जाता है। बेचारा - पानी छिड़क कर उसे होश में लाता है।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - सरकार आप इतने लालची आदमी हैं। लिखते लिखते मैं बेहोश हो गया। हाथ दुख रहा है। अब और मैं नहीं लिख सकता।&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - ठीक है अभी आप इतना ला दीजिए। बाकी मैं बाद में बोलता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - अभी और है... और यह लिस्ट तो बहुत बड़ी है। मैं कैसे करूँगा इतना काम!&lt;br /&gt;(स्वगत)&lt;br /&gt;मेरी हिस्ट्री में मुझे बहुत किस्म के लोग मिले। बहुत लोगों ने इस चिराग को रगड़ा। किसी ने कहा दीनार दो, तो किसी ने कहा मीनार दो।&lt;br /&gt;कोई बोला शबाब दो, तो कोई बोला साथ में शराब और कबाब दो।&lt;br /&gt;कोई ताजमहल माँगा तो कोई मुमताज महल,&lt;br /&gt;पर यह आदमी तो एकदम आम आदमी है।&lt;br /&gt;मैं पूछता हूँ कि क्या चाहिए धन, दौलत, लड़की&lt;br /&gt;और यह माँगता है नून, तूल और लकड़ी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - ओ भूत महाराज। सामान जल्दी ले आइए। मुझे अपनी बीवी को सरप्राइज देना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - सरकार इतना सामान लाते लाते तो मुझे महीना लग जाएगा। मुझे जल्दी है। चिराग में जा कर सोना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - अभी तो मैंने पूरा सामान बताया ही नहीं । पहले मेरा पूरा काम कर दीजिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - (स्वगत) मर गए। अब मैं इससे कैसे छुटकारा पाऊँ! आइडिया! -प्रकट- सरकार अगर आप अमर हो जाँय तो कितना अच्छा होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - अमर माने?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - अमर माने अमर। आपका नाम लोग सदियों तक याद करते रहेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - इससे मुझे क्या फायदा होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - आप इम्मार्टल हो जाएँगे। आपकी संतान, आपकी संतान की संतान,&lt;br /&gt;आपकी संतान की संतान की संतान, यानी पुश्त दर पुश्त आपकी आल फ्यूचर जनरेशन आपको याद करेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - यह कैसे होगा! क्या आप ऐसा कर सकते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - हुकुम मेरे आका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - भूत तुम मुझे अमर कर दो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - यह लीजिए सरकार। वह देखिए क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - कहाँ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - उस तरफ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - वहाँ तो एक बहुत बड़ा जूता दिखाई पड़ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - वह जूता नहीं है सरकार, वह एक बहुत बड़ी विल्डिंग है। शू पैलेस। जूता महल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - जूता महल !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - हाँ जूता महल आप ताज महल के बारे में जानते हैं न?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - हाँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - जैसे ताजमहल को देख कर लोग शहंशाह शाहजहान को याद करते हैं वैसे ही जूता महल देख कर लोग आपको याद करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - कैसे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - मैं आपको मार कर आपकी कब्र के ऊपर जूता महल बनाऊँगा। जैसे ताजमहल के नीचे शहंशाह शाहजहान वैसे ही जूता महल के नीचे आप। जैसे शहंशाह शाहजहान अमर हैं वैसे ही आप अमर हो जाएँगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - तू साला भूत। मुझे मारना चाहता है। मुझे! तुमने मुझे मार दिया तो मैं अपनी बीवी को क्या मुँह दिखाऊँगा। अमर बनाएगा मुझे। अरे तू क्या अमर बनाएगा मुझे। दूर हो जा मेरी नजरों से नहीं तो अपने इस जूते से मार-मार कर तेरा भुरकस निकाल दूँगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्न - जो हुकुम मेरे आका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जिन्‍न गायब हो जाता है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दृश्‍य बेचारा और पथिक&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - मेरे दूर हो जा कहते ही वह जिन्‍न गायब हो गया। वह चिराग भी गायब हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - यानी वो जिन्न चला गया। तुम्हारा सामान भी नहीं आया। चिराग भी चला गया!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - पता नहीं कहाँ गया। मैंने बहुत खोजा नहीं मिला। या तो जमीन खा गई या आसमान निगल गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - ( लंबी सॉंस खींच कर) वह चिराग अब नहीं मिलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बेचारा गौर से पथिक को देखता है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - कौन हो तुम?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - तुम्हारी तरह ही एक किस्मत का मारा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - वो कैसे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - वह चिराग का भूत...जिन्न तुमसे छुटकारा पाना चाहता था। पर तुम्हारी मर्जी के बिना यह संभव नहीं था। वह तुमको गुस्सा दिलाना चाहता था ताकि तुम गुस्से में उसे चले जाने को कहोगे और वह चिराग में घुस जाएगा। पर चिराग ही गायब हो गया। वह बेचारा लटक गया बीच में ही। चिराग में तो घुस नहीं पाया। चिराग के बिना उसका जादू भी बेकार हो गया। अब वह जिन्न से साधारण आदमी बन गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - तुम को यह सब कैसे मालूम?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - क्यों कि मैं ही वह जिन्न हूँÆ ... था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - डरता है&lt;br /&gt;डरो मत। अब मैं भी एक बेचारा हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - अपने लिए नहीं तो तुम्हारे लिए चलो चिराग को खोजते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - मैंने कहा न अब वह चिराग नहीं रहा। जब तुम अमीर बनना चाहते थे मैंने तुमको एक बेगम ला कर दी थी। वह कोई और नहीं तुम्हारी ही बीवी थी। तुम उस भेष में उसे नहीं पहचान पाए थे। वह जाते समय चिराग को अपने साथ लेती गई। उस समय मैंने भी ध्यान नहीं दिया। मुझे बहुत बात में पता चला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - यह तो अच्छा हुआ चिराग घर में ही है। तुमको तुम्हारा घर मिल जाएगा और मुझे मेरा सामान। लिस्ट तो तुम्हारे पास होगी ही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - तुम्हारी बीवी चिराग लेकर सीधे लोहार के पास गई। चिराग को गला कर उसने एक कटोरी बनवा ली है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - माने?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - माने चिराग गया। न मैं जिन्न बन सकूँगा और न तुम्हारा सामान आएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचारा - अब तुम क्या करोगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथिक - कुछ नहीं। तुम्हारे साथ तुम्हारे घर चलता हूँ। तुम्हीं को मुझे पालना पड़ेगा। मुझे तो कुछ आता ही नहीं है।&lt;br /&gt;समाप्‍त&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-3891913608170563493?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/3891913608170563493/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=3891913608170563493' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/3891913608170563493'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/3891913608170563493'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/12/blog-post_15.html' title='चिराग का भूत - हँसी से भरपूर प्रहसन'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-8055751252142328826</id><published>2009-11-28T11:54:00.012+05:30</published><updated>2009-11-28T12:30:20.094+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्‍य व्‍यंग्‍य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>वो बस मुस्कराये और जाँ निकल गई</title><content type='html'>श्रीमती जी को बेटी दामाद से मिलने की प्रबल इच्छा हुई। मुझसे कहा गया मैं जाती हूँ दुबई। एक महीने के बाद लौटूँगी। तब तक तुम मेरी बिल्लयों की देखभाल करना। मैं अकेला और मेरे साथ दो बिल्लियाँ। बस समझ लीजिये एक महीने तक यही चलेगा। बिल्लियाँ न होती तो मैं 'खोया खोया चाँद खुला आसमाँ' हो जाता। पर क्या करें बिल्लियाँ हैं और उनका अस्तित्व नकारा नहीं जा सकता। पर जब आप एकाकीपन महसूस करते हैं तो बिल्लियों की संगत पर्याप्त नहीं होती। दो टॉग वाले प्राणियों की कमी खलने लगती है। वर्षों पहले लगभग ऐसी ही स्थिति थी जब मैं अकेला बैठा घर में लगभग बोर हो रहा था। उसी बोरियत में मैंने एक कविता लिखी थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैठा हूँ आज अकेला मैं&lt;br /&gt;संध्या की बेला है और हाथ में हे मय&lt;br /&gt;और कर रहा हूँ याद&lt;br /&gt;बीते दिनों को हो कर तन्मय&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन चार पंक्तियों को छोड़ कर बाकी की कविता मैंने पहले ही &lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2008/02/blog-post_3923.html"&gt;यहाँ &lt;/a&gt;पोस्ट कर रखी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचा कुछ नया लिखूँ। चलो कविता ही सही। कौई मौजूँ विषय? - हाँ क्यों नहीं।&lt;br /&gt;प्यार? - इससे बढ़ कर मौजूँ और क्या हो सकता है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद आया कि&lt;a href="http://mathurakalauny.blogspot.com/2008/02/blog-post_20.html"&gt; प्यार &lt;/a&gt;पर भी कुछ पहले ही पोस्ट कर चुका हूँ।&lt;br /&gt;ऐसा क्यों होता है कि जिस विषय पर आप लिखना चाहते हैं आप पहले ही लिख चुके होते हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर प्यार में नया लिखने की बहुत संभावनाएँ हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हजारों लाखों बार परिभाषित होते हुए भी आप पूछने के लिये वाध्य होते हैं कि आखिर है क्या यह प्यार?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस विषय में हमारे भारत से अधिक जानकार कोई देश नहीं हो सकता। यहॉं साल में कई हजार करोड़ की लागत से साल में 2000 से अधिक फिल्में बनती है। सबका विषय एक ही है प्यार। फिर भी पूछने का दिल करता है कि आखिर है क्या यह प्यार?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;60-70 वर्ष से हमारी फिल्में हमें प्यार के बारे में बता रही हैं कि प्यार किया नहीं जाता बस हो जाता है। पर कैसे होता है किसी को नहीं मालूम। Cause and effect वाला सिद्धांत यहाँ लागू नहीं होता। नायक गुफा कुदराओं से, रेगिस्तान से, बर्फीली चोटियों से, आस्‍ट्रेलिया से, अफ्रीका से दहाड़ता है कि प्यार हो गया है। कैसे हुआ, न तुम जानो, न मैं जानूँ। प्रेमी या प्रेमिका भले ही एक दूसरे की आगोश में आ जाय, पर प्यार पकड़ में नहीं आता है।&lt;br /&gt;शायर लोग प्यार के मामले में बहुत कुछ कह गये हैं जिसका अर्थ न वो समझे हैं न किसी और को समझ में आता है। किसी शायर ने कुछ ऐसा भी कहा है 'अभी नादां हो, दिल रखा है तुम्हारे ही लिए, ले जाना जवाँ हो कर।' यह तो सीधे जेल की तरफ ले जाने वाला प्यार है।&lt;br /&gt;प्यार की कुछ रूपों का मुलाहिजा फरमाइए&lt;br /&gt;कॉल सेंटर वाला अपरिपक्व प्यार&lt;br /&gt;जनम जनम का साथ वाला प्यार&lt;br /&gt;जज्बये दिल किसे पेश करूँ वाला प्यार&lt;br /&gt;जज्बये दिल कैसे पेश करूँ वाला प्यार&lt;br /&gt;दिल चाहता है में अक्षय खन्ना वाला प्यार&lt;br /&gt;वैलेन्टाइन डे वाला प्यार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यार पर नीरक्षीर विवेचन होना चाहिये। क्या प्यार है, क्या नहीं है। जैसे, क्या क्षणिक आकर्षण प्यार है? क्या वासना रहित प्यार प्यार है? इत्‍यादि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यार पर मेरी एक सद्य:रचित कविता मुलाहिजा फरमाइए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न कहीं खून बहा, न चोट कोई,&lt;br /&gt;वो बस मुस्कराये और जाँ निकल गई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फैशन की महफिल में हसीनों के जलवे थे&lt;br /&gt;पर वाह रे तेरी सादगी, मीठी छुरी चुभो गई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देर में जाना फैशन का एक अंदाज है सादगी&lt;br /&gt;खामखाँ लौ में एक पतिंगा जल गया है कोई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें तो इश्क हुआ, खेल इसको समझते हैं वो&lt;br /&gt;हम बिरहा गा रहे हैं, मल्हार गा रहा है कोई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेगैरत हम भी न थे क्यों जाते उसकी गली&lt;br /&gt;वो तो बेखुदी थी जो हमें वहाँ तक ले गई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गीली रेत पर बना तो दिया है दिल&lt;br /&gt;अब है इंतजार लहर जल्दी से आये कोई&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-8055751252142328826?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/8055751252142328826/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=8055751252142328826' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/8055751252142328826'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/8055751252142328826'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/11/blog-post_28.html' title='वो बस मुस्कराये और जाँ निकल गई'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-7370281079517265320</id><published>2009-11-14T15:27:00.001+05:30</published><updated>2009-11-14T15:30:11.358+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्‍य व्‍यंग्‍य'/><title type='text'>उसके बारे में</title><content type='html'>सभी जानते हैं उसके संबंध में लेकिन कोई भी उसका नाम अपनी जुबान पर नहीं लाता। नाम उच्चारण करने में बहुत अश्‍लील लगता है। पहले तो बड़े बड़े साइन बोर्डों में, नगरपालिका की दीवारों पर और सिनेमा के पर्दे पर ही उसका नाम दिखाई पड़ता था पर जबसे टेलीविजन लिया है ठीक बैठक के कमरे में उसके बारे में देखने और सुनने को मिलता है। लिहाजा मोहन चिंतित है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोहन की दो पुत्रियॉं हैं। एक नौ साल की है और दूसरी छह साल की। दोनों ने टी वी पर आने वाले सभी विज्ञापन याद कर रखे हैं।  टूथपेस्ट के बारे में हो या प्रेसर कुकर के बारे में, घड़ी के बारे में हो या आम के अचार के बारे में, कोई भी ऐसा विज्ञापन नहीं जो उन दोनों को याद न हो। दोनों लड़कियॉं समवेत कंठ से टी वी के साथ साथ विज्ञापन की पंक्तियॉं दोहराती हैं। इन्हीं विज्ञापनों में एक उसके बारे में भी होता है। इस विज्ञापन को भी दोनों लड़कियॉं निश्‍छल भाव से दूसरे विज्ञापनों की तरह ही दोहराती हैं।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मोहन और उसकी पत्नी जब उन दोनों के मुँह से उस विज्ञापन को सुनते हैं तो ऐसा दिखाते हैं जेसे सुना ही न हो। ऐसा साहस उन दोनों में से किसी को भी नहीं है कि लड़कियों को मना कर सकें कि उस विशेष विज्ञापन को न दोहरायें। मना करने का कोई कारण भी नहीं सूझता उन दोनों को। इस डर से उनकी नींद हराम हो गयी है कि अगर दोनों में से किसी ने कुछ पूछ दिया कि वह क्या होता है तो वे क्या उत्तर देंगे! पत्नी के सामने तो मो‍हन बहुत बहादुर बनता है,  किन्तु उस संभावित प्रश्‍न का उत्तर उसे नहीं सूझता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्या उत्तर देंगे?'  पत्नी पूछती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सच बता देना। हर्ज ही क्या है!' मोहन कहता है। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;'इतनी कच्ची उमर में क्या वह ठीक समझ पायेंगे! बेकार में गलत दिशा में उनका घ्यान खींचना ठीक होगा? मैं तो कुछ झूठ बोल कर बात टाल दूँगी।' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं नहीं बच्चों से झूठ नहीं बोलना चाहिये। फिर बच्चे भी तो कुछ समझते हैं ही, तुरन्त पकड़ लेंगे कि झूठ बोला जा रहा है। वे सोचेंगें ऐसा क्या है जो छिपाया जा रहा है। ऐसे में वे इस पर गलत तरीके से सोचेंगे। सच ही बोलना चाहिये।'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;'कैसे?'  पत्‍नी पूछती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सच जैसे बोलते हैं। वैसे बाहर के देशों में तो इस संबंध में स्कूल में ही बता देते हैं।' मोहन का कहना था।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;वे दोनों इसी तरह की बातें करते लेकिन इस समस्या का समाधान कैसे करेंगे इस विषय पर उनकी कोई सुलझी हुई धारणा नहीं थी। सब गोल था। उनकी किस्मत अच्छी थी कि उन दोनों में से किसी ने अभी तक उसके बारे में नहीं पूछा था। वे टी वी के साथ विज्ञापन को दोहराती थीं बस।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किस्मत अच्छी थी केवल अब तक। अब छोटी ने उन्‍हें चिन्ता में डाल दिया था। कहने का अर्थ है कि पहले से अधिक चिन्ता में डाल दिया था। संभावित प्रश्‍न के पूछे जाने की संभावना अचानक बहुत अधिक बढ़ गयी थी। छोटी इस संबंध में बहुत कुछ सोच रही थी। उसकी बातों से यही लगता था।  एक दिन उसने अपनी मॉं से पूछा था,  'मम्मी हम लोग दो ही हैं, दीदी और मैं।  कितना अच्छा है न। तीन होते तो तुमको कितना कष्‍ट होता? खाने की मेज में जगह नहीं होती और सोने के लिये भी एक और पलंग लगाना पड़ता!' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और एक दिन उसने मोहन से कहा 'पापा स्कूटर में मम्मी और दीदी तो पीछे बैठते हैं और मैं सामने खड़ी होती हूँ। हम लोग तीन होते तो तुम क्या करते? तीसरे बच्चे को कहॉं बिठाते?'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;उनके एक पड़ोसी के पॉंच बच्चे हैं। परिवार नियोजन के बारे में बेचारे को तब मालूम हुआ जब बहुत देर हो गयी थी। मोहन की छोटी मुन्नी उन बच्चों के बारे में बहुत चिन्तित थी। कई बार कह चुकी थी कि वे बेचारे एकसाथ बैठकर खाना नहीं खा सकते, एकसाथ पिक्चर नहीं जा सकते इत्यादि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोहन और उसकी पत्‍नी हम दो हमारे दो से संतुष्‍ट थे। छोटा परिवार सुखी परिवार। मुन्नी के इन नये प्रश्‍नों से एक नया डर पैदा कर दिया है उनके मन में।  जिसको अभी तक असंभव किये बैठे हैं कहीं संभव हो गया तो क्या होगा? क्‍या मुँह दिखाऍंगे इन बच्‍चों को!&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;खैर यहॉं बात उसके बारे में हो रही थी जिसका विज्ञापन उनकी पुत्रियॉं टी वी के साथ दोहराती हैं। इस संबंध में एक दिन उनका डर साकार हो ही गया। टी वी में विज्ञापन आया। दोनों ने एक साथ दोहराया  सुखी वैवाहिक जीवन के लिये ...............। छोटी दौड़ती हुई अपनी मॉं के पास गई और उसने पूछा,  'मम्मी वह क्या होता है?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह घटना रसोईघर में हुई। मोहन बैठक से सब देख रहा था। उसने देखा कि उसकी पत्नी सकपका गई है। प्रश्‍न संभावित अवश्‍य था। लेकिन पत्नी को आशा नहीं थी कि यह पहले उसीसे पूछा जाएगा। वह तैयार नहीं थी। सारी प्लानिंग धरी की धरी रह गई। उसने कहा, 'मुझे काम करने दो मुन्नी, जाओ खेलो।'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;'क्या मम्मी इतनी रात को भी कोई खेलता है?  बताओ न वह क्या होता है?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बेटा ऐसा होता है न कि जब अस्पताल में बच्चे पैदा होते हें तो....तो...देखो मेरी रोटी जल गई। मैं बाद में तुमको बता दूँगी हॉं। अभी मुझे खाना बनाने दो।'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;'नहीं मम्मी अभी बताओ।'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;'कहा ना बाद में बता दूँगी।' मुन्नी को डॉंटते हुए पत्नी ने कहा।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;'मुन्‍नी को क्यों डॉंटती हो?' मोहन ने कहा। 'डॉंटना ठीक नहीं है। उसे बता दो। उसकी जिज्ञासा शांत कर दो बस।'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;'मुन्‍नी बेटा ऐसा करो अपने डैडी से पूछ लो।' मोहन की पत्नी ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोहन को इसकी आशा नहीं थी। मुन्नी दौड़ती हुई उसके पास गई और उसने पूछा, 'पापा मम्मी नहीं बता रही है। तुम बताओ न वह क्या होता है?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मुन्‍नी अपनी मम्मी से बाद में पूछ लेना। देखो मैं अभी कुछ पढ़ रहा हूँ।' मोहन ने बचने का प्रयत्न किया।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;'नहीं नहीं अभी बताओ।' मुन्नी ने जिद की और मोहन ने बताना आरंभ किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बेटा ऐसा होता है न कि ....' इसके आगे मोहन की समझ में नहीं आया कि वह क्या बोले। फिर साहस करके आगे कहा। 'ऐसा होता है न कि अस्पताल होता है जहॉं बच्चे पैदा होते हैं...।' इसके बाद उसने अस्पताल और उसकी बिल्डिंग का लंबा चौड़ा विवरण प्रस्तुत किया इस आशा से कि मुन्नी अपना प्रश्‍न भूल जाएगी। वह भूलती भला। उसने कहा 'पापा तुम ठीक नहीं बता रहे हो बताओ न वह क्या होता है?'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;'मुन्‍नी मुझे नहीं मालूम है।' मोहन ने हथियार डालते हुये कहा। उसे यह डर लगा हुआ था कि कहीं बड़ी लड़की भी न पहुँच जाय जो अभी टी वी देखने में व्यस्त थी।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम बुद्धू  हो और मम्मी भी बुद्धू है। मुझे मालूम है कि वह क्या होता है।' मुन्नी ने उछलते हुये कहा।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पत्‍नी रसोई से बाहर आ गई। दोनों ने एक स्वर में मुन्नी से पूछा, 'तुम क्या जानती हो उसके बारे में?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'उससे परिवार नियोजन होता है।' मुन्नी ने कहा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-7370281079517265320?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/7370281079517265320/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=7370281079517265320' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7370281079517265320'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7370281079517265320'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/11/blog-post_14.html' title='उसके बारे में'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-887341297743886775</id><published>2009-11-12T09:43:00.002+05:30</published><updated>2009-11-12T09:56:03.286+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>एक पल</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SvuOMASlFuI/AAAAAAAABs0/8-wfrk7jkTs/s1600-h/chunni_toon.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 298px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SvuOMASlFuI/AAAAAAAABs0/8-wfrk7jkTs/s320/chunni_toon.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5403068514848544482" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह नि:शब्द रात यह स्वच्छ चांदनी पेडों पर&lt;br /&gt;यह झींगुर का बोलना यह मेढक की टर्र टर्र&lt;br /&gt;शहर के कोलाहल से दूर  इस  गांव   में&lt;br /&gt;क्या  यह  स्वर्ग  उतरा  है  धरती   पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह तारों भरा आसमान यह मधुर मंद बयार&lt;br /&gt;हौले हौले से उडते ये तुम्हारे केश अपार&lt;br /&gt;यह चांदनी कितनी रहस्यमय लगती है तुम पर&lt;br /&gt;प्रिये टहरो, बैठ जाओ उस पत्थर पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह चंचल नयन तुम्हारे लिए एक मंद हास&lt;br /&gt;कर रहे शरारत होंठ बोलने का है कुछ प्रयास&lt;br /&gt;क्यों न  भूलें  भूत औ भविष्यत हम&lt;br /&gt;यही तो है पल इसी के लिए जींएं हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे तो मिलेंगे नित्य जीवन के झमेले&lt;br /&gt;कल तो आयेंगे छोटे बडे दुखों के मेले&lt;br /&gt;चलो बदल डालते हैं समय काल का विधान &lt;br /&gt;बनाते हैं एक आयु इसी पल को खींच तान&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मथुरा कलौनी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-887341297743886775?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/887341297743886775/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=887341297743886775' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/887341297743886775'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/887341297743886775'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/11/blog-post_12.html' title='एक पल'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SvuOMASlFuI/AAAAAAAABs0/8-wfrk7jkTs/s72-c/chunni_toon.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-9030696091886915239</id><published>2009-11-05T20:30:00.001+05:30</published><updated>2009-11-05T20:32:23.351+05:30</updated><title type='text'>अलोहा</title><content type='html'>कभी कभी अपराध बोध होता है कि मैंने बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा। अधिकतर सोच में पड़ जाता हूँ कि लिखूँ तो क्या लिखूँ। यह कंप्यूटर की देन है कि मुझे RSI व्याधि है। यानी देर तक कीबोर्ड प्रयोग करने पर मेरे हाथ में दर्द होने लगता है। मैं मन को सांत्वना दे लेता हूँ कि मुझे नहीं लिखने का बहाना ढ़ूँढ़ने की आवश्यकता नहीं है। अरे विषय मिल भी जाय तो क्या हुआ, टाइप तो नहीं कर पाऊँगा न! हाथ में दर्द जो होने लगेगा!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर पढ़ने में जो कोई बाधा नहीं। न सृजन की व्यथा, न RSI । तो साहब जब मुझे लिखना चाहिए और जब मैं लिखने के लिये समय निकालता हूँ तो लिखने से जान छुड़ाने के लिये मैं ब्लॉग पढ़ता हूँ। विशेष कर टिप्पणियाँ पढ़ने में मुझे बहुत आनंद आता है। मैंने पाया है कि अँंग्रजी ब्लागों में लोग रचना या विषय से अभिभूत हो कर टिप्पणी करते हैं या अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। हिन्दी ब्लॉगों के टिप्पणीकार थोड़ा हट कर हैं। अधिकांश तो रचना का एक अंश copy paste कर लिखते हैं 'बहुत खूब'। कुछ केवल 'बहुत बढ़िया' लिख कर खिसक लेते हैं।  यह 'बहुत खूब' या 'बहुत बढ़िया' बिल्ली के म्याऊँ जैसा है। पता ही नहीं चलता कि म्याऊँ में क्या छिपा है, प्यार, गुस्सा, तारीफ या गाली। बहुत  कुछ होनोलूलू के 'अलोहा' जैसा। पहले लगा कि वहाँ स्वागत में 'अलोहा' कहते हैं। पर शीघ्र ही पता चला कि आओ तो 'अलोहा', जाओ तो 'अलोहा', खाओ तो 'अलोहा' कुछ नहीं करो तब भी 'अलोहा'।&lt;br /&gt;ऐसे ही साहब मुझे हिन्दी ब्लॉगों की 'बहुत खूब' या 'बहुत बढ़िया' टिप्पणियाँ लगती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजे की बात यह है कि ये 'बहुत खूब' या 'बहुत बढ़िया' टिप्पणियाँ लिखने वाले प्राय: हिन्दी के हर ब्लॉग में मिल जाते हैं। ऐसा लगता है कि टिप्पणी लिखने वाला यह दृढ़ निश्चय कर कंप्यूटर खोलता है कि कल मैंने 175 टिप्पणियाँ दी थीं आज कमसेकम 200 टिप्पणियाँ तो अवश्य दूँगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप पूछेंगे कि ऐसी टिप्पणियाँ पढ़ने में मुझे क्या मनोरंजन मिलता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उन टिप्पणीकारों के नाम नोट कर रखे हैं। मुझे लगता है कि कहीं न कहीं ये टिप्पणीकार सजग हो जाते हैं कि भैया मैंने आज 50 जगह 'बहुत खूब' लिखा है और 55 जगह 'बहुत बढ़िया'। कहीं कोई पकड़ न ले या शायद थोड़ा अपराध बोध हो कि मैंने तो ब्लॉग पढ़ा ही नहीं और बिना पढ़े ही 'बहुत बढ़िया' टीप दिया तो वे copy paste 'बहुत बढ़िया'  या copy paste 'बहुत खूब' टीप मारते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं कि ऐसे टिप्पणीकार ब्लॉग पढ़ते ही नहीं। कभी कभी जल्दी में पढ़ भी लेते है। अब समझने का झंझट कौन उठाये। आज का टारगेट 200 टिप्पणियाँ जो हैं। तो साहब 'बहुत खूब' या 'बहुत बढ़िया से सेफ टिप्पणी और क्या हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे अच्छा खेल क्या हो सकता है कि आप अनुमान लगायें कि भैया इसने तो ब्लॉग पढ़ा है या केवल सरसरी निगाह से देखा है, या एकदम पढा ही नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलोहा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-9030696091886915239?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/9030696091886915239/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=9030696091886915239' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/9030696091886915239'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/9030696091886915239'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='अलोहा'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-3246100308663157325</id><published>2009-10-23T18:11:00.003+05:30</published><updated>2009-10-23T18:25:48.401+05:30</updated><title type='text'>परसनल स्पेस</title><content type='html'>तारा को लेने जा रही हो या मैं जाऊँ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तारा अब घर नहीं आना चाहती है। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने काल सेंटर ज्वाइन कर लिया है। कहती है जब घर ही नहीं है तो क्यों आऊँ। फिर वह हम दोनों में से किसी एक को चुनना नहीं चाहती है। मिलना है तो हमें ही जाना पड़ेगा उसके पास। वह नहीं आयेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने तो उसके सामने कभी ऐसा नहीं दिखाया कि हम अलग हो गये हैं। उसे मालूम न हो करके इसी घर में रह कर हम एक दूसरे तो झेलते रहे हैं। उसको कैसे पता चला?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारी दुनिया को मालूम हो गया है तो उसे क्यों नहीं मालूम होगा। फिर मत भूलो कि वह हमारी ही बेटी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह तो ठीक नहीं हुआ। मेरा जीवन तो नर्क बन ही गया है, पर मैं अपनी बच्ची पर कोई आँच नहीं आने देना चाहता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किस नर्क की बात कर रहे हो तुम। छुट्टे साँड़ की तरह तो शहर में घूम रहे हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सभ्य भाषा का प्रयोग करो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने सभ्य भाषा का ही प्रयोग किया था। असभ्य भाषा का प्रयोग करूँ तो तुम्हारी दुम उग आयेगी जिसे तुम अपनी टाँगों में दबा कर उछलने लगोगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखो तुम्हारी ऐसी ही कटु बातों से आज हम इस मुकाम पर पहुँचे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी मुकाम तक तो पहुँचना चाहते थे तुम। यही तो तुम्हारी मंजिल थी न। अब क्यों अफसोस कर रहे हो! याद है इस मुकाम तक पहुँचने के लिये तुमने क्या किया था? उस कुर्सी की एक टाँग तोड़ी थी। अभी तक अपनी टूटी टाँग ले कर एक कोने से लगी है बेचारी। हमारे रिश्ते की तरह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुर्सी का रोना क्या रो रही हो? अपनी भूल गई तुमने भी तो किचन के सारे बरतन तोड़े थे। मैं सँभालने गया तो मेरा सिर भी तोड़ दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीच में आओगे तो लगेगी ही। जानबूझ कर नहीं तोड़ा था। क्या कहा था  तुमने? अरे माडर्न बनो... आधुनिक बनो... आजकल क्या कहते हैं उसे, परसनल स्पेस का जमाना है... वह पुराना जमाना अब नहीं रहा कि एक दूसरे में घुसे चले जाओ। अब क्या हुआ!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने तो तुम्हारी भावना को शब्द दिये थे। तुमको ही चाहिए था यह परसनल स्पेस। क्या कहा था तुमने कि मैं तुमको घेरता हूँ और तुम्हारा दम घुटता है यहाँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो मिल गया न तुमको तुम्हारा परसनल स्पेस। कितना परसनल स्पेस चाहिए तुम्हें। तुम्हारे चारों ओर तो खाली खाली है। कोई तुम तक पहुँचना भी चाहे तो यह खाली परसनल स्पेस तय करने में महीनों लग जाएँगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारा परसनल स्पेस भी कम बड़ा नहीं है। मैं भी तो तुम तक पहुँचने के लिये पिछले छह महीनों से लगा हुआ हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बकवास मत करो। तुम छह महीनों तो अपना ही परसनल स्पेस पार नहीं कर पाओगे। अपनी खोह से बाहर निकलो तो मुझ तक पहुँचने की बात करना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक है। थोड़ा तुम चलो और थोड़ा मैं। हमारा मिलना जरूरी है। मैं नहीं चाहता कि मैं... हम अपनी बच्ची के सामने छोटे पड़ें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम नहीं मैं बोलो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक है मैं। मैं नहीं चाहता कि मैं तारा के सामने छोटा पड़ूँ। थोड़ा तुम अपने परसनल स्पेस से बाहर आओ। और थोड़ा मैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा कोई परसनल स्पेस नहीं है। यदि है भी तो इसमें तुम आराम से समा सकते हो। तारा तो पहले से ही यहाँ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक है तो मैं आऊँ फिर?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आ सकते हो पर जूते खोल कर बाहर ही रखना। माने तुम्हारा परसनल स्पेस।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-3246100308663157325?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/3246100308663157325/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=3246100308663157325' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/3246100308663157325'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/3246100308663157325'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='परसनल स्पेस'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-4916570141613908688</id><published>2009-08-31T12:35:00.007+05:30</published><updated>2009-08-31T12:47:16.844+05:30</updated><title type='text'>मेरी खिड़की से</title><content type='html'>तीन साल पहले जब मैं अपने नये फ्लैट में शिफ्ट हुआ तो खिड़की से यह दृश्य देखा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Spt28l0MhbI/AAAAAAAABoY/sD36HlAy7iw/s1600-h/DSC02221.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Spt28l0MhbI/AAAAAAAABoY/sD36HlAy7iw/s320/DSC02221.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5376021363512083890" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भले ही बेंगलोर को उद्यानों का शहर कहते हैं पर खिड़की से झाँकने पर ऐसे दृश्य बहुत कम ही देखने को मिलते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Spt2zya7zWI/AAAAAAAABoQ/fC0hNpsRFfo/s1600-h/DSC02217.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Spt2zya7zWI/AAAAAAAABoQ/fC0hNpsRFfo/s320/DSC02217.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5376021212276968802" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे मनोरम बाग को देख कर दिल बाग-बाग हो गया था। सुबह पक्षियों के कलरव के साथ उठता था। बड़े पेड़ पर बंदरों का एक परिवार रहता था। उनकी दिनचर्या देखने का घंटों तक आनंद उठाया जा सकता था। फिर गिलहरियों का खेल। कैसे पेड़ की एक फुनगी से दूसरी में कूदती थीं। यह तब की बात थी।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;वे आये थे कुल्हाड़े और मोटराइज्ड आरे लेकर। एक दिन में सारे पेड़ गिरा दिये। सारे झाड़ काट डाले। उस दिन बहुत ही दुखी मन से सोने गया था। सुबह पक्षियों का कलरव नहीं था। आर्तनाद था। पता नहीं कितने घोंसले उजड़े थे।  बंदरों का परिवार पता नहीं कहाँ चला गया।  एक हफ्ते तक वे ट्रकों में लकड़ियाँ भर कर ले जाते रहे। उस जगह प्रकृति का निर्मम बलात्कार हुआ था। एक गिलहरी की लाश दिखाई पड़ रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Spt3XWL1qtI/AAAAAAAABog/UP928tqbie0/s1600-h/DSC04495.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Spt3XWL1qtI/AAAAAAAABog/UP928tqbie0/s320/DSC04495.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5376021823172750034" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज का दृश्य देखिये। पेड़ तो आरे से काट डाले गये थे। पर दूर और गहरी फैली हुई जड़ें तो खोद खोद कर ही निकालनी पड़ रही हैं। ऐसा लगता है किसी जानवर की लाश ऊपर गिद्ध पिले हुए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Spt3ez0TpyI/AAAAAAAABoo/mzFDSYJk_Ew/s1600-h/DSC04493.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Spt3ez0TpyI/AAAAAAAABoo/mzFDSYJk_Ew/s320/DSC04493.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5376021951386199842" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-4916570141613908688?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/4916570141613908688/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=4916570141613908688' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/4916570141613908688'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/4916570141613908688'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/08/blog-post_31.html' title='मेरी खिड़की से'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Spt28l0MhbI/AAAAAAAABoY/sD36HlAy7iw/s72-c/DSC02221.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-7603531780795811520</id><published>2009-08-08T21:49:00.021+05:30</published><updated>2009-08-10T12:27:40.322+05:30</updated><title type='text'>अभी अभी पहाड़ से लौटा हूँ।</title><content type='html'>अभी अभी पहाड़ से लौटा हूँ। &lt;br /&gt;एक नया गॉव देखा हड़तोला। भुवाली से कार से डेढ़ घंटे की चढ़ाई है। खूब बारिश हो रही थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn2qQyowVgI/AAAAAAAABmw/R69S97hvzug/s1600-h/DSC04185.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn2qQyowVgI/AAAAAAAABmw/R69S97hvzug/s320/DSC04185.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5367633536342840834" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहाड़ों पर बरसात&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn2qfHUN9II/AAAAAAAABm4/pyss64vHG4Q/s1600-h/DSC04202.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn2qfHUN9II/AAAAAAAABm4/pyss64vHG4Q/s320/DSC04202.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5367633782412014722" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बरसात बंद होने के बाद निखरा सौंदर्य&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn-2ZDEmaVI/AAAAAAAABnI/Z-4KslHd-i0/s1600-h/DSC04213.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn-2ZDEmaVI/AAAAAAAABnI/Z-4KslHd-i0/s320/DSC04213.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5368209822286506322" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिधर देखो फलों के बाग है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn-5Ny-E0mI/AAAAAAAABnQ/50-FRIhxvGA/s1600-h/DSC04220.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn-5Ny-E0mI/AAAAAAAABnQ/50-FRIhxvGA/s320/DSC04220.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5368212927520494178" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हड़तोला से पिथेरागढ़ गये। अल्‍मोड़ा के पास भांग के झाड़ मिले। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि भांग के पत्‍तों की पकोडि़यॉं भांग के सकारात्‍मक गुणों के साथ बहुत ही स्‍वादिष्‍ट होती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिथौरागढ़ से &lt;a href="http://www.facebook.com/home.php#/video/video.php?v=1189039801511&amp;ref=mf"&gt;वीर्थी जलप्रपात &lt;/a&gt;देखते हुए हम मुन्‍स्‍यारी गये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुन्‍स्‍यारी से पंचचूली का दृश्‍य&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn-5qvArWfI/AAAAAAAABnY/eKKXdsEOPDE/s1600-h/DSC04326.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn-5qvArWfI/AAAAAAAABnY/eKKXdsEOPDE/s320/DSC04326.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5368213424673872370" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम को जब बादल छाए हुए थे&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn-5yjrfKiI/AAAAAAAABng/3MVcnkagX7g/s1600-h/DSC04337.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn-5yjrfKiI/AAAAAAAABng/3MVcnkagX7g/s320/DSC04337.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5368213559071156770" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक घस्‍यारन&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn_BJkRc0PI/AAAAAAAABno/8ujOxEvVw_Q/s1600-h/DSC04366.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn_BJkRc0PI/AAAAAAAABno/8ujOxEvVw_Q/s320/DSC04366.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5368221650948772082" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn_DK1WEXaI/AAAAAAAABnw/YVT9TetjRmc/s1600-h/DSC04258.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn_DK1WEXaI/AAAAAAAABnw/YVT9TetjRmc/s320/DSC04258.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5368223871734668706" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-7603531780795811520?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/7603531780795811520/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=7603531780795811520' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7603531780795811520'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7603531780795811520'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/08/blog-post_08.html' title='अभी अभी पहाड़ से लौटा हूँ।'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sn2qQyowVgI/AAAAAAAABmw/R69S97hvzug/s72-c/DSC04185.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-6317508080623509577</id><published>2009-08-07T14:04:00.002+05:30</published><updated>2009-08-07T14:09:28.335+05:30</updated><title type='text'>वह एक आवारा कुत्ता था।</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SnvnXguF6PI/AAAAAAAABmY/Sxkru9NrYM0/s1600-h/village_dog_small.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SnvnXguF6PI/AAAAAAAABmY/Sxkru9NrYM0/s320/village_dog_small.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5367137772048345330" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं तहसील के बाहर पत्थर पर बैठा इंतजार कर रहा था। वह मंथर गति से शाही चाल चलता हुआ मेरे पास आया। अपनी पनीली आँखों से मुझे देखने लगा मानो कह रहा हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कुछ खिलाना-वाना है तो बोलो। नहीं तो मैं चलता हूँ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे उसका यह एटिच्यूड भा गया। मुझे भी भूख लग ही रही थी। पास की दुकान से पूरी-भाजी के दो पत्तल लिये। एक अपने लिए और दूसरा उसके लिए। उसके सामने पत्तल परोसा। उसने पहले मेरी ओर देखा और फिर खाने पर ध्यान दिया। खाने के बाद वह अपनी राह चला और मैं अपनी राह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो दिन यही कार्यक्रम चला। तीसरे दिन भी वह आया। चाल मतवाली थी। मेरे पास आते-आते वह लड़खड़ाया और गिर गया। उसके जबड़े भिंच गये थे। वह अप्राकृतिक रूप से बहुत जल्दी-जल्दी साँस लेने लगा। साँस लेने में उसे कष्ट हो रहा था। &lt;br /&gt;'लगता है इसको लकवा मार गया है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अरे कोई इसे अस्पताल ले जाओ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'इसके मुँह में पानी डालो।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी ने उसके मुँह के ऊपर एक गिलास से पानी डाला। वह उठ खड़ा हुआ। फिर लड़खड़ा कर गिर पड़ा। तभी तहसील के अंदर मेरा नाम पुकारा गया और मैं अंदर चला गया। लगभग एक  घंटे के बाद बाहर आया तो वह उसकी साँसें बंद हो चुकी थीं। उसके मुँह के ऊपर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक साधारण सी घटना है। गली का कुत्ता था, मर गया। पर मैं भुला नहीं पा रहा हूँ। उसका छरहरा बदन, उसकी वह चाल, उसका उन अभेद्य पनीली आँखों से मुझे देखना। संक्षिप्त ही सही, कहीं तो कोई अपरिभाषित संपर्क सूत्र था हम दोनों के बीच। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह एक आवारा कुता था।&lt;br /&gt;आवारगी का अपना रोमांच है, अपना रोमांस है। आदमियों की बात करें तो आवारगी की पराकाष्ठा अकबर इलाहाबादी के इस शेर में निहित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुए इस कदर मुहज्ज़ब, कभी घर का मुँह न देखा&lt;br /&gt;कटी उम्र होटलों में, मरे तो अस्पताल जा कर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस कुत्ते की बात करें तो मानो वह कह रहा हो&lt;br /&gt;न रहे हम कभी किसी के, न कोई हमारा।&lt;br /&gt;तुम्हें ही मुबारक अब ये गली ये चौवारा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(मुहज्ज़ब - सभ्य)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-6317508080623509577?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/6317508080623509577/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=6317508080623509577' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/6317508080623509577'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/6317508080623509577'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='वह एक आवारा कुत्ता था।'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SnvnXguF6PI/AAAAAAAABmY/Sxkru9NrYM0/s72-c/village_dog_small.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-4322595718616963709</id><published>2009-07-12T10:25:00.004+05:30</published><updated>2009-07-12T10:38:01.892+05:30</updated><title type='text'>सब कुछ ठीक ठाक है - दूसरा और अंतिम भाग</title><content type='html'>चौथे दिन चंद्रिका ने मुझे विक्टोरिया मेमोरियल बुलाया। अनिच्छित मन से, और भारी कदमो से वहाँ पहुँचा। चंद्रिका पहले ही पहुँच चुकी थी। गंभीर तो वह सदा ही रहती थी।  उस समय साधारण से अधिक गंभीर लग रही थी। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;'प्रताप मैं तुमसे एक बात कहना चाहती हूँ पर तुम्हें दुख होगा। इसलिये समझ में नहीं आ रहा है कि कैसे कहूँ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बस कह डालो।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम मेरे मित्र हो..।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'इस भूमिका की कोई आवश्यकता नहीं है चंद्रिका। बात क्या है?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हें दुख होगा प्रताप।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बात तो बताओ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'उस दिन जब तुमने शादी की बात की थी तब से मैं इस बारे में गंभीरता से सोच रही हूँ। प्रताप, हम दोनों की प्रकृति एकदम भिन्न है। यह शादी करके हम भूल ही करेंगे। क्या.. क्या हम दोनों मित्र ही नहीं रह सकते'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं भी तो यही चाहता था। चलो यह तो अच्छा हुआ कि चंद्रिका भी नहीं चाहती कि हम दोनों की शादी हो। मुझे सोच में पड़ा देख कर चंद्रिका ने कहा था, 'मुझे मालूम है कि तुम्हें दुख होगा... पर...'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं नहीं चंद्रिका तुम नहीं चाहती तो यह शादी नहीं होगी।' मैंने कहा था। मैंने मौके का एक फिल्मी डायलॉग भी जड़ दिया था, ' तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंद्रिका इस भ्रम में थी कि उसकी ना से मुझे बहुत दुख पहुँचा है। मैंने उसके इस भ्रम को बने रहने दिया था। हाँ, उसकी ना ने मेरे अहम् को ठेस अवश्य पहुँचाई थी। जो हो, हम दोनों अनचाहे बंधन में बँधने से बच गये थे।&lt;br /&gt;घर में शादी की बात उठी तो मैंने  चंद्रिका के साथ अपनी इस संबंध में हुई बातों का अक्षरश: वर्णन कर दिया। दानों घरों में उठी आँधी का सामना चंद्रिका को अकेले करने दिया। बाद में पिताजी मुझे दोषी ठहराने लगे थे। पर उस समय तो आँधी निकल गई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस घटना को चार साल हो गये हैं। चंद्रिका और मेरा मिलना वैसे ही कम हो गया था। इस घटना के बाद तो और भी कम हो गया था। बस तीन या चार बार ही हमलोग मिल पाये थे वह भी बहुत औपचारिक रूप से। अब तक न चंद्रिका की शादी हुई थी न मेरी। मेरी शादी इसलिये नहीं हुई थी कि एक तो मेरा ध्यान और कई विषयों में बँट गया था और दूसरे मेरे दायरे में जितनी लड़कियाँ आईं किसी में कुछ ऐसा नहीं देखा कि शादी के लिए हायतौबा मचाता। चंद्रिका की शादी क्यों नहीं हुई मुझे नहीं मालूम। उसकी भी शायद मेरी जैसी स्थिति हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SlltwIljZeI/AAAAAAAABM8/52tRSxaQLgo/s1600-h/steam_train__esk_valley.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SlltwIljZeI/AAAAAAAABM8/52tRSxaQLgo/s320/steam_train__esk_valley.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5357433905440056802" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंदनी में पहले जब भी आया बस दो दिनों से अधिक नहीं रुका था। इस बार माँ और पिताजी की शिकायत दूर करने के लिये मैं लंबी छुट्टी ले कर घर आया था। तीसरे दिन ही मुझे लगा कि चंदनी में समय बिताना बहुत ही टेढ़ी खीर हे। यहाँ आने से पहले समय कैसे बिताया जाता है इसका बाकायदा प्रशिक्षण ले लेना चाहिये। पहला दिन तो मातापिता से मिलने में बिताया। दूसरे दिन चंद्रिका के पिता कृष्णकुमार जी आदि से मिला। तीसरे दिन बस सामने सड़क और पीछे रेललाइन, इन दोनों को छोड़ कर मनोरंजन का और साधन नजर नहीं आया। शाम को कृष्णकुमार जी ने बताया कि चंद्रिका भी चंदनी आने वाली है तो मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई।  उस घटना के बाद मुझे चंद्रिका का सामना करने में थोड़ी झिझक होती है। हालाँकि शादी के लिये मना चंद्रिका ने किया था पर मुझमें एक ऐसी अपराध भावना आ गई है जो मुझे सहज नहीं होने देती है। तो आप पूछ सकते हें कि चंद्रिका के आने का समाचार सुन कर मुझे प्रसन्नता क्यों हुई। आप चंदनी में तीन चार दिन रहिये तो आपको उत्तर स्वयं मिल जायेगा। इस बोरियत के सामने कोई भी अपराध भावना नहीं ठहर सकती। फिर चंद्रिका के साथ वर्तमान जैसा भी हो बचपन तो उसी के साथ कटा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसको लेने बस अड्डे मैं ही गया था। मुझे देख कर उसने आश्चर्य प्रकट किया। मुस्कराई। पर प्रसन्न हुई या नहीं मैं नहीं कह पाया। रास्ते में केवल औपचारिक बातें ही हुईं। उसके घर की, मेरे घर की, बस। अगले दिन सुबह सुबह ही मैं उसके घर पहुँच गया। वह कोई पत्रिका पढ़ रही थी। मुझे देख कर उसने पत्रिका रख दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अकेली हो ?' मैंने पूछा। घर में कोई नहीं दिख रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ माँ पता नहीं कहाँ गई है। पिताजी हाट गये हैं।' उसने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्या करने का इरादा है आज तुम्हारा।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कुछ विशेष नहीं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बड़ी बोर जगह है यह।' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'यहाँ शहर का वातावरण खोजना बेवकूफी है। मैं यहाँ अपने लिखने पढ़ने का पूरा सामान ले कर आई हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर बात का उसके पास काट था, हमेशा की तरह। मजे की बात यह कि वह बात बात में मुझे बेवकुफ भी कह गई। खैर मैंने उसकी बात का बुरा नहीं माना। इस तरह की चोटें तो हमदोनों के बीच चलती रहती थीं। और मैंने चाहा भी यही है कि हमदोनों के बीच का समीकरण न बदले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मुझे नहीं मालूम था कि तुम यहाँ मिलोगे नहीं तो मैं तुम्हारे लिये भी कुछ पुस्तकें उठा लाती।' उसने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अच्छा किया नहीं लाई। तुम्हारी दी हुई पुस्तकें मेरे पास बहुत हैं। उन्हें पढ़ने के लिये रुचि उत्पन्न करना मेरे लिये कठिन कार्य है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मुझे तुम्हारी रुचि मालूम है। मैं सूरज के उपन्यासों की बात कर रही थी।' उसके होंठों में हल्की स्मित रेखा खिंची हुई थी। मेरी और उसकी आँखें चार हुईं तो दोनों ठठा कर हँस पड़े। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह हँसी हम दोनों के बीच सहजता ले आई। थोड़ी देर और बैठ कर मैं वहाँ से चला आया। शाम हुई तो मैंने छत पर एक बड़ा सा गद्दा और गावतकिये लगा दिये। वहीं गद्दे में अधलेटा हो कर मैं आसपास के दृश्य का आनंद उठाने लगा। चांदनी छिटक आई। दूर घरों में बत्तियाँ टिमटिमाने लगीं। माँ ओर पिताजी भी वहीं चले आये और हमलोग पारिवारिक बातचीत में व्यस्त हो गये। माँ ने मेरी शादी का विषय उठाना चाहा पर मैंने उठाने नहीं दिया। नीचे आहट हुई। माँ देखने के लिये नीचे उतरी और वहीं से आवाज दी कि चंद्रिका आई है। मैंने कहा उसे ऊपर ही भेज दो। तुमलोग बैठो कह कर पिताजी भी नीचे चले गये। मैं चंद्रिका के बारे में सोचने लगा। बड़ी पढ़ाकू बनती है, कितना पढ़ेगी आखिर।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sllubl51DoI/AAAAAAAABNE/ehCLXtpHc-Y/s1600-h/moon.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 203px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sllubl51DoI/AAAAAAAABNE/ehCLXtpHc-Y/s320/moon.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5357434652044103298" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंद्रिका छत पर आई। सफेद सलवार कमीज में थी, डिटर्जेंट टिकिया का विज्ञापन बनी हुई। भली लग रही थी। मैंने बैठने के लिये कहा। वह पास ही एक गावतकिया लगा कर घुटने मोड़ कर बैठ गई। बहुत देर तक न वह बोली और न मैं बोला। जब चुप्पी भारी पड़ने लगी तो मैंने उसकी ओर देखा। वह मुझे ही निहार रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगह का नाम चंदनी हो, स्थान एकांत छत हो, चंद्रमा की चाँदनी छिटकी हुई हो, लड़की का नाम भी चंद्रिका हो और वह चाँदनी से उजले कपड़े पहने हुए हो, ऊपर से बचपन की मित्र भी हो तो किसी घटन-अघटन की आशंका करनी चाहिये।&lt;br /&gt;पहले हम दोनों की टकटकी बँधी और फिर पलक झपकते ही हम एक दूसरे की बाँहों में समा गये। आलिंगन के आवेश में साँसें अवरुद्ध होने लगीं। भावावेश के बावजूद मैंने पाया कि मेरा चेतन मस्तिष्क काम कर रहा है और इस प्रश्न का हल ढ़ूँढ़ रहा है कि जब हम दोनों के बीच प्रणय नहीं है तो ऐसा क्या अव्यक्त रह गया है जिसकी अभिव्यक्ति इस समय इस आलिंगनपास से हो रही है। आवेश की अवधि समाप्त हुई, चंद्रिका तीव्रता से उठ कर छत की मुँडेर के पास चली गई। इसी समय अँधेरे को चीरती हुई रेल गाड़ी आई और एक झाँंकी दिखला कर चली गई। फिर चुप्पी। मैंने पुकारा 'चंद्रिका', पर वह बिना उत्तर दिये वहाँ से चली गई। मैं उठ कर मुँडेर के पास गया ओर अपने घर की ओर जाते हुये उसे देखता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं सोचने लगा कि यह मैंने क्या कर डाला। चंद्रिका को भावना में बहने का अधिकार है। एक तो वह लड़की है, दूसरे वह यह धारणा पाले हुई है कि शादी के लिये मना कर उसने मुझे बहुत दुख पहुँचाया है, तीसरे अकेलेपन से शायद वह बहुत घबड़ा गई हो और चौथे शायद बचपन का प्यार उमड़ आया हो। उसके लिये इनमें से कोई भी एक कारण भावना में बहने के लिये पर्याप्त है। पर मुझे तो होश में रहना चाहिये था। क्या पता यह क्षणिक आवेश मुझे महँगा पड़े। अब यदि चंद्रिका शादी का प्रस्ताव रखे तो मैं कभी मना नहीं कर पाऊँगा।&lt;br /&gt;देर रात तक मैं सो नहीं पाया। सुबह सुबह आँख लगी तो सपने में क्या देखता हूँ कि चंद्रिका एक बेंत गोद में रखे आराम कुर्सी  में डोल रही है और मुझसे मनोविज्ञान की एक मोटी पुस्तक के अध्याय तीन से प्रश्न पूछ रही है। उत्तर सही न होने पर दो बेंत मार पड़ेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घबड़ा कर उठ बैठा। अपने सपने पर मुझे हँसी आ गई।&lt;br /&gt;आज मेरा मन नहीं किया कि मैं चंद्रिका का सामना करूँ। इसलिये शारदा नदी में मछली पकड़ने का प्रोग्राम बनाया। इस उद्देश्य से मैं पिताजी का फिशिंग राड निकाल कर ठीक कर रहा था कि वहीं चंद्रिका आ पहुँची। उसकी बड़ी बड़ी आँखों में तैरते लाल डोरों से पता चला कि वह रात में ठीक से सोई नहीं। आते ही उसने कहा, 'प्रताप चलो कहीं बाहर चलते हैं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं शारदा में मछली पकड़ने जा रहा हूँ, वहाँ चलना है ?'&lt;br /&gt;चंद्रिका ने स्वीकृति में सिर हिलाया।&lt;br /&gt;नदी किनारे उचित जगह देख कर मैंने दरी बिछाई। चंद्रिका को बैठने के लिये कहा। मैंने काँटे में चारा फँसाया। लाइन पानी में डाली और रॉड लेकर चंद्रिका के पास बैठ गया। मैं क्या देखता हूँ कि चंद्रिका अनमनी सी बैठी है जैसे उसके मन में कोई बोझ हो। उसके माथे में पसीने की बूँदें हैं। पैदल चलने के श्रम से साँस थोड़ी तेज है। उसको उस हालत में देख कर मैंने निर्णय लिया कि चाहे कुछ हो जाय मैं इस लड़की को कभी दुख नहीं पहुँचाऊँगा। मेरे ऊपर इतना हक तो उसका बनता ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'प्रताप, कल के अपने व्यवहार के लिये मैं शर्मिन्दा हूँ।' उसने नदी की ओर देखते हुये कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'गलती मेरी भी है।' मैंने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद हमदोनों बहुत देर तक चुप रहे। वह अपने ख्यालों में और मैं अपने। एक छोटी मछली हाथ आई। मैंने चारा फँसा कर लाइन को फिर पानी में डाल दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'प्रताप, इतना कष्ट करके मछली मिली भी तो इतनी छोटी। हाट से क्यों नहीं खरीद लेते। पिता जी कह रहे थे कि मछलियाँ बहुत सस्ती हैं यहाँ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम बोर हो रही हो ? '&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;' नहीं तो।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बाजार से तो हर कोई खरीद लेता हैे पर अपनी पकड़ी हुई मछली का स्वाद ही अलग होता है। कहने का अर्थ यह कि जो चीज बाजार में आसानी से मिल जाती हो उसकी कद्र नहीं होती। फिर एकांत चाहिये हो या अपने में ही डूबे रहने की इच्छा हो तो इससे अच्छी दूसरी जगह नहीं हो सकती।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'शायद तुम ठीक कह रही हो।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हें तो मालूम होना चाहिये। तुम मनोविज्ञान आदि का बहुत अध्ययन करती हो।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर में चंद्रिका ने कुछ नहीं कहा। केवल पानी की ओर देखती रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कल से तुम में कुछ परिवर्तन देख रहा हूँ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कैसा परिवर्तन ? कल की बात कर रहे हो?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नहीं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'फिर ? '&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हें मालूम है मैं क्या कह रहा हूँ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'शायद। तुम ठीक ही कह रहे हो। कल मेरे अंदर का छुपा हुआ कुछ बाहर आ गया था। हर समय तो तन के नहीं खड़ा रहा जा सकता है न प्रताप।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ यही बात है। मुझे कभी अच्छी नहीं लगी तुम्हारी यह बात। मैं तुम्हारा बालसखा हूँ। मेरे सामने तनने की  तुमको क्या आवश्यकता आन पड़ी! अरे मेरे सामने ढीली नहीं होओगी तो किसके सामने होओगी ? '&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर वही चुप्पी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मुझसे शादी करोगी चंद्रिका?' अपने इस प्रश्न पर मैं स्वयं ही चौंक पड़ा। पता नहीं मन के किस कोने में दबी हुई थी यह भावना जो अभी चंद्रिका के सामने शब्दों में परिणत हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ प्रताप।' चंद्रिका ने कहा। वह मेरे पास खिसक आई और मेरे कंधे में सिर रख दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके उत्तर से अधिक आश्चर्य नहीं हुआ मुझे। प्रश्न पूछने के बाद मैं जैसी आशा कर रहा था वैसा ही हुआ। मैंने चंद्रिका को अपनी बाईं बॉह के घेरे में ले लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम मित्र से पति-पत्नी बने। चंद्रिका अब भी अध्ययनशील है। अब भी मोटी मोटी किताबें पढ़ती है और मेरे अध्ययनशील न होने पर मुझे टोकती रहती है। पर सब कुछ ठीक ठाक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाप्‍त                                                                         &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक उवाच&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक जमाना था जब हम जवाँ थे, एक जमाना यह है जब कहना पड़ रहा है कि हम अब भी जवाँ हैं। फर्क इतना है कि तब दिल से सोचते थे और अब थोड़ा बहुत दिमाग से भी सोच लेते हैं। &lt;br /&gt;प्यार तब भी अपरिभाषित था और आज भी अपरिभाषित ही है। इसमें दिमागी सोच कम ही काम करती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़ालिब कह गये हैं -&lt;br /&gt;'यह आग का दरिया है..'&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सामरसेट माम कह गये हैं&lt;br /&gt;'प्यार के मामले में तटस्थ मत रहो..'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यार में दो पहलुओं में मैंने दो कहानियाँ लिखी हैं। दोनों कहानियाँ काल्पनिक हैं पर कपोल काल्पनिक नहीं। एक तो अभी आपने पढ़ी। दूसरी कुछ दिनों बाद। टंकित करने का झमेला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मथुरा कलौनी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-4322595718616963709?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/4322595718616963709/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=4322595718616963709' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/4322595718616963709'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/4322595718616963709'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/07/blog-post_12.html' title='सब कुछ ठीक ठाक है - दूसरा और अंतिम भाग'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SlltwIljZeI/AAAAAAAABM8/52tRSxaQLgo/s72-c/steam_train__esk_valley.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-7388401277228305609</id><published>2009-07-09T19:23:00.003+05:30</published><updated>2009-07-09T19:43:00.357+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>सब कुछ ठीक ठाक है</title><content type='html'>अवकाश प्राप्त करने के बाद पिताजी गाँव चंदनी में बस गये हैं। बीस बीघा जमीन है। जमीन के बीचोबीच आरामदेह और सुरुचिपूर्ण मकान बनाया है। दाहिने और बाएँ पड़ोस में उनके मित्र बसे हुए हैं।  यारदोस्त अच्छे हें। पेन्शन है। बैंक में अच्छा बैलेन्स है। मतलब पिताजी सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे हैं। हाँ, एक दुख उनको अवश्य है। उन्हीं के शब्दों में उनका इकलौता लड़का नालायक निकला। यह बात और हैे कि मैं कितना ही लायक क्यों न बनूँ उनकी दृष्टि में सदा नालायक ही रहूँगा। मुझे नालायक सिद्ध करने के लिए उनके पास सैंकड़ों उदाहरण हैं। पर एक बात वह विशेष जोर दे कर कहते हैं, वह यह कि चंद्रिका जैसी रूपवान और बुद्धिवान लड़की से मैंने शादी नहीं की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रूप और बुद्धि के साथ चंद्रिका में एक और गुण यह है कि वह पिता जी के अभिन्न मित्र कृष्णकुमार जी की सुपुत्री है। चंदनी में दाहिने पड़ोस में कृष्णकुमार जी ही रहते हैं। कलकत्ते में भी हमारे दोनों परिवार साथ ही रहते थे। दोनों परिवारों के बड़े चाहते थे कि चंद्रिका और मेरी शादी हो जाय। छुटपन में तो यह एक दूसरे को चिढ़ाने का विषय था। बड़े हुए तो वह अपने रास्ते लगी और मैं अपने। वह अपने पहले से ही बड़े मस्तिष्क में अधिक से अधिक ज्ञान भरने की चिंता में लगी और मैं रोजी रोटी की चिंता में। इस दौर हमारा मिलना भी बहुत कम हो गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे अच्छी नौकरी मिल गई और जीवन स्थिर हुआ तो घरवालों ने तिकतिक लगानी शुरू की कि बच्चू अब शादी कर लो, चंद्रिका तुम्हारे लिए बैठी नहीं रहेगी, इत्यादि। तब मैंने सोचा हर्ज ही क्या है। विचार करने पर यह विचार मुझे पसंद आने लगा कि मेरी शादी अब हो ही जानी चाहिये। शुभकार्य आरंभ करने के लिए मैंने चंद्रिका को फोन किया। चूँकि मामला व्यक्तिगत था इसलिए घर से दूर विक्टोरिया मेमोरियल में मिलने का प्लान बनाया। &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SlX3M4Tg4aI/AAAAAAAABMs/ic9f34jWidU/s1600-h/vic+memo.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 248px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SlX3M4Tg4aI/AAAAAAAABMs/ic9f34jWidU/s320/vic+memo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5356459132471796130" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;ठीक समय पर चंद्रिका आई। उसे देख कर मुझे लगा कि इस बीच हम दोनों कितने कम मिले थे। सबसे पहली चीज मैंने लक्ष्य की वह चंद्रिका का चश्मा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुमने चश्मा कब से लगाना शुरू कर दिया?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बहुत दिन हो गए।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बताया भी नहीं!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'इसमें बताने लायक कौन सी बात है!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सचमुच बताने योग्य कोई बात नहीं थी। मैंने चंद्रिका को बुला तो लिया था पर असल विषय को छेड़ने में मुझे घबराहट हो रहीं थी। हालाँकि पहले कोई भी ऐसी बात नहीं होती थी जिस पर मैं चंद्रिका से सहजता से बात नहीं कर सकता था। युवावस्था ने विशेष कर चंद्रिका की युवावस्था ने हमारे बीच की सहजता समाप्त कर दी थी।  फिर पता नहीं क्यों वह चश्मा बहुत आड़े आ रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम्हारी परीक्षा कब है?' मैंने पूछा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कौन सी परीक्षा?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'एम. ए. की।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कहॉ रहते हो? एम.ए. तो मैंने पिछले साल ही पास कर लिया था।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'पर तुम्हारे पिता जी तो कह रहे थे कि तुम अध्ययन में बहुत व्यस्त रहती हो।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ आजकल मैं जीवविज्ञान पर व्यक्तिगत रूप से अध्ययन कर रही हूँ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'एम.ए. में तो तुम्हारा विषय मनोविज्ञान था।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ। '&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तो अब जीवविज्ञान क्यों?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जीव विज्ञान क्यों नहीं?' उसने अपने चश्मों के पीछे से विचित्र भाव से मुझे देखा था। मानो वह अपने जीवविज्ञान के ज्ञान का प्रयोग मुझ पर कर रही हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम क्या कर रहे हो आजकल?' अब उसके पूछने की बारी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नौकरी कर रहा हूँ। मैंने कुछ दिन पहले तुमको बताया तो था।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ, मुझे मालूम है। मेरे कहने का मतलब था नौकरी के अलावा क्या कर रहे हो?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'नौकरी के अलावा!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मेरा मतलब अध्ययन आदि था।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'ओ अध्ययन! उससे तो मैंने छुटकारा पा लिया है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उसे अपनी ओर फिर उसी विचित्र भाव से देखते हुए पाया था। तब मुझे याद आया कि अध्ययन पर उसके विचार क्या हैं। 'खाली समय में कुछ पढ़ लेता हूँ।' मैंने बड़बड़ा कर कहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'आजकल क्या पढ़ रहे हो?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'आजकल सूरज का एक उपन्यास...'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सूरज?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मेरा मतलब था सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।' मैंने जल्दी से कहा था। इससे पहले कि अध्ययन पर हमारी बहस छिड़े मैंने असल मुद्दे में बात कर लेना उचित समझा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'चंद्रिका।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बोलो।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैंने तुम्हें एक विशेष बात करने के लिए बुलाया है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मुझे मालूम है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मालूम है! कैसे मालूम है?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सीधी सी बात है प्रताप। तुमने मुझे घर न बुला कर इतनी दूर यहाँ बुलाया है। और आजकल हम दोनों के घरों में में जो बात हो रही है उसे छोड़ कर और क्या बात हो सकती है?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'चलो तुमने बात आसान कर दी। तो क्या कहती हो, हम अपने माँ बाप को प्रसन्न कर दें?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी बात सुन कर वह खिलखिला कर हँसने लगी थी। मुझे बुरा लगा था। 'इसमें हँसने की कौन की बात है?' मैंने पूछा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हँसने की ही तो बात है। ऐसा कह कर शायद ही किसी ने आज तक किसी लड़की का हाथ माँगा होगा।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तो क्या हुआ, थोड़ा अनूठापन ही सही।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'प्रताप क्या तुम अपने माँबाप को प्रसन्न करने के लिए शादी कर रहे हो?' अब वह थोेड़ी संजीदा हो गई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैं भी प्रसन्न होऊँगा। अब यह भी बताना पड़ेगा?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद वह थोड़ी देर तक कुछ नहीं बोली थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'क्या सोच रही हो?' मैंने पूछा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सोच रही थी कि हमारा वैवाहिक जीवन कैसा रहेगा।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कैसा रहेगा माने? अच्छा रहेगा।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम अध्ययन में विश्वास नहीं रखते हो।' उसके लहजे में शिकायत थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तो क्या हुआ। आवश्यकता पड़ी तो  थोड़ा बहुत अध्ययन मैं भी कर लिया करूँगा।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम मेरी जीवनशैली में बाधा तो नहीं डालोगे?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मेरा अपमान मत करो, चंद्रिका। तुम मुझे बचपन से जानती हो। उल्टा सीधा सोचना बंद करो। हमारे बड़े यही चाहते है कि हम दोनों शादी कर लें। अब मैं तुमसे पूछता हूँ कि क्या तुम मुझसे शादी करोगी ?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ प्रताप।' उसने कहा था और मेरा हाथ थाम लिया था।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SlX6XqWKLJI/AAAAAAAABM0/jmgwa2B1z3U/s1600-h/eyeglasses_2057_136530651.gif"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 130px; height: 130px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SlX6XqWKLJI/AAAAAAAABM0/jmgwa2B1z3U/s320/eyeglasses_2057_136530651.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5356462616238238866" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे प्रसन्न होना चाहिए था कि एक सुंदर और सुशिक्षित कन्या से मेरी शादी तय हो गई है। पर नहीं। उस दिन घर लौटा तो मन में सब कुछ उलझा उलझा था। पहले इस संबंध में गहराई से सोचा नहीं था और अब कोई छोर पकड़ में नहीं आ रहा था।  ऊँट किसी करवट सीधा नहीं बैठ रहा था। लगता था कोई बहुत बड़ी मूर्खता कर डाली थी मैंने। मनोविज्ञान में एम.ए.। जीवविज्ञान में व्यक्तिगत अध्ययन। जब देखो कोई मोटी किताब पढ़ती रहती थी। चंद्रिका जैसी पुस्तकमुखी के साथ जीवन बिताने की बात सोच कैसे ली मैंने। वह तो मुझे संदर्भ दे कर बतायेगी कि प्यार कैसे करना चाहिए। दो दिनों में ही मेरी अवस्था हवा निकले टायर सी हो गई। ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(कहानी का दूसरा और अंतिम भाग दिनांक 12 जुलाई को)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-7388401277228305609?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/7388401277228305609/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=7388401277228305609' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7388401277228305609'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7388401277228305609'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/07/blog-post_09.html' title='सब कुछ ठीक ठाक है'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SlX3M4Tg4aI/AAAAAAAABMs/ic9f34jWidU/s72-c/vic+memo.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-6053684031823200389</id><published>2009-07-06T12:59:00.002+05:30</published><updated>2009-07-06T13:03:32.994+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>बहुत मनुहार के बाद भी...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SlGn_hWjDwI/AAAAAAAABMk/w4UgnW1hu60/s1600-h/sapna.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 286px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SlGn_hWjDwI/AAAAAAAABMk/w4UgnW1hu60/s320/sapna.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355246141646769922" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानी रुकी नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम अनदेखा करते गये, होनी थी कि टली नहीं&lt;br /&gt;मोड़ ले कर आगे बढ़ गई, कहानी रुकी नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकट पगडंडियाँ थी और घूप थी तेज&lt;br /&gt;हम प्यासे रह गये पनिहारिन थी कि रुकी नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहती रही पुरवाई, और भीगती गई पलकें &lt;br /&gt;साश्रु नयनों से पर एक भी आँसू टपका नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हवाओं ने रुख फेरा और दिन जल्दी ढला नहीं,&lt;br /&gt;रोशनी करते रहे रात भर सुबह का कोई पता नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब कौन जाने क्या है क्षितिज के उस पार &lt;br /&gt;वहाँं जाने की राह कभी हमें मिली नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करवटो की कहानी सिलवटों मे उलझती गई&lt;br /&gt;मन का हिंडोला था कि कभी रुका नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिह्वा में अंकुश था होंठ थरथरा कर रह गये&lt;br /&gt;बदलते गये अर्थ मौन के, शब्दों का पता नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ भी तो नहीं होता सरल यदि हम पी लेते गरल &lt;br /&gt;जिन्दगी के घूँट पीते रहे, पर जिन्दगानी रुकी नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत मनुहार के बाद भी पाहुन रुका नहीं&lt;br /&gt;प्यार होते होते रह गया पर हुआ नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मथुरा कलौनी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-6053684031823200389?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/6053684031823200389/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=6053684031823200389' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/6053684031823200389'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/6053684031823200389'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/07/blog-post_06.html' title='बहुत मनुहार के बाद भी...'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SlGn_hWjDwI/AAAAAAAABMk/w4UgnW1hu60/s72-c/sapna.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-4337241152493729866</id><published>2009-07-01T21:23:00.003+05:30</published><updated>2009-07-01T21:27:29.860+05:30</updated><title type='text'>ख़राशें - मंचन की कुछ झलकियॉं</title><content type='html'>&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-4337241152493729866?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://www.youtube.com/watch?v=s7uAoYP6bcM' title='ख़राशें - मंचन की कुछ झलकियॉं'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/4337241152493729866/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=4337241152493729866' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/4337241152493729866'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/4337241152493729866'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='ख़राशें - मंचन की कुछ झलकियॉं'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-8443451593259620517</id><published>2009-06-26T21:37:00.002+05:30</published><updated>2009-06-26T21:45:56.390+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कभी आ कर तो देखो</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SkTz7_ga2VI/AAAAAAAABMc/VJo8vBuFvzA/s1600-h/girl-lawn-7f6.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 215px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SkTz7_ga2VI/AAAAAAAABMc/VJo8vBuFvzA/s320/girl-lawn-7f6.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5351670469208234322" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रस्में पुरानी ही सही, पांव की बेड़ियां ही सही&lt;br /&gt;हो कर दूसरों के, रस्में निभाकर तो देखो&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;तुम्हारी थी दुनियाँ तुम्हारी ही है दुनियाँ &lt;br /&gt;हमें भी कभी दुनियाँदारी सिखा कर तो देखो&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;खुली हवा में सांस ले ली, मेड़ों मे अठखेलियां कर ली&lt;br /&gt;अब बंद है आशियाना,  इसमें समा कर तो देखो&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आदतें वही औ' लीक पर चल रही है जिन्दगी&lt;br /&gt;कभी कदम से कदम मिला कर तो देखो&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;न चांद हमारा,  न चांदनी हमारी &lt;br /&gt;अनजान डगर पे चलना सिखा कर तो देखो&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;नैना लगा कर हारे, सपने संजोए बैठे हैं&lt;br /&gt;दौड़े आयेंगे हम,  बुला कर तो देखो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                     मथुरा कलौनी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-8443451593259620517?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/8443451593259620517/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=8443451593259620517' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/8443451593259620517'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/8443451593259620517'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/06/blog-post_26.html' title='कभी आ कर तो देखो'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SkTz7_ga2VI/AAAAAAAABMc/VJo8vBuFvzA/s72-c/girl-lawn-7f6.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-5052808952593821713</id><published>2009-06-20T13:36:00.006+05:30</published><updated>2009-06-20T13:53:41.312+05:30</updated><title type='text'>बेंगलोर में ख़राशें का सफल मंचन</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SjycCrmWpAI/AAAAAAAAA8g/0zceJWZgE9E/s1600-h/Kharaashein+at+Alliance+Bangalore.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SjycCrmWpAI/AAAAAAAAA8g/0zceJWZgE9E/s320/Kharaashein+at+Alliance+Bangalore.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5349322027286569986" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा पिछला नाटक कब तक रहें कुँवारे हँसी ठहाकों से भरपूर था। अगले मंचन के लिये एक कॉमेडी की तलाश थी।  हाथ लग गया गुलज़ार का लिखा नाटक ख़राशें।  मैं साधारणतया उतना भावुक व्यक्ति नहीं हूँ। पर नाटक पढ़ा तो मैं तो हिल गया। सोद्देश्य मंचनीय नाटक कम ही मिलते हैं। ख़राशें में तो एक-एक शब्द 'हार्डहिटिंग' है। कहना न होगा कि अगले मंचन के लिये नाटक की खोज 'ख़राशें' पर समाप्त हो गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़राशें एक ऐसा नाटक है जिसमें आप पात्र में परकाया प्रवेश नहीं कर पाते हो या  गुलज़ार का दर्द नहीं समझ पाते हो तो आप पात्र के साथ न्याय नहीं कर पाते हो। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sjybsb-dnaI/AAAAAAAAA8Y/yQG4gYQxS9I/s1600-h/Kharaashein+-+Sudarshan+and+Sanil+in+Khuda+Hafiz.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/Sjybsb-dnaI/AAAAAAAAA8Y/yQG4gYQxS9I/s320/Kharaashein+-+Sudarshan+and+Sanil+in+Khuda+Hafiz.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5349321645135601058" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाटक की परिकल्पना श्री सलीम आरिफ़ की है। गुलज़ार की कविताओं और कहानियों का 'कोलाज़' बहुत ही संगठित है। थोड़ी भी ढील की गुंजाइश नहीं है।  सलीम आरिफ़ ने अपने मंचन में सात पात्र रखे थे। हमने रिहर्सल आरंभ किया 10 पात्रों से। पारिवारिक और काम के पूर्वाग्रह के कारण दो पात्र कुछ निकल गये। आठ पात्रों से नाटक आगे बढाया। जो पात्र ख़ौफ़ कहानी को अंजाम दे रहा था वह अभिनेता ओ अच्छा था पर पात्र को नहीं जी पा रहा था।  उसको एक बड़ी ही असहज विदाई देनी पड़ी।  ख़ौफ़ का रोल उस पात्र के पल्ले पड़ा जो पहले ही खुदा हाफ़िज़ वाला लंबा रोल कर रहा था। वह ख़ौफ़ करने को कतई तैयार नहीं था। थोेड़ी ना नुकुर के बाद वह तैयार हो ही गया। 11 पन्नों का लंबा एकल संवाद था। वह तो पात्र में डूब ही गया। नाटक में चार कहानियाँ हैं और कहानियों के पहले कहानी को परिभाषित करती कविताएँ हैं।  नाटक के पात्रों चारों कहानियों ने दर्शकों को दहला दिया। कविताओं ने कइयों की आँखें आर्द्र कर दी थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाटक के तीन प्रदर्शन हुए। तीनों हाउसफुल रहे। कई लोगों को निराश वापस जाना पड़ा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यों तो हिन्दी नाटकों की अंग्रेजी पत्रों में बहुत कम समीक्षाएँ आती है पर कलायन संस्था बेंगलोर में बीस वर्षों से हिंदी नाटकों का मंचन कर रही है। समीक्षाएँ भी आती रहती हैं। ख़राशें के लिये हम सराहना मिली है। (&lt;a href="http://www.kalayan.org/kalayantheatre/index.html"&gt;यहाँ पढ़ें&lt;/a&gt;) सब मिला के ख़राशें का मंचन बहुत ही संतोषजनक रहा।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SjybbtD9oKI/AAAAAAAAA8Q/q1LfEOog4Ds/s1600-h/2.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 214px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SjybbtD9oKI/AAAAAAAAA8Q/q1LfEOog4Ds/s320/2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5349321357664297122" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-5052808952593821713?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://www.kalayan.org/kalayantheatre/index.html' title='बेंगलोर में ख़राशें का सफल मंचन'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/5052808952593821713/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=5052808952593821713' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/5052808952593821713'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/5052808952593821713'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/06/blog-post_20.html' title='बेंगलोर में ख़राशें का सफल मंचन'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SjycCrmWpAI/AAAAAAAAA8g/0zceJWZgE9E/s72-c/Kharaashein+at+Alliance+Bangalore.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-7601457499304843356</id><published>2009-06-02T00:12:00.001+05:30</published><updated>2009-06-02T00:19:14.159+05:30</updated><title type='text'>प्रेस में</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SiQhvKOF-iI/AAAAAAAAA7w/n4U3jhbBHcI/s1600-h/Kharaashein+in+TIME+OUT+BANGALURU.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5342432152049285666" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 238px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SiQhvKOF-iI/AAAAAAAAA7w/n4U3jhbBHcI/s320/Kharaashein+in+TIME+OUT+BANGALURU.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-7601457499304843356?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/7601457499304843356/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=7601457499304843356' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7601457499304843356'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7601457499304843356'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='प्रेस में'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SiQhvKOF-iI/AAAAAAAAA7w/n4U3jhbBHcI/s72-c/Kharaashein+in+TIME+OUT+BANGALURU.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-7124810833910636440</id><published>2009-05-01T20:53:00.012+05:30</published><updated>2009-05-01T21:27:59.852+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नाटक'/><title type='text'>ख़राशें</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SfsWvT3_blI/AAAAAAAAA6w/dtlyNQ3K51o/s1600-h/Final_Poster.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5330879585967894098" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 229px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SfsWvT3_blI/AAAAAAAAA6w/dtlyNQ3K51o/s320/Final_Poster.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;पिछले नाटक में बहुत हँस लिये अब हँसी रोक कर एक गंभीर विषय पर कुछ देर सोच लें। गुलज़ार के शब्दों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'ज़रा सा आओ न, बैठो वतन की बात करें।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यों तो वतन की बात टाइमपास करने के लिये की जाती है। बैठकों में ज्ञान प्रदर्शन के लिये की गई बौद्धिक बकवास। पर हम वतन की बात को मंच पर ले आये हैं क्यों कि गुलज़ार कहते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उम्मीदें डूब गई जो निगल-निगल के भँवर-&lt;br /&gt;उम्मीदें हाँप रही हैं जो बादबानों में&lt;br /&gt;उम्मीदो-शौक़ के क़त्लो-ग़बन की बात करें-&lt;br /&gt;वतन की बात करें?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम सांप्रदायिक हिंसा के उस घिनौने दौर से वे गुज़रे हैं जब फ़िरक़ावाराना वहशत ने इंसानियत के जिस्म में ख़राशें पैदा कीं थी। पर समय के गुज़रने के साथ कुछ बदला नहीं। पुराने ज़ख़्म भरने भी नहीं पाते कि फिर दंगे और फिर ख़राशें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दर्दनाक क़िस्से को गुलज़ार ने बड़ी बेबाकी से हमारे सामने रखा है- ख़राशें में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुलज़ार की इन कविताओं और कहानियों में विषम परिस्थितियों में भी इंसानियत का चेहरा चमक कर सामने आया है। कवि हमसे कोंच कोंच कर पूछता है यदि आप ऐसी विकट परिस्थिति में फँसें तो आपकी सोच पर मज़हब का पर्दा होगा या इंसानियत की समझ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंचन जून 5 और 6 को है। यदि आप उस समय बेंगलोर में हैं तो अवश्य आयें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Venue &lt;/p&gt;&lt;p&gt;Alliance Francaise de Bangalore&lt;br /&gt;Millers Tank Bund Road,&lt;br /&gt;Vasanth Nagar&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Date and Time&lt;br /&gt;Friday 5th June 2009 at 7:45 PM&lt;br /&gt;Saturday 6th June at 4 PM and 7PM&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Ticket Rs 150&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Available at&lt;br /&gt;Super Market, 5th Avenue, Brigade Road&lt;br /&gt;New Arya Bhavan Sweets, all outlets&lt;br /&gt;also available online&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.buzzintown.com/"&gt;http://www.buzzintown.com/&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;Contact&lt;br /&gt;9341220780 / 9845804430&lt;br /&gt;editor@kalayan.org&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;नाट्य संस्था कलायन&lt;br /&gt;निर्देशन मथुरा कलौनी&lt;br /&gt;लेखक गुलज़ार&lt;br /&gt;परिकल्पना सलीम आरिफ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंच पर&lt;br /&gt;सुदर्शन राजगोपाल&lt;br /&gt;दीपक अजमानी&lt;br /&gt;सनिल यती&lt;br /&gt;योगी वर्मा&lt;br /&gt;परमजीत&lt;br /&gt;चिन्मय मुखी&lt;br /&gt;रवि यादव &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;फातिमा फारिया&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-7124810833910636440?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/7124810833910636440/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=7124810833910636440' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7124810833910636440'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7124810833910636440'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='ख़राशें'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SfsWvT3_blI/AAAAAAAAA6w/dtlyNQ3K51o/s72-c/Final_Poster.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-6378875053464741764</id><published>2009-04-16T21:44:00.002+05:30</published><updated>2009-04-16T21:51:30.008+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्‍यंग्‍य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्‍य'/><title type='text'>बेतुकी तुकबंदी और मंच की कैद</title><content type='html'>कहानी व्यंग्य लेख नाटक कोई भी विधा हो, सामने कोरा कागज हो और हाथ में लेखनी हो तो कुछ न कुछ बन ही जाता है। उससे भी बढ़िया सामने कंप्यूटर हो तो क्या बात है। दस बार लिखो, दस बार डिलीट करो, कोई सबूत नहीं रहता कि आपने एक पेज लिखने में कितनी बार काटा छाँटा या कितना समय बरबाद किया। आत्मविश्वास के लिये बहुत आवश्यक है कि अपना लिखा हुआ अपने ही द्वारा कटा न मिले। और फिर जब लोग आपको लेखक समझते हैं तो हमारा भी धर्म बनता है कि उनकी यह धारणा बनी रहे कि हम कलम घिस्सू लेखक नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर कविता के मामले में हम मार खा जाते हैं। कविता रचने की सोचते ही नानी मरती है। चार पंक्तियों की तुकबंदी लिखने में चार हफ्ते लग जाते हैं। और जो बनता है वह इतना बेतुका ही होता है कि लगाये न लगे बनाये न बने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर क्या करें! लोगों की धारणा है कि आप लेखक हैं तो कविता अवश्य लिखते होंगे। उनके इस विश्वास को ठेस न पहुँचे, हम कविता रचने को वाध्य हैं। विश्वास कीजिये हमारी प्रत्येक कविता के पीछे महीनों की मेहनत और परेशानी है। जब कविता तैयार हो जाती है तो लगता है, गुलज़ार जी के शब्दों में , 'कहीं तवाज़न बिगड़ गया है तो कहीं सीवन उधड़ गई है'। टिप्पणियाँ भी मिलती हैं - 'कलौनी जी, भाव बहुत अच्छे हैं, यदि आप स्केल पर ध्यान दें तो बहुत अच्छा हो'।  भैया हम तो पहले से ही कबूल किये बैठे हैं कि हम कोई कवि-ववि नहीं हैं। काहे का स्केल और काहे का मीटर! आपको हमारे पद्य में गद्य नजर आता है तो अच्छा है न! हम हैं तो गद्य लेखक ही। जब हम पहले ही हथियार डाले बैठे हैं तो आप काहे को घाव में नमक मल रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहर की काव्य गोष्ठियों में भी जाना ही पड़ता है। स्थिति से बचने की हमारी रणनीति रही है, देर से जाओ और बहाना बना कर जल्दी निकल आओ।  सिर पर बिजली गिरी जब हमने पाया कि हमारे दुश्मनों ने साजिश रच कर हमें साहित्यिक संस्था का अध्यक्ष मनोनीत कर दिया है। और यह साहित्यिक संस्था हार्डकोर कवियों की संस्था है। जब भी काव्यगोष्ठी होती है वे हमें बुलाते हैं और मंच पर बिठा देते हैं। मंच का कैदी, अब न देर से आ सकता है और न जल्दी खिसक सकता है। ऊपर से बेसुरे कवियों की बेतुकी तुकबंदी। यातना ही यातना। :(&lt;br /&gt; कितने ही उपाय किये, कितने जतन किये कि कविता से हम कितना ही दूर क्यों न भागें, कविता हमारा पीछा नहीं छोड़ती। कभी कभी सोचते हैं कविता हाडमांस वाली कविता क्यों न हुई!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-6378875053464741764?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/6378875053464741764/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=6378875053464741764' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/6378875053464741764'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/6378875053464741764'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='बेतुकी तुकबंदी और मंच की कैद'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-5843803378610200715</id><published>2009-03-08T07:09:00.000+05:30</published><updated>2009-03-08T07:11:30.875+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='होली'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>होली</title><content type='html'>होली&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं पिचकारी की मार, कहीं रंगों की बौछार है&lt;br /&gt;कहीं उड रहा अबीर, तो कहीं गुलाल है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीगी चोली है, भीगा है चोला भी&lt;br /&gt;कुछ रंग यहॉं हैं, कुछ रंग वहॉं भी हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ रंग चरणों में अर्पित, कुछ माथे पर शोभित हैं&lt;br /&gt;कौन अपना कौन पराया है, रंगों ने भेद मिटाया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंग है भंग है, पर नहीं रंग में भंग है&lt;br /&gt;जोश है उमंग है, रवानी है तरंग है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंगों की भाषा है रंगों की ही बोली है&lt;br /&gt;कोई किसी का हो लिया तो कोई हो ली है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितनी ही गहरी नहीं लगती गाली है&lt;br /&gt;देखो किसी ने मन की गांठ खोली है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूलो गिले शिकवे, छेड अपनों से ही होती है&lt;br /&gt;होली के रंग में रंग जाओ, बुरा न मानो होली है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                        मथुरा कलौनी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-5843803378610200715?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/5843803378610200715/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=5843803378610200715' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/5843803378610200715'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/5843803378610200715'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='होली'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-7783870345112127296</id><published>2009-02-06T14:41:00.001+05:30</published><updated>2009-02-06T14:45:38.596+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्‍यंग्‍य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>गंदगी उलीचने के बहाने</title><content type='html'>आजकल भारतीय संस्‍कृति को लेकर लोग बहुत परेशान हैं। मैं भी परेशान हूँ। आजकल 'पब कल्‍चर' की बात चल रही है। मुझे तो ये शब्‍द ही समझ में नहीं आते हैं। पब में जाना पब कल्‍चर कहलाता है तो जो रेस्‍तरॉ में जाना क्‍या कहलायेगा। सिनेमा कल्‍चर कभी सुनने में नहीं आया। भारतीय संस्‍कृति दस हजार वर्षों से भी अधिक पुरानी है। तब न सिनेमा थे न रेस्‍तरॉ। आज भारतीय संस्‍कृति को इनके दुस्‍प्रभाव से बचाने के लिये कोई सेना क्‍यों नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि हम अपने को वाह्य प्रभाव से बचा कर कूपमंडूक बन जायें तो बसुधैवकुटुम्‍बकम् का राग हम कैसे आलाप सकते हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;10000 साल पुरानी संस्‍कृति की रक्षा करने के लिये क्‍या हम उस युग के वल्‍कल वस्‍त्र धारण कर लें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी आदि नारियॉं सोमरस का पान करती थीं। यज्ञ में भाग लेती थीं। हमारे वेदों की कई त्रऋचायें उन्‍हीं ने रची थीं। यदि वे हमारी संस्‍कृति का अंग हैं तो आज कुछ लड़कियों के पब में जाने से भारतीय संस्‍कृति कैसे डांवाडोल होने लगी!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई सेनायें खड़ी हो गई हैं हमारी संस्‍कृति को बचाने के लिये। पर संकट किससे है!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही कई सवालों से परेशान हूँ। इस परेशानी में यह कविता बन पड़ी है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कब तक...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;यथार्थ से दूर&lt;br /&gt;आदर्श से परे&lt;br /&gt;थोथे सिद्धांतों के&lt;br /&gt;नारे लगाते रहे।&lt;br /&gt;गंदगी उलीचने के बहाने&lt;br /&gt;गंदगी में जीते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न समेट पाए साहस इतना&lt;br /&gt;अपनी निरर्थकता से&lt;br /&gt;दो चार हो सकें।&lt;br /&gt;मुख आइने में देखते&lt;br /&gt;अपने से आँखें चुराते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसकी भी लाठी रही&lt;br /&gt;वह भैंस खोल कर ले गया।&lt;br /&gt;चलता है चलता रहेगा&lt;br /&gt;यह राष्ट्रगीत हम गाते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राम की आयोध्या&lt;br /&gt;राम का मंदिर&lt;br /&gt;राम का नाम हम भुनाते रहे।&lt;br /&gt;राम जब भी आए&lt;br /&gt;बनवास उनको हम देते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मथुरा कलौनी&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-7783870345112127296?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/7783870345112127296/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=7783870345112127296' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7783870345112127296'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/7783870345112127296'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='गंदगी उलीचने के बहाने'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-8349973080006823908</id><published>2009-01-26T12:32:00.003+05:30</published><updated>2009-01-26T12:40:25.558+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्‍य व्‍यंग्‍य'/><title type='text'>सूज़ैन का बिस्तर</title><content type='html'>मीनाक्षी    - पहले तुम बोलो।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश - मैं पहले क्यों बोलूँ?  पहल तुमने की है। तुम ही पहले बोलो।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी - नहीं तुम। यू फर्स्ट।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश  - सवाल ही नहीं उठता। यू फर्स्ट। लेडीज फर्स्ट।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी  - देखो पहले आप, पहले आप में गाड़ी छूट जाएगी।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश  - जिसको गाड़ी पकड़नी हो, वो चिंता करे। अपन की कोई गाड़ी नहीं छूट रही।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी  - हूँ ... तो गणेश मैं...&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश  - गणेश नहीं, गनेश।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी  - शुद्ध शद तो गणेश है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश  - गनेश मेरा नाम है, कोई व्याकरण का विषय नहीं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी -  ठीक है ठीक है। लो तुम्हारी शिष्या सूज़ैन आ गई। &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;  सूज़ैन - गानेश, मैं तुमको खोज रही थी।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी - आओ सूज़ैन, तुम अच्छे मौके पर आई।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सूज़ैन - मैं जब भी आती वही मौका अच्छा होता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश - हूँ।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी - हूँ क्या?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश  - मैं जब भी आती हूँ, वही मौका अच्छा होता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सूज़ैन - ठीक है गुरु जी। मैं जब भी आती हूँ, वही मौका अच्छा होता है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी  - गुरु जी?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सूज़ैन  - मैंने गानेश को अपना गुरु जी बनाया है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश  - (मुँह बनाता है।) इस वाक्य में बहुत गलतियाँ हैं, सूजन।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी - क्यों बेचारी का नाम बिगाड़ रहे हो! नाम सूजन नहीं सूज़ैन है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश  - मैं इसको कितनी बार बता चुका हूँ कि मेरा नाम गानेश नहीं गनेश है। पर यह गानेश ही पर अटकी हुई है। अब मैंने भी तय किया है कि मैं इसे सूजन बुलाऊँगा, फिर देखता हूँ इसका मुँह सूजता है कि नहीं।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;    (मीनाक्षी हँसती है।)&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सूज़ैन - सूजन क्या होता है?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी - थोड़ी देरी के लिए अपना हिंदी अध्याय बंद रखो। मैं जो बताने वाली थी उसे सुनो। कल गनेश हमें बाहर खाना खिला रहा है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश  - मैंने ले जाने की बात की थी, खिलाने की नहीं। सब अपना-अपना बिल चुकाना।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी - (हँसती है) ठीक है, ठीक है। तुम जैसे कंजूस से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सूज़ैन - गान...गनेश, मुझे तुमसे हिंदी के बारे में बात करनी है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश - ठीक है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सूज़ैन - आज शाम को?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश - ठीक है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सूज़ैन  - बिस्तर में?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश - क्या...!!&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी - ये क्या हो रहा है! मैं चलती हूँ।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश - नहीं रुको मीनाक्षी। यह क्या बकवास कर रही हो तुम सूज़ैन?&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सूज़ैन  - तुम्हारे पास टाइम नहीं है तो...&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश - तुम मुझे गुरु मानती हो और ऐसी बातें कर रही हो! तुमने मुझे समझ क्या रखा है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सूज़ैन  - मैंने क्या कहा जो तुम गुस्सा हो रहे हो।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश - बिस्तर में बताने को कह रही हो और कहती हो कि मैंने क्या कहा!&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सूज़ैन  - बिस्तर में नहीं बताओगे तो समझ में कैसे आएगा।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश - फिर...फिर..&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी  - गनेश मुझे लगता है कि यहाँ कुछ गड़बड़ है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश - कुछ क्या, बहुत गड़बड़ है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी - सूज़ैन तुम हिंदी बिस्तर में क्यों सीखना चाहती हो।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  सूज़ैन - मुझे प्रॉब्लम है। मैं स्लो हूँ। गनेश डीटेल में बताएगा तो मुझे समझ में आएगा।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;    (मीनाक्षी हँसने लगती है और हँसते हँसते लोट-पोट हो जाती है।)&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश - अब तुमको क्या हुआ!&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी  - नहीं समझे? सूज़ैन तुम्हें बिस्तर में नहीं विस्तार में बताने को कह रही है।&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  गनेश - विस्तार... बिस्तर... विस्तार। हे भगवान! अर्थ का अनर्थ इसी को कहते हैं!&lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;  मीनाक्षी सूज़ैन को समझाती है। बिस्तर और विस्तार में अंतर बताती है। सूज़ैन शर्माती है और झिझकती है। फिर तीनों हँसते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-8349973080006823908?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/8349973080006823908/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=8349973080006823908' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/8349973080006823908'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/8349973080006823908'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='सूज़ैन का बिस्तर'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-4113732497740431761</id><published>2008-12-27T14:40:00.002+05:30</published><updated>2008-12-27T14:55:45.497+05:30</updated><title type='text'>खुली तिजोरी</title><content type='html'>हमारी संस्कृति कहती है अतिथि देवो भव। मेहमानों के साथ कैसा व्‍यवहार करना चाहिये यह हमें बचपन से ही सिखाया जाता है। आजकल ब्रांड-युग में लोग घुट्टी के बारे में नहीं जानते होंगे नहीं तो कहता कि अतिथि सेवा-सम्मान हमें घुट्टी में पिलाया जाता है। ऐसे अतिथि प्रेमी देश में सैलानी या टूरिस्ट किस श्रेणी में आते हैं?  मेरा अनुभव है कि टूरिस्टों की श्रेणी ही अलग है। कुछ अपवादों को छोड़ कर टूरिस्ट खुली तिजोरी की तरह होते हैं। कोई भी उन्हें लूटने का अधिकार रखता है। पर्यटक को देख कर लोगों की बॉंछें खिल जाती हैं। उनके मुँह से लार टपकने लगती है। आश्चर्य में डालनेवाली बात यह है कि टूरिस्ट बेचारा तो खैर लुटता ही है पर लूटने वाले उस पर्यटनस्थल के आकर्षण का भी कोई आदर नहीं करते हैं। होटल हों या रेस्तरॉं, दुकानदार हों या फेरीवाले, गाइड हों या ऐजेंट कोई भी उस जगह की, उसके आकर्षण की उपेक्षा ही करता है जिससे उनकी रोजी रोटी चलती है। पर्यटक हो या पर्यटन स्‍थल, बस समान भाव से लूटो। लूटने वाले अनेक। पर अनेकता में एकता की भावना रहती है लूटने के प्रति। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी हाल ही में  किसी कार्यवश देहरादून जाना पड़ा। देहरादून तक आ ही गये हैं तो सोचा मसूरी  भी घूम आयें। होटल बुक नहीं किया था। सोचा दिसंबर का महीना है वैसे ही भीड़ कम होगी। मिल जायेंगे होटल। फिर एक गेस्टहाउस का रेफरेंस अपने पास था ही। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गेस्टहाउस निकला माल रोड से बहुत दूर। हमें दो दिन तो यहाँ रहना था। फिर इतनी दूर गेस्टहाउस में रहने में आने जाने में परेशानी होगी। यही सोच कर होटल में रहने का इरादा किया। टैक्सीवाले ने पहला होटल दिखाया जो पिक्चरहाउस के पास था। होटल बाहर से तो ठीक ही लगा। पर जब कमरा देखा तो वहाँ से भाग आया। कमरे का किराया था 2500 रुपये। दिसंबर में 50 प्रतिशत डिस्काउंट। पर कमरा इतना गंदा था कि वहाँ रहने का सवाल ही नहीं उठता था। होटल के मैनेजर ने पीछे से आवाज लगाई, 'साहब आपके लिये किराया 700 रुपये कर दूँगा।' पर गंदगी से कौन समझौता करे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टैक्सीवाला दूसरे होटल ले गया। बाहर से होटल देख कर दिल खुश हो गया। कमरा दिखाया तो ठीक ही लगा। हमें दो ही रात तो ठहरना था। हमें बताया गया कि कमरा सुपरडीलक्स है। सीजन में रेट 3000 रु है। आफसीजन में 50 परसेंट डिस्काउन्ट। डिस्काउन्ट के ऊपर 20 परसेंट रीबेट। यानी कमरा 1200रु का पड़ा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होटल का फॉर्म भरा। सामान कमरे में रखवाया। और मसूरी बाजार घूमने निकल पड़े। माल रोड पर एक रेस्तराँ में चाय और पकौड़े का आर्डर किया। टूटी प्याली में चाय आई। पकौड़े की प्लेट गंदी। पकौड़े देखने में तो ठीक थे पर खाने में लगा बेसन में बालू मिलाया गया है। दाम वही जो टूरिस्ट के लिये होते हैं। और यह हुआ मालरोड में सुसज्जित रेस्तराँ में। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मसूरी में पालीथीन वर्जित है। पर करीब 70 प्रतिशत दुकानदार धड़ल्ले के साथ आपको सामान पालीथीन बैग में ही देते हैं, इस टिप्पणी के साथ कि साहब पालीथीन तो यहाँ वर्जित है। हमें जुर्माना लग सकता है, फिर भी (अहसान मानिये कि) हम आपको पालीथीन कैरी बैग दे रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घूमफिर कर, थक कर होटल का कमरा खोलते हैं तो बदबू का ऐसा झौंका कि लगा कमरे में कचरे की गाड़ी पार्क कर रखी हो। रिशेप्शन से शिकायत की तो तुरंत एक आदमी बाल्टी और फेनाइल ले कर आ गया। उसने बताया कि इस कमरे में बाथरूम से बदबू आती है। अभी सब ठीक हो जायेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब वह ठीक करके गया तो पूरा कमरा फेनाइल की बहुत ही तेज महक से महकने लगा। लगा यह महक तो रात भर में भी जाने वाली नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमरा बदलवाया। यानी कमरा नं 103 से 105 में गये। 105 में न बदबू थी और न फेनाइल की महक। पर बाथरूम गीला और गंदा था। बिस्तर पर चादर दागदार। तकिये के खोल मैले। शिकायत की तो नये चादर भिजवाये गये, जो पहले से अधिक गंदे थे। चादर लाने वाले लड़के से पूछा, &lt;br /&gt;'क्यों भैया ये चादर धुले हैं न यूँ ही तह करके रख दिये गये हैं?' &lt;br /&gt;'नही साहब, चादर धुले हुये हैं। देखिये न इस कोने में, धोबी ने चादर फाड़ रखा है।' &lt;br /&gt;'फटा चादर क्यों बिछा रहे हो? &lt;br /&gt;'चादर ठीक है साहब, बस थोड़ा कोने में फटा है।' &lt;br /&gt;'और कितने दाग हैं इसमें!' &lt;br /&gt;'सफेद चादर है साहब, थोड़े बहुत दाग तो रहेंगे ही।' &lt;br /&gt;इस तरह निरुत्तर हो कर हमने हथियार डाल दिये। खैर। अब जो रजाई को देखा तो बहुत ही मैली निकली। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने सोचा सुपरडीलक्स कमरा है। एयरकंडीशन का टेंप्रेचर बढ़ा देंगे। रजाई की आवयश्यकता नहीं पड़ेगी। अब जो गौर से देखते हैं तो कमरे में एयरकंडीशन की कोई व्यवस्था ही नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रूम हीटर मंगाया। उसका चार्ज 100 रुपये अतिरिक्त। अब जो हीटर लगाते हैं तो वह इतने कम वाटेज का निकला कि एकदम नजदीक जाओ तो ही गरमी मिल सकती है। कमरे में दो हीटर लगाने चाहे तो हमें बताया गया कि दो नहीं लग सकते, क्यों कि कमरे का फयूज उड़ जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात में ठंड से बचने के लिये रजाई ओढ़नी ही पड़ी। तब पता चला कि रजाई में पिस्सू हैं। आधे धंटे में ही रजाई उतार फैंकी और पाँव खुजाते हुये उठ खड़े हुये। किसी तरह रात बिताई। दूसरी रात के लिये हमने माल रोड से गरम कपड़े खरीद लिये थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाथ रूम की अवस्था के बारे में आप स्वयं अंदाज लगा लीजिए। मैं बताने लगूँ तो यह लेख लंबा हो जायेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह आठ बजे चेकआउट के समय हिसाब मुझे एक चिट पर बताया गया। मैंने बिल माँगा तो मुझसे कहा गया कि बिल चाहिये तो आपको टैक्स देना पड़ेगा। मैंने कहा आप बिल अवश्य दीजिये। बिल बनवाने में आधा घंटा समय लगा क्यों कि बिल बनाने वाले साहब सो रहे थे। उन्हें जगा कर बिल बनवाया गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकल होटलों में बिना फोटो आइडी के कमरा मिलना असंभव है, विशेष कर मुंबई की दुर्धटना के बाद। पर मसूरी के इस होटल में तो बिना बिल के ठहराया जाता है। फोटो आइडी के संबंध में उन्हें मालूम तो होगा। पर जब बिना बिल के ठहराया जाता है तो रिकार्ड रख कर अपने ऊपर मुसीबत क्यों मोल ला जाय। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मसूरी में दो दिनों के प्रवास में मैं कई और अनुभवों से गुजरा हूँ। पर कोई इतना आश्चर्य में डालनेवाला नहीं है जितना मेरा होटल के संबंध में हुआ।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मसूरी के बारे में कहा जाता है 'पहाड़ों की रानी मसूरी',  'हिलस्टेशनों की रानी मसूरी'। मुझे नहीं लगा कि वहाँ लोग दिल से मसूरी पहाड़ों की रानी मानते हैं। यह सैलानियों को भ्रम में डालने का तरीका अधिक लगता है, नहीं तो क्‍या कोई रानी के साथ दुव्‍यवहार करता है! मसूरी के साथ दासीवत् व्यवहार होता है। और टूरिस्टों के लिये तो यह अलिखित नियम लगता है कि अवसर मिला है मत चूको, जितना लूट सको लूटो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- मथुरा कलौनी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-4113732497740431761?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/4113732497740431761/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=4113732497740431761' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/4113732497740431761'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/4113732497740431761'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2008/12/blog-post_27.html' title='खुली तिजोरी'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-6195785595044244763</id><published>2008-12-23T13:55:00.000+05:30</published><updated>2008-12-23T13:59:05.869+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>ऐसे कुछ अशआर चाहिये</title><content type='html'>इधर कुंठा उधर त्रास है&lt;br /&gt;आँखें वीरान मन नीराश है&lt;br /&gt;डरे सहमे से दिन हैं&lt;br /&gt;काली डरावनी हैं रातें&lt;br /&gt;भटके हुओं को राह दिखाये&lt;br /&gt;ऐसे कुछ चिराग चाहिये&lt;br /&gt;सोते हुओं को जगाये&lt;br /&gt;ऐसे कुछ अशआर चाहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊँची दीवारें हैं खिड़कियॉं  हैं तंग&lt;br /&gt;निकलने के रास्‍ते हो गये हैं बंद&lt;br /&gt;हताशा में है जीवन&lt;br /&gt;घुट रही है मानवता&lt;br /&gt;सीलन को दूर करे &lt;br /&gt;ऐसी एक  आग चाहिये&lt;br /&gt;इस आग को हवा करें&lt;br /&gt;ऐसे कुछ अशआर चाहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुश्‍मन तो जाना पहचाना है&lt;br /&gt;यारों से कौन बचाये&lt;br /&gt;खुशगवार चेहरे में &lt;br /&gt;जो हैं रकाबत छिपाये&lt;br /&gt;इस बार जो मौसम बदला&lt;br /&gt;जाड़े ठहर गये&lt;br /&gt;जमे रिश्‍ते जो पिघला दे&lt;br /&gt;ऐसे कुछ अशआर चाहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथों में थाम कर मशाल&lt;br /&gt;बढ़ रहे हैं पुआल की ओर&lt;br /&gt;ऐसे नासमझ तो न थे फिर&lt;br /&gt;क्‍यों जा रहे हैं विनाश की ओर&lt;br /&gt;इस बार जो हुआ है आर्तनाद&lt;br /&gt;सब के सब  सिहर गये&lt;br /&gt;आशा की किरण दिखाये&lt;br /&gt;ऐसे कुछ अशआर चाहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोहब्‍बत की है तुमसे&lt;br /&gt;उल्‍फत की रस्‍में भी निभायेंगे&lt;br /&gt;तेरे शहर में अब आये हैं&lt;br /&gt;प्‍यार तो जतायेंगे&lt;br /&gt;तेरी जुबान में ही सही&lt;br /&gt;हमें तो बस संवाद चाहिये&lt;br /&gt;मेरी बात तुम तक पहुँचे &lt;br /&gt;ऐसे कुछ अशआर चाहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिकने पत्‍ते पर ठहरी है&lt;br /&gt;जिन्‍दगी बूँद  ओस की  &lt;br /&gt;इस बदहवासी में करें&lt;br /&gt;कैसे  बातें होश की &lt;br /&gt;बहुत परेशान हैं हम&lt;br /&gt;कसमकश है जीने की&lt;br /&gt;पॉंव में छाले हैं &lt;br /&gt;कुछ तो ठहराव चाहिये&lt;br /&gt;घावों में मलहम लगाये&lt;br /&gt;ऐसे कुछ अशआर चाहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे बारिश की बूँदें &lt;br /&gt;सूरज की तपिस चाहिये&lt;br /&gt;खुली हवा में सॉंस &lt;br /&gt;मेरे सपनों का गॉंव चाहिये&lt;br /&gt;कुँए की जगत में ठॉंव चाहिये&lt;br /&gt;मुझे मेरे हिस्‍से का चॉंद चाहिये&lt;br /&gt;बहुत हो चुकीं रुखसारोजमाल की बातें&lt;br /&gt;अब तो बस इन्‍कलाबी अशआर चाहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  मथुरा कलौनी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-6195785595044244763?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/6195785595044244763/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=6195785595044244763' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/6195785595044244763'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/6195785595044244763'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2008/12/blog-post_23.html' title='ऐसे कुछ अशआर चाहिये'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-1256748891600529683</id><published>2008-12-05T12:56:00.000+05:30</published><updated>2008-12-05T13:06:50.291+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुभव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्‍मरण'/><title type='text'>गोल्‍डक्‍लास में फैशन</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/STjZ5k5k0uI/AAAAAAAAA1M/I-7rH0X-R0o/s1600-h/kangana.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 159px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/STjZ5k5k0uI/AAAAAAAAA1M/I-7rH0X-R0o/s320/kangana.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5276206546645471970" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने जब सिनेमा देखना आरंभ किया था तो कलकत्‍ते के एक फटीचर हाल में पर्दे के एकदम सामने की टिकट पाँच आने में आती थी। स्‍कूल गोल कर कितनी पिक्‍चरें वहॉं देखी थीं! लड़कपन पार कर जब कालेज में दाखिला लिया तो अपने को अपग्रेड किया तथा बालकनी में पिक्‍चर देखना आरंभ किया। आजकल मल्‍टीप्‍लेक्‍स का जमाना है। डेढ़ सौ रुपये दे कर पिक्‍चर देखनी पड़ती है। यहॉं तक तो ठीक है। पर आज तक कोई मुझे पॉंच सौ रुपये दे कर गोल्‍डक्‍लास मल्‍टीप्‍लेक्‍स में सिनेमा देखने के लिये मजबूर नहीं कर सका। पर जब उपहार  स्‍वरूप पॉच-पॉंच सौ की दो टिकटें मिलीं तो सोचा चलो यह अनुभव भी सही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो साहब हम भी सपत्‍नीक गोल्‍डक्‍लास में पिक्‍चर देखने पहुँचे। हाल में लोग बहुत कम थे जो स्‍वाभाविक ही है। लोग इतनी मँहंगी टिकट ले कर क्‍यों सिनेमा देखने लगे जब कि बगल के हाल में वही पिक्‍चर डेढ़ सौ रुपयों में देखी जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हॉल में सीटें इतनी बड़ी कि एक सीट में दो समा जॉंय। सीट में बैठना तो असंभव था। या तो आप अधलेटे बैठिये या पूरे ही लेट जाइये। सीट में कंबल भी रखा हुआ था। कई लोग तो कंबल ओढ़ कर लेट गये थे। चलो पिक्‍चर बोर हुई तो आप तीन घंटे की नींद ले सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब लेट कर पर्दे की ओर देखा तो पाया कि पर्दे का निचला हिस्‍सा तो आराम से दिखता है पर पर्दे का ऊपर का हिस्‍सा देखने के लिये सिर को पीछे की ओर करना पड़ता है जो गरदन के लिये कड़ा ही कष्‍टप्रद कोंण है। हॉल की सीटें श्रीमती जी को बहुत हास्‍यास्‍पद लग रही थीं। हँसते-हँसते उनका बुरा हाल हो रहा था। पिक्‍चर समाप्‍त होने पर हमें एक दूसरे को सहारा देकर सीट से उठाना पड़ा था। वे प्रसन्‍न थीं कि चलो इस अवांछनीय अनुभव पर कम से कम टिकटों पर अपना पैसा नहीं खर्च करना पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहॉं हाल में ही खाने पीने की भी व्‍यवस्‍था है। हरएक सीट में एक-एक साइड टेबल लगा था जिसमें मीनू कार्ड भी रखा हुआ था। पत्‍नी से सलाहमशवरा कर दो सैंडविच और एक बोतल पानी का आर्डर दिया। हॉल के धुँधले प्रकाश में दाम ठीक से दिखे नहीं। बिल आया पॉंचसौ एकतीस रुपये! पॉंच सौ एकतीस रुपये किस बात के! न स्‍वाद, न सर्विस, न वातावरण। उनकी हँसी एक गंभीर सोचमुद्रा में बदल गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब आते हैं पिक्‍चर पर। पिक्‍चर थी फैशन। हमदोनों को पिक्‍चर बहुत पसंद आई। चलो कम से कम पिक्‍चर अच्‍छी लगी। शाम पूरी बेकार नहीं गई। पिक्‍चर अच्‍छी तो थी पर एक बात कहना चाहूँगा कि पूरी पिक्‍चर में कई सीन ऐसे थे जिनमें युवतियॉं बहुत कम वस्‍त्रों में रैंप पर इठला रही थीं।  और लगभग पूरी पिक्‍चर में कैमरे का फोकस नीचे ही रहा था। अब आप अंदाज लगा सकते हैं कि मैं कैसे अनुभव से गुजरा। सीट में अधलेटा बैठने के बाद वैसे ही पर्दे के ऊपरी भाग को देखने में कष्‍ट हो रहा था ऊपर से पूरी पिक्‍चर में कैमरे का लो-ऐंगल! नहीं-नहीं मैं आपत्ति नहीं कर रहा हूँ मैं तो केवल अपना अनुभव आपके साथ बॉंट रहा हूँ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-1256748891600529683?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/1256748891600529683/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=1256748891600529683' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/1256748891600529683'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/1256748891600529683'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='गोल्‍डक्‍लास में फैशन'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/STjZ5k5k0uI/AAAAAAAAA1M/I-7rH0X-R0o/s72-c/kangana.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-1788703395274085690</id><published>2008-10-12T10:25:00.000+05:30</published><updated>2008-10-12T10:27:15.091+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>मोहनी मूरत</title><content type='html'>प्रिया में वे सभी गुण थे जो एक ऑफिस एसिस्टेंट के पद के लिए आवश्यक होते हैं। मोहिनी मूरत और सोहिनी सूरत। प्रचुर मेधा। सभी कुछ ठीक-ठाक और सुंदर। रिक्त पद के लिए उसका चयन हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच बोलूँ तो मैं नहीं चाहता था कि ऑफिस एसिस्टेंट के पद के लिए प्रिया का चयन हो। मेरे लंबे अनुभव ने मुझे सिखाया है कि यदि कोई कन्या आपकी अधीनस्थ हो और प्रिया जैसी संघातिक रूपवती हो, तो वह अपने रूप के दंभ में इस तरह लिप्त होती है कि अंग्रजी में 'पेन इन दि नेक' यानी गर्दन का दर्द और हिंदी में सिर का दर्द साबित होती है। परंतु मेरा सौभाग्य कि प्रिया के संबंध में मेरे भय एकदम व्यर्थ सिद्ध हुए। वह एक आडंबर विहीन, परिश्रमी और कार्यकुशल लड़की निकली। हम कभी कितना गलत सोचते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन प्रिया एक विचित्र अनुरोध ले कर मेरे पास आई। वह ऑफिस के लेडीज टॉयलेट में एक फुल-लेन्थ आईना चाहती थी। पहले तो मुझे समझ में ही नहीं आया कि वह क्या चाहती है। जब समझ में आया तो विश्वास नहीं हुआ। यानी एक ऑफिस में पूरे शरीर को दर्शाने वाला आईना किसने देखा-सुना है। मैंने हंस कर उससे कहा कि वह पूरे आईने को भूल जाए और वाश बेसिन के ऊपर जो छोटा आईना है उसी से काम चलाए। मैं अधिक-से-अधिक उसे एक छोटा स्टूल दे सकता था, जिस पर खड़े हो कर वह वाश बेसिन के ऊपर लगे आईने में स्वयं को इंस्टालमेंट में देख सकती थी। जब मैंने उससे ऐसा कहा तो मेरे इस सरल परिहास पर उसे हँसी नहीं आई। पर अपना आईना वह भूली नहीं। उसने एक जिद सी पकड़ ली थी। उसे जब भी अवसर मिलता वह आईना माँगना नहीं भूलती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके बार-बार माँगने से मैं इस तरह द्रवित हो गया था कि यदि मैं कहीं का राजा होता तो खुशी-खुशी अपना आधा राज्य उसे दे देता। मैंने बड़ी मुश्किल से उसे विश्वास दिलाया कि ऑफिस में लेडीज टॉयलेट में फुल-लेन्थ आईना लगवाना मेरे अधिकार क्षेत्र के बाहर है। अब वह यह अनुरोध करने लगी कि मैं मैनेजर के पास जाऊँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'असंभव।' मैंने कहा, ' अपनी बाल-प्वाइंट पेन के लिए जब भी नए रीफिल की आवश्यकता पड़ती है, मुझे उसे पुराना इस्तेमाल किया हुआ रीफिल दिखना पड़ता है, तक जा कर वह नया रीफिल सेंक्शन करता है। हमारा मैनेजर इस कदर कंजूस है। अब मैं उससे टॉयलेट में पूरे आईने की बात करूँ तो शायद उसकी हृदयगति ही रुक जाय।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी बात पर प्रिया को विश्वास नहीं हुआ। उसने मुझसे पूछा, ' मैं जाऊँ मैनेजर के पास।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका ऐसा कहना मुझे कहीं छू गया। यह उसकी अच्छी प्रकृति थी कि उसने पहले मुझसे पूछा। नहीं तो उसकी जैसी मोहिनी-मूरत-सोहिनी-सूरत-लड़कियाँ सीधे चेयरमैन के ऑफिस में जा सकती हैं। एक अदना मैनेजर की क्या बिसात? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर मैं अपने मैनेजर को अच्छी तरह जानता था। उसके जैसा शुष्क प्रकृति वाला व्यक्ति शायद ही कहीं हो। उसमें रस के नाम पर था रेगिस्तान ही रेगिस्तान। प्रिया की सोहनी सूरत से वह नहीं प्रभावित होने वाला था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'उससे छह आईनों के लिए कहना।' मैंने राय दी।&lt;br /&gt;'छह क्यों, मुझे तो केवल एक चाहिए।' प्रिया ने कहा। मुझे मालूम था कि वह ऐसा ही कहेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'इस ऑफिस में यदि किसी एक वस्तु की आवश्यकता होती है तो छह माँगनी पड़ती हैं। मुझे मालूम है, मैनेजर के खानदान में मोल-भाव करने की बड़ी पुरानी परंपरा है। मेरी मानो, छह माँगना। यदि उसका मूड ठीक रहा तो शायद तुम्हें एक आईना सेंक्शन कर दे। गुड लक!' मैंने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रिया मैनेजर के कमरे में गई और पाँच मिनटों में बाहर आ गई। उसके चेहरे के भाव देख कर मैं समझ गया कि उसे सफलता नहीं मिली। मुझे उसके ऊपर अपार दया आई। भगवान ने उसे इतनी मोहिनी सूरत दी है, पर क्या फायदा? इतिहास साक्षी है कि अच्छी सूरत के कारण लोग राजपाट छोड़ देते हैं। पर यहाँ एक कंजूस मैनेजर की मुट्ठी से प्रिया एक साधारण आईना नहीं छुड़ा पाई। भले ही उसमें रूप का दंभ न हो पर उसके स्वाभिमान को तो ठेस पहुँचनी ही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'यह क्या हो गया है, मेरी तो समझ में ही नहीं आ रहा है।' उसने खोए हुए अंदाज में कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'टेक इट ईजी प्रिया! तुम चिंता न करो। मैं कुछ-न-कुछ करूँगा तुम्हारे आईने के लिए।' मैंने उसे दिलासा देने का प्रयत्न किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तुम समझ नहीं रहे हो। मैनेजर ने मुझे छह आईने सेंक्शन कर दिए हैं।' प्रिया ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;------------------------------------------------------------------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-1788703395274085690?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/1788703395274085690/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=1788703395274085690' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/1788703395274085690'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/1788703395274085690'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2008/10/blog-post_11.html' title='मोहनी मूरत'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-189252346712470887</id><published>2008-10-01T13:45:00.000+05:30</published><updated>2008-10-05T14:25:05.600+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्‍लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्‍यंग्‍य'/><title type='text'>क्‍या पता मेरा डिप्रेशन लौट आये !</title><content type='html'>1&lt;br /&gt;रिटायर होने के बाद मैंने देखा कि लोग आपके स्वास्थ्य के प्रति बहुत उत्सुक हो जाते हैं। जब भी कोई मिलता है या जब किसी से फोन में बात होती है तो जरूर पूछता है कि आपका स्वास्थ्य कैसा है। यह बात मैंने अपने एक मित्र से कही जो रिटायरमेंट में मुझसे काफी सीनियर हैं, तो उन्होने मुझे हिदायत दी, खबरदार अपने आफिस कभी मत जाना। वहाँ लोग तुम्हारे स्वास्थ्य के बारे में तो पूछेंगे ही, पर प्रच्छन्न और परोक्ष रूप में आश्चर्य करेंगे कि तुम अभी तक जीवित हो। तुम्हारा स्वास्थ्य अभी तक अच्छा है! यह सब हुआ कैसे?&lt;br /&gt;मैंने उनकी बात सुन तो ली पर विश्वास नहीं हुआ। ऐसा भी कहीं होता है! जिनके साथ जीवन के बेहतरीन साल निकाले, ऊँच नीच में साथ रहे, जिंदादिल पाटिर्र्यों का आनंद उठाया, वे आफिस में व्यस्तता के कारण भले ही आपको उचित समय नहीं दे पायें, पर आपके बारे यह सोचें कि आप जिंदा कैसे हैं... नहीं नहीं  कभी नहीं।&lt;br /&gt;परसों मैं अपने पुराने आफिस गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2&lt;br /&gt;सोचा था रिटायरमेंट के बाद दुनिया घूमेंगे। जहाँ कभी अकेले गए थे वहाँ सपत्नीक जाएँगे। यार दोस्तों के बुलावे भी आ ही रहे हैं। अक्टूबर का महीना चुना विदेश जाने के लिए। पर हा भाग्य!&lt;br /&gt;रिटायरमेंट के बाद मैंने बुद्धिमानी यह की थी कि बहुत सारा पैसा शेयर मार्केट में लगा दिया। कल खबर आई कि सेंसेक्स 40 प्रतिशत नीचे है और 30 प्रतिशत और नीचे जाने की संभावना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3&lt;br /&gt;सोचा और कुछ संभव नहीं तो नाटक करेंगे। पिछला नाटक जून में किया था। अब समय आ गया है नए नाटक का। हिन्दी में नए नाटकों अभाव है यह तो मालूम था। स्थिति इतनी दयनीय है, यह तब पता चला जब मैंने सभी नाटक छान मारे और अपने मतलब का कोई नहीं मिला। नया नाटक लिखने का उत्साह नहीं पा रहा हूँ। अत: नए नाटक का मंचन अनिश्चित काल के लिए स्थगित करना पड़ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4&lt;br /&gt;2 अक्टूबर से देश में नया कानून आ रहा है जिसके तहत धूम्रपान में कठोर प्रतिबंध लगेगा। सड़क छोड़ कर सब जगह धूम्रपान निषिद्ध होगा। मैं अपने प्रिय पब में अपने प्रिय पेय के साथ अपनी प्रिय सिगरेट नहीं सुलगा पाऊँगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही एक दो और कारण हैं जिनके सामूहिक प्रभाव से मुझे कल कुछ गंभीर प्रकार का डिप्रेशन हो गया था। नैराश्य के अंधकार में गिरता चला गया था। कुछ करने को दिल ही नहीं कर रहा था। इस गहन नैराश्य से बाहर निकलने के लिए कुछ यार दोस्तों को फोन किया।&lt;br /&gt;दिल्ली वाले ने कहा, "अबे काहे का डिप्रेशन। अगली फ्लाइट पकड़ कर दिल्ली आ जा। तेरा डिप्रेशन दूर कर दूँगा।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह तो सही है कि जब तक उसके साथ रहूँगा डिप्रेशन पास भी नहीं फटकेगा पर जब मैंने आने जाने के खर्चे का हिसाब लगाया तो डर लगा कि कहीं दिल्ली से आने बाद डबल डिप्रेशन न हो जाय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलकत्ते वाले ने अच्छी राय दी। "तुमने इतने शौक कसे ड्रिंक्स कैबिनेट बनवाई किसलिये थी। बस उसे खोल कर सामने बैठ जा। फिर देख डिप्रेशन दुम दबा कर कैसे भागता है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह राय मुझे जँच गई।  मैंने बोतल निकाली तो पत्नी ने आवाज दी क्या आज दोपहर से ही चालू हो रहे हो?&lt;br /&gt;मैंने कहा कि मेरे दोस्त ने यही राय दी है क्यों कि आज मुझे डिप्रशन है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;"तुमको डिप्रेशन है?" पत्नी ने कहा। जो शब्दों में नहीं कहा और चेहरे के भाव से दर्शाया वह था "खबरदार मेरे पास मत आना। नहीं तो मुझे भी डिप्रेशन हो जाएगा।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब भी मैं अपनी पत्नी को अपनी व्यथा कथा सुनाता हूँ तो वे मुझसे भी अधिक डिप्रेश हो जाती हैंं। अब जब कभी मुझे भारी-भरकम टाइप का डिप्रशन होता हे वे मेरे पास नहीं फटकती हैं। इस बार तो वे अपनी सहेली का जन्मदिन मनाने चली गईं। शाम को जब लौटीं तो मेरा डिप्रेशन तो वैसा ही था पर अब वह 'रायल चैलेंज' में तैर रहा था। शाम को मैं जल्दी 'सो' गया। आज सुबह देर से  तीन मन भारी सिर ले कर उठा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार्पोरेट दिनों की याद स्वरूप 'रेमी मार्टिन' बची हुई थी। उसका सेवन कर इस लायक हुआ कि यह व्लॉग लिख सकूँ।  डिप्रेशन का तो पता नहीं क्या हुआ। थोड़ी देर में जब 'रायल चैलेंज' और 'रेमी मार्टिन' का असर कम होगा तब पता चलेगा। क्या पता डिप्रेशन लौटे न लौटे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1601548908260800333-189252346712470887?l=mathurakalauny.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/feeds/189252346712470887/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1601548908260800333&amp;postID=189252346712470887' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/189252346712470887'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1601548908260800333/posts/default/189252346712470887'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://mathurakalauny.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='क्‍या पता मेरा डिप्रेशन लौट आये !'/><author><name>मथुरा कलौनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/08652709661569445696</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='20' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SKUtFaQfSnI/AAAAAAAAAqw/ZpC0Kctly9s/S220/MDK+DEC+07.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1601548908260800333.post-5345090942779501131</id><published>2008-09-23T06:45:00.000+05:30</published><updated>2008-09-23T07:15:23.981+05:30</updated><title type='text'>कैले बजै मुरूली</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SNhHP1BSUXI/AAAAAAAAAxw/lYoLMK-nfj4/s1600-h/DSC02277.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SNhHP1BSUXI/AAAAAAAAAxw/lYoLMK-nfj4/s320/DSC02277.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5249023702956396914" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SNhEFzhZOZI/AAAAAAAAAxI/RjmM9jv6G1c/s1600-h/20EF2~1.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SNhEFzhZOZI/AAAAAAAAAxI/RjmM9jv6G1c/s320/20EF2~1.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5249020232220621202" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SNhIa3f9OOI/AAAAAAAAAyY/WaZs-K3i-JE/s1600-h/Sidhi+Khet.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SNhIa3f9OOI/AAAAAAAAAyY/WaZs-K3i-JE/s320/Sidhi+Khet.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5249024992112097506" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तराखंड का नाम लेते ही मन में कई चित्र उभरते हैं। एक बार याद करने लगें तो उन चित्रों में मन ऐसा रमता है कि &lt;br /&gt;सारी दुनिया को भुला बैठे&lt;br /&gt;हम अपने पहाड़ को याद कर बैठे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्यों न हो हमारा पहाड़ है ही ऐया। जाड़ों की ठिठुरती सर्दी में जब चारों ओर फुसरपट्ट (बर्फ की सफेद चादर) होती है तब &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SNhEiSWP0oI/AAAAAAAAAxQ/wxSC6bmRnbc/s1600-h/00008.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SNhEiSWP0oI/AAAAAAAAAxQ/wxSC6bmRnbc/s320/00008.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5249020721531703938" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;लिहाफ के अंदर ठंडी अंगुलियॉं छुआने की शैतानी या सग्गड़ में सुलगते उपलों की गर्मी का जिसने अनुभव किया हो वही जान सकता है सही मानों में पहाड़ी होने का अर्थ। बिना अल्मोड़ा गये अल्मोड़ा के बारे में अनुमान कितना सही हो सकता है वह इस कहावत से विदित होता है -&lt;br /&gt;न गये अल्मोड़ा, ना लाग्या गजमोड़ा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब याद आती है उत्तराखंड की, जब निसास लगता है तो मन कैसा जो हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तराखंड&lt;br /&gt;हिमालय के ललाट पर तिलक है।&lt;br /&gt;देवताओं की क्रीड़ास्थली है, देवभूमि है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंदिरों का देश है। मुनियों की तपोभूमि है।&lt;br /&gt;भरत की जन्मभूमि है। कन्व का आश्रम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पांडवों का अज्ञातवास है।&lt;br /&gt;संजीवनी बूटी है, च्यवनप्रास है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुमित्रानंदन का पल्लव है।&lt;br /&gt;कालिदास की उड़ान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SNhGjf0aucI/AAAAAAAAAxo/7NIWbubs2xo/s1600-h/00014.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SNhGjf0aucI/AAAAAAAAAxo/7NIWbubs2xo/s320/00014.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5249022941351033282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;यहॉं ब्रह्मा हैं, विष्णु हैं और महेश हैं।&lt;br /&gt;अंतहीन सीढ़ीदार खेत हैं।&lt;br /&gt;अल्हड़ पहाड़ी नदियॉं हैं।&lt;br /&gt;तीखी धार पर घास काटती युवतियॉं हैं।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SNhExLmKQPI/AAAAAAAAAxY/1nvezTLpcWQ/s1600-h/00007.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_G6wrZ44_RdQ/SNhExLmKQPI/AAAAAAAAAxY/1nvezTLpcWQ/s320/00007.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5249020977417437426" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुरूँस के फूल हैं। देवदार और चीड़ के पेड़ हैं&lt;br /&gt;काफल, हिसालू, किलमोड़ी हैं। जंगली मेल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाड़-गोध्यारों में लुकाछिपी का खेल है।&lt;br /&gt;नानतिनों का नानतिन्योल है। (बच्चों के खेल)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डाड़े में बिरहन का गीत है।&lt;br /&gt;धाध देती बौजी 
